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@dawriter

पटना वाला प्यार - 2

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पटना वाला प्यार - 2

पटना में तीन तरह के लौंडे पाये जाते है । पहले वो जो ज़िन्दगी भर सिंगल रहते है , लेकिन लड़की पटाने के लिए पूरी कोशिश में लगे रहते है । ये जाति असली ज़िन्दगी में तो लड़की के सामने मिमियाते रहते है , लेकिन फेसबुक , व्हाट्सएप्प पर एकदम इमरान हाशमी की तरह डीलिंग देते है ।

दूसरे वो , जो अपने आप को एकदम सच्चा आशिक़ समझने लगते है , लेकिन यह कभी भी पटना में लड़की नहीं पटा पाते है और बाद में ये दिल्ली , कोलकाता जैसे जगहों पर जा कर इंजीनियरिंग करते है और वहीं की लड़की या किसी और राज्य की लड़की को पटा लेते है । बाद में उसी से शादी भी कर लेते है । अगर इस ग्रुप से कोई सच्चा प्यार करने की झुर्रत पटना में करता है तो , उसे या तो अपनी जान से हाथ धोना पड़ता है या हमेशा के लिए अपना शहर छोड़ कर जाना पड़ जाता है । क्योंकि इस शहर में सच्चा प्यार को हासिल करना यानि मौत से जीत हासिल करना ।

और अंत में वो तीसरे तरह के लौंडे , यह कोई भी हो सकते है । बस इनको पहचानने के तरीके याद रखिए , और उसके बाद खुद पता चल जायेगा की ये तीसरे समूह में आते है । ये हर महीने अपना फ़ोन नंबर चेंज करते है , इनका शाम का अड्डा पिंटू पान दुकान या रमेश रिचार्ज दुकान ऐसी जगहों पर यह आसानी से मिल सकते है । यह कितनी भी गर्मी क्यों न रहे रात को चदर से पूरा मुँह ढक कर सोते है , और आधी रात के बाद फ़ोन पर व्यस्त हो जाते है । कभी भी इनकी बात सुनने की कोशिश मत कीजियेगा क्यूंकि घंटा आपको कुछ नहीं समझ में आएगा ( मैं एक - दो बार यह कोशिश कर के पछता चूका हूँ ) । इनकी सबसे बड़ी खासियत यह हर महीने नयी गर्लफ्रेंड के साथ मार्किट में हाज़िर रहते है , इनके लिए लड़की पटाना बायें हाथ का खेल जैसा रहता है । दूसरी खासियत इनकी ये लंबी - लंबी डीलिंग लेने में माहिर होते है ।

।।

हाँ तो यह कहानी है मेरे और मेरे दोस्त “तिवारी जी” की है ।

नोट :- मैं खुद पटना के पहले वाले समूह का लड़का हूँ ( मेरे बारे में ज्यादा जानकारी के लिए , इस कहानी का पहला भाग पढ़े) । और तिवारी जी पटना के उस तीसरे समूह को प्रतिनिधित्व करते है ।

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तिवारी जी का पूरा नाम “सुधांशु तिवारी” है । उम्र में हमसे तीन साल के बड़े । तिवारी को हम प्रेम से “पंडित” कह कर बुलाते है । वैसे तो तिवारी हमारे बड़े भाई साहब के क्लासमेट थे । पर मैट्रिक के बोर्ड के एग्जाम से कुछ महीने पहले उनको प्यार हो गया । और इस प्यार के चक्कर में वो उस दफा फ़ैल हो गए । मार्किट में तो यह हल्ला था कि पंडित को सच्चा वाला प्यार हो गया है । पर ऐन वक़्त पर लड़की मुक़र गयी । पटना का एक बड़ा अजीब ट्रेंड है , यहाँ अगर किसी को अपने पहले प्यार से धोखा मिलता है तो , वह उसके बाद पक्का हरामी हो जाता है । उसके बाद वैसे लौंडे जल्दी प्यार में नहीं पड़ते है । उनको ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है , उसके बाद वो केवल टाइमपास के लिए लड़की पटाना पसंद करते है । और यही हाल अब तिवारी का हो गया था ।

दूसरे साल फिर उसने मैट्रिक का एग्जाम दिया , पर ठीक सेण्ट -अप एग्जाम से पहले उसके बाबूजी “राम को प्यारे हो गए” । और इसका चोट तिवारी को लगा । और तिवारी जी दूसरी मर्तबा फ़ैल हो चुके थे ।

अब इस बार तिवारी जी से वो मेरे लिए तिवारी बन चूका था । क्योंकि इस बार तिवारी तीसरी बार दसवीं में था और हम पहली बार । तिवारी के पिताजी की मौत के बाद वो मोहल्ला का छुटल शांड़ बन चूका था । इस बार पास होने में कोई कसर न रह जाए , इसके लिए तिवारी अपनी सारी चाले चल चुका था । वो सी.बी.एस.सी , बिहार बोर्ड एवम एन.आई.ओ.एस , तीन-तीन बोर्ड से अपना रजिस्ट्रेशन करवा चूका था । उसे पक्का यकीं था किसी एक में तो वो पास हो ही जाएगा ।

