0
Share




@dawriter

पुराने किस्से

0 2       

पूरे साल भर पहले की बात है उसके बाद बहुत कुछ बदला पर लोग और उनके हाल अभी भी बदलाव की उम्मीद वाले किनारे पर ही खड़े हैं ।
सफर की घटना 

 ————————————-

पापा की तबियत का सुन कर पहले ही मन बेचैन था | भरी हुई ट्रेन में भी ऐसा लग रहा था जैसे मै अकेला ही हूं | सामने वाली दो सीटों में एक सीट मेरी थी और दूसरी सीट नाला अभी आया नही था | मै अंधेरे में ही बाहर झांकता हुआ जैसे अपने भविष्य की झलकियां देख रहा था जिस में साफ साफ कुछ नज़र नही आ रहा था | फोन की तरफ देखे जा रहा था की कब भाई का फोन आए और वो कहे पापा ठीक हैं | 
तभी मेरा ध्यान टूटा एक बच्चे के रोने से | नज़र गई सीट के नीचे पैरों के पास जहां एक लड़की जो कम उम्र में शादी के बाद दो बच्चों की माँ बन कर औरत हो गई थी | सामने खड़ा था उसका पति जो यही कोई 21, 22 साल होगा | एक बच्चा जो गोद में था वो दिनों का लग रहा था | मासूम सा लोक लाज त्याग कर रोये जा रहा था चिल्ला कर और एक बच्ची थी जिसे उसने लगभग सीट के नीचे ही सुला रखा था | मैने फिर अपना ध्यान हटा लिया | कुछ देर बाद फिर उधर नज़र गई जब सामने दो लोग सीट के लिए लड़ रहे थे | 
मेरा ध्यान लड़ाई की तरफ जाने से पहले मेरे सीट के नीचे पड़ी लेटी बच्ची की तरफ गया | वो बेसुध सुकून से लेटी थी और उसकी माँ और बाप वहां से जा चुके थे | बच्ची के पैर आने जाने वालो रास्ते में फैले थे और सामने सीट को कश्मीर मुद्दा समझ कर लड़ रहे बन्दों को इसकी ख़बर तक नही थी | मै दो मिनट अपनी सारी चिंता छोड़ कर सोचने लगा कहीं इनमें से किसी का पैर बच्ची की टांग पर पड़ा तो गज़ब हो जाएगा | मै उठा और बच्ची को उठा कर अपनी सीट पर लिटा दिया और खुद बची हुई जगह में बैठ गया | मुझे देख कर सामने लड़ रहे बन्दे शायद शर्मिंदा हो गए क्योंकी उसके बाद उनकी आवाज़ नही आई | वो बच्ची अब भी चैन सुकून से सोई हुई थी | मैं उसे ग़ौर से देखता रहा उसके बेफिक्र चेहरे को निहारता रहा | दो स्टाप बाद सामने वाले यात्रियों में से एक उठा और बोला ” भाई साहब आपने जो किया वो वाकई में इंसानियत की मिसाल है | मै आपको धन्यवाद कहता हूं |”
मैं ये सब सुनने के मूड में नही था क्योंकी ये सुननो को बच्ची को नही उठाया था मैने | मैने कहा ” सर एक तो मैने कुछ किया नही | बच्ची को उठा कर बस सीट पर रखा है | दूसरा मैं शर्मिंदा हूं की जो मैने किया वो कोई और नही कर सकता था क्या ? पर करता क्यों सबको तो सीट के लिए लड़ने से फुरस्त नही और जो सीट वो लड़ के हासिल कर रहे उस पर भला वो बच्ची को क्यों लिटाते |”
मैने पता नही ऐसा क्या गलत कहा वो बन्दा मेरे से पूरे सफर मुँह फुलाए ही रहा शायद दिल पर ले गया | कुछ देर बाद बच्ची की माँ आई और उसे ले जाने लगी | उसने उसे नीचे से ऊपर लेटे देखा तो कुछ बोली नही बस मुझे देखती रही जैसे कुछ कहना चाहती हो | मैं उसके भाव समझ रहा था | खाने का वक्त हो गया था | मासी नें काफी कुछ रख दिया था खाने को पर मेरा मन कहां था | मैने बच्ची की माँ से पुछा ” खाने को कुछ लाई हैं |”

बोली ” नही साहब ”
मैने  अपने खाने का थैला उसे दे दिया और कहा ” बहन ! बच्ची को ऐसे कहीं पर मत रख के चली जाया करो | खाना है खा लेना | बच्ची रो रही थी शायद ये भूखी हो |”

वो खुश थी | मै जानता था उनरे पास पैसों की कमीं थी क्योंकी जरनल का टिकट ले कर स्लीपर में चढ़ने के गुनाह में टीटी फाईन ले गया था उनसे | सोचा जो मदद हो जाए | इस घटना के बाद मेरी परेशानियां तो वैसे की वैसे ही थीं मगर उन्हे सहने की नई ताकत सी आ गई थी |
एक बात साफ करता चलूँ मेरा ये सब लिखने का मतलब वाह वाही लूटना या खुद को अच्छा कहवाना बिल्कुल नही होता क्योंकी मैं अच्छे से जानता हूँ मैं किस हद तक बुरा हूँ । लिखने का मतलब बस इतना है की जब मेरे जैसा बुरा इंसान भी एक अच्छा काम कर सकता है तो आप तो दिखते ही बड़े अच्छे हैं आप तो और बेहतर कर सकते हैं । 
धीरज झा…



Vote Add to library

COMMENT