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@dawriter

पापा के लिये

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अब मौतें मुझे नही डरातीं…
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निडरता इंसान में  समय के साथ अपने आप आ जाती है | परिस्थितियाँ खुद लड़ना सिखा देती हैं | बच्चपन में बड़ा डरपोक था अकेलो सोना तो सीखा ही नही था कभी |

फिर थोड़ा बड़ा हुआ तो हिम्मत कर के अकेला सोना सीखा पर रात बिरात जब हवा से पीपल के पत्ते खड़खड़ाते तो लगता कोई है बाहर फिर दुबक कर आँखें बन्द कर लेता | मोहल्ले मों किसी बड़े बुज़ुर्ग की मौत हो जाती तो महीने तक रात को बाहर नही निकलता सोच कर की कहीं उनका भूत सामने ही ना खड़ा हो |

अक्सर सोचता मौत कैसे आती होगी इंसान कैसे तड़पता होगा | लाशें डराया करती थीं | कभी मुर्दे को देख नही पाता था | काँप जाता था | फिर वक्त आया जब अपने सबसे करीबी को पल पल तड़पता देखा उसे अपनी ही बाहों में दम तोड़ते देखा |

मेरी ज़िंदगी का सबसे कीमती शक्स मुझे छोड़ कर एक लाश में बदल गया | हाँ मुर्दा ही तो हो गया मेरा वो अपना | इन्ही आँखों से जिस से हर वक्त निहारा उसके चेहरे को एक दिन उसकी लाश को घन्टों देखना पड़ा | उस दिन मौत हुई उस इंसान के साथ मेरो डर की भी |

अपने डर को उसके साथ जला आया | क्रिया कर्म कर दिया साथ साथ अपने डर का भी | अब रात की आहटों में डर नही एक इंतज़ार होता है की कहीं वो अपना ही तो नही | मर गया मेरा डर भी उस इंसान के साथ | अब मैं निडर हूँ |
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धीरज झा…



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