तो परीक्षा से दो महीना पहले , तिवारी मेरे यहाँ आ कर रात में पढ़ने लगा । यह बात मेरे बाबूजी को ठीक नहीं लगा , पर बड़े भाई साहब के समझाने पर बाबूजी मान गए । अपने जीवन काल में मैंने बस वही दो महीने तिवारी को इतना सीरियस देखा था । लड़की लोग से एकदम बात तक करना छोड़ दिया था , अपना मोबाइल वो घर पर ही रख के मेरे यहाँ पढ़ने आता । हम उस वक़्त तक प्यार में नहीं पड़े थे , लेकिन इस समय तक तिवारी ना जाने कितनी लड़की के साथ “इलू - इलू” फ़रमा चुके थे । रात के तीन - तीन बजे तक हम दोनों पढाई करते थे । और ठीक सोने से पहले तिवारी बाथरूम में जा कर सिगरेट पीता था । मेरा कमरा ऊपर में था , तो ऊपर में मेरे और मेरे कुत्ते के अलावा और कोई नहीं रहता था ।

तो एक दिन हम तिवारी से पूछ लिए - अरे पंडित ये ऐब तुम्हें कब से लग गयी ?

अरे जब स्वाति ( तिवारी के हिसाब से उसका सच्चा प्यार) के चक्कर में पड़े थे तभी से । इतना ज्यादा टेंशन देती थी क्या बताये । टेंशन के कारण एकदम “अनस” होने लगा , और उसके बाद सिगरेट खींचने लगे - पंडित ने जवाब दिया ,

तो ये बात किसी को पता है या नहीं ?

हाँ , केवल तुम्हरे बाबूजी को पता है !

पपा को , पपा को कैसे पता चला बे - हमको तो जैसे 440 का झटका लगा था ,

अरे तुम्हरे बाबूजी हर होली में “हैदर” के यहाँ से मटन लेते है । तो जब आज से दू साल पहले जब ऊ हैदर के यहाँ पहुँचे थे तो भीड़ देख कर उनका मन घबरा गया था । और तुम तो जानते ही हो हमको हैदर से कितना अच्छा “टर्म एंड कंडीशन” है । तब हम हैदर को चिल्ला कर बोले थे - की ऐ हैदर दू किलो सूखा खस्सी का मीट अगला सीना , रांग और चाप , कलेजी और तेल अलग से । हैदर पांच मिनट के भीतर मटन तौल के हमरे पास ले आया । और हम मीट का पॉलीथिन तुम्हरे बाबूजी को थमा दिए और जितना हम बोले वो उतना पैसा हैदर को दे दिए । और जाते जाते हैदर से तुम्हारे बाबूजी को परिचय भी करवा दिया । बस इसी बीच साला हैदर सिगरेट पी रहा था और आधा पीने के बाद हमको बढ़ा दिया । यही चीज़ तुम्हरे बाबूजी देख लिए - पंडित सारा बात बक दिया था ,

अबे हरामी , तुम तो बहुत बड़का बिसखोपर हो यार पंडित । इसी कारण बाबूजी अचकचा रहे थे , जब तुम्हारे बारे में घर में बोले थे की तुम पढ़ने आओगे रात में अब से । लेकिन बाद में मेरे और बड़े भाई साहब के समझाने पर वो समझ गए -  हमरा तो दिमाग एकदम भन्ना गया था ।

।।

परीक्षा का परिणाम कुछ ही दिनों में आने वाला था । तिवारी बिहार बोर्ड  और एन.आई.ओ.एस बोर्ड के रिजल्ट में फेल हो चुके थे । अब केवल सी.बी.एस.सी से उम्मीद बची थी । और इसका भी रिजल्ट आ गया । तिवारी ने अपना और मेरा इज्जत बचा लिया उसने 70% से पास हो कर जंग जीत लिया था । पर बहुत कम लोग ही जानते थे की इस रिजल्ट में तिवारी से ज्यादा मेहनत सी. बी. एस. सी वालों ने की थी । हुआ यूँ की उस साल सी. बी. एस. सी वालों ने एक नया पैटर्न लागू किया था सी. सी. ई पैटर्न । इसमें फाइनल एग्जाम के टाइम सिलेबस आधा हो जाना था और 100 नंबर की परीक्षा में 40 नंबर स्कूल वाले को देने थे । तो बस यही चीज़ तिवारी को पास होने में मदद कर दी ।

परीक्षा के बाद तिवारी अपने चच्चा के यहाँ बनारस रहने चला गया । इंटर में उसने वहीं एडमिशन ले लिया , यू. पी बोर्ड से ।

और इधर पटना में रह कर हम इंटर की तैयारी करने लगे थे । इसी बीच हमको भी कंप्यूटर क्लास में सच्चा वाला प्यार हो चूका था ( पटना वाला प्यार - 1) , पर यह सच्चा वाला प्यार कम “एकतरफा प्यार” ज्यादा था ।

उधर तिवारी यू. पी बोर्ड से साइंस स्ट्रीम में एडमिशन ले लिया था । ।

इंटर की परीक्षा के बाद हम डिप्लोमा करने के लिए धनबाद पहुँचे । पर हाय रे मेरी किस्मत ! तिवारी नाम का भूत मेरा यहाँ भी पिछा छोड़ने के लिए तैयार नहीं था । जिस कॉलेज में मेरा दाखिला हुआ था , उसी कॉलेज में तिवारी का भी एडमिशन हो गया था । अपने चच्चा से बोल के पैरवी करवा लिया था । बदकिस्मती से हम दोनों को हॉस्टल नहीं मिला । तो हम दोनों ने बाहर कमरा ले लिया । हम दोनों के अलावा वहाँ तीन जन और थे । पर अभी तक मेरे समझ में यह नहीं आ रहा था कि , साले पंडित ने बारहवीं की परीक्षा पास कैसे की । इसका जवाब तिवारी दिया - “चच्चा विद्यायक है हमारे” ।

