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@dawriter

बड़े बड़े लोग

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मेरी पत्नी ने मुझे किसी को भी लिफ्ट न देने के लिए सख़्त हिदायत दे रखी है। परन्तु उसके इस फ़रमान के बावज़ूद पहले मैं लोगों को लिफ्ट दे दिया करता था। मुझे लोगों को, खासकर ऐसी सड़कों पर जहाँ अपनी गाड़ी के अलावा आने-जाने के कोई साधन नहीं हैं, लिफ्ट मांगते देख लगता था कि इन लोगों की सहायता कर देनी चाहिए तब मैं अपनी पत्नी की हिदायत भूल जाता था और बरबस ही मेरा पैर गाड़ी के ब्रेक पर पड़ जाता था और मैं गाड़ी रोक लेता, उन लोगों को लिफ्ट देता और जहाँ वो रोकने को कहते रोक देता। फिर गाड़ी आगे बढ़ाकर सोचता कि चलो अच्छा हुआ कुछ लोगों की सहायता हो गई, करनी भी चाहिये, आख़िर आदमी ही आदमी के काम आता है, इत्यादि, इत्यादि।

परन्तु अब मैंने लोगों को लिफ्ट देना बंद कर दिया है। और इसके लिए वो लोग ही ज़िम्मेदार हैं क्योंकि मैंने अनुभव किया कि कुछ ने तो शराब पी हुई होती है और उनके गाड़ी में घुसते ही पूरी गाड़ी शराब की बदबू से भर जाती है। अब एक बार गाड़ी में बिठाकर उनको नीचे उतरने के लिए कहना मुझसे नहीं होता, नहीं नहीं। और कुछ के जूतों में इतना कीचड़ लगा होता है कि गाड़ी के पूरे फ्लोर पर कीचड़ ही कीचड़, हे बाबा, और कुछ लोग गाड़ी में बैठते ही बदबूदार गैस पास कर देते हैं कि सांस लेना दूभर हो जाता है, बाप-रे-बाप अब क्या करें ? और सुनने में आया है कि कभी-कभी आदमी इस चक्कर में चोर-डाकुओं को भी लिफ्ट दे बैठता है और फंस जाता है। इसलिए ऐसी कृपा करने में कोई लाभ नहीं है, ये सोचकर अब मैं लोगों को लिफ्ट नहीं देता।

ये पुरानी बात है। मैं दिल्ली से सूरजकुंड वाली सड़क से अपने घर जा रहा था। मैंने देखा कि एक पुलिसवाला लिफ्ट लेने के लिए हाथ से इशारा कर रहा था। पुलिसवाला है, शायद ड्यूटी पर ज़ल्द पहुँचना होगा, इसकी हेल्प करनी चाहिए, और मैंने ब्रेक पर दबाव बढ़ा दिया। गाड़ी रुक गयी, मैंने दरवाज़ा खोलकर पूछा, “कहाँ जाना है ?”

“आगे, सिद्ध्दाता आश्रम।” उसने ज़वाब दिया।

“ठीक है, बैठ जाईये।”

उसके गाड़ी में बैठ जाने के बाद मैं चुपचाप गाड़ी चलाने लगा।

कुछ देर के बाद वो बोला, “वहाँ पर सत्संग है, इसलिए जा रहा हूँ।”

“आपकी ड्यूटी है वहां पर?” मैंने पूछा।

“नहीं साब, मैं सुनने जा रहा हूँ। सुना है बहुत पहुंचे हुए संत आये हैं, उनका प्रवचन है। मेरी ड्यूटी तो एन आई टी में है, प्रवचन सुन कर वहां जाऊँगा, दो घंटे बाद।”

मैं चुप रहा, मगर उसकी प्रवचन सुनने की बात सुनकर मैं काफ़ी हैरान हुआ – पुलिसवाला और प्रवचन ! पुलिसवाले तो नंबर एक के धूर्त होते हैं, किसी को नहीं छोड़ते, घूस लेना तो इनका सामाजिक अधिकार है, और गालियाँ तो इतनी देते हैं – बाप-रे-बाप – ये तो भयंकर विरोधाभास है। शायद अपने पाप, मेरा मतलब प्रवचन सुनकर अपने कुछ पापों का प्रायश्चित करने जा रहा होगा, वगैरा वगैरा। ये सब सोचते हुए मैंने गर्दन उसकी ओर घुमाई। वह क़रीब पचपन – साठ  के बीच का होगा, काफ़ी मोटा स्थूलकाय, पेट भी निकला हुआ, सफ़ेद मूछें, रंग सांवला, और चेहरा कठोर।

“क्या बात है, सौ चूहे खा के बिल्ली हज को चली !” मैं मन ही मन सोचता रहा और चुप रहकर गाड़ी चलाता रहा।

उसकी आवाज़ फिर सुनाई दी, “सा’ब, दुनिया में क्या है, कुछ भी नहीं, सब यहीं रह जाएगा, बस दो घड़ी राम का नाम ले लें।”

मैंने थोड़ा सिर हिलाया।

“सा’ब इस दुनिया में क्या है, लोग पैसे के पीछे इस क़दर भाग रहे हैं कि पूछो मत, किसी को फ़ुरसत नहीं है, होश नहीं है, बस पैसा और पैसा।” वह सीधे देखते हुए गंभीरता से बोला।

मैं चुप रहा।

“देखो न सा’ब – कितने बड़े-बड़े डॉक्टर हैं, बड़े-बड़े इंजीनियर हैं, कितना पैसा है इनके पास – क्या करेंगे, सब यहीं रह जाएगा।” और उसने एक हल्की सी आह भरी।

डॉक्टर शब्द सुनकर मैं थोड़ा सावधान हो गया था। न चाहते हुए भी मैंने गर्दन घुमाकर उसकी और देखा। मैंने देखा उसके चेहरे पर कुछ उदासी थी, और आँखों में रिक्तता। मैं कुछ नहीं बोला और फिर से सामने देखते हुए गाड़ी चलाता रहा। वैसे भी ये रोड़ पहाड़ीनुमा है, इस रोड़ पर गाड़ी चलाते हुए ऐसा लगता है जैसे किसी हिल स्टेशन पर छुट्टियाँ मनाने जा रहे हों। ट्रैफिक भी कम रहता है, इसलिए इस रोड़ पर गाड़ी चलाने में बड़ा आनंद आता है।

वह भी सामने देख रहा था जैसे शून्य में देख रहा हो। उसने फिर शुरू किया, “इनकी कोठियां देखो – कितनी आलीशान ! और बच्चे देखो, बड़े-बड़े स्कूलों में पढ़ते हैं,  एसी गाड़ियों में स्कूल जाते हैं, और बच्चे क्या साहब, इनके कुत्ते भी गाड़ियों में घूमते हैं। सर जी, मैंने सुना है कि इनके कुत्तों के लिए बिस्कुट इंग्लैंड अमरीका से आते हैं और मीट फाइव-स्टार होटल से।” फिर उसने मेरी तरफ गर्दन घुमाई और बोला, “सा’ब, बड़े-बड़े डॉक्टर हैं, बड़े-बड़े इंजीनियर हैं, कहाँ ले जायेंगे इतना पैसा ?”

वह मायूसी से अपनी बात कह रहा था और मैं सुन रहा था।शायद वह दूसरों के पास अधिक पैसा होने से मायूस था। लेकिन यह भी हो सकता है कि उसे स्पिरिचुअल अवेकनिंग हो गई हो और धन की व्यर्थ्तता समझ में आ गयी हो ! जो भी हो, मुझे सुनाने समझाने का क्या फायदा? मैं तो इसकी बातें सुनकर सुधरने वाला हूँ नहीं, तो फिर मुझे सुनाने का क्या फायदा? हो सकता है वो ये जताने की कोशिश कर रहा हो कि वह एक आम घूसखोर पुलिसवाला नहीं है, बल्कि एक धार्मिक, सत्संगी पुलिसवाला है – एकदम दूसरों से अलग। जो भी हो मुझे क्या?

“सा’ब जी, आजकल के डॉक्टर कोई काम फ्री में नहीं करते – किसी की कटी ऊँगली पर भी पेशाब करने को कहो तो फीस मांग लेते हैं, और इंजीनियर – सब खा जाते हैं – इंटें, रोड़ी, सीमेंट, बदरपुर, सब...इनका पेट ही नहीं भरता। क्या करेंगे इतना पैसा कमाकर, सब यहीं रह जाएगा।”

मुझे भी पता नहीं क्यों उसकी बातों में आनंद आने लगा था। मैंने बोला कुछ नहीं, बस धीरे से गर्दन हिलाता रहा। उसे लगा कि शायद मैं उसकी बातों से सहमत हूँ, या हो रहा हूँ , या हो जाऊँगा।

उसने फिर से कुछ दबी आवाज़ में कहना शुरू किया, “ सा’ब जी, इनकी बीवियां देखो, एकदम गोरी-चिट्टी, हाथ लगाओ तो मैली हो जाएँ, सारा दिन ब्यूटी पार्लर में बैठी रहती हैं, हज़ारों रुपये ख़र्च कर डालती हैं, रोज़ाना,” वह थोड़ी देर को रुका फिर बोला, “इनकी पार्टियों में महँगी-महँगी शराब चलती है, हमें सब पता है, मगर कोई पूछने वाला नहीं! इनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता साहब – बड़े-बड़े डॉक्टर हैं, बड़े-बड़े इंजीनियर हैं।”

उसकी गंभीरता उसके दिल का दर्द बयां कर रही थी। लगता था कि वह डॉक्टरों और इंजीनियरों से ख़ासा नाराज़ था और मैं उसकी इस नाराजगी पर मन-ही-मन मुस्कुरा रहा था। तभी सिद्ध्दाता आश्रम के मंदिर दिखाई देने लगे।

उसने मुझसे कहा, “यहीं उतार देना सर, यहीं पर सत्संग है।”

मैंने गाड़ी रोक दी। उसने उतरने के लिए दरवाज़ा खोला और अपनी एक टांग बाहर निकाली, फिर अचानक मेरी ओर मुड़कर पूछा, “आप क्या करते हैं सा’ब ?”

एक सेकंड के लिए मैं झिझका कि इसे क्या बताऊँ ? डॉक्टर तो ये सुनना नहीं चाहेगा, इंजीनियर भी नहीं, उनसे तो यह पहले ही ख़फा है, तो फिर? और मुझे दूसरा कुछ भी ध्यान न आया, मेरे मुंह से तुरंत निकल गया, “डॉक्टर।”

और डॉक्टर सुनते ही जैसे उसके होश उड़ गए। उसका चेहरा देखने लायक था। वह भारी क़दमों से धीरे-धीरे नीचे उतर कर खड़ा हो गया। वह कुछ कहना चाहता था और इससे पहले वह कुछ कहे, मैंने गाड़ी आगे बढ़ा दी।

आगे जाकर मुझे ज़ोर से हंसी आई और मैं अकेला ही हंस पड़ा। फिर मुझे उसका जुमला याद आया – बड़े-बड़े डॉक्टर हैं, बड़े-बड़े इंजीनियर हैं।

मैं फिर हंस पड़ा।

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