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@dawriter

बाबा

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अपनी सहेली विदुषी के कहने पर रक्षा आशुतोषानंद जी महाराज के आश्रम तो आ गयी पर आने के साथ ही उसका सारा उत्साह जाता रहा। वह सोच रही थी कि बहुत बड़ा आश्रम होगा, हज़ारों की भीड़ होगी पर इसके विपरीत बहुत छोटा सा आश्रम और बमुश्किल दस पंद्रह लोग थे। मन तो हुआ कि लौट जाएं फिर सोचा,जब इतनी दूर आ गयी हूँ तो मिलकर ही जाती हूँ।

आसनविहीन चटाई पर बैठे महाराज मोबाइल पर कुछ कर भी रहे थे और आगंतुक भक्तों की समस्या का समाधान भी बता रहे थे। अचानक उसका ध्यान एक लड़के की ओर गया जो अपनी व्यथा महाराज को बता रहा था।

"प्रभु, मैंने बी टेक किया है। छह महीना हो गया पर अभी तक जॉब नहीं मिला है। मन करता है कि ज़हर खा लूं।"

"वत्स! फेसबुक चलाते हो?

"जी, महाराज।"

" कितना समय देते हो फेसबुक पर?"

"यही कोई दो तीन घण्टे! सकुचाते हुये लड़के ने कहा।"

" जाओ! फेसबुक चलाना बन्द कर दो। तीन महीने में जॉब मिल जाएगा। जाओ अब।"

अगला भक्त

अपनी बारी देख रक्षा आगे बढ़ी।

"भंते!क्या कष्ट है? महाराज ने उसके आंखों में आंख डालते हुए पूछा।"

"महाराज, शादी के पांच साल हो गए हैं। पर मैं अभी तक माँ नहीं बन पाई।"

"अकेले आयी हो?"

"जी महाराज।"

"अपने बाएं गाल में एक थप्पड़ मारो।"

"क्या?"

"सुना नहीं, मैंने क्या कहा? महाराज गुस्सा हो गए।"

धीरे से एक थप्पड मार रक्षा गहन सोच में पड़ गयी कि कहाँ फँस गयी मैं।

"पति या माता-पिता को बताकर आयी हो?"

"जी।जी नहीं महाराज।"

"अब अपने दाहिने गाल पर ज़ोर से थप्पड़ मारो।"

रक्षा उठने लगी। फिर सबकी नज़र खुद पर टिकी देख अपने गाल पर थप्पड़ लगा लिया। अब रक्षा को लग रहा था कि वह रो ही देगी।"

" रिपोर्ट साथ में लायी हो?"

"नहीं। नहीं महाराज।"

" अगले पूर्णिमा को रिपोर्ट लेकर पति के साथ आना। समझी कि नहीं। और हाँ, सीधा घर जाना। नहीं तो अनिष्ट हो सकता है। समझ गयी।"

घर जाते समय रक्षा सोच रही थी कि यह बाबा इंसान है या शैतान या फिर कुछ और...।"

© मृणाल आशुतोष

Image Source: punjabkesari



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