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@dawriter

एक स्नेह यह भी.... ----

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rgsverma by  
rgsverma

 

“क्या मैं अन्दर आ सकता हूँ?”

 

एक बुजुर्ग आवाज सुनते ही मैंने अपने कार्यालय कक्ष के मुख्य द्वार की ओर नजर उठाकर देखा.लगभग छह फीट के सौम्य व्यक्तिव का स्वामी वह व्यक्ति तब तक चिक को धीरे-से हटाकर निकट आ चुका था. सर्दियों के दिन में खादी का ब्राउन रंग का श्वेत पट्टियोंयुक्त कलफ लगा हुआ कुर्ता और उस पर डार्क ब्राउन रंग की बंद गले की जैकेट फब रही थी. बाल अधिकाँश सफ़ेद हो चुके थे और आधे हिस्से से गायब भी. झुर्रियां थी, पर गोरा रंग और हल्की नीली आँखों से उनके चेहरे का तेज़ प्रखर हो रहा था. उम्र रही होगी लगभग ७८ या अस्सी वर्ष.

 

मैंने उन्हें अभिवादन कर सामने कुर्सी पर बैठने का संकेत कर दिया था. सो, वह बैठ चुके थे.

 

“पहचाना ?”, कहा उन्होंने, पर पहले ही मैंने सोचना शुरू कर दिया था, कि यह भद्र पुरुष कौन हो सकते हैं.

 

मैंने और जोर दिया अपने मस्तिष्क पर. लेकिन अफ़सोस, जब से नौकरी को गंभीरता से लेना आरम्भ किया, तब से बस दिनचर्या ही ऐसी बन गई है कि अपने सरकारी कामों के अलावा काफी भूलने लगा हूँ, बहुत कुछ. कई बार झुंझलाहट भी होती है. पर, क्या किया जाए !

 

“जी, बताइए?”

 

मैंने कुछ कौतुहल और कुछ ना पहचान पाने की खीज से उत्पन्न खिन्नता से बस नकारात्मक स्वर में गर्दन से ही संकेत किया.भाव मेरे तब भी सरकारी भाव वाले ही थे, कुछ उदासीनता वाले. तब उन्होंने जो बताया, तो मैं अपनी कुर्सी छोड़ कर खड़ा हो गया. सीधे मैंने उनके चरण-रज का वंदन किया और क्षमा मागी. बात भी तो लगभग तीन दशक पुरानी थी. मैं अभिभूत हो गया था और मैंने अपनी कुर्सी से हटकर उनकी बगल वाली कुर्सी पर बैठना ही अपना सौभाग्य समझा.

 

डॉ सूर्यकांत अवस्थी उस पोस्टग्रेजुएट कॉलेज के प्रिसिपल थे जहाँ से मैंने अपनी ग्रेजुएशन और फिर मास्टर्स की शिक्षा प्राप्त की थी. मेरा उनसे कोई व्यक्तिगत संपर्क नहीं रहा. लेकिन एक तो वह मेरे पिता के निकटस्थ मित्रों में से थे, (पर जब भी वह घर पर आये तो मेरी कभी हिम्मत ही नहीं हुई उनके सामने पड़ने की), दूसरे उनके सख्त स्वभाव के कारण उन्हें हिटलर के नाम से जाना जाता था. अब आप समझ सकते हैं कि उनसे दूर रहने के कितने कारण मेरे पास हो सकते हैं. वह हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष भी थे, पर हिंदी मेरा कभी विषय नहीं रहा था अतः उनसे सम्पर्क का कोई कारण नहीं बनता था..

