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@dawriter

कर्तव्यबोध

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"बेटा स्वाति, ये है गौरव! इसी से तुम्हारा विवाह ठीक किया है।" "पापा, छत पर चलिये।"

 

..... "क्या पापा ?आपने मेरा विवाह ठीक कर लिया और मुझसे पूछना तक जरूरी नहीं समझा।"

 

"बेटा, जब मेरा एक्सीडेंट हुआ था तो इसी लड़के ने मुझे अस्पताल पहुंचाया था। तन मन धन से दिन रात मेरी सेवा की तब जाकर आज तेरा बाप तेरे सामने खड़ा है। और गौरव तुझे पसंद भी करता है। मेन मार्किट में रेडीमेड गारमेंट्स की अपनी दुकान है। अच्छी कमाई हो जाती है।"

 

"गौरव जी का उपकार हम कभी नहीं भूल सकते। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उस उपकार के बदले में उससे शादी कर लूं।"

 

"उसी ने तेरा हाथ माँगा तो मैंने उसको हाँ कह दिया।"

 

"अगर वह मेरे बदले माँ का हाथ माँग देता तो क्या तब आप हाँ कर देते क्या?"

 

"बहुत जबान चलने लग गयी है तेरी। जो मन में आये बक देती है। बाप का अधिकार है कि अपनी बेटी की जहां इच्छा हो वहाँ उसका विवाह करे।"

 

"पापा, कर्तव्य को अधिकार का नाम काहें दे रहे हैं? बाप का कर्तव्य होता है कि जहाँ बेटी खुश रहे , वहाँ उसका विवाह करे। न कि उपकार के बोझ तले बेटी को किसी के हाथों बेच दे।"

 

" बेटी! आंख से आँसू पोछते हुये कहा, शायद तू ही ठीक कहती है। मैं उसके पैर पकड़ लूँगा। पर तेरी शादी वहीं करूँगा जहाँ तू खुश रहेगी।"

 

© मृणाल आशुतोष



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