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@dawriter

बेवड़ा

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#बेवड़ा

बरसात का मौसम था इसलिए मोहन जल्दी ही दुकान बंद करके घर को चल दिया। ऑटो भी बड़ी मुश्किल से मिला पर सड़क से गली में घुसते ही सड़क का खस्ताहाल देख उसने आगे बढ़ने से इनकार दिया। संयोग से बिजली भी नहीं थी। जेब से मोबाइल निकाला तो वह भी ऑफ था। अब अंधेरे में ३-४०० मीटर की दूरी मिलों लम्बी लग रही थी।

वह एक एक कदम सोच सोच बढ़ा रहा था। अचानक ऐसा लगा कि किसी चीज़ से पैर टकरा गया हो।वह डरकर पीछे हो गया। फिर कुछ आवाज़ सी आयी। मानों किसी आदमी की आवाज़ की हो। उसने पूछा,"कौन? कौन है?" .....

जबाब न मिलने से उसका डर और बढ़ गया। फिर भी हिम्मत करके पूछा," कौन है?कौन है ?"

"तू कौन है?बे!"

आवाज़ कुछ जाना पहचाना-सा लगा। नज़दीक गया तो देखा कि कोई शराबी टुन्न होकर सड़क पर कीचड़ में गिरा हुआ है। जैसे ही उसे उठाने की कोशिश की," अबे साले, छोड़ मुझे।"

"सोहन!" वह चौंका,

"उठ, चल!....अरे... भाई, उठ। क्या हाल बना लिया है?"

"छोड़ दे मुझे।"

"चल घर!"....शराब पीता है तू, ये मुझे पता था पर,..!"

"मैं क्या करता हूँ?"

"क्या करता है?तू ऐसे बेवड़ा बन जायेगा, ये न पता था।"

"क्यों,जिसका बाप शराबी, उसका बेटा बेवड़ा। हा हा हा। क्या बुरा है!"

"एक ही बाप के बेटे तुम भी हो और मैं भी। हम दोनों ने उनसे सीखा है! देख मुझे!"

"क्या देखू, बत्....ता! कहते हुए वह फिर से कीचड़ में ढुलकने लगा.

"मेरे बेवडे भाई, तुमने उनसे शराब पीना सीखा और मैंने शराब को हाथ न लगाना सीखा।" उसने उसे कस कर उठा अपने कंधे पर रख घर की ओर चल पड़ा, गली में अब बिजली आ चुकी थी.

© मृणाल आशुतोष



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