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@dawriter

कल्पना

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ये कल्पनायें ,हाँ जी ये कल्पनायें । होती बड़ी ही अजीब चीज है,यार क्या बताऊँ कुछ भी, कैसा भी ऐसा लगने लगता है,जैसे ये तो वाकई सम्भव है,और कुछ समय बाद सम्भव भी हो जाता है।

क्या ऐसा हो सकता है? हम सोचने लगते हैं अपनी कल्पनाओं के नजरिये से ,लेकिन जैसे ही किसी दूसरे की कल्पनाओं से परत दर परत,या यूं कह लीजिये सीढ़ी दर सीढ़ी हमको पता चलता है,इस तरीके से ये तो हो सकता है, फिर जाकर हम कहीं न कहीं कह उठते हैं ,"बात तो माननी पड़ेगी बन्दे या बन्दी की "क्या दिमाग पाया है,मुझे तो लगा ये हो ही नहीं सकता, लेकिन जिस तरीके से उसने बताया ,अब तो लगता है ये पक्का होगा।

आज का जमाना देख लिजिये, बहुत सी चीजें किसी न किसी की कल्पना का खेल है,क्या कभी सोचा था? आज से 20 साल पहले किसी ने कि कोई ऐसा यंत्र भी होगा जिससे हम वीडियो चैट भी कर सकते हैं ,बस किसी की कल्पना का खेल है ये,ऐसी कल्पनाओं को खोजने जाओगे हजारों उदाहरण मिल जायेंगे,फिर वो चाहे ई-कॉमर्स हो या ओला ,उबेर की कैब बुकिंग की दुनिया या फिर आज कल का सबसे लोकप्रिय फेसबुक,सब कुछ किसी न किसी की कल्पना का कमाल है,जो फलीभूत होकर मिला औऱ हमारे लिये सुख लेकर आया।

कल्पनाओं के विषय मे एक बात जो सबसे अच्छी है ,वो यह है कि ये कल्पनायें समय के साथ-साथ हमेशा बढ़ती ही चली जाती है,और एक उड़ते मस्त पंछी की तरह इनकी कोई सीमा भी नहीं होती,कोई बन्दिश नहीं होती इनपर ,कोई भी किसी भी दिशा में जाकर कल्पना कर सकता है।



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