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@dawriter

कलंक

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mrinal

"माँ! तुमने अच्छा नहीं किया। सतीश की आवाज़ में दर्द भरपूर था।"

"क्या किया मैंने?"

" तो आपको नहीं पता कि आपने क्या किया है?"

"कुछ बोलोगे या यूं ही बकवास करते रहोगे।"

"शाम में चौक पर मिश्रा जी मिले थे।"

"अच्छा तो उस वकीलबा ने तुमको बता दिया सब। बहुत नीच आदमी है।"

" वह नीच है! माँ। और तुम? क्यों किया ऐसा तुमने?"
.....

" मुझसे क्या गलती हो गयी? हमेशा भैया से ज्यादा ख्याल रखा तुम्हरा। फिर भी घर के अलावा सारी संपत्ति उसको वसीयत कर दी। क्यों माँ?"

" क्या कहूँ? यह पाप करते समय मेरे हाथ कितने काँप रहे थे। यह मैं ही जानती हूँ।"

"हाथ काँप रहे थे! क्यों झूठ बोलती हो? माँ!"

" हाँ बेटा, तुम तो जानते ही हो कि उसकी छोटी सी प्राइवेट नौकरी है। वह तो एक बच्चे के बाद ही ऑपरेशन करा लेना चाहता था। मैंने ही पोते की लालसा में दूसरा, तीसरा और अंत मे चौथा बच्चे की ज़िद पर अड़ी रही। पर मेरा दुर्भाग्य, चारों लड़की ही हुई। अब तुम ही बताओ, इस आसमान छूती महंगाई में चार बेटियों का दहेज़ बेचारा कैसे जोड़ेगा? गलती मेरी थी इसलिए सारी संपत्ति उसके नाम कर इस पाप का प्रायश्चित करना चाहती थी।"

" गांव में सब लोग थू थू करते तुम्हारे जाने के बाद, उसका ख्याल नहीं आया।"

"मरने के बाद ही न! मैं कौन सा सुनने के लिये रहती?"

" माँ एक बार मुझसे या अपनी बहू से कहा तो होता। मुझे नहीं पता है क्या कि भैया की हालत कैसी है? उनकी बेटी केवल उन्हीं की है क्या? मेरी नहीं है क्या? सब बेटी के नाम पर लाख लाख का फिक्स डिपॉजिट करा रखा है मैंने। और तुम्हारी बहु ने सबके लिये गहना भी बना रखा है।"

"क्या!"

"हाँ माँ! मेरा एक बेटा है ना। तेरी बहू ने मना करने के बाद भी ऑपरेशन करवा लिया है। मेरे एक नहीं पाँच बच्चे हैं।"

" बेटा, मैं तुमको और बहू को समझ नहीं पायी। हो सके तो मुझे माफ़ कर देना। अभी मिश्रा जी को फोन करके बुलाओ। भगवान,ऐसी सन्तान सबको दे। बेटा, तुमने मुझे बहुत बड़े कलंक से बचा लिया।"

© मृणाल आशुतोष



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