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@dawriter

पिक्सी

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पिक्सी

कल ही की बात लगती है जब सत्रह साल पहले तुम्हे पहली बार देखा था .यूँ तो बच्चो की ज़िद थी इसलिए तुम्हे घर लाने को राज़ी हो गयी थी मैं, अन्यथा मुझे घर में किसी पशु को पालना बिलकुल न भाता था। जब तुम्हे लेने गए थे हम उस दिन, तो तुम्हे देखते ही मेरे मन में न जाने कहाँ से ढेर सा प्यार उमड़ पड़ा ....तुम थे ही इतने प्यारे ....गोल - मटोल चाँदी सा उजला वो सफ़ेद रंग और गोल -गोल काली चमकीली आँखे जो तुम्हारे बालों में छुपी हुई थीं तुम टुमटुम करते भागते हुए मेरे पास आ गए थे। प्यार से तुम्हे गोद में उठा लिया था मैंने और फिर छोड़ा ही नहीं।

हम एक घंटे का रास्ता तय कर जब घर पहुंचे तो बच्चे ख़ुशी से उछल पड़े थे। उन्हें तुम रुई के गोले जैसे गोलू लगे। उसी दिन से तुम घर का अभिन्न अंग बन गए, सबके प्यारे। बच्चे तुम्हारी धुन में पढ़ाई- लिखाई सब भूल बैठे थे। कभी तुम्हारे लिए दूध का प्रबंध करना, कभी तुम्हे अपने पीछे भगाना और कभी तुम्हारे पीछे भागना, सारे दिन यही खेल रहता था।

उस समय जब तुम घर में घूमते - फिरते थे तो सचमुच एक रुई की लुढ़कती हुई गेंद लगते थे। नेहा,निम्मी और गुड्डू तुम्हे अपने ही पास सुलाते थे रात भर तुम्हारा ध्यान रखते, कब वो उठे, तुम्हे कब दूध गरम करके दिया कब तुमने उनका बिस्तर गन्दा किया और कब उन्होंने उसे साफ़ किया ......मुझे कभी पता ही न चलने देते थे बच्चे ...

तुम्हारे गले में घुँघरू बांध दिए लाड में उन्होंने एक लाल रिबन के साथ। कितने प्यारे लग रहे थे तुम !!! तुम्हारा नाम पिक्सी रखा गया, कई नाम बदलने के बाद ।जब तुम दूध पीते थे तो तुम्हारा पेट फूल जाता था और तुमसे चला भी न जाता था चारों खाने चित्त हो जाते थे चलते -चलते। घर का आँगन इतना बड़ा था कि तुम्हे घुमाने कहीं नहिं ले जाना पड़ा कभी। वही घूमते तुम बड़े होने लगे ....इतने चंचल, ज़रा सी आहट बहुत होती थी तुम्हे भौंकने का मौका देने के लिए .

मुझे याद है एक दिन घर के अंदर कोई कूद आया था पिछली तरफ से, तो तुम इतनी ज़ोर से शोर मचने लगे कि आस- पास के लोग भी उठ गए और तुम ने उसका पीछा कॉलोनी के गेट तक किया था …. और वो जब तुम गली के बड़े बड़े कुत्तोँ से दो -दो हाथ करने को तैयार हो जाते थे ......एक बार तो लालू ने तुम्हारा कान काट खाया था मुझे आज भी याद है कि कैसे बचा पाए थे हम तुम्हे उस खतरनाक लालू से पर मजाल है कि तुम किसी से डर जाते ....

घर के आँगन में आने वाली नन्ही चिड़ियों का भी पीछा करने से कब चूकते थे तुम ! चूहे को तो एक बार देखने की देर होती थी बस उसकी जान लेकर ही छोड़ते थे तुम.....गिलहरियां भी तुम्हे चिढ़ाने आती थीं और जब तुम उनके पीछे भागते थे तो झट से आम के पेड़ पर चढ़ जाती थीं। आस पड़ोस के सब बच्चों के दुलारे बन गए थे तुम।

गुडडू ( मेरी छोटी बेटी ) हर तीसरे चौथे दिन तुम्हे नहला देती थी तुम्हे कब क्या खिलाना है, कब घुमाना है सब बातों का ध्यान बच्चे ही रखते थे एक- एक कर के तीनो बेटियां अपने घर चली गयीं। दो साल से बस तुम ही तो थे मेरा सहारा . जब मैं नहाने जाती तो तुम बाथरूम के बाहर बैठे रहते, रसोई में जाती तो तुम वही आकर बैठ जाते, कभी कहीं बाहर जाती तो खाना छूते तक नहीं थे तुम ....

पिछले छह महीने से तुम अपने अकेलेपन से शायद कुछ ज़्यादा ही परेशान हो गए थे या फिर उम्र का तकाज़ा था कि तुम दिन ब दिन कमज़ोर होते जा रहे थे,आभास था इस बात का मुझे और हम सब को कि अब शायद ज़्यादा दिन के मेहमान नहीं हो तुम क्योंकि अपनी औसत उम्र से अधिक बिता चुके थे कभी- कभी तो गुस्से में कह देती थी “ पिक्सी अब तुम जाओ बहुत परेशान करते हो अब तुम ...” तुम इतने निर्मोही हो जाओगे यह सोचा न था।

पर तुम ऐसे अचानक चले जाओगे हम सब को रोता छोड़कर यह न पता था .....न जाने कैसे रह पाते होंगे तुम अकेले ....एक पल भी तो न रहते थे तुम मेरे बिना ....आज दस दिन हो चुके हैं तुम्हे गए, पर एक दिन क्या, एक पल भी भुला नहीं पायी मैं तुम्हे .....बच्चे भी अपने दिल को समझा चुके हैं कि जाना तो था ही तुम्हे लेकिन पता नहीं मैं कब समझ पाऊँगी....एक बार और आ जाओ पिक्सी, बस थोड़े दिन के लिए ....



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