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@dawriter

एक मुलाकात

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abhi92dutta by  
abhi92dutta

 

 

दिल्ली, देश की राजधानी । कहने के लिए इसको “दिलवालों का शहर” कहा जाता है । ऐहतिहाशिक के साथ साथ आधुनिकता का बेजोड़ संगम है दिल्ली ।

हर बिहारी की तरह मेरे भी काफी रिश्तेदार दिल्ली में रहते है । उनमें से कुछ दिल्ली के ही रह गए और कुछ की आत्मा आज भी बिहार में ही भटक रही है ।

वैसे भी बिहार में एक कहावत बहुत ही प्रचलित है , “दिल्ली में किसी बूढ़े बरगद के पेड़ को जोर से हिलाओगे तो उसमें से चार बिहारी , तीन भैयाजी( उत्तर प्रदेश के निवासी) तब जा कर एक दिल्ली का मूल निवासी गिरेगा” । सुनने में यह कहावत अच्छी लगती है , पर शायद अब दिल्ली में उतने बड़े बरगद के पेड़ के लिये भी जगह कहाँ बची हैं ।

जब स्कूल में था , तो बहुत मन करता था दिल्ली घूमने का । दिल्ली की जब भी चर्चा होती तो मन में कौतूहल का विषय बना रहता था । सोचा करता था काश कभी एक बार दिल्ली घूमने जाऊँ । लाल किला , क़ुतुब मीनार , चांदनी चौक , संसद भवन , दिल्ली यूनिवर्सिटी यह तमाम नाम सुनते ही अंदर से जोश भर देता था । सबसे आश्चर्य दिल्ली मेट्रो के बारे में सुन कर होता था । कि दिल्ली में मेट्रो ज़मीन के अंदर भी चलती हैं , यह बात मुझे सबसे ज्यादा चकित करती थी । 

इतना होते होते मैं कैसे भी कर के अपना दसवीं की बोर्ड परीक्षा दे चुका था । और तीन महीने की छुट्टी पर भारत भ्रमण का विचार कर रहा था । मुझे याद है उन तीन महीनों की छुट्टी में , मैं दिल्ली , गुजरात , मुम्बई , गोवा , उत्तर प्रदेश घूमा था । 

तो सबसे पहले मैं चला अपने सपनों के शहर दिल्ली । पहली बार घर से अकेले सफर पर निकलने वाले थे । तो मन में डर तो था ही लेकिन ख़ुशी ज्यादा थी । घर में चारों तरफ से सफर के लिए तमाम तरह की हिदायत दी जा चुकी थी - रास्ते में कोई कुछ दे खाने के लिए तो बिलकुल मत खाना , ज्यादा अजनबी लोगो से बात मत करना , मुगलसराय स्टेशन पर सामान और बैग का ध्यान रखना वहाँ चोरी बहुत होती है , फलाना चिलाना और भी बहुत कुछ । मेरे मंझले भैया हमको पटना स्टेशन छोड़ने आये थे । टिकट कन्फर्म था , सीट पर बैठने से पहले फिर वही हिदायत दोबारा मंझले भैया के तरफ से हमको दिया गया । और हमको बताया गया कि नयी दिल्ली स्टेशन पर हमारे बड़े भैया इंतज़ार करेंगे । हमारे बड़े भैया दिल्ली में ही रह कर अपनी पढ़ाई कर रहे थे ।

ट्रेन खुलने के बाद घर में दिया गया सारा ज्ञान छू मंतर हो गया । पूरा ट्रेन स्टूडेंट सब से भरा पड़ा था । तो हमको बड़ा मजा आ रहा था । गाज़ियाबाद के बाद ट्रेन दिल्ली क्षेत्र में प्रवेश कर चुकी थी । ट्रेन की खिड़की से मेट्रो दिखाई दे रही थी ।

दिन के 11 बजे के आसपास मैं नयी दिल्ली स्टेशन पर था । अपने सपनों के शहर में मैं अपना पहला कदम रख चुका था  । स्टेशन पर बड़े भैया मेरा इंतज़ार कर रहे थे । स्टेशन  से निकलने के बाद हम लोग दिल्ली मेट्रो स्टेशन गए , वहाँ से राजीव चौक , और फिर वहाँ से बदरपुर । और बदरपुर से ऑटो से फ़रीदाबाद । दस दिन की उस ट्रिप में मुझे दिल्ली और भी पसंद आने लगा था । वहाँ का लाइफस्टाइल , मेट्रो सब कुछ मुझे आकर्षित कर रहा था । मैंने मन में निश्चय कर लिया की बारहवीं की परीक्षा के बाद आगे की पढ़ाई के लिए दिल्ली ही आना है ।

