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@dawriter

प्रेम वाला खाना

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कृष्ण गोपाल को बिस्कुट खाते देख कंचन ने पूछा "नाश्ता बना दूं, क्या लोगे?"
"हां भूख लग रही है। कुछ भी बना दे। क्या बनाओगी?"
"आलू का पराठा बना दूं?"
"बना दे।"
कंचन ने पराठे के साथ अदरक वाली चाय भी बना दी।
"कंचन आज बहुत मुद्दत बाद आलू के पराठे में स्वाद आया है।"
"खाना तो खुशबू भी अच्छा बनाती है। कभी शिकायत तो आपने नहीं की।"

"कंचन जब से तुमने खाना बनाना छोड़ा है, खाने में रस नही रहा। नौकर अच्छा खाना बनाते हैं लेकिन खाना बनाते समय अपनापन नहीं होता जिस कारण रस नहीं होता। वो सिर्फ नौकरी करते हुए सिर्फ काम करते हैं। अपनत्व की भावना नहीं होती जिस कारण खाने में रस नहीं आता। कंचन जब तुम खाना बनाती थी तब पति और बच्चों के लिए खाना बनाती थी। खाना बनाने की रस्म नहीं निभती थी बल्कि अपना फर्ज समझ कर प्रेम से खाना बनाती थी। वो फर्ज और प्रेम खाने में समा जाता था जिससे खाने में रस आता था। नमक, मिर्च-मसाले, तेल कम या ज्यादा भी होते फिर भी स्वादी लगते क्योंकि तुम प्रेम से खाना परोसती।

यहां नौकर सिर्फ खाना पूर्ति करते हैं। आज देखो दस बज रहे हैं अभी तक आये ही नहीं।"
पति की बात सुनकर कंचन मुस्कुराई "क्या करूं, बीमारी के कारण अब काम होते नहीं। उम्र भी तो पैंसठ की हो चुकी है। आजकल के बच्चे रसोई में घुसते नहीं। मजबूरी है क्या किया जाए?"
"तभी तो जो मिलता है खा लेते हैं।"
"रविवार का दिन है, बच्चे भी छुट्टी के कारण देर से उठे हैं। महारानी खुशबू छुट्टी कर गई है। खाना आज प्रेम और वात्सल्य से खाना बनाते हैं।"

आज मुद्दत बाद कंचन रसोई में नाश्ता बनाने गई। पोता-पोती भी खुशबू को देखने रसोई में आये। उनके पेट में भी चूहे कूद रहे थे।
"दादी आज खुशबू नहीं आई। भूख लगी है।"
"नाश्ता तैयार है मेरे स्वीट्स।"
दादी के हाथ से तैयार नाश्ता खा कर दोनों पोता-पोती दादी से चिपक गए।
"वाओ दादी आज नाश्ता बहुत टेस्टी और यम्मी बना है।"
"आज का लंच और डिनर भी टेस्टी और यम्मी बनेगा।"
"दादी आप बनाओगे?"
"बिल्कुल आज दादी लंच और डिनर बनाएगी।"
"वाओ फिर तो मजा आ जायेगा।"
बच्चों के चेहरे पर खुशी देख कृष्ण गोपाल मुस्कुरा दिए।
"बुढ़ापे में बात तो सही करते हो। प्रेम और वात्सल्य ही खाने में स्वाद बढ़ाते हैं। मुझे नहीं लगता कि मैंने नाश्ता अच्छा बनाया है।"
"पत्नी और मां का प्रेम और वात्सल्य खाने को अमृत बनाता है चाहे वह कैसा ही बना हो। हकीकत तुम्हारे सामने है।" कृष्ण गोपाल ने कंचन का हाथ अपने हाथ में लेकर कहा।

Image Source: youtube



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