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@dawriter

आरक्षण

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जैसे ही आनन्द ने घर में कदम रखा, पिताजी की आंखों में दहकते अंगारों ने उसका जोरदार स्वागत किया। "कहाँ थे दो दिन तक?"

"नानी गाँव गए थे। माँ को फोन करके बता दिये थे।"

"नानी मर गयी थी कि फिर एसएससी में लटक गये"

"हाँ, इस बार भी नहीं निकला।"

"देख लो अब तुम अपना कि दिल्ली जाना है या मुम्बई। बेहूदा कहीं का। विजय का भांजा निकाल लिया। मिशिर जी की बेटी भी निकाल ली। लेकिन इस ढक्कन से कुछ नहीं हुआ।"

..... "और तो और रमुआ का बेटा और भतीजा दुन्नु पास हो गया।" "रमुआ के बेटा और भतीजा आरक्षण से पास हुआ है।" "रमुआ के बेटे का बराबरी तू करेगा रे! ओकरा पैर के धुअन भी नहीं है। ऊ सबेरे खेत में काम करता है। स्कूल से आने के बाद गाय भी चराता है। रात में मकई और आम का रखबारी करते हुये पढ़ाई किया है। और एक तुम हो जिसको हम न कभी आटा पिसाने भेजे और न ही कभी पेठिया से तरकारी लाने। इस हिसाब से तो आरक्षण तुमको भी मिला। आगे से कभी आरक्षण का नाम लिया न तो जूता भिगाकर मारेंगे।" आनंद डरते डरते आगे बढ़कर पिताजी का पैर पकड़ लिया। "एक साल हमको और दे दीजिए। अगर पास नहीं हुए तो माँ कसम आपको अपना मुँह नहीं दिखाएंगे।" "आरक्षण का दर्द हम भी समझते हैं बेटा लेकिन जिंदगी ऐसे नहीं चलती है ना। हमको सर्वश्रेठ बनने के अलावा कुछ और बनने का विकल्प सरकार ने छोड़ा ही नहीं है।

मृणाल आशुतोष



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