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@dawriter

मुखर्जी नगर- सपनों का नगर

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दोस्तों मेरा नाम कपिल शर्मा है, मै कानपुर, उ०प्र० का रहने वाला हूं, आज के इस हास्य ब्यंगात्मक आलेख में कुछ काल्पनिक पात्रों का नामोल्लेख करुंगा, और हास्य व्यंग्य हेतु ग्रामीण अंचलों की क्षेत्रीय बोली का भी समावेश कर रहां हूं।

मुखर्जी नगर दिल्ली में स्थित एक छोटी सी बेहद भीड़भाड़ वाली जगह है, जी०टी०बी० नगर इसका करीबी मेट्रो स्टेशन है, देश के कोने-कोने से हर साल लाखों प्रतियोगी छात्र-छात्राये जो यू०पी०एस०सी० की सिविल सर्विसेज की तैयारी करना चाहते हैं, यहां आते है।

लगभग लगभग हर व्यक्ति की कोई न कोई हॉबी होती है, ऐसी ही एक हॉबी है सिविल सर्विस। यू०पी० और इसके मुंह बोले भाई बिहार, यहां तो भइया माजरा ही कुछ अलग है।

बल्लू को अभी जुम्मा जुम्मा चार दिन भये ग्रेजुएशन कम्प~~~लीट किए हुए, कि संध्या कालीन बेला में आई गै चऊबे अंकल, और चाय की चुस्की लेते हुए बोले !अरे! मुरारी भईया, अब तौ लरिका का गरैजु~बेशन हुई गा... काहे ना कलेक्टरी की तई~य्यारी करवाय देव..

बस चौबे अंकल का इतना कहना हुआ, और बल्लू का टिकट कट गया मुखर्जी नगर के लिए। अब यहां के हालात देखिए , जितना बड़ा गांव में रसोईघर होता है उतना बड़ा यहां रहने के लिए रूम/ केबिन मिलता है। 15×10 का कमरा जिसमें 2-4 लोग रहते हैं, उसी कमरे में ही हमारा किचेन, स्टडी रूम, ड्राइंग रूम, बेडरूम, गेस्ट रूम...सब कुछ होता है, कभी कभी तो मैखाने की भी भूमिका अदा करता है 15×10 काम वो रूम।

कभी मुखर्जी नगर में खड़े होकर एक बार चारों तरफ नज़र दौड़ाइए, क्या दिखेगा आपको? ई बड़े बड़े होर्डिंग, कटआउट कि लगेगा कि किसी ठठेरी बाज़ार में खड़े हैं आप। अब उन बोर्डों पर लिखी बातों को पढ़िए, आपका दिल बैठ जाएगा। विद्यार्थी से ज्यादा आज यहाँ का शिक्षक आत्मविश्वास से भरा लगता है, और होर्डिंग पर उनकी लगी फ़ोटो किसी साउथ के हीरों को मात देती हुई लगती है। लगता है जैसे इनको ज्यादा चिंता है हमारे माँ बाप से, इनको ज्यादा जल्दी है हमें आईएएस बना देने की, सामान्य पृष्ठभूमि से आया हुआ छात्र ये सब देख के ऐसा भरमाता है कि वो लगातार इन कोचिंग सेंटरों के चक्कर काट काट कर अपने जीवन के स्वर्णिम दौर का चार पांच साल, दो तीन मिनट की तरह कब काट देता है उसे पता ही नहीं चलता।

चारो तरफ ऊंची-ऊंची इमारतें, लाल पीले हरे नीले दूर दूर तक कोचिंग्स की होर्डिंग्स पोस्टर्स ऐसे प्रतीत होते हैं जैसे राजस्थान की सांभर झील में फ्लेमिंगो (हंसावर) विचरण कर रहे हों। सुबह आंख खुलते ही " द हिंदू, जनसत्ता, इकनॉमिक टाइम्स" के आर्टिकल्स की अंडर लाइनिंग, कटिंग्स शुरू हो जाती है। इसके बाद का टाईम तो कुरुक्षेत्र से लड़ते हुए योजना की योजनाएं समझने में निकल जाता है।

यहां हर कोचिंग्स के क्लास रूम की भीड़ देखकर 1756 में कलकत्ता में नवाब सिराजुद्दौला कृत ब्लैक होल घटना की याद आ जाती है।

बत्रा चौराहे पर खड़े खड़े कन्याकुमारी की कुमारियों से लेकर त्रिपुरा की त्रिपुर सुंदरियों के दर्शन होना स्वाभाविक है, यहां हर 15 मिनट में चार बार प्यार हो जाता है।

वहां गांव में हमारी गुलाबों मंगलुआ के साथ फिलम देख रही- ट्वायलेट एक प्रेम कथा, और हम यहां कालाहारी मरुस्थल (दक्षिण अफ्रीका, नामीबिया, बोत्सवाना) में बुशमैन जनजाति खोज रहे हैं।

गांव में अपने किसी शादी में जाते तो मुंह में रूमाल फंसा के नागिन वाला डांस या भांगड़ा बस दो ही पता थे, वो तो यहां आके पता चला राज्यों के अलग अलग लोक नृत्य होते हैं जैसे केरल – कथकली, आंध्रप्रदेश – कुचिपुडी, उत्तर प्रदेश- कथक, तमिलनाडु – भरतनाट्यम।

इस इतिहास ने तो दिमाग का दही कर रखा है, कभी तराइन में पृथ्वीराज के साथ महमूद गजनवी को लड़ा देते हैं तो कभी हल्दी घाटी में राणा प्रताप को बाबर से भिड़ा देते हैं।

कभी कभी सोचते हैं मोहब्बत तो हमारे सामने थी और हम कक्षा 6 से कक्षा 12 तक एन०सी०ई०आर०टी०, इंडिया ईयर बुक, प्रशासनिक सुधार आयोगों में ही उलझे रहे।

और इधर ये कोचिंग सेंटर वाले तो मेंटल पैसेंट का भी एडमिशन लेलें, ये नहीं की जाने दें वापस उन सबको अपने गाँव देश। कह दीजिये कि आप से न हो पायेगा, हमसे तो खैर हुआ नहीं। काहे आह ले रहें हैं इतने बच्चों की, और अगर कहीं आपको लगता है कि हमारे साथ अन्याय हो रहा है तो शिक्षक का चोला उतार आइये गले मिलिए, मित्र बनिए और एक लड़ाई लड़िये इस व्यवस्था के खिलाफ। हमारे लिए न सही, अपने लिए न सही, आने वाली पीढ़ी के लिए तो लड़िये। जानते हैं साहब, हम गरीब लोग हैं, दिल्ली में रहे नहीं कभी तो समझने में थोड़ा समय लग गया। पर अब समझ आ रहा है कि पैसा हमारा, समय हमारा, जवानी हमारी, और इन सब पे ऐश आपकी और यहाँ के बाशिंदों की।

और कभी तो हमे खुद लगता है हमसे ना हो पायेगा, चलो अब अब लौट चलें, अपने गांव जहां मां की ममता है, पिता का संरक्षण, चौबे अंकल के मजेदार उपदेश, और हमारी गुलाबो का प्यार,, फिर तभी पिछले 2 साल का प्रिलिम्स का पर्चा आंखों के सामने तांडव करने लगता है।

और फिर एक बार तैयार हैं जंग के लिए....यू०पी०एस०सी० के मैदान में जो शायद इस बार हम जीत जांयें............
(कपिल शर्मा)



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