ज्यादा बिकलासी न पादो , और सच सच बताओ । इत्ता तो हम भी जानते है तुम्हरे चच्चा कोई नेता - वेता नहीं है - हम बोले ,

अरे दत्ता ( दोस्त लोग इसी नाम से पुकारते है हमें) हमारे चच्चा यू. पी बोर्ड में बहुत बड़े पोस्ट पर है । बस उसी का फायदा उठा लिए । फर्स्ट डिवीज़न दिलवा दिए चच्चा । और का बताये तुमको साला बीच एग्जाम हॉल में , खुद मास्टर हमको चिट्टा पुर्चा दे के गया - तिवारी ने कहा ,

अपने हिसाब से उसने सच ही कहा था ।

अबे हरामी अभी तक फेकने का आदत गया नहीं तुमको - हम गुस्सा के बोले ।

अच्छा पंडित बनारस क्यूँ छोड़े बे ?

अरे यार मन ऊब गया था , बनारस में ।

हाँ हाँ , ज्यादा नौटंकी मत करो । तुम्हरे चेहरे पर साफ़ पता चल रहा की तुम झूठ बोल रहे हो - हमने तिवारी से कहा ,

अरे भाई ई दो साल हम बनारस में 5 - 6 लड़की पटाए । यहाँ तक तो ठीक था । पर साला मकान मालिक की छोटकी बेटी भी हमको लाइन देने लगी । शुरू में तो बड़ा अच्छा लगा , पर बाद में पता चला ऊ तो एक नंबर की हवसी थी । उ रोज़ हमारे कमरे में घुसने का हिम्मत करने लगी । और ई बात तो तुम जानते ही हो हम केवल लड़की पटाते है पर कभी किसी लड़की के साथ कुछ गलत नहीं किये । पर इस लड़की को तो गज़ब था । हम इससे दूर भागने की कोशिश में थे , और ये हमारे और नजदीक आने की कोशिश में रहती । इसके लक्षण सही नहीं थे । तो एक दिन उसका भाई लोग को पता चल गया । और उसके भाई लोग हमको हौंक दिया बढ़िया से । अपना जगह नहीं न था , नहीं तो हम भी ऊ लोग को बढ़िया से कूटते । और इसी कारण हमको चच्चा वहाँ से भगा दिए । तो हम इहाँ आ गए - तिवारी ने कहा ,

वाह पंडित , मतलब काण्ड करना तुम बनारस में भी नहीं छोड़े ।

हमारा काहे पकड़ के बैठे हो । हमारे अनुपस्थिति में तुमने जो काण्ड सब किये पटना में , वो कौन बतायेगा । “पूर्णिमा” के चक्कर में सुने थे पूरा बावला हो गया था - तिवारी अपनी कुटिल मुस्कान दिखाते हुए कहा ,

अबे पंडित , तुमको उसका नाम कैसे पता चला - मैं एकदम अवाक् था ,

और भी कुछ राज खुलने बाकी थे ।

बेटा हम तुम्हारे बड़े भाई से भी उम्र में दो साल के बड़े है , तो उस हिसाब से तुमसे पाँच साल के बड़े हुए । तुमसे ज्यादा पटना हम देखे हुए है । तुम पटना में कहीं मूतते थे तो हमको पता चल जाता था - तिवारी अपनी कुटिल मुस्कान जारी रखा ,

तो तुम हमारे पीछे अपना लड़का सब को छोड़े थे क्या , मेरे जासूसी के लिए - मैंने पूछा ,

पागल है क्या हम जो तुम्हारे पीछे जासूस छोड़े , हम तो जासूस….. - तिवारी एकाएक बोलते - बोलते चुप हो गया ,

हम तो जासूस क्या , बोल पंडित । ज्यादा सस्पेंस मत बनाओ - मैंने कहा ,

“हम तो जासूस” पूर्णिमा के पीछे छोड़े हुए थे - तिवारी ने कहा ,

पूर्णिमा के पीछे , तुम पूर्णिमा के पीछे क्यों जासूस छोड़े थे - मैं एकदम आश्चर्य था ,

काहे की पटना में एक समय वो हमारी गर्लफ्रेंड हुआ करती थी - तिवारी ने कहा ,

क्या - मैंने कहा ,

मुझे समझ नहीं आ रहा था इस स्थिति में क्या करूँ ? हँसु या रोऊँ

हाँ भाई , जब हम पहली बार मैट्रिक का एग्जाम दिए थे , तो रिजल्ट आने में टाइम था । तो हम भी उसी कंप्यूटर क्लास में एडमिशन ले लिए थे , जिसमे तुमने बाद में एडमिशन लिया था । वहाँ पहली बार हमको पूर्णिमा मिली , वो भी मेरे ही बैच में थी । हम उसको तीन महीना के अंदर ही पटा लिए थे - तिवारी ने कहा ,

एक बात बताओ पंडित , तुम इतना लड़की कैसे पटा लेते हो । और हमसे एक भी नहीं हो पाता है - मैं पटना के तमाम सिंगल समुदाय के तरफ से यह सवाल पूछा था ,

क्योंकि तुम और तुम्हारे जैसे जितने भी लड़के है पटना में , सब के सब चूतिया है - तिवारी ने कहा ,