 

तमाम बातें हुई उनसे. कुछ उस कॉलेज की, कुछ अपने शहर और कुछ नए शहर के मिजाज की. और जब समय बीता तो समझ में आया की बहुत अच्छा लगा था उनका आना. दरअसल अब वह सेवानिवृति के बाद इसी शहर में अपने पुश्तैनी मकान को ठीक कराकर यहीं सेटल हो गए थे. तीन बेटियां थी उनकी, जो सब विवाह उपरान्त अमेरिका में स्थापित थी और वह पत्नी के साथ यहाँ रहकर अपनी साहित्य रचना में लीन थे.

 

चाय पीकर सर जाने को हुए तो मैंने ड्राईवर से उनको घर तक छोड़ कर आने को कहा. उनका घर वहां से लगभग ग्यारह किलोमीटर था, और वह तीन ऑटो रिक्शा बदल कर मेरे ऑफिस तक आप पहुंचे थे. बस यूँ ही मिलने.

 

डॉक्टर साब को से मैंने आशीर्वाद लिया और किसी छुट्टी में घर आने का आग्रह भी. उन्होंने भी विनम्रता से मुझे स्नेह युक्त आमंत्रण दिया. ...और वह चले गए. बाद में वह एक बार घर भी आये, और उस रविवार को पत्नी के न होने के कारण मैंने उन्हें जलेबी-खस्ता और चाय का नाश्ता कराया.

२.

स्मृतियाँ कितनी विचित्र होती हैं.न चाहते हुए भी साथ नहीं छोडती. और अगर चाहो तो याद नहीं आती. अच्छी स्मृतियाँ तो यूँ धूमिल हो भी सकती हैं, पर कुछ दु:खद और कडूआहट भरी अथवा जटिल-सी स्मृतियाँ तो इंसान पूरी जिन्दगी ढोता रहता है, और वह बस निर्लज्जता से जुड़ी रहती हैं, हमारे साथ, हर समय. कुछ स्मृतियाँ बुरी होती हैं पर वह अच्छी यादों से मिलकर एक खूबसूरत और यादगार सा चलचित्र भी अंकित कर देती हैं हमारे स्वाभाविक से निर्मल पटल पर. जी हाँ. मूल रूप से तो हमारा मन-मस्तिष्क मिर्मल-निश्छल ही होता है न, वह तो हम लोग हैं जो जाने-अनजाने में कुछ विषद और कुछ अवसाद के लम्हों और कुछ कुटिलता को जोड़कर इसे जटिल बनाते हैं, और फिर स्वयं ही इस चक्रव्यूह में फंसे रह जाते हैं.

 

याद है वह दिन मुझे. ...और भूल भी कैसे सकता हूँ. मेरा आनर्स का पेपर था उस दिन. पूरे कॉलेज में केवल मैं ही था जिसे आनर्स चुनने का सौभाग्य मिला था. मेरे अकेले के लिए क्लासरूम सजता था. जी हाँ. केवल एक विद्यार्थी. मैं भी पूरी तल्लीनता से पढाई करते हुए अपनी तैयारी कर रहा था. जिस दिन द्वितीय वर्ष का पेपर था देर तक जागता रहा था मैं, और अलार्म भी उस दिन खराब था. मैंने भाभी से अनुरोध किया था कि मुझे हर हाल में सवेरे सात बजे उठा दें, क्योंकि ठीक आठ बजे से मेरा पेपर था….जब सवेरे मेरी स्वयं आँखें खुली तो देखा कि आठ बजकर पांच मिनट हो चुके थे. मैंने छलांग लगाई, झटपट तैयार हुआ और साइकिल लेकर तेज़ पेडल लगाये, शायद भाग्य साथ दे जाए. खतरा प्रिंसिपल सर से था, अपने डॉ अवस्थी जी जो नियम, क़ानून और अनुशासन के लिए इतने सख्त थे, कि सही बात के लिए भी सब उनके सामने जाने से भय खाते थे. और अगर जाना पड़ ही जाए, तो कांपना तो अवश्यम्भावी था. कुछ ऐसा टॉवरिंग व्यक्तित्व था उनका.

