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@dawriter

बस जो है अपना वो हैं मांगते

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कहने को तो है सारा जहाँ हमारा
लेकिन फिर भी बेबसी के मारे हैं
न दिन को चैन
न रात को आराम
न आसमां का कंबल
न इंसानियत की चादर
न दो जून की रोटी
न तन को ढकती कोटि
फिर भी न गीला है न शिकवा है
भले ही कम हमको मिला है
आज भी हम आपसे रहीस हैं हुज़ूर
क्यूंकि न दो हमको तो आपके कर्म बिगड़े हुज़ूर
हमारी एक हँसी आपके सौ लाखों पर भारी
आज भी हमारी मासूमियत नहीं हारी
जनाब न नहीं हम किसी दया के मोहताज
दया नहीं अपना हक मांगते आज
देना है तो हमको प्यार दो
हमारे हिस्से की धरती हमारे नाम दो
तुम्हारा बंगला तुम्हारी गाड़ी
नहीं चलती इससे जिंदगी सारी
बस साहब, साहब बन जाओ
हम गरीब से इज़्ज़त पायो
भीख नहीं अपने हक़ का हक़ हैं जताते
हमारे बिना तुम भी कैसे रौब जमाते
नहीं कहते गर हम कुछ तो
कमजोर न हमको जानो
है अपने हौसलों में दम
ये इस सड़क को देख कर मानो
भले ही आज खाली हाथ हैं
पर हौसले का जो साथ है
लायेगी एक दिन उस खुदा की रहमत रंग
होंगे अपने भी हज़ारों रंग
बस यही एक आस अपने साथ है
कहने को तो अपने पास पूरा आकाश है



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