हैं ? - मैंने बोला ,

हैं हैं मत करो । सही बोल रहे है तुम जैसे लड़के केवल फेसबुक और व्हाट्सएप्प पर ही लाइनबाजी कर सकते हो । असली दुनिया में तुम सब लड़की को देखते ही पुकपुकाने लगते हो । लड़की को एकदम बोल्डली एप्रोच करो , आँख में आँख मिला कर बात करो । लेकिन तुम जैसा सब आज भी सत्तर के दशक में हो , और गाना कुमार सानू और अरजित सिंह के ही सुनोगे । लड़की के पेन का ढक्कन क्लासरूम में गिर गया तो उसके बाद उसी ढक्कन को लेकर एकदम हीरो बने फिरोगे । और लड़की को जा कर बताओगे की “सुनिये न हम आपका पेन का ढक्कन सँभाल के रखे हुए है ” तो ऐसे हाल में लड़की तुमको ढक्कन ही न समझेगी । वो ज़माना गया , केयरिंग शेयरिंग वाला । अब तो डायरेक्टली जा कर कह दो । और तुम तो प्रोपोज़ भी फ़ोन पर किये थे । अब बताओ , जो प्रोपोज़ सामने से नहीं कर सकता । वैसे लड़को को सब फट्टू समझते है - तिवारी ने अपना भाषण खत्म किया ,

तिवारी का एक - एक शब्द मेरे कान छेद दिए थे । उसने हम जैसों का एकदम “धागा खोल दिया था” ।

और जानते हो दत्ता , हमको पहला दिन जब पता चला था कि तुम पूर्णिमा से प्यार कर बैठे हो , तो हमको उसी वक़्त महसूस हो गया था कि यह लड़की तुमसे नहीं पटती । हाँ तुम्हारी गर्लफ्रेंड जरूर बन जाती , पर वो जो तुम खोज रहे थे सिद्दत वाला प्यार । वो कभी नहीं बनती - तिवारी ने कहा ।

इतना यकीं से तुम कैसे कह सकते हो - मैंने पूछा ।

अरे कितना बार बोले , तुमसे ज्यादा हम पटना को नापें हुए है । लेकिन तुम समझते नहीं हो । तुमको हर बार समझाना पड़ता है । देखो ऊ हमारी गर्लफ्रेंड थी , और वो हमसे सच्चा प्यार करती थी । पर हम थे हरामी , हम तो टाइमपास कर रहे थे । पटना का एक अजीब ट्रेंड है दोस्त , “जब भी कोई लड़का या लड़की प्यार में धोखा खाता है । तो उसके बाद उसको प्यार नाम के भूत का नशा उतर जाता है । उसके बाद वो जो भी नया रिलेशनशिप में जाता है , केवल टाइमपास के लिए ” ।

जब वो मेरी गर्लफ्रेंड थी , तो मैं उसके पैसों से काफी ऐश किया । और जब तुम उसके ज़िन्दगी में आये तो यही  चीज़ उसने तुम्हारे साथ किया । वो तुम्हारी दोस्त तो बनी , एक तरह से गर्लफ्रेंड भी बनी । तुम्हारे पैसों पर उसने ऐश भी भोगा । पर जब तुमने प्रोपोज़ किया , वो बड़े आराम से साइड हट ली । वैसे भी मुझे पता चला था , उसको लेकर तुम बड़ा “डोसा प्लाजा” , “मौर्या लोक” , शास्त्रीनगर का सेव बुनिया ये सब बहुत खिलाये उसको । और रिचार्ज तो जरूर करवाये होंगे - तिवारी अभी और धागा खोलने के मूड में था ।

बस कर पंडित , एक दिन में और कितने शॉक देगा । पर एक बात बता , पूर्णिमा और तुम्हारा रिलेशनशिप ख़तम कैसे हुआ ?

अरे हुआ ऐसा , की हम उस कंप्यूटर इंस्टिट्यूट में दो कोर्स कर रहे थे । एक सुबह को जिसमे पूर्णिमा थी , और शाम में दूसरा कोर्स जिसमे “निधि” थी - तिवारी ने कहा ।

और पंडित तुम दोनों के चक्कर में होगे - मैंने अपना मत रखा ।

अरे मेन बात तो तुम जानबे नहीं किये । हम दोनों को पटा लिए थे । पर साला किसमत हमरा धोखा दे दिहिस । पूर्णिमा और निधि एक ही कॉलेज की थी । बस हमारा यहीं बाँस हो गया । दोनों छोड़ के चली गयी । पूर्णिमा के लिए ज्यादा दुखी थे हम , क्योंकि वो सच्चा मोहब्बत करने लगी थी हमसे । पर कोई नहीं ऊ दुनु से हम खूब पैसे निकलवाये थे - तिवारी ने कहा ।

मान गए पंडित । कसम से , बाबूजी तुम्हारे बारे में एकदम सही बोलते थे । तुम साला अपना सगा तक को बेच देगा - मैंने हँसते हुए कहा ।

अरे भाई कुछ भी हो , लेकिन हम किसी लड़की का इज्जत बर्बाद नहीं किये । ई हमारे वसूल के खिलाफ था - तिवारी यह बात बड़े जोड़ से कहा ।

हाँ बे पंडित तुम बहुत बड़े वसूलवादी हो ,,

।।।

हॉस्टल के शुरुवाती दिनों में तिवारी जी शांत रहे । पढाई पर ध्यान दिए । पर तिवारी कब तक अपने को रोकता । बिहार में एक कहावत बहुत प्रसिद्ध है “मियाँ के दर मस्जिद” । तो तिवारी फिर नया काण्ड के लिए तैयार हो रहा था । इसका भनक हमको तब लगा , जब वो रोज़ सुबह - सुबह दूध लाने के लिए बगल वाले रायजी के यहाँ जाने लगा । वैसे तो हॉस्टल में सबका दिन बाँटा हुआ था कि किस दिन किसको दूध लाना है । पर ये जिम्मेदारी तिवारी ऐकले सम्भाल रहा था । जो लड़का सुबह 8 बजे से पहले नहीं उठता था , वो रोज़ इतनी सुबह दूध लाने जा रहा है । कुछ तो गड़बड़ था ।

एक दिन मौका देख कर हम तिवारी से पूछे ,,

“क्यों पंडित आजकल बड़े जल्दी उठ जाते हो । रात को लड़की सब से नहीं बतियाते हो क्या” ?