 

कॉलेज के वरांडे में घुसते ही सर दिखाई पड़ गए. घड़ी में आठ बजकर अडतीस मिनट बजे थे. जैसे ही सामने पहुंचा, उन्होंने बिना कोई प्रश्न किये मुझे अपनी अन्वेषणात्मक निगाहों से देखा तो मैने सिर्फ अनुनय कर उनसे पेपर में सम्मिलित होने का अनुरोध किया. मुझे तीस साल बाद भी बिल्कुल शीशे की तरह साफ़ याद है. उन्होंने एक क्षण मुझे गौर से देखा-- थोड़ा मेरी आँखों में झाँका, कुछ क्षणिक दुविधा-सी दिखाई और न जाने क्या सोचकर परीक्षा में सम्मिलित होने की स्वीकृति दे दी. यह सब चमत्कारिक था. या कहें अविश्वसनीय, पर सच था ! मुझे स्वयं इस चटकार की सिर्फ क्षीण से संभावनाएं थीं. मैंने उन्हें तो नहीं, पर ईश्वर को धन्यवाद दिया और मन से प्रश्नपत्र हल किया. बाद में इस प्रश्नपत्र में मैंने विशिष्ट योग्यता के मार्क्स प्राप्त करने में सफलता भी पाई.

 

मां की केवल स्मृतियाँ शेष थी. उनका निधन उसी समय हो गया था, जब मैं ९वीं कक्षा में पढ़ता था. घर की सब जिम्मेदारी भाभी जी उठाती थी. एक बार घर छोड़ कर जा चुकी थी भाभी परन्तु उनके गंभीर बीमार होते ही, फिर से आ चुकी थीं , और फिर वह कहीं नहीं गई. भाइयों में सबसे छोटा था मैं. मेरा उनके प्रति एक निश्छल लगाव था. मैं हर पल उनमें अपनी मां खोजा करता था, और लगभग ही हर पल मुझे इसमें असफलता मिलती थी. पर, न जाने क्यों, मेरा अभी भी विश्वास था कि एक ना एक दिन उनका वैसा ही स्नेहाशीष मुझे भी प्राप्त होगा जैसा वह अपने दो बेटों और एक बेटी को करती थीं . अफ़सोस, वह दिन कहीं नहीं दिख रहा था, और अगर गौर से देखें तो यह समझ आ रहा था कि वह इस देवर-भाभी के रिश्ते को मां-पुत्र के रूप में ईमानदारी से ग्रहण करने की इच्छुक नहीं थीं . सवेरे न उठाने वाली घटना ने मुझे झकझोर दिया था, और यह अकेली घटना मेरे मन को इस सब एकतरफा आत्मिक-से रिश्ते की उपादेयता पर पुनर्विचार करने के लिए एक बड़ा बहाना बन गई थी.

 

ऐसा नहीं था कि भाभी भूल गई हों, और इसके लिए उन्हें कोई खेद हो. रहने व पढ़ने के लिए मेरे लिए प्रथम तल का कमरा था, जबकि वह, बच्चे और अन्य भाई नीचे के कमरों में रहते थे. पिता इस विशाल घर के एक पृथक भाग में, जिसे गेस्ट हाउस की तरह भी प्रयोग में लाया जाता था, उसमे रहते थे. उनसे इस सम्बन्ध में कुछ कहने की हिम्मत नहीं थी, और न ही कोई जरूरत. दुःख इस बात का था कि इतनी बड़ी घटना के बाद भी जब मैं किसी तरह हडबडाहट में पेपर देने जा रहा था, तब वह लिविंग रूम में निश्चिन्तता से बैठी चाय पी रहीं थीं .मेरे पूछने के बावजूद न ही उन्होंने इस सम्बन्ध में कोई विशेष बात की, न कोई चिंता प्रकट की. हाँ, उन्होंने यह अवश्य कहने का उपक्रम किया कि उन्हें स्मरण नहीं रहा. और हाँ, एक निश्चिंत सी मुस्कान. बस !

