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@dawriter

वृद्धाश्रम

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" मेरे दो दोस्त क्या आ गए, तुमसे चाय बनाना न हो पाया।"

 

" बाबूजी, दूध खत्म हो गया था तो लाने चली गयी थी। लेकर आयी तो आपके दोस्त चले गए थे।"

 

"झूठ और केवल झूठ! मेरा एक छोटा सा काम करने में तुमलोगों की नानी मर जाती है। दो महीने से कह रहा हूँ कि थोड़ा काशी ले चलो लेकिन नहीं! मेरे पेंशन पर पूरा हक है लेकिन मेरा ख्याल रखना नहीं हो पाता है इनसे।इससे अच्छा तो मैं वृद्धाश्रम चला जाता।"

 

" क्या कहा आपने! जितना आपका पेंशन आता है, उससे कम खर्चा है क्या आप पर। दुनिया भर की रिश्तेदारी और उस पर से बीमारी का खर्चा!सबेरे शाम कीच कीच। मैं तो तंग आ गयी हुँ।"

 

"क्या कहा, मैं कीच कीच करता हुँ। अभी समान पैक करता हूँ। अब इस घर में एक दिन भी नहीं रहूँगा।"

 

"हाँ, हाँ! चले जाइये। कौन रोकता है। कुछ तो शांति मिलेगी। आने दीजिये इनको। अब बहुत हो गया।"पति के आने के साथ ही, "इस घर में या तो आपके पूज्य पिताजी रहेंगे या मैं।"

 

"अरे,बात क्या हुई?लोग क्या कहेंगे?" "कुछ नहीं,अगर उनको इस घर से नहीं निकाला तो मैं अभी गैस सिलिंडर में आग लगा लूंगी।"

 

बेटा नम आंखों से अपने बाप को वहाँ छोड़ने जा रहा था जहाँ जाने की कल्पना कोई बाप नहीं करता है। बाबुजी तो चले गए , साथ में घर की खुशियाँ भी ले गए।

 

घर में श्मशान सा सन्नाटा छा गया था। इस एक हफ्ते न कभी वह खुश हो पाई और न ही पति के चेहरे पर कोई मुस्कान ही दिखा। चार पांच बार हैरी के चिल्लाने की आवाज़ ही थी जो पड़ोसियों को सुनने को मिली थी। अब उसे बाबुजी का गुस्सा भी अमृत ही लग रहा था। अपने आपको संभालने की तमाम कोशिश नाकाम ही साबित हुई। फिर भागी वृद्धाश्रम की ओर। दौड़ती रही तो बस दौड़ती ही रही। वहाँ पहुंच कर जब बाबुजी को देखा तो लोक लाज भूलकर ऐसे गले लगी जैसे बचपन में मेला में बिछड़ने के बाद मिलने पर अपने बाप के गले लगी थी।

 

"माफी के काबिल तो मैं नहीं बाबुजी, पर माफ कर दीजिए।" "बेटी, मुझे भी माफ कर दो। दोस्तों के अनुभव सुन सुनकर मैं भी पूर्वाग्रह से ग्रस्त हो गया था।"

 

© मृणाल आशुतोष



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