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@dawriter

“पिता से पहले पिता के बाद”

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डेढ महीने हस्पतालों चक्कर काटे थे उन भाईयों ने अपने पिता को लेकर । वो पिता जिसका घूरना ही काफी होता था इन बेटों के मन में वो डर पैदा करने के लिए जो एक बाप को लेकर हर बेटे में होता है उस बाप को थप्पड़ तक मारे थे इन बेटों ने । उस दिन डाॅक्टर लोग बोले सोडियम कम जाने से दिमागी संतुलन बिगड़ गया । जिसने आप के सिवा किसी को और कुछ ना कहा वो इंसान गालियाँ दे रहा था सबको सभी को मरने के लिए कह रहा था बेटों को लगा अगर थप्पड़ मारें तो शायद पहचान लें हमें ठीक हो जाएं । हालाँकि थप्पड़ मारने के बाद बेटे फूट फूट कर रोए अपने हाथों को दिवार में मारा । रोज़ सोच सोच कर खुद की नज़रों में गिरे ।

 

पूरा डेढ़ महीना कभी हाॅस्पिटल तो कभी घर । और एक दिन सब शांत था । रात रात पिता के साथ जगे बच्चे दिन में निढाल पड़े थे ये सोच कर कि अभी सो लो रात को पापा फिर जगाऐंगे । मगर ये क्या जब तक बेटे जागे पिता सो चुके थे हमेशा के लिए । शोर मचा पड़ा था । भागते हुए कमरे में गए देखा सामने पिता का शरीर पीला पड़ा है । माँ सिरहाने बैठ पिता को जगाने की नाकाम कोशिश में लगी है साथ साथ रोए जा रही है । बेटे जान रहे हैं कि पिता अब नही हैं फिर भी मन को बहला रहे ये कह कर कि डाॅक्टर बुलाओ नब्ज़ देखो ज़िंदा होंगे । ऐसे कैसे बिना बताए चले जाऐंगे । एक आवाज़ तो लगाते । हद है छोटी छोटी बात के लिए चिल्ला के बुलाते थे और दुनिया से चले गए एक बार अलविदा भी ना कहा । डाॅक्टर ने देखा सीधा जवाब “20 मिनट पहले चल बसे”

 

“नही रहे” ऐसे कैसे नही रहे ? बेटों ने कहाँ बना किया था किसी बात से वो ऐसे ही सेवा करते, डाॅक्टरों के पास ले कर घूमते, रात रात जागते, जो वो कहते बेटे करते मगर ऐसे मुँह मोड़ कर जाना सही नही था । उस पत्नी का अपने बच्चों का ज़रा ख़याल नही आया ।

 

20 अक्तूबर शाम 5:16 मिनट साल भर पहले एक ही पल में दुनिया बदल गई । बेटे अकेले रह गए । पिता की अहमीयत तो वो पहले से जानते थे फिर ऐसे महसूस कराने कि क्या ज़रूरत थी । रो नही सकते उन्हे तकलीफ होगी और उन बेटों और पत्नी का क्या जो उन्हे याद कर कर के तिल तिल मरते हैं । खैर फायदा क्या बोलने का पिता ने कौन सा सुनना है । खैर जो भी हो अक्तूबर तुम उन बेटों की नज़र में जितनी अहमीयत रखते थे ना अपनी एक भूल के कारण उस से कहीं ज़्यादा गिर गए उनकी नज़रों से और 20 अक्तूबर तुम तुम तो साले मनहूस हो एक नम्बर के । जब आओगे तब कोसेंगे तुम्हे ये बेटे । पर तुम गुस्सा मत होना बहुत बड़ा दुख दिया है तुमने इन्हे, बाप खोया है इन्होने अपना ये तो कोसेंगे ही।मगर तुम समझदार हो बुरा मत मानना । चलो लग जाओ अपने काम में बस तुम्हे कोसने के लिए ही याद किया था ।

 

बेटे आज बिल्कुल नही रोए  कहा था ना रोने से दुख कम होता है दुख कम होने से यादें धुंधली पड़ने लगती हैं और बेटे तो पिता को भुला नही सकते इसी लिए दर्द का ज़िंदा रहना ज़रूरी है । इसी लिए वो रोऐंगे भी नही ।

 

धीरज झा



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