 

मैंने पेपर तो अवश्य दिया, अच्छा दिया, लेकिन भाभी के प्रति जो वितृष्णा के भाव बने वह अभी भी मस्तिष्क पर ज्यूँ के त्यूं अंकित हैं और वह कडुवाहट न जाने क्यों अभी तक घट नहीं पाती, मेरे चाहने के बावजूद भी. न जाने कितने प्रयास किये मैंने स्वयं ही अपने इन संबंधों को फिर से कोरी स्लेट पर लिखने की, पर हर बार वही पुरानी इबारतें उभर आतीं और मन पहले से भी अधिक खराब हो जाता. तब से लेकर आज लगभग तीस दशकों में न जाने गंगा में कितना पानी बह चुका होगा, पर मेरा मन भी उनके प्रति स्वाभाविक रूप से निर्मल नहीं हो पाता. यही नहीं उनकी बोल के मिठास से सशंकित होना तो अब अवश्यम्भावी हो गया हो. पता नहीं कौन सा नया जाल बिछाया गया हो.

 

पेपर देकर लौट आने के बाद मैंने साहस कर पिता को इस प्रकरण से अवगत कराया था. उन्हें अपार दुःख हुआ, लेकिन उन्होंने इस मुद्दे से स्वयं को ही सीख लेने का बेहतर उदाहरण बताया मुझे.. तब उन्होंने एक सीख देते हुए ब्रह्ममन्त्र दिया था जो मुझे रह-रह कर स्मरण होता है-- “बेटा, अगर आपकी कोई केयर कर सकता है, मन से चिंता कर सकता है, या सुख-दुःख में आपके साथ खड़ा रह सकता है, वह सिर्फ दो इंसान हो सकते हैं-- आपकी मां, या आपकी पत्नी. शेष सभी रिश्ते अस्थायी और बंधन हीन हैं". उन्होंने इसे दुनिया का शाश्वत नियम मानकर अपने आप पर निर्भर रहने और भरोसा रखने की सलाह दी. वही सलाह और ब्रह्मवाक्य किसी भी दुविधा में मेरे संकट मोचक की तरह आ खड़े होते हैं.

 

माँ से जैसा बच्चों का जुड़ाव होता है, वही, मेरा भी था-- कहानियां सुनना, फरमाइश करना, नखरे करना, लाड कराना. जो भी था वह बॉन्डिंग मां के साथ ही थी. उन दिनों एल पी जी गैस का प्रचलन नहीं था. किचेन में चूल्हे की सिकती रोटियों की भीनी-भीनी खुशबु , और वहीँ बैठकर गर्मागर्म भोजन करने का स्वाद अलग ही होता था. न दुनिया की फ़िक्र, न कमाने का तनाव, न कोई झंझट. बस, खाओ-पियो, खेलो, खिलखिलाओ और स्कूल जाओ, फिर वही सब...बस ! यही थी वह जिन्दगी. उस समय तक किसी भाई का विवाह भी नहीं हुआ था, सो विवाहोपरांत होने वाले तनाव से तब तक कोई परिचय भी नहीं था. बस अपनी दुनिया इतनी ही थी घर की चारदीवारी में.

 

बचपन में घर में वैवाहिक समारोह का अर्थ बाल मन के लिए केवल तरह-तरह के व्यंजनों की खुशबुओं, सजावट, आतिशबाजी और चहल-पहल तक ही सीमित होता है. कुछ नये मेहमान के लिए नई अनुभूतियाँ और रोमांचक चुहलबाज़ियाँ ! पर, जब इस सबसे मुक्त होते हैं, और नवविवाहिता अपनी गृहस्थी में रमने लगती है तो उसका असली रूप-- चाहे वह जो भी हो, अच्छा या बुरा अथवा उदासीन, वह सामने आने लगता है. यह मुलम्मा धीरे-धीरे ऐसा उतरता है कि चाहे पॉलिश की कितनी ही कोशिश क्यूँ न कर लो, हर बार असली रूप ही सामने आ जाता है. जो भी ऊपरी आवरण है, वह अपनी चमक, या यूँ कहें कृत्रिम आवरण को हर हाल में उतार ही फेंकता है.