लेकिन कुछ सपने अधूरे रह जाते है । परिस्थिति कुछ ऐसी हुई की बारहवीं के बाद मुझे बंगाल से अपनी आगे की पढ़ाई करनी पड़ी । 

तो अब छः साल बाद , दोबारा दिल्ली जाने का मौका मिला  । इस बार एक विद्यार्थी के तौर पर नहीं , एक युवा लेख़क के तौर पर । इन छः साल में मुझे दिल्ली एकदम बदली हुई नज़र आई । लोग यहाँ चल नहीं रहे थे , दौड़ रहे थे । पता नहीं किस चीज़ की रेस लगी हुई थी । इन सब को ओलंपिक में भेज देना चाइए एक दो गोल्ड मैडल तो भारत को मिल जाता । सबसे खराब हालत तो मेट्रो में थी । तीन तीन घंटे के सफर में कोई किसी को टोकता भी नहीं है । 

इन 6 सालों में मुझे दिल्ली से ज्यादा बंगाल से लगाव हो चुका था । 3 इडियट्स के रणछोड़ दास की जगह अब मुझे गैंग्स ऑफ़ वासेपुर का फैज़ल खान पसंद आने लगा था । नए फ़िल्मी गीत की जगह ग़ज़ल सुनना अच्छा लगने लगा था । भीड़ से अच्छा शांति पसंद आने लगी थी । रौशनी से अधिक अंधेरा मेरा साथी बन चुका था ।

।।।।।।

यह सब फ़ालतू बात मैं सोच ही रहा था । की अपनी घड़ी में समय देखा तो रात के ग्यारह बज के बीस मिनट हो रहे थे । और मैं साकेत विहार एरिया में घूम रहा था , और मुझे द्वारका सेक्टर 21 जाना था । और अब मेट्रो से जाना कोई औचित्य नहीं बचा था । मैंने उबेर कैब बुक किया , पर किसी कारण मेरी राइड कैंसिल हो चुकी थी । तब अंतिम में हार कर अपने मित्र कार्तिक को फ़ोन किया , जिसके यहाँ जाना था । तो पहले उसने जी भर के गाली दिया , दिल्ली के भाषा में । और फ़ोन पर बोला “की देख भाई तू वहीं इंतज़ार कर , मैं बाइक से आ रहा हूँ । तू वहाँ से हिलना भी मत क्योंकि साकेत विहार का एरिया सही नहीं है । मैं डेढ़ घंटे में वहाँ आ जाऊँगा ” ।

अब मेरे पास कोई दूसरा चारा नहीं था , पर मुझे यह समझ नहीं आया की “साकेत बिहार एरिया अच्छा नहीं है” इसका क्या मतलब हुआ ?

मैं एक बेंच पर बैठ कर सिगरेट पी रहा था । तभी सामने के बेंच पर एक लड़की बैठी हुई दिखी । वो लड़की सिगरेट पी रही थी । मैं एक छोटे शहर का लड़का , यह बात मुझे थोड़ी अजीब लगी की यह , एक लड़की हो कर वो सिगरेट पी रही है ।  मैंने उसका चेहरा देखने की कोशिश की । उसका चेहरा जाना पहचाना लगा । मैं उसके पास गया और फिर ध्यान से उसका  चेहरा देखने की कोशिश की । 

अरे यह तो निहारिका थी । निहारिका मेरे स्कूल की दोस्त , बारहवीं तक हम दोनों एक ही स्कूल में थे । बारहवीं के बाद मैं बंगाल चला गया था । और निहारिका को भूल ही गया था । पर आज छः साल बाद वो दिल्ली में मिली , सिगरेट पीते हुए । शायद दिल्ली की आवो हवा ने मेरे दोस्त के बदल के रख  दिया था ।

मैं उसके पास गया , और बोला - कैसी हो निहारिका ? 

निहारिका - कौन हो तुम ? 

मैंने बोला - अरे तुम्हारे बचपन का दोस्त आकाश । जिसको तुम स्कूल में हाथी बुलाती  थी ।

निहारिका - अरे आकाश तुम , यहाँ कैसे ? 

