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@dawriter

Child abuse

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छोटी सी थी मैं लगभग ७-८ साल की. मासूम सी थी अभी मैंने इस दुनिया का बुरा चेहरा देखा भी नहीं था पर मुझे नहीं पता था ये दुनिया अपनी असलियत मुझे इतनी जल्दी दिखा देगी ।

 

मैं अपने घर में सब की चहेती थी सब को बहुत प्यारी लगती थी पर मुझे ये नहीं पता था लोग मुझसे किस किस्म का प्यार करते थे.. वो मुझे बड़े प्यार से अपने पास बैठता प्यार से चॉकलेट खिलता जान नहीं पायी की उसके मान में क्या चल रहा था ।

 

वो मुझे जगह जगह छूता इतनी मासूम थी मैं की उसके इरादों को समझ नहीं पायी और एक रात ऐसी आयी उस ने अपनी सारी हवस निकल दी समझ भी नहीं आया की वो क्या करने वाला है .. चुप चाप वही उसके साथ लेटी रही डर गयी थी । 

 

बस उस दर्द से रोज़ गुजरने लगी. वो रोज़ मुझे कही न कही से छूता रोज़ मेरे करीब आता रोज़ वही दर्द दे जाता. मैं इस दर्द का शिकार बन के रह गयी। समझ न सकी की किस को बताऊँ मैं ये बात अपनी।

 

कौन मुझपे विश्वास करेगा। कई बार मम्मी को बताने की कोशिश की पर कैसे बता देती वो शख्स और कोई नहीं मेरे..मामा थे। कैसे कहती मैं अपने घर पे कैसे बताती मैं सब को जो शख्स हमारे बिच रहता है वो इंसान नहीं जानवर है और हर रोज़ को अपनी असलियत दिखता है।

मैं रोज़ ये सब सहते सहते थक चुकी थी ..पर मैं कुछ नहीं कर पायी रोज़ वही ज़ख्म मिलते रहे.. नफरत सी हो गयी थी उस इंसान से मुझे पर वो घर में सब का चहेता था... उसे बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी अपने ही घर में.. इतनी टूट चुकी थी मैं की शायद कोई जरिया नज़र न आ रहा था इस सब से दूर जाने का...।

 

मैंने कुछ समय बाद इसी ज़िन्दगी के साथ जीना सीख लिया वो रोज़ रात को मेरे करीब आता बहुत करीब वो दर्द मुझे महसूस होता उसके हाथ मेरे बदन को जकड़ लेते मेरी रूह उसके कब्ज़े में रहती और मेरी चीख़ भी नहीं निकल पा रही थी बस आंसुओं का सहारा था।

 

मेरे आंसू ही मेरा दर्द बयां करते थे.. शांत हो गयी थी मैं मेरी मासूमियत ख़ौफ़ में बदल गयी थी , मेरी ज़िन्दगी नर्क में बदल गयी थी , एक अलग ही ज़िन्दगी में थी मैं जिस में सिर्फ दर्द था मेरे ज़ख्म थे , मेरे आंसू थे , उसकी प्यास थी , उसकी हवस थी , मेरा बदन था और उसका जुनून था... मेरे साथ कोई नहीं था बस मैं ही थी बस यही ज़िन्दगी थी ।

 

सारे दोस्त छूट गए सारी बातें खत्म हो गयीं। घर में बस रहती थी ज़िंदा लाश की तरह बहुत बार सब ने पूछा क्या हुआ है पर क्या बताती किस दर्द से गुज़र रही हूँ मैं। मुझे इस बात का डर था की कोई मुझपे यकीन करेगा या नहीं कोई मेरा साथ देगा भी या नहीं , कहीं मेरी ज़िन्दगी बिलकुल खत्म न हो जाये.. कही मेरी वजह से सब बिखर न जाये..कही मेरी वजह से ये रिश्ते टूट न जाये... बस इन्ही सब बातों की वजह से अपने सारे दर्द को अपने अंदर ही दबा लिया ..चुप हो गयी मैं मेरी खुशिया खत्म हो गयी थी ।


मेरी मासूमियत तो रही नहीं डर लगता था कोई छू भी ले मुझे तो। हर कोई एक जैसा लगने लