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@dawriter

व्यापार वर्धक यंत्र

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kumarg by  
kumarg

छोटे शुकुल जादे पढ़े लिखे नहीं लेकिन सरकारी कॉलेज की बदौलत इतनी डिग्री जुगाड़ लिए की खेतीबाड़ी और पंडिताई जैसे काम के लिए अयोग्य हो गये।

शहर जाके भी देख लिया तीन महीने झक मारकर सिक्योरिटी गार्ड बने उसमें भी पहली डयूटी वहीं लगी जहाँ मनोहर पासी का बेटा मनेजर था सलाम मारते हुए दिल रो पड़ा। लंच टाइम में ही भाग खड़े हुए थे।

मकान मालिक ने किराया वसूलने के लिए आधी रात में टीभी पर प्रचार में जो व्यापार वर्धक श्रीयंत्र दिखाई देता है उसी को कमीशन पर बेचने के काम में लगवा दिया।

शहरी तो पढ़े लिखे होते हैं बहुत बतकुच्चन करते और तब भी नहीं खरीदते।

आखिर छोटे शुकुल गांव वापस आ गये। यहाँ उनका पुरोहित वंश से होना यूसपी था ऊपर से धंधे की प्रोफेशनल ट्रेनिंग भी ले चुके थे।
सो सुबह भगवा कुर्ता और त्रिपुंड धारण करके ही निकले।

पहला ग्राहक जो मिला उसने इनके शुक्लाई से प्रभावित होकर एक श्रीयंत्र खरीदा लेकिन जब सिर्फ दस प्रतिशत अतिरिक्त भुगतान पर कंपनी की एक के साथ एक और फ्री वाली योजना का पता चला तो अतिरिक्त भुगतान कर दुसरा भी ले लिया।

बीस रूपये की लौहपट्टी जिसको कंपनी छह सौ रूपये में बेचती है उसे चार हजार में एक और पांच हजार में दो बेचकर शुकुल ने व्यापार की शुरुआत करी। ग्राहक पत्नी ने शंका जताई तो कंपनी के काम न होने पर पैसे वापसी की गारंटी समेत पूर्वजों के पंडिताई के द्वारा कमाये गये पुण्य को भी लौटाने का वादा कर लिया।

सफल बोहनी के पश्चात वो सेलिब्रेशन का ठिया ढूंढ ही रहे थे कि बारिश शुरू हो गई। एक चाय की तड़ी में घुसे तो किसी ने पहचान कर फौरन दादीजी के देहांत की सूचना दी।
भींगते भागते घर पहुंचे। क्रियाकर्म की तैयारियां शुरू हुई। घाट पर पहुंचे तो पता चला घाट के पास के सभी लकड़ी बेचने वालों की लकडियां भींगी पड़ी है।

किसी तरह लोग ऊपर मेनरोड की एक दुकान से कुछ कम भींगी लकड़ियां और धी का डिब्बा लेकर आए। बाबूजी को आग देना था सो वे वहीं चिता के पास खड़े रहे और छोटे शुकुल को पैसा देकर भुगतान करने भेजा।

छोटे शुकुल ज्योंहीं दुकान पर पहुंचे तो अपने ब्रांड का नया नौकौर श्रीयंत्र देखकर चौंक पड़े। कहीं यहाँ कोई धंधे का कम्पीटिटर तो नहीं सोचकर टटोले " ये क्या लटका रखा है कौन चूना लगा गया। "

दुकानदार हत्थे से उखड़ गया " थोड़ा तमीज से ये व्यापार वर्धक श्रीयंत्र है एक बड़े पहुंचे हुए पंडितजी ने बड़े भैया को दिया है , दो थे तो एक उन्होंने मुझे दे दिया। और देखो इस बरसात में भींगी लकड़ियों के खरीदार मिल रहे हैं। पहले तो मुझे लग रहा था श्मशानघाट पर दुकान खोलकर गलती कर दी। लेकिन भला हो उन पंडितजी का अब तो धंधा चौचक हो रहा है पिछले दो घंटे में बारिश के बावजूद लोग घाट की दुकानें छोड़कर मेरे पास आ रहे हैं। "



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