 

ऐसा ही हाल मैंने देखा था. दहेज़-रहित शादी थी भाई की. कोई मांग नहीं, कोई दिखावा, आडम्बर नहीं, कुछ भी नहीं. वाकई बड़ी निराशाजनक शादी थी मेरे लिए वह. सारी कल्पनाएँ धूमिल हो गयीं थीं , और बुरा भी बहुत लगा. पर, समझ में आता है, इस सबका तर्क इतने वर्षों बाद. यह सारी ढकोसलेबाजी, दिखावा और दहेज़ नितांत अस्थायी और मनभेद कराने वाला होता है. स्थायी तो आपका चरित्र, संवेदनाएं और मानवीय अनुभूतियाँ होती हैं. यदि इनका अभाव हो, तो न आप न विवाहित जीवन और न सम्बन्ध-- कुछ भी आपके लिए सुखद नहीं हो सकता. उस समय मैंने मां से पुछा भी था, पर उन्होंने हंस कर टाल दिया, “जब तुम्हारी शादी होगी, तो बहुत धूम-धाम से होगी", कहकर उन्होंने मेरी चिकोटी काट ली थी.

 

न होने पर भी बहुत काम होते हैं शादी में. वह सब अच्छे से संभाले मां ने. स्वामी दयानंद सरस्वती और आर्य समाज के सिद्धांतों में अगाध श्रद्धा थी पिता की. कुल पांच लोग बारात में गए थे, मैं भी था, पर मेरी उन पांच में गिनती नहीं थी सबसे छोटा जो था मैं. वापिस आये, तो मेरा तो अधिकतर समय अपनी मां से कहीं अधिक भाभी के इर्द-गिर्द ही बीतता था. पर, उस बाल मन को भी थोड़ा -थोड़ा समझ में आ रहा था, कि उन्हें इतना भी मेरा स्नेह पसंद नहीं. वह बात अलग है कि मैं आसानी से हार नहीं मानने वाला था. एक दिन मैंने उनके संदूक में उनकी लाई हुई साड़ियों में से एक को अपनी होने वाली पत्नी के लिए सुरक्षित रखने का अनुरोध भी कर लिया. उन्होंने न हाँ की, न ना, बस हल्का-सा मुस्कुरा कर अपना सामान सहेजने में लगी रहीं . और वह साड़ी मुझे कभी मिली ही नहीं. बाद में मुझे समझ में आया, वह रंग-बिरंगी साड़ी जरूर थी, पर थी कुल साधारण, अपनी क्वालिटी के कारण, शायद आर्टिफ़िशिअल सिल्क थी, जो बहुत सस्ती आती है, पर उन्होंने इसे अपने से जुदा न करना ही बेहतर समझा होगा.

 

