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@dawriter

आत्म दीपो भवः

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बात पिछले वर्ष की दीवाली की है मैंने और मेरे मित्र विजय ने निर्णय लिया की इस बार हम दिवाली कुछ ख़ास, कुछ अलग मनाएंगे। अपने लिए तो सब खुशियाँ मनाते है, हम दुसरो को खुशियाँ बांटेंगे। तो आखिरकार निर्णय यह लिया गया की हम दोनों मित्र इस वर्ष दिवाली पर अनाथालय पर जायेंगे। और अनाथ बच्चो के साथ खुशियाँ मनाएंगे। हम अनाथालय गए, तो वहा का दृश्य देखने लायक था। केवल हम ही नहींं वहां पर और भी लोग बच्चो को मिठाइयाँ और तोहफे देने पहुंचे हुए थे। एक पल को तो काफी अच्छा महसूस हुआ की चलो, हमारा समाज इस बात के प्रति कितना जागृत है। एकलौते हम नहीं थे जो वहां खुशियाँ बांटने गए हैं। वहां समाज के और भी सभ्य लोग है, जो समय-समय पर ऐसी संस्थाओं को दान देते रहते हैं और त्योहारों इत्यादि में वहां के बच्चो को मिठाइयाँ और तोहफे भी बांटते हैं।

खैर थोडा वक्त बच्चो के साथ बिताने के बाद हम घर की ओर निकल पड़े। हम बहुत ही खुश थे, कि आज हमने कुछ अच्छा काम किया। रास्ते में पाँवभाजी के स्टाल पर गाड़ी रोक कर मैंने पावभाजी पैक करवाई। और फिर हम घर के लिए निकल पड़े। रात के साढ़े नौ बज रहे होगे। मेरी निगाह रास्ते पर खड़े नन्हे से बच्चे पर गयी। फटे पुराने से कपड़े पहने हुए, रास्ते में आतिशबाजी कर रहे बच्चो को एकटक निहार रहा था। अनायास ही मेरे मन में आया की मुझे उससे बात करनी चाहिये।

मैंने उस से कहा की “अरे छोटू आप दिवाली नहीं मना रहे हो, पटाखे नहीं फोड़ रहे हो।”

वो नन्हा ७-८ साल का बच्चा चौकते हुए बोला  “नहीं भाईया हम बस देख रहे थे, वो ....वो.... “।

मैंने बीच में टोकते हुए पुछा “पटाखे चाहिए ?”

उसने हाँ में सर हिला दिया। मैंने सामने ही की दुकान पर से उसे मनचाहे पटाखे दिलवा दिए। उसके चेहरे की भाव भंगिमाए जैसे पल भर में बदल गयी थी। नन्हा सा बच्चा चहक उठा था।

मैंने उस से कहा “बेटा अकेले मत फोड़ना किसी बड़े के साथ ही फोड़ना।”

नन्हे बच्चे ने मासूम सा चेहरा बनाते हुए कहा कि  “हमरे साथ तो कोनो बड़ा नहीं है, भैया”।

मैंने कहा की “घर में कोई तो होगा बड़ा ?,भैया-दीदी या माँ-पिता जी कोई।”

उसने मासूम चेहरा बनाते हुए कहा “हाँ अम्मा है लेकिन उकी तो तबियत सही नहीं है, इसलिए वो हमरे साथ पटाखा नहीं फोड़ेगी न।”

और फिर वो पटाखे लेकर ख़ुशी ख़ुशी कूदता हुआ घर की और चल पड़ा। हम भी उसके पीछे पीछे हो लिए। जाकर देखा तो एक जर्जर सी झोपडी में बच्चा अन्दर चला गया। बाहर केवल दो दिए जल रहे थे। जहा चारो ओर पटाखों का शोर हो रहा था, इस घर में शांति सी छाई हुई थी।

अन्दर जाते ही बच्चे ने आवाज लगायी “देखो अम्मा हम का लाये हैं, पटाखे।”

“एरे छोटुआ ये पटाखे कहा से लाया रे....” माँ ने आवाज दी।

बच्चे ने कहा “अरे उ एक भैया मिले थे उन्होंने दिए है। बोले लेओ तुम भी दिवाली मनाओ।”

मैंने बाहर से आवाज लगायी। “अरे छोटू इधर तो आओ जरा।”

छोटू झट से दौड़ कर बाहर आया। और  बोला “अरे भाई आप यहाँ...”

“अरे हां हम तुम्हे ये मिठाई देना तो भूल ही गए थे। ये लो तुम भी खाना और अपनी अम्मा को भी खिलाना।”

उसकी माँ ने आवाज़ लगायी “अरे छोटुआ कौन है रे...”

“अरे अम्मा वही वाले भैया है जो हमको पटाखा दिए रहे। और देखो हमरे लिए मिठाई भी लाये है।” छोटू ने आवाज लगायी.

उसकी माँ उठ कर बाहर आने ही वाली थी की दोस्त ने टोकते हुए कहा की “अरे अरे आप लेटे रहिये, आप की तबियत ठीक नहींं है। हम छोटू के दोस्त है। और इस बार की दिवाली हम छोटू के साथ ही मनायेगे। क्यों छोटू ...?”