बस ऐसे ही , दिल्ली आया था , तो घूमते घूमते यहाँ आ गया - मैंने जवाब दिया ।

ओह ! लेकिन इतनी रात गए साकेत विहार में क्या कर रहे हो । कोई काम या ….. - निहारिका ने पूछा ।

अरे नहीं , प्रगति मैदान में लेख़क लोगों का साहित्य समारोह था , तो उसी में आया था । तो उसके बाद सोचा की दिल्ली घुमा जाए मेट्रो में और शायद घूमने से कोई कहानी मुझे मिल जाये । बस इसी घूमने के चक्कर में इतनी रात हो गयी - मैंने जवाब दिया ।

ओह तो तुम लेखक हो । क्या लिखतें हो ? कहानियाँ , उपन्यास या कुछ अलग ? - निहारिका ने सवाल किया ।

फिलहाल तो कहानियाँ ही लिखता हूँ । उपन्यास का सोचा है लेकिन उसके लिए अभी लम्बा सफर तय करना है । वैसे तुम बताओ , तुम यहाँ क्या कर रही हो - मैंने सवाल किया ।

क्या हम टहलते हुए बात कर सकते है । मेरी सिगरेट भी खत्म हो चुकी है - निहारिका ने मुझसे पूछा ।

मैंने हाँ में सर हिला दिया । उसका यह बदला हुआ अवतार मुझे अजीब सा लग रहा था ।

अब हम दोनों सड़क किनारे फूथपाथ पर चल रहे थे ।

वही जो तुम्हारे साथ हुआ । मेरी भी लास्ट मेट्रो छूट गयी । वैसे मेरे ऑफ़िस की गाड़ी आ रही है मुझे लेने - निहारिका ने मेरे सवालों का जवाब दिया ।

ओह तो तुम जॉब करती हो । बधाई हो - मैंने ख़ुशी जाहिर करते हुए कहा ।

‘अरे काहे का ऑफ़िस , मैं कॉल सेंटर में जॉब करती हूँ ’।

ओह अच्छा है - मैंने कहा ,

वैसे तुम क्या करते हो ? और शादी - वादी हुई या नहीं या किसी को पसंद करते हो ? - निहारिका ने एक साथ दो - तीन सवाल कर दिए ।

फिलहाल तो बेरोजगार हूँ । लेखक बनना चाहता हूँ । कुछ कहानियाँ सब लिखी है मैंने , उसी सिलसिले में दिल्ली आया हूँ इस बार । बस एक ही सपना है मेरी किताब छप जाए । और रही शादी की बात तो बेरोज़गार से शादी कौन करता है । और कोई पसंद भी आये तो उसके सामने अपने प्यार का इज़हार नहीं कर पता हूँ - मैंने निहारिका के सभी सवालों का जवाब दे दिया था ।

वैसे निहारिका तुम्हें याद स्कूल में एक बार मैंने तुम्हें प्रोपोज़ किया था । और तुम गुस्सा होने के बजाय हँसने लगी थी और हाथी - हाथी कह कर मेरा मजाक बना दी थी । तुमको पता है वो सभी दोस्तों ने शर्त लगायी थी की मैं किसी लड़की को प्रोपोज़ नहीं कर सकता हूँ ,  मेरे में इतनी हिम्मत नहीं है किसी को प्रोपोज़ कर सकूँ । इसलिये इस शर्त को जीतने के लिए मैंने तुम्हें प्रोपोज़ किया था  - मैंने बचपन के दिन याद करते हुए कहा ,

हाँ मुझे पहले से ही उस शर्त के बारे में पता था - निहारिका ने कहा ,

वो भी क्या दिन थे - मैंने कहा ,

बात करते करते कब हम लोग चाय की दूकान पर पहुँच गए पता ही नहीं चला । और चाय मेरी कमजोरी थी । मैंने निहारिका से चाय के लिए पूछा । शुरू में उसने मना किया लेकिन फिर वो मान गयी ।

मैं चाय वाले के पास गया और निहारिका कुछ कदम पीछे खड़ी हो गयी । उसका चेहरा कुछ अजीब लगा , ऐसा लगा वो कुछ चिंता में है । पर इन छः साल के समय ने हम दोनों के दोस्ती के बीच एक गहरी खाई सी जमा हो गयी थी । मैं चाहते हुए भी उससे कुछ नहीं पूछ सकता था ।

मैंने चाय वाले से दो चाय के लिए कहा । चाय वाले ने चाय बनाते हुए मुझसे पूछा “सर रूम चाइए क्या” ? 