मैं बहुत छोटा था. मुझे बिल्कुल स्मरण नहीं कि कब हम लोग किराये का घर छोड़कर नये मकान में शिफ्ट हो गए थे. मकान क्या था, महल था. मैं अक्सर गिन लेता था. कुल चौदह कमरे थे. दस भूतल पर और चार पहली मंजिल पर. नौकरों की फौज भी थी. कुछ घर के काम के लिए कुछ ऑफिस के. ऑफिस बाहरी हिस्से में था. घर के लिए दोनों ओर से एंट्री हो सकती थी-- आगे से कार्यालय की ओर से भी, और पीछे से भी, जो रास्ता केवल घर के लिए ही था. नौकर होना अलग बात है, और उन्हें संभालना अलग. मां को मैंने बखूबी अच्छे प्रबंधक की तरह देखा-- साफ़ सफाई के लिए निर्देश देते हुए से लेकर अतिथियों के लिए चाय-नाश्ता और लंच-डिनर तक की व्यवस्था करते हुए. वह सवेरे से जुटी रहती, सुबह मुझे, भाई और बहन को तैयार कराकर स्कूल भेजने से लेकर पूरे दिन के लिए. और रात को डिनर के समय भी कुक के स्थान पर स्वयं ही अपने हाथों से रोटियाँ बनाकर खिलाती. आज तक कभी बनाकर रखी या, टिफिनदान में रखी चपातियां नहीं खाई उनके समय में. (हाँ, वह बात अलग है कि बाद में पत्नी ने भी कभी ऐसा अवसर नहीं दिया). चाहे रात के दो क्यों न बजे हों ! पता नहीं कहाँ से ऊर्जा मिलती थी उन्हें, हालांकि वह समय-समय पर अपने टेस्ट भी कराती रहतीं और दवाओं का भी ध्यान रखतीं . किडनी प्रोब्लम थी उनको, पर निराश कभी देखा नहीं मैंने उन्हें. व्यस्त समय के बावजूद वह मुझे कहानियाँ सुनाने का समय जरूर निकाल लेतीं . उनकी कहानियों में परीलोक भी होता था, और जीवन दर्शन के सन्देश भी !

 

मां-पिता का यह प्रेम-विवाह था. मां अपनी खुशियाँ घर और अन्य कामों में खोजती रहती. पिता भी बहुत प्रसन्न रहते थे. उनकी हंसी के किस्से दूर-दूर तक चर्चित थे. कभी अवसाद में नहीं देखा मैंने उन्हें, तमाम तरह की कठिनाइयों के बावजूद. उनका व्यक्तित्व ऐसा था कि अच्छा-भला इंसान उनके तेज़ के सामने बौना पड़ जाता था. लगभग छः फीट का बदन और विशुद्ध सुर्ख लाली लिए गोरा रंग. आवाज यूँ तो सौम्य थी, पर जब नाराजगी में बोलते तो घर में थरथराने की सी आवाज़ महसूस होती. एकबारगी लगता कि हल्का-फुल्का भूकंप आ गया हो. हम लोग तो कोनों में छिप जाते और तभी निकलते जब उनकी फिर से हंसी न सुन लेते. सौभाग्य से वह उतनी जल्दी ही शांत भी हो जाते और फिर अपनी हंसी-मज़ाक की दुनिया में लौट जाते. मां से कभी किसी बात पर गुस्सा होते, या कोई वाद-विवाद होते मैंने देखा हो, मुझे स्मरण नहीं.

 

मुझे आज तक नहीं पता कि बात क्या हुई. हाँ, इतना जरूर ध्यान है कि भाभी ने छः माह में ही कुछ ऐसा निर्णय लिया कि वह घर में नहीं कहीं अलग ही रहेंगी वह. उनकी जिद देखकर किसी ने उन्हें रोका भी नहीं. एक दिन वह वह अपना सामान समेटकर एक अलग घर में शिफ्ट कर गईं . केवल भाई-भाभी गए थे घर से, पर मुझे लगता था कि वह यहीं रहते तो अच्छा था. पर, बहुत कुछ शेष था अभी. विवाह के बाद पत्नी से जो बान्डिंग बनता है, उससे एकबारगी सब रिश्ते पीछे छूट जाते हैं-- मां-बाप, भाई-बहिन, परिजन और बचपन के मित्र. कुछ लोग अवश्य ऐसे होते हैं कि वह समझदारी बनाते हुए दोनों रिश्तों का सम्मान बनाये रखते हैं. पर ऐसा कुछ दिखा नहीं. भाई का पलड़ा पत्नी की तरफ ही दिखा हर बार.

