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@dawriter

बाढ़

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"माँ! बहुत हिम्मत के बाद आदित्य के मुँह से ई शब्द निकल पाया।"

"बोलो!"

" लछमन भइया को अपना पक्का पर बोला लें!"

"खबरदार, जो उसका नाम भी लिया।"

"मां, पानी बहुत बढ़ गया है। खपड़ा का घर है और नीचे फर्श भी तो नहीं है। कहीं चौकी धँस गया तो भइया भउजी भले बच जाय पर चारु बच्चा नय बचेगा।"

"कितना गन्दा गन्दा गाली दिया था हमको, पता है तुमको कुच्छो! उसको कोड़ा में खिलाये थे। केवल बरसात का पानी उसके दरवाजा चला गया इसलिए। घृणा आता है उसके बारे में सोचकर।"

"उसने तो अपना जात दिखा दिया। अब हमारी बारी है। हम भी वैसन बन जाये क्या? इतना कठोर नहीं बनो।"

" रघु कक्का के यहाँ, क्यों नहीं चला जाता है?"

"तुम तो जानती ही हो। उनसे भी लड़ाय करके बैठल है।"

"सबसे झगड़ा लड़ाय कर लेगा तो ऐसन समय में कौन साथ देगा?"

"मां, ऊ बच्चा सब को कुछ हो जायेगा तो अपने आपको माफ कर पाओगी क्या?

......

"यहाँ आयगा तो अपने शरम से डूब मरेगा पर बाढ़ में तो नहीं डूबेगा।"
.....

"मां, बुला लेने दो न! बड़की काकी कितनी मानती थी तुमको और हमको। कम से कम उसकी खातिर।"

" बुला लो शरधुआ को। माय बेटा के नाम पर पार उतर जायगा।"

"हो लछमन भइया, हो! जल्दी जल्दी बच्चा सबको लेकर आ जाइये।"

"क्या! कुछ कहा क्या रे आदितबा?"

"हाँ, आ जाइये। सब बच्चा को लेकर। हम छज्जी पर आ जाते हैं। वहीं पकड़ा दीजियेगा।"

" किस मुँह से हम आएं। हम तो माय जैसी काकी को ....।"

"पैर पकड़ लीजियेगा। फिर ऐसी गलती नहीं कीजियेगा। माँ, खुद बोली है आपको आने के लिये। बाकी बात बाद में करियेगा। पानी बहुत तेजी से बढ़ रहा है।"

"हम तो काकी के सामने आने के काबिल नहीं हैं। लेकिन आना तो पड़ेगा ही।"

लछमन के आंखों में पश्चाताप के आँसू थे और आदित्य के आंखों में खुशी के।

© मृणाल आशुतोष



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