नहीं - मैंने कहा ,

ओह तो लगता है होम डिलीवरी है - चाय वाले ने मेरे हाथ में चाय पकड़ाते हुए कहा ,

मैं उसकी बातों का कोई मतलब ही नहीं जान सका ।

मैंने उसकी बात को दरकिनार करते हुए एक चाय निहारिका के तरफ बढ़ा दी । चाय पीने के लिए निहारिका ने जैसे ही अपने चेहरे पर से साल हटाया तो मैंने देखा की उसका बायाँ गाल पर चोट का निशान है , और वो सूजा हुआ भी है । 

अरे निहारिका यह कैसा चोट है - मैंने पूछ ही लिया ,

अरे ये । कल ब्यूटी पार्लर गयी थी फेसिअल और मसाज के लिए तो वहीं एक क्रीम साइड इफ़ेक्ट कर गयी और मेरे चेहरे का यह हाल हो गया । पार्लर वालों ने कहा है एक - दो दिन में ठीक हो जायेगा - निहारिका ने अपने तरफ से सच बोली थी , 

पर मेरा मन बिलकुल भी इस बात को मानने के मूड में नहीं था । पर मैं इसके बारे में ज्यादा न ही पूछना बेहतर समझा ।

अच्छा निहारिका , मैंने सुना था कि तू शादी कर चुकी है - मैंने पूछा ,

हाँ मैंने लव मैरिज की थी , जब फर्स्ट ईयर में थी तभी पटना में एक लड़के से प्यार कर बैठी । फिर हम दोनों भाग कर दिल्ली आ गए । वो भी एक कॉम्पनी में जॉब करता है - निहारिका ने कहा ,

ओह ,बधाई हो - मैंने कहा ।

एक मिनट , तुम यह तो नहीं सोच रहे हो की यह चोट का निशान मेरे पति ने दिया है - निहारिका ने मुझसे पूछा ।

एक औरत , मर्द की तुलना में यह जल्दी जान लेती है कि सामने वाले के दिमाग में क्या चल रहा होता है ।

अरे नहीं नहीं - मैंने झेंपते हुए कहा ।

आकाश एक मदद करेगा , मेरे पास कैश खत्म हो गया है और मेरी कार्ड की लिमिट भी खत्म हो गयी है । क्या तू मुझे पंद्रह सौ रूपये दे सकता है । मैं कल ही तेरे अकाउंट में ट्रांसफर करवा दूँगी । मुझे जाते वक़्त कुछ काम है पैसों की - निहारिका ने कहा

कोई और रहता तो शायद नहीं देता । पर यह मेरी बचपन की दोस्त थी । आप सबको अविश्वास की नज़र से देख सकते है , पर बचपन के दोस्तों पर कभी शक नहीं कर सकते है । मैंने अपने पर्स से पंद्रह सौ निकाल कर उसे दे दिए ।

अच्छा आकाश मेरी गाड़ी आ गयी है , तू सुन न अपना मेल आई-डी और अकाउंट नंबर मुझे दे । एक दो पब्लिशर को मैं भी जानती हूँ अगर कोई बात बन सके - निहारिका ने कहा ।

मैंने अपना मेल आई-डी और अकाउंट नंबर उसे दे दिया । उसके बाद वो चली गयी । 

सामने से मेरा दोस्त कार्तिक भी बाइक पर चला आ रहा था । 

 ।।।।।।।।।

और भाई चलें - मैंने कार्तिक से पूछा ,

चल पहले चाय पीते है , बाइक चला कर आ रहा हूँ काफी ठण्ड लग रहा है - कार्तिक ने कहा ।

ठीक है चल ।

मैं और कार्तिक उसी चाय वाले के ठेला के पास गए , जहाँ कुछ देर पहले मैं और निहारिका ने चाय पी थी ।

क्या सर आपने मजा भी नहीं लिया , और उसको पैसे थमा दिए - चाय वाले ने मुझसे आश्चर्य रूप से पुछा ।

क्या ? मैं कुछ समझा नहीं । तुम किस चीज़ की बात कर रहे हो - मैंने चाय वाले से कहा ,