 

“बेटा, तुम्हारी भाभी ने जहाँ शिफ्ट किया है, वह तुम्हारे स्कूल के रास्ते में पड़ता है. यह पैकेट और बर्तन तुम उनके हाथ में दे देना.. सावधानी से… और किसी को बताना नहीं है. समझे?”, मां ने एक दिन सवेरे मुझे स्कूल जाने से पहले कहा.

 

मैंने स्वीकृति में गर्दन हिलाई, रास्ता समझा और निकल पड़ा, बैग लेकर. मां के निर्देशों से मुझे अपनी महत्ता का तो भान हुआ ही, यह देखकर भी अच्छा लगा कि शायद संबंधों में कुछ गुंजाइश अभी बाकी है. मैं गया, और जो वहां देखा उनका हाल, उससे बहुत ग्लानि हुई. रहने का स्तर हमारे नौकरों से भी गया बीता था. सही से सर्व करने के लिए उनके पास कप-प्लेट भी नहीं थे. मुझे देखकर एकबारगी उन्हें शायद अच्छा लगा. जैसे वह मेरी ही प्रतीक्षा कर रही हों. छोटा पैकेट भी उन्होंने मेरे सामने ही खोला. पॉलीथीन में कागज़ और टेप से लिपटी दो परतों के बाद सुर्ख लाल रंग का जो पैकेट था उसमें काफी गहने थे, सब सोने के.एक-एक कर को छूकर देखा भाभी ने उन्हें, फिर तसल्ली से गिनकर रख लिया.

 

मुझे स्कूल के लिए जल्दी थी, सो मैं निकल आया, बाद में आने का कहकर. कई बार फिर भी जाना हुआ, कभी स्वयं से, कभी मां के कहने से. जब भी कुछ सामान भिजवाना होता था, वह मुझे ही कहती. लगता था कि अब कुछ आत्मीयता के भाव फिर से अंकुरित हो रहे थे भाभी के मन में. वह मुझे देर तक रुकने का आग्रह करतीं , कोशिश करके कुछ बनाकर खिलातीं . पर, जैसा कि मैंने उन्हें जाना था, उन्हें किचन में जाना और खाना बनाना बिल्कुल भी पसंद नहीं था. ऐसे में जो वह बनाती, कुछ न कुछ कमी रह ही जाती, और मन कसैला हो जाता. इससे बेहतर तो हमारा पुराना कुक ही बनाता था.

 

एक दिन, मां ने जब बिस्तर पकड़ा तो फिर वह उठ ही नहीं पाई. बेहतर इलाज़ के लिए उन्हें दिल्ली के आयुर्विज्ञान संस्थान में भर्ती कराया गया. लगातार डायलिसिस के बाद राहत तो मिलती लेकिन ऐसी राहत कभी नहीं मिल पाई कि वह फिर से अपने प्राइवेट वार्ड के अहाते में ही टहल सकतीं . अपने हाथों से गर्म-गर्म चपातियाँ सेंक कर खिला पाना , या फिर कुछ परीलोक की सी कहानियां ही सुनाना तो दूर की बात थी.

 

