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@dawriter

नहीं मुझे यह शहर चाहियें

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अधूरी,अनजानी सी खवाहिशों का भंवर है
घर है मेरा यहाँ फिर भी अजनबी सा ये शहर है।।
यहाँ अपनों का मुखौटा लगा अनजाने बसते है
मुहँ पर मुस्कुराते है मगर पिछे सब हँसते है
लगने लगा मुझे अपनों के सायें से भी डर है
घर है मेरा यहाँ फिर भी अजनबी सा ये शहर है।।
पक्की सड़के है यहाँ ऊँचे ऊँचे से घर है
पत्थरों के शहर में सबके दिल भी पत्थर है
साथ है सभी फिर भी मुश्किल भरी डगर है
घर है मेरा यहाँ फिर भी अजनबी सा ये शहर है।।
भागती सी जिंदगी उलझा उलझा सा हर पल है
खामोशी भरा आज यहाँ बेतरतीब सा कल है
जीने की चाहत हर किसी को मगर है
घर है मेरा यहाँ फिर भी अजनबी सा शहर है।।
तड़प किसी की, किसी की पुकार
सुनता नहीं कोई सबके मन मे अधंकार
पीड़ा है मनोरजंन,कैसा खौफनाक मंजर है
घर है मेरा यहाँ फिर भी अजनबी सा ये शहर है।।
जिस्म है जान है मगर भावना नही है
किसी के लिये जीने की किसी को कामना नहीं है
बातों में ,दिल में क्या यहाँ की तो हवा में भी ज़हर है
घर है मेरा यहाँ फिर भी अजनबी सा ये शहर है।।
नहीं चाहती मै कोठी बंगला नहीं मुझे दिल के घाव चाहिये
नहीं चाहती मै पक्की सड़क, ना छालों भरे पाँव चाहिये
नीम की मीठी मीठी हवा मुझे पीपल की छाँव चाहिये
नहीं चाहती ये रूखा शहर, मुझे अपना प्यारा गाँव चाहिये।।



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