अरे सर आपने उस लड़की को पैसे दिए न । वो एक रंडी है । दिल्ली की भाषा में बोलु तो “कॉल-गर्ल” । रोज़ रात में वो धंधा करती है - चाय वाले ने कहा ,

तुम झूठ बोल रहे हो । बिना सोचे समझे कुछ भी मत बोलो किसी के बारे में - मैं गुस्से से उसको डाँटें जा रहा था ,

अरे साहब हम क्यों झूठ बोले किसी से । मैं इस एरिया में चाय का धंधा करता हूँ और साथ ही साथ इस एरिया का एजेंट भी हूँ । इस एरिया में कॉल गर्ल के साथ जो ग्राहक होता है उसको रूम और बाकी की जरुरत का सामान मैं ही पहुँचता हूँ । मैंने तो तभी आपसे पूछा भी था कि साहब रूम चाइए क्या ? पर आपने कुछ जवाब ही नहीं दिया । तो मुझे लगा शायद आप उसको अपने बंगले या किसी गेस्ट हाउस ले जायेंगे । और क्या बताऊँ सर उस लड़की के लिए कितने ग्राहक मेरे से रूम बुक करवातें है । पर एक बात समझ में नहीं आयी साहब , जब आपको उसके साथ कुछ करना ही नहीं था  , तो फिर आपने पैसे क्यों दिए - चाय वाले ने सभी सच्चाई , बेबाक अंदाज़ में बोल दिया था ,

तुम नहीं समझ पाओगे - मैंने कहा ।

मैं पूरी तरह अवाक् था । काटो तो खून नहीं । मैं कुछ भी समझ पाने में असमर्थ था । चाय वाला और कार्तिक मेरा मजाक उड़ा रहे थे , और बोल रहे थे की पैसा दिया और मजा भी नहीं लिया । 

कार्तिक मेरे कॉलेज का दोस्त था , इसलिये उसको मेरे बचपन के दोस्तों के बारे में नहीं पता था । इसलिये वह भी मेरा मजाक उड़ाए जा रहा था ।

मुझे उन दोनों की बात की परवाह नही थी । मुझे एक बात परेशान कर रही थी , की आज में जिससे मिला वो मेरी बचपन की दोस्त थी या …..

और निहारिका के लिए मैं दोस्त था या ग्राहक ?

फिर चाय खत्म कर मैं और कार्तिक बाइक से द्वारका की और निकल गया । रास्ते में मेरा मोबाइल में एक नोटिफिकेशन की आवाज़ आयी । मैंने घर जा कर नोटिफिकेशन चेक करने का सोचा , क्योंकि रास्ते में किसी को रिप्लाई देने का मन नहीं था । और निहारिका के बारे सोच सोच कर मेरा दिमाग और दुखी हो रहा था । मेरी बचपन की दोस्त दिल्ली में ऐसी हो गयी है । स्कूल में हम लोग कितने अच्छे दोस्त थे ।

डेढ़ घंटे बाद हम लोग कार्तिक के रूम में थे । कार्तिक ने मुझसे कहा “भाई ज्यादा टेंशन न ले और जा कर सो जा” 

मैं अपने कमरे में गया । और मोबाइल निकाल कर नोटिफिकेशन देखा , एक मेल आया हुआ था । यह निहारिका का मेल था ।