छोटू ने मुस्कराते हुए हामी में सर हिला दिया ...

हम लोग पटाखे फोड़ने लगे और साथ ही साथ उसकी माँ से बाते भी करते जा रहे थे। इसकी माँ ने बताया कि वह घरो का काम करती है। लेकिन कुछ समय से तबीयत ख़राब होने की वजह से वह काम करने भी नहींं जा सकी जिसके चलते उसकी कुछ भी आमदनी न हुई।

उसकी माँ ने कहा की “अगर आप लोग नहीं आते तो शायद इस बार हम दिवाली भी न मना पाते। आप लोगो की बहुत कृपा हुई बाबु जी जो आप हम लोगो के साथ दिवाली मना रहे हो। छोटुआ ने तो पेट भर कर खाना भी न खाया, शाम से कह रहा था की अम्मा हमें भी पटाखे चाहिए।  लेकिन कहाँ से लाते पटाखे, जब पैसे ही नहींं थे।”

यह बात सुन कर मैंने गाड़ी में से पावभाजी का पैकट उठाया और छोटू की और बढ़ता हुआ आवाज लगायी की “देखो छोटू हम आपके लिए खाने को और भी चीजे लाये हैं।”

एक पल को तो ऐसा लगा की छोटू की माँ शक भरी निगाह से हमारी और देख रही थी की की आखिर क्या वजह होगी इतना सब कुछ करने की।

मैंने भी बात को सम्हालते हुए कहा की “आओ आज हम साथ में खायेंगे।” और फिर हमने साथ में बैठ कर पावभाजी खाई और बाकि बची हुई भी छोटू को देते हुए कहा कि “जब दोबारा भूख लगे तो और खा लेना।”

रात के साढे १० बजने को थे। तो हम अपने घर की और निकल पड़े। आज दिल में एक बड़ा सुखद सा एहसास हो रहा था। पटाखो के शोर के बावजूद दिल में असीम शांति सी महसूस हो रही थी, जैसे ह्रदय का दीपक जल उठा हो, अन्दर का अन्धकार मिट सा गया हो। “आत्म दीपो भवः “;

लेकिन मन में एक सवाल और उठ रहा था। की आज तो हमने मदद करदी लेकिन कल क्या होगा, हम तो अपने लाइफ में बिजी हो जायेंगे तब क्या कोई होगा उनका ख्याल रखने वाला। हम विजय के घर पहुँच चुके थे।  विजय को ड्राप कर हम अपने घर चले आये। यही सोचते हुए काफी रात तक हमें नींद नहीं आई। अगले दिन स्कूल की ईमारत के काम से सारा दिन बिजी रहे और फिर काफी थक जाने के बाद घर आकर सो गए। उसके अगले दिन यानि दिवाली के दो दिन बाद सुबह टहलते हुए छोटू के घर की तरफ निकल गया। उसके घर के पास जा कर उसे आवाज लगायी मगर वहा जवाब देने वाला कोई न था। एक पल को मुझे चिंता सी होने लगी कि न जाने क्या हुआ होगा। कहाँ चले गए होंगे वो लोग। आस-पास के घरों से पूछा तो उन्हें भी कुछ मालूम न था। उसके बाद अपने विचारों में खोया विजय की घर की ओर तेज कदमो से बढ़ चला। विजय के घर पहुँच कर क्या देखता हूँ की छोटू वहा आँगन में विजय के भतीजे आश्रय के साथ खेल रहा था और उसकी माँ घर का सामान जमा रही थी। मैंने विजय की तरफ देखा, इसके पहले मैं कुछ कहता विजय ने मेरे सवालों के जवाब दे दिये कि, “मेरे भैया भाभी को एक काम वाली जरुरत थी जो घर का काम कर सके और साथ ही यहाँ रह कर मुन्ने की देखभाल कर सके। भैया हॉस्पिटल चले जाते है और भाभी भी स्कूल पढाने चली जाती है। तो मुन्ने का ख्याल रखने के लिए और साथ में खेलने के लिए भी तो कोई चाहिये। इस लिए हमने इन्हें यही काम पर रख लिया है, अब इन्हें और कही काम करने की जरुरत नहीं है। और रहने के लिए पीछे वाला क्वाटर जो खाली पड़ा था। वह दे दिया जहा अब वो लोग रहेंगे।”

विजय ने बताया कि उसे आज ही कुछ जरुरी काम से दिल्ली जाना है। इसलिए जल्दबाजी में तुम्हे बता न सका। कुछ वक्त वहा बैठने के बाद मैं मुस्कराता हुआ घर लौट आया।

एक साल हो गए इस घटना को, छोटू अब स्कूल जाता है, और घर आकर आश्रय के साथ खूब खेलता भी है। माँ-बेटे दोनों ही बहुत खुश हैं। इस एक घटना ने मेरे दृष्टिकोण को काफीहद तक बदल दिया था। सब कुछ सकारात्मक सा नज़र आने लगा था। क्यों कि शायद मन का अँधेरा मिट गया था। आत्मा का दीपक जल उठा था। अंतर्मन का अंधकार मिट गया था। इसलिए मैंने इस संस्मरण का शीर्षक “आत्मदीपो भवः” रखा है।



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