तेईस जनवरी की तारीख थी वह, जब पिता मुझे दिल्ली ले गए, मां से मिलाने. तारीख इस्ल्ये याद है कि उस दिन दिल्ली में गणतंत्र दिवस की परेड का पूर्वाभ्यास होता है, और इसके चलते नई दिल्ली की सभी प्रमुख सड़कों का ट्रैफिक परिवर्तित कर दिया जाता है, जिससे आवागमन बहुत कठिन हो जाता है. उस दिन देखा तो समझ में आया कि कितना क्षीण हो गई थी वह. वैसे भी छरहरा शरीर था उनका, पर इस बीमारी और लगातार डायलिसिस ने उनके शरीर को तोड़ दिया था और आत्मा को मजबूर-सा बना दिया था. वह मुस्कुराना चाहती थी, पर मुस्कुरा नहीं पाई. बैठने की कोशिश की, लेकिन उनका हिलना भी संभव नहीं दिख रहा था. बिना कुछ बताये या बोले, मैं उनकी मन:स्थिति समझ रहा था, मेरी आँखें नम हो गईं थीं . इस स्थिति में न मैंने उन्हें कभी देखा था, न ही कल्पना की थी. पूरे दिन मैं उनके आसपास ही रहा, लेकिन हमारा कोई संवाद नहीं हो पाया. बस जो हुआ वह आँखों के माध्यम से मूक संवाद. जाने के समय उन्होंने बड़े भाई को इंगित कर मुझे कानों के इर्द-गिर्द ठीक से मफलर लपेटने को कहा. फिर, एक क्षीण-सी मुस्कान आशीर्वाद के रूप में बिखेरने की भी कोशिश की उन्होंने. मैंने चरण-स्पर्श कर उनसे विदा ली. ट्रेन का समय हो रहा था.

 

रात लगभग एक बजे मैं पिता के साथ घर लौटा, एक सौ बीस किलोमीटर का सफर तय कर. सवेरे ८.३० बजे भाई ने फोन कर उनके देह त्याग की सूचना दी. मैं अवाक था. मैंने पहली बार निकट से अनुभव किया था कि कोई अपना स्वयं से कैसे अलग होता है. सब कुछ आँखों के सामने था. हृदय विदारक. जिसे केवल महसूस किया जा सकता है, लिखने को शब्द नहीं हैं मेरे पास. अभी न जाने उनसे कितनी कहानियाँ मुझे सुननी शेष थी, और वह स्वयं, अचानक इतिहास के पन्नों में विलीन हो गई थी.

 

भाभी फिर कभी वापिस किराए के मकान में नहीं गई. घर का एक-एक हिस्सा मां की स्मृतियों को हर पल जीवंत करता दिखता था, और उधर फिर से भाभी की बेरुखी, न जाने क्यों ? रेखाएं-सी खिंच गई थी, अनचाही और अलिखित वर्जनाओं की. रहना असह्य हो गया था. अंततः मैं अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए भी उस मकान में, और उनके साथ कभी नहीं रुका. न ही उन्होंने चाहा, क्योंकि उनके चाहने पर ही मेरे लिए हॉस्टल की व्यवस्था कर दी गई, और मैंने सहर्ष घर से दूर रहना स्वीकार कर लिया. कुछ अनजानी हो चली ईंट, सीमेंट, लोहे और लकड़ी की रंग बिरंगी पुती आत्मा-विहीन इमारत में रहने से बेहतर हॉस्टल के कमरे को अपना साथी बनाना उचित विकल्प था मेरे लिए.

 

यह एक भाभी के स्नेह का तरीका था, और वह मेरा उस पर अपना निर्णय ! न जाने कौन ठीक था ! पर, इतना जरूर रहा कि जीवन में न मुझे कभी मां मिल पाई और न भाभी. काश, रिश्तों का मनोविज्ञान सब लोग समान रूप से अगर जान लें तो बहुत सी जटिलताएं स्वयँ ही दूर हो जाती हैं. पर मानव जीवन तथा संबंधों जितना जटिल इस दुनिया में कुछ और नहीं. फिर, यह जो पीढ़ियों का द्वंद है, इसकी निरंतरता में अगर अवरोध हो जाए, तो फिर सब ठीक ही न हो जाए! यह चक्र तो वंशानुगत तौर पर चलता ही आया है..और न जाने कब तक चलेगा. स्वामी विवेकानंद ने रिश्तों की उदासीनता के लिए कुछ यूँ भी कहा था…”जीवन में ज्यादा रिश्ते होना जरूरी नहीं है, पर जो रिश्ते हैं, उनमें जीवन होना जरूरी है”.

---- --Raj Gopal Singh Verma



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