To - aaksh12***@gmail.com

From - niharika95***@gmail.com

Subject - मुझे माफ़ कर देना ।।

आकाश मुझे माफ़ कर देना । मुझे पता है मेरे जाने के कुछ ही देर बाद , तुम्हें मेरी सच्चाई पता चल गयी होगी । तुम सोच रहे होंगे तुम्हारी यह बचपन की दोस्त दिल्ली में आकर यह क्या कर रही है ? तुम्हारा सोचना बिलकुल सही है । तुमको जब मैंने आज साकेत विहार में देखा , तो मुझे लगा की तुम भी किसी कॉल गर्ल के साथ रात बिताने आये हो । पर तुम्हारी बातों से पता चला की मैं गलत थी । मुझे बड़ी खुशी मिली यह जानकर की तुम एक लेखक बन गए हो । अब तुमको मैं अपने बारे में बताती हूँ । सभी का तो नहीं पता , लेकिन इस तरह के काम में सभी अपने मन से नहीं आती है । कोई मजबूरी , कोई ज़बरदस्ती तो किसी को जानबूझकर इस काम में लगाया जाता है । मेरी भी मजबूरी थी । मेरी कोई लव मैरिज नहीं हुई है । हाँ पटना में एक लड़के से प्यार कर बैठी , उसी के साथ दिल्ली भाग आयी । घर में बड़ों की बातें बंदिशे लगती थी । प्यार होने के बाद मुझे एक अलग एहसास हुआ । मैं जीना चाहती थी । आज़ाद होना चाहती थी । हम दोनों दिल्ली भाग आये । पर यहाँ मुझसे एक गलती हो गयी , भागने से पहले मुझे कोर्ट मैरिज कर लेनी चाइए थी । मैं कोर्ट मैरिज नहीं कर सकी , मुझे नहीं पता था उसके मन में क्या चल रहा था । वो जो भी कुछ कहता तो मुझे सही ही लगता था । जब किसी से प्यार होता है न तो उसकी हर बात अच्छी और सच्ची ही लगती है । हम लोग दिल्ली में मंडावली में रह रहे थे । 4 महीने के बाद ही मैं प्रेग्नेंट थी । जब यह बात उसको पता चली तो , वह एक दिन दवाई लाने के बहाने गया , सो आज तक नहीं लौट के आया । 

इस हाल में मेरी मदद मोहल्ले की राबिया भाभी ने की । उन्होंने मुझे ले जा कर मेरा गर्भपात करवाया । मैं अपने बच्चे को जन्म देना चाहती थी । पर स्थिति की मार ने मुझे उस बच्चे का हत्यारा बना दिया । मैं और राबिया भाभी वापस घर आये । मैं कर्ज़ों में डूबी हुई थी , और मेरे पास ऐसी कोई डिग्री भी नहीं थी , जिससे मुझे दिल्ली जैसे जगह पर कोई अच्छी जॉब मिलती ।  मैं वापस पटना नहीं जाना चाहती थी । मेरे गलत कदम के कारण पहले ही मेरे घर वाले काफी परेशान थे , उन्हें और ज़लील नहीं करना चाहती थी । 

मुझे उस मोहल्ले से निकाल दिया गया था । पर कर्ज़दारों का दवाब बढ़ते ही जा रहा था । और मैं गलत संगतों में फँसी जा रही थी । वो राबिया भाभी ऐसे ही लड़की सब की तलाश में रहती थी । वो मुझे दूसरे एरिया में रहने का इंतज़ाम कर दी थी । एक दिन वो , और उनके साथ एक आदमी आया था मेरे यहाँ । उन्होंने बताया कि यह आदमी उनका भाई है । वो रात में खाने के लिए रुक गए थे । लेकिन खाते खाते मैं कब बेहोश हो गयी मुझे पता ही नहीं चला । जब मुझे होश आया , तब तक मेरी ज़िन्दगी ही बदल चुकी थी । उनका मुहँबोला भाई मेरे साथ बिस्तर पर सोया हुआ था । मैं रो रही थी , तभी दूसरे कमरे से राबिया भाभी आयी और उन्होंने मुझे समझाया कि रो मत और बोली की इस काम में बहुत पैसे हैं । तेरे सारे कर्जे एक बार में खत्म हो जायेंगी । इतना कहने के बाद उन्होंने मेरे हाथ में आठ हज़ार रख दिए और बोली यह ले तेरी पहली कमाई । उस समय मैं कुछ भी सोच सकने में असमर्थ थी । राबिया भाभी ने समझया की यह आदमी उसका हर डील फाइनल करेगा । उसके हर डील का पंद्रह सौ इसका होगा बाकी सब तेरा । मैं पूरी तरह टूट चुकी थी । मैंने कोई जवाब नहीं दिया । जाते वक़्त राबिया भाभी ने कहा सोच समझ के जवाब देना । वो लोग जा चुके थे । मुझे अपने से घिन्न आ रही थी । उस दिन दो घंटे बाथरूम में शावर के नीचे खड़ी थी । दिल्ली जैसे शहर में आप किसी पर विशवास नहीं कर सकते है।हर नज़र आपको नोच खाने के लिए तैयार रहती है । और पेट की भूख और पैसों की जरुरत मुझे उस दिशा में सोचने के लिए मजबूर कर रही थी । ना चाहते हुए भी मुझे राबिया भाभी को हाँ कहना पड़ा । महीने के पंद्रह दिन मुझे उनके लिए काम करना था और हर रात के डील का पंद्रह सौ उन्हें देना था ,बाकी मेरा । मेरा रेट तय हुआ पाँच हज़ार एक रात का ।  मुझे साकेत विहार का एरिया दिया गया । महीने के पंद्रह दिन यह काम करने के बाद काफी पैसे मिलने लगे । दिल्ली के रसूखदार लोगों के यहाँ मुझे भेजा जाने लगा । कोई कोई पाँच हज़ार के बदले ज्यादा भी देते थे । कोई भी चीज़ की आदत लगाओ तो वो नशा बन जाता है । मेरे लिए यह चीज़ भी नशा की तरह हो गया है । मैं शराब , सिगरेट  इन सब का नशा आम हो गया है मेरे लिए । 

