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@dawriter

"दया ही सभी धर्मों का मूल है"

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दिसम्बर का अंतिम सप्ताह,मैं सर्दी की छुट्टीयाँ बिताने अपने गाँव गया हुआ था। सुबह-सुबह कड़ाके की ठंड़ थी। सूरज अपनी गर्मी बिखेरने की कश्मकश में कोहरे की ठंडक पर आधिपत्य करना चाह रहा था। मैं दोनों हाथों को जेब में ड़ाले हुए चारों और फैली हरियाली पर ओस की बूँदों से हुए श्रृंगार को निहारता,प्रकृति की अनूठी सुंदरता पर मुग्ध हो रहा था। गाँव के अंतिम छोर पर कुछ मवेशी चारागाह की मुलायम घासों का स्वाद ले रहे थे। प्रकृति की मनोरमता में खोया ही था कि तभी अचानक मवेशियों के एक झुंड पर निगाह पड़ते ही मेरे मस्तिष्क की सारी संवेदनाएँ शिथिल पड़ गईं। झुंड में एक चरवाहा अपनी गाय पर अंधाधुंध लाठियाँ बरसाये जा रहा था। सहमी गाय भययुक्त नेत्रों से इधर-उधर देख रही थी किंतु स्वामी के दंड पर प्रतिक्रिया का साहस नहीं कर रही थी। सुबह-सुबह निर्ममता और क्रूरता का ऐसा रूप देखकर हृदय कंपित हो उठा। पास जाने पर ज्ञात हुआ कि उस तर्कहीन-निरीह पशु ने अपने मालिक की अभिव्यक्ति के विरुद्ध कोई कार्य कर दिया था। इसी का दंड वह मूक भुगत रही थी।

मन में उस चरवाहे के लिए कई शब्द थे,किंतु..उम्र का अधिक अंतर होने के कारण मैं चुप-चाप वहाँ से निकल गया। ....अरे भाई! अगर उस मूक पशु में अभिव्यक्ति की इतनी समझ होती तो वह अपना संपूर्ण जीवन एक बंधक की भाँति आपके अधीन नहीं कर देती और शायद अपने अधिकारों के इस प्रकार दमन से क्रुद्ध हो आप पर हमला भी कर देती। किंतु आपने अपने क्रोध में उसकी पीड़ा को समझने की चेष्टा ही नहीं की। इन्हीं विचारों से आहत लौटते वक्त प्रकृति की वही मनोरमता अब पीड़ा से ग्रसित महसूस हो रही थी।

वर्तमान समाज में पशुओं पर अत्याचार की यह घटना तो शायद गिनती में भी ना आती हो। इससे भी अधिक निर्ममता और क्रूरता इन मूक पशुओं के साथ की जाती है। बेचारे कहीं धर्म का शिकार बनते हैं तो कहीं भोजन का। कहीं समाज विकसित हो रहा है तो कहीं क्रूरता और नीचता त्यौरी चढ़ाये बैठे हैं। ये निरीह पशु तो मनुष्य की क्रूरता के बदले भी अपनी वफादारी और प्रेम ही लुटाते हैं। मनुष्य द्वारा स्वार्थ,सुविधा,लाभ अथवा मनोरंजन किसी की प्रेरणा से भी पशु-पक्षियों के साथ किया हुआ अत्याचार उसकी आत्मा का पतन अवश्य कर देगा। जीवों के साथ क्रूरता करने वाले का हृदय भावनाशून्य होकर कठोर हो जाता है। ऐसा हृदयहीन व्यक्ति न तो आत्मिक उन्नति कर सकता है और न समाज में अपने आचरण को शालीन रख सकता है।

हम चाहे जिस भी धर्म के हों,हमें यह समझना होगा कि 'दया ही सभी धर्मों का मूल है'। पशुओं के अधिकार भी मानव-अधिकारों की तरह ही हैं। पशुओं के प्रति हमें दया-भाव उत्पन्न करना होगा। मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म मानवता है और मानवता की रक्षा हेतु दया ही आवश्यक अस्त्र-शस्त्र है।

----शिवम् तिवारी।

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