अरे ये सब मोह - माया है । सुबह जल्दी उठने से मन एकदम फ्रेश रहता है - तिवारी ने कहा ,

सुनो अपना ये चूतियापा किसी और सामने पेलना , हमरे सामने नहीं । अब सच सच बताओ खेला क्या है - तिवारी को भांपते हुए मैंने अपना फांसा फेका ।

और मेरा चला हुआ चाल एकदम सटीक बैठा ।

तिवारी ने बोलना चालू किया ,,,

अरे वो बगल वाली घर में जो लड़की रहती है , ऊ भी सबेरे को दूध लेने आती है । बस आजकल उसी के चक्कर में है ।

अबे वो तो तुमसे उम्र में बड़ी है । और सुने है उसका शादी भी होने वाला है इसी साल - मैंने कहा ,

अबे उम्र का ज्ञान हमको मत दो । तुम भी तो पटना में अपने से दो साल बड़ी लड़की के चक्कर में पड़े हुए थे - तिवारी ने पूर्णिमा की याद दिलाते हुए कहा ।

बढ़िया है लगे रहो - मैंने कहा ,

और तुम भूल गए क्या , पटना में क्या कहा जाता है “जब तक लड़की कुंवारी , न हमारी न तुम्हारी” - तिवारी ने कहा ,

“बस सरकारी” - उसके आधे बात को मैंने पूरा कर दिया था ।

।।

हॉस्टल में कुछ ही दिनों में यह बात फ़ैल गयी थी , की तिवारी जी और बगल वाली के बीच खेला चल रहा है । हॉस्टल के लड़को ने एक अच्छा सा नाम उस लड़की को दे दिया “दूध वाली भाभी” ।

तिवारी अपने कर्म का पक्का । उसने दूध वाली भाभी के शादी से पहले 5000-6000 रुपया ऐंठ चूका था । पर तिवारी इससे ज्यादा आगे नहीं बढ़ा । वो अपनी सीमा को अच्छी तरह से जानता था । खैर , तिवारी के कारण हम लोग को दूध वाली भाभी की शादी का निमंत्रण मिला । उनका तो शादी हो गया , पर तिवारी के पेट दो दिन तक ख़राब रहा था । शादी के रात उसने छः पीस तंदूरी चिकन पेल दिया था। ।

तिवारी कुछ दिनों के लिए शांत रहा । पर अब उसकी नज़र दूसरे मकान पर पड़ गयी । और किस्मत के धनी तिवारी जी , उस घर का मुखिया पटना से बिलोंग करता था । पर उसने मकान धनबाद में बनवा लिया था । एक बात बड़ी अच्छी है “दूसरे शहर में अपने होम टाउन के लोग मिल जाए , तो बड़ा जल्दी मित्रवत हो जाते है” । बस तिवारी इसी बात का फायदा उठाया । उस घर में जो हेड था , उसकी एक छोटी बहन थी । जो इस साल ग्यारवीं में थी । बस तिवारी लग गए उसके पीछे । और देखिये इसको कहते है अनुभव , एक हफ्ते से भी कम समय में वो लड़की तिवारी जी के प्यार में गिर चुकी थी । अब इस बार भी हॉस्टल में सभी को यह बात पता लग चुकी थी । अब इस बार इस लड़की का नाम पड़ा “बच्ची” । अब तिवारी जी का उसके घर आना जाना भी होने लगा । मुझे मन में डर था , की किसी दिन उस लड़की के घर वालों को शक हुआ , तो कसम से बढ़िया से ये मोहल्ला वाला सब हम लोग को कूट देगा । पर तिवारी जी अपने चाल में मदमस्त थे ।

अब तो हर हफ्ते के किसी दिन तिवारी को पनीर खाने की इच्छा होती , तो शाम तक उस “बच्ची” के यहाँ पता नहीं कैसे अपने आप दूध फट जाता था । और रात के खाने के टाइम हम सभी लड़को को पनीर खाने को मिल जाता था ।

परीक्षा सर पर थी । तो एक बार फिर तिवारी को पढ़ाने की जिम्मेदारी मैंने अपने ऊपर ली । पर तिवारी को थोड़ा टेंशन में दिखा ।

का हुआ पंडित , इतना परेशान किसलिए हो - मैंने पूछा ,

अरे यार “बच्ची” परेशान कर दी है - तिवारी ने कहा ।

काहे क्या हुआ - मैंने पूछा ,

अरे भाई , ऊ हमेशा दोपहर के वक़्त हॉस्टल घुसने का प्रयास में रहती है । और एक दिन तो हमारे टी-शर्ट के अंदर हाथ डालने लगी थी - तिवारी ने कहा ।

ही ही ही - मैंने हँस दिया ,

साला तुम हँस रहा है , और यहाँ हमारा फट के दरवाज़ा लगा हुआ है - तिवारी सही में इस दफा टेंशन में था ।

अबे तो कुछ इलाज़ कर दो उसका - मैंने कहा ,

अरे तुमको तो पता है हम लड़की के इज्जत को हाथ नहीं लगाते है , सिर्फ टाइमपास और पैसे के लिए लड़की पटाते है । लड़की पर तुम खर्चा नहीं करो , लड़की तुम पर ख़र्चा करे । तब न तुम हीरो हुए - तिवारी ने कहा ।

अभी पढाई पर ध्यान दो , परीक्षा में सिर्फ अब डेढ़ महीना ही बचा हुआ है । और उसे तुम कोई बहाना दे दो । परीक्षा के बाद कौन यहाँ रहने वाला है - मैंने तिवारी को समझाया ।

हाँ यह ठीक रहेगा । वैसे दत्ता एग्जाम के बाद तुमने क्या सोचा है । मतलब आगे क्या करोगे - तिवारी ने मुझसे पूछा ।

भाई हम तो डिग्री कोर्स के लिए कोलकत्ता चले जायेंगे । घर वालों को बता दिया है मैंने । पर तुमने क्या सोचा है - मैंने पूछा ।

हम वापस पटना चल जायेंगे । अब हमसे पढाई हो नहीं पाता है । वही नौकरी करेंगे - तिवारी ने कहा ।

।।

परीक्षा ख़तम हुआ । हम दोनों पास भी हो गए । तिवारी ने बच्ची को बहाना दे दिया था । अब तिवारी दुबारा पटना में था । और मैं कोलकत्ता में ।

कोलकत्ता में मुझे अभी तीन साल का और पढाई करना था ।

।।

फर्स्ट ईयर के छुट्टी के बाद मैं पटना गया तो , तिवारी से “पी & एम” मॉल में मिला । उसके हाथ में एप्पल का “आई-फ़ोन” देख कर मेरा दिमाग सनसना गया । तो मैंने उससे पूछ लिया ,,

क्यों पंडित ये हाथ में “आई-फ़ोन” ? अब क्या चोरी - वोरी भी करने लगे हो ,

एकदम झंडू को क्या तुम , अपने पैसा का ख़रीदे है - तिवारी ने कहा ।

एक प्राइवेट हॉस्पिटल का लैब तकनीशियन को कब से इतना सैलरी मिलने लगा , की वो “आई-फ़ोन” खरीदने लगे - मैंने जवाब दिया ,

अरे हम साइड में एक बिज़नस भी करते है न । ये उसी का है - तिवारी ने मोबाइल की तरफ इशारा करते हुए कहा ।

ऐसा कौन सा बिज़नस करने लगे हो ?

अरे छोड़ो न - तिवारी मेरा बात ताल गया ।

।।।

दूसरे साल फिर छुट्टी में अपने घर पटना आया हुआ था । की अचानक सुबह को तिवारी का फ़ोन आया ।

अरे दत्ता , शाम को गाँधी मैदान में मिलो । एक दोस्त का बर्थडे पार्टी है । “राज-रसोई” रेस्ट्रुरेन्ट में - तिवारी ने फ़ोन पर कहा ।

अबे तुम्हारे दोस्त की बर्थडे पार्टी है । उसमें हम आ के क्या करेंगे - मैंने पूछा ,

अरे फ्री का चिकन तोड़ना - तिवारी ने कहा ,

ठीक है आते है , शाम को 6 बजे ।

मैं शाम में 6:30 बजे गाँधी मैदान पहुँच चूका था । और राज रसोई के बाहर तिवारी का इंतज़ार कर रहा था । सामने से तिवारी भी आ रहा था ।

अरे चलो अंदर - तिवारी ने कहा ,

हाँ - हाँ , पर ये बताओ किसका बर्थडे है - मैंने जानना चाहा ।

अरे स्कूल में अपने क्लास में एक लड़की हुआ करती थी “रंजू” नाम की - तिवारी ने बताया ।

अरे वही रंजू जिसके पीछे पूरा स्कूल पागल था । कहीं तुम उसको भी अपनी गर्लफ्रेंड तो नहीं बना लिए - मैंने पूछा ।

अरे नहीं , अब हम गर्लफ्रेंड बनाना छोड़ दिए है । और रंजू मेरी गर्लफ्रेंड नहीं है । मेरे एक दोस्त की गर्लफ्रेंड है । तो मेरा वो दोस्त रंजू को ट्रीट दे रहा है , तो हमको भी बुलाया है । वो क्या है न इन दोनों की सेटिंग हम ही किये है न - तिवारी ने कहा ।

अरे वाह पंडित , तुम त लव गुरु बन गए हो पटना के । हमारे लिए भी कोई जुगाड़ लगा दो - मैंने हँसते हुए कहा ,

अरे नहीं , तुम खुद करो - तिवारी ने कहा ,

काहे , हमको तुम दोस्त नहीं मानते हो क्या - मैंने तिवारी से पूछा ।

अरे वो बात नहीं है । सारा चीज़ तुमको बाद में समझा देंगे । फ़िलहाल रंजू और उसका बॉयफ्रेंड आ गया है । अभी उन दोनों का बर्थडे मनाते है । फिर तुमको सब कुछ समझा दूँगा - तिवारी ने कहा ।

फिर हम सब मिल के रंजू का बर्थडे सेलिब्रेट किया । 10-15 फोटो लिया गया । उसके बाद रंजू और उसका बॉयफ्रेंड चले गए ।

हाँ पंडित अब बताओ । तुम उस नए दोस्त के लिये लड़की सेटिंग कर दिए । पर अपने इस बचपन के दोस्त के लिए कुछ नहीं - मैंने अपने तरफ इशारा करते हुए पूछा ।

अरे ये बिज़नस है - तिवारी ने कहा ।

बिज़नस , कैसा बिज़नस - मैंने पूछा ।

देखो ये तो तुम जानते ही हो पटना कोचिंग संस्थाओं का अड्डा बन चूका है । पुरे पटना में केवल जहाँ नज़र दौड़ाओ वहाँ केवल कोचिंग का ही बोर्ड और कोचिंग इंस्टिट्यूट ही दिखाई देता है । इंजिनीरिंग , मेडिकल , जनरल कम्पटीशन और भी तमाम तरह का कोचिंग । तो जब इतने कोचिंग है , तो जाहिर सा बात है , पटना में दूसरे जगह की तुलना में ज्यादा स्टूडेंट होंगे । ये स्टूडेंट इतने आते कहाँ से है । ये सब बिहार के दूसरे ज़िला सब से आते है । अपना घर छोड़ने वक़्त आँखों में चमक रहता है , की पटना में पढ़ेंगे और कुछ बन के दिखाईंगे । पर यहाँ कुछ दिन रहने के बाद जोश ठंडा हो जाता है । पढ़ने वाले केवल 10 गो ही रहता है , बाकि 100 केवल इस पटना में भीड़ बढ़ाने के लिए आते है । जो लड़का यहाँ रह के ऊबने लगता है । तो वो मेरे जैसे एजेंट के पास आता है । और फिर हम उसका सेटिंग किसी लड़की से कर देते है । 1 सेटिंग करने का 5000 चार्ज करते है हम । और इस काम में मेरे पास 20- 22 लड़की जुडी हुई है । अब देखो एक लड़का खुश है की उसको पटना में गर्लफ्रेंड मिल गयी । उसके बाद वो लड़का अपनी गर्लफ्रेंड पर जम के ख़र्चा करता है । और वो जितना पैसा लड़की को देता है उसमें से 30% मेरा होता है । अब रंजू के बॉयफ्रेंड का उदाहरण ले लो । रंजू मेरे कांटेक्ट में थी , उसको पैसे की कमी थी । तब हम रंजू का सेटिंग अपने उस दोस्त के साथ करा दिए । तो इस सेटिंग का हमको 5000 मिला । और उन दोनों के रिलेशन में आने के बाद रंजू अभी तक उस लड़के से 10000 निकलवा चुकी है । और उस 10000 में 30% मेरा हिस्सा अलग से । अब इस बिज़नस में अगर लड़की पैसा छिपाने लगे , तो यह चीज़ मैं होने नहीं दूँगा । क्योंकि मैं लड़का सब के साथ ऐसा बॉन्डिंग कर लेता हूँ , की वो जब भी लड़की को पैसा देगा । वो मुझे बता देगा , और फिर मेरा 30% मेरे हाथ में - तिवारी ने बहुत बड़ा रहस्य खोल दिया था पटना का ।

बाप रे बाप । इतना बड़ा हरामी बन गए हो पंडित । पर तुम इतना लड़का और लड़की सब से कैसे जान पहचान बना लिए - मैंने पूछा ।

अरे भाई , मेरा एरिया बोरिंग रोड से लेकर दानापुर तक का है । तो इस एरिया में जितने भी बड़े कोचिंग इंस्टिट्यूट है , जैसे - “कररीर प्लानर” , “ऐम क्लासेस” , “संधान” और “पैरामाउंट” जैसे न जाने कितने कोचिंग है । जहाँ की भीड़ दिल्ली के राजीव चौक से भी ज्यादा होती है । मैं इन सभी जगह को अच्छे तरीके से नाप चूका हूँ । और इस एरिया के सभी बॉयज हॉस्टल , पी. जी और मेस को भी नाप चूका हूँ । तो इस कारण वहाँ का लड़का लोग मेरा ग्राहक बन जाता है । और मेरे इस बिज़नस में सबसे जरुरी है लड़की । तो मेरे ग्रुप में 20 - 22 लड़की है । ये सब वैसी लड़की है , जिनकी पॉकेट मनी घर से पूरा नहीं मिल पाता है । ये सब केवल पैसे ऐंठती है । और जब कोई लड़का ज्यादा सेंटी होने लगता है । तब लड़की “A” दिखा के “B” हो लेती है । मतलब रिलेशन से निकल लेती है - तिवारी ने सारा राज खोल दिया था ।

आई-फ़ोन हम इसी बिज़नस के पैसा से लिए थे - तिवारी ने कहा ।

तुम्हारे चरण कहाँ है पंडित - मैंने कहा ।

इसलिए हम तुम्हारे लिए लड़की नहीं सेटिंग कर सकते है - तिवारी ने कहा ।

।।।

अब मैं फाइनल ईयर का एग्जाम दे कर , अपना सारा सामान लेकर वापस पटना आ गया था । इस बार बिहार में शराबबंदी हो चुकी थी ।जॉब हमको गुड़गाँव में लगी थी । जोइनिंग दो महीना बाद करना था । तो हम शाम को पहुँच गए तिवारी के यहाँ । तिवारी को देख कर यकीं ही नही हुआ । पूरा मजनू जैसा बन के छत पर बैठा था । दाढ़ी , और मूँछ देख कर लग रहा था , की दो - तीन महीने से इसने उस्तरा नहीं लगवाया हो ।

अरे पंडित ये क्या हुलिया बना रखे हो - मैंने पूछा ।

कुछ नहीं भाई - तिवारी ने उदास मन से कहा ।

अब तो बकलोली का आदत छोड़ दो । तुमको हम बचपन से जानते है । हमको लग रहा है इस बार कुछ सीरियस हुआ है - हमने कहा ।

भाई हमको प्यार हो गया था - तिवारी ने कहा ।

हा हा हा , तुमको और प्यार । तुम तो केवल टाइमपास के लिए लड़की पटाते थे न । तो तुमको कैसे दुबारा प्यार हो गया - मैंने चुटकी लेते हुए कहा ।

अरे नहीं भाई इस दफा सच्चा प्यार हो गया था । पिछले साल तुम आये थे न , तो तुमको हम बोले थे न की अब लड़की पटना अपने लिए छोड़ दिए है । क्योंकि उस वक़्त हमको सच्चा प्यार हो गया था - तिवारी ने कहा ।

नाम क्या है उसका , और पूरा बात बताओ - मैंने कहा ।

“नूतन” नाम था उसका । मौसी की बेटी को कंप्यूटर क्लास में जब नाम लिखवाये थे । तो नूतन भी उसी क्लास में थी । भाई उसका आँख था एकदम नीला । एक महीना में हम उसको अपनी गर्लफ्रेंड बना चुके थे । और उसके बारे में अपने लड़का लोग से पता कर चुके थे । आज तक उसका कोई बॉयफ्रेंड नहीं था । इस बार हम सीरियस थे । उसको लेकर कभी हाजीपुर , कभी बिहटा खूब लॉन्ग ड्राइव पर गए । अपना पुराना मोटर साइकिल बेच कर उसके स्कूटी में अपना योगदान दिये थे । वो भी हमसे सच्चा प्यार करने लगी थी । पर तुम तो जानते ही हो पटना की सभी लड़कियों को , इंजीनियर , डॉक्टर या बैंक पी. ओ ही ले जाता है । नूतन के बाबूजी नूतन का शादी फिक्स कर दिए एक बैंक पी. ओ से । और नूतन अपने बाबूजी का विरोध नहीं कर सकी , और हमने भी कोई दवाब नहीं डाला । क्योंकि हम नूतन के काबिल थे ही नहीं । फिर नूतन के शादी में टेंट से लेकर बैंड वाला तक हम सेट कर के नूतन के बाबूजी को दिए - तिवारी ने कहा ।

तो इस शादी में तुम कितना कमीशन काटे - हम जानते थे तिवारी यहाँ भी कुछ न कुछ जरूर फायदा देखा होगा ।

अरे केवल टेंट में 2000 - तिवारी ने कहा ।

ऊ दू हज़ार हम शादी के रात दारु पीने के लिए थे - तिवारी ने कहा ।

अरे बिहार में तो दारु बंद है - मैंने कहा ।

घण्टा बंद है । अपना नितिशवा है न फुलवारी वाला । उ बेटा रोज़ पीता है । नूतन के शादी के दिन हमको रोना आ रहा था । ज़िन्दगी में जितने भी काण्ड किये थे सब याद आ रहा था । तब नितिशवा हमको लेकर फुलवारी गया , और अपना अड्डा से दारु ले आया । मुर्गा उसके तरफ से था । उस दिन तीन आदमी दो फुल खत्म किये थे - तिवारी ने कहा ।

तो अब आगे क्या सोचा है पंडित । मतलब अब तो कहीं सेटल हो जाओ - मैंने कहा ,

अरे अगला महीना हम लोग पटना छोड़ रहे है । भैया कानपूर में फ्लैट ले लिए है , और मेरे लिए एक जॉब भी खोज लिए है । जानते हो दत्ता नूतन के जाने का इतना दुख नहीं है जितना पटना छोड़ने का दुख है । अपना सारा कर्म काण्ड यही बीता है - तिवारी के आवाज़ में उदासी झलक रही थी ।

।।

अगले महीने तिवारी और उसकी माँ को छोड़ने पटना स्टेशन गया था । संपूर्ण क्रांति को अभी आने में देर थी । तिवारी और मेरे , हम दोनों के आँखों में आँसू थे ।

ट्रैन आ चुकी थी । और तिवारी हमेशा के लिए पटना छोड़ कर जा रहा था ।।

।।।

दो साल बीत चुके है । मैंने अपना ट्रांसफर पटना करवा लिया है । पटना में सब कुछ तो है , पर तिवारी नहीं है । लड़का सब के ग्रुप को देखता हूँ तो उसमें तिवारी और दत्ता को खोजते रहता हूँ ।।

एक दिन अचानक एक फ़ोन आया ,

हेल्लो - मैंने कहा ,

का दत्ता - उधर से तिवारी ने कहा ।

अरे पंडित , कैसे हो जी - मैंने कहा ।

अरे दत्ता , सुनो अगला महीना के 10 तारीख को हमारा वियाह हो रहा है । सो तुमको आना होगा - तिवारी ने कहा ।

बेटा तुम शादी कर रहे हो । लव मैरिज या अरेंज - मैंने पूछा ।

अरेंज कर रहे है बे । चच्चा रिश्ता ले कर आये थे । तो हम तैयार हो गए । सैलरी भी 25000 हो गया है - तिवारी के आवाज़ में ख़ुशी था ।

चलो ठीक है , तब तो आते है शादी में - मैंने कहा ।

और फ़ोन काट दिया ।।।।

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पटना वाला प्यार - I



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