जो मेरा एजेंट था , उसने अपने पैरवी से मुझे नॉएडा एरिया में एक छोटे से कॉल सेंटर में जॉब लगवा दिया । तो दिन में निहारिका बन कर कॉल सेंटर में जॉब करती हूँ । और रात को नेहा बन कर कॉल गर्ल बन कर “धंधा” करती हूँ । 

परसो रात जिस कस्टमर के पास मुझे गया था । उसने मुझे नशे के हालात में मुझे मारा पीटा और सिगरेट से मेरी जांघो में कितने जगह जला दिया था । तुमने जो मेरे गालों पर एक चोट का निशान देखा था , यह उसी कस्टमर ने मुझे परसों दिया था । आज भी मुझे उसी कस्टमर ने बुक किया था । पर मैं अपनी तरफ से आज की डील कैंसिल कर दी थी । मर्द लोग का दिन में अलग चेहरा होता है , और रात को बिस्तर पर एक दूसरा चेहरा होता है , जो बेहद डरावना , गन्दा और हैवानियत से भरा हुआ होता है । 

पर मुझे अपने एजेंट का हिस्सा देना था । अगर आज नहीं देती तो कल दोगुना हिस्सा देना पड़ता । और जब भी हम लोग की बुकिंग होती है , तब हम लोग अपनी कोई भी पहचान पत्र और पैसे साथ में नहीं रखते है । इसलिए मैंने तुमसे झूठ बोल कर तुमसे पैसे लिए । मैं कल ही तुम्हारा पैसा तुम्हारे अकाउंट में डाल दूँगी । 

पर एक वादा करो , हमारी आज के मुलाकात के बारे में तुम किसी से भी कोई जिक्र नहीं करोगे । क्योंकि लोग आपकी मजबूरी समझे बिना आप पर हँसेंगे , अश्लील भाषा का इस्तेमाल करेंगे । और दुबारा मुझसे मिलने की कोशिश मत करना , क्योंकि मैं तुमसे नज़रे नहीं मिला पाऊँगी । और हाँ मुझे समझाने की कोशिश मत करना मैं अब उस दुनिया में वापस नहीं आना चाहती है , मेरी ज़िन्दगी अब इसी में सिमित हो गयी । हम जैसी लड़कियों का तुम्हारे दुनिया में कोई जगह नहीं है ।

मुझे पता है स्कूल में तुम मुझसे प्यार करते थे , पर वो बचपन था और यह सच्चाई है । 

तुम्हारी बचपन की दोस्त, 

निहारिका 

( मेरा प्यारा हाथी )

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यह पढ़ने के बाद मेरी आँखे नम थी । मैं कुछ भी सोच सकने में असमर्थ था । मैंने उस मेल का जवाब उसी वक़्त दिया ,,,

मैं तुमसे वादा करता हूँ , आज की हम दोनों की मुलाकात की जिक्र मैं किसी के सामने नहीं करूँगा । और अगर तू सच में आज भी मुझे अपना दोस्त समझती है तो मुझे पैसे वापस मत करना । एक दोस्त समझ के मैंने दिया और तू भी एक दोस्त समझ के रख ले । पर एक बार कोशिश कर इस दलदल से निकलने का ।।।।।

तुम्हारा हाथी ,

आकाश 

।।।।।।।

मेल करने के बाद मैं सो गया । दूसरे दिन मुझे पटना के लिए निकलना था । आज दिल्ली का दूसरा रूप भी देखने को मिल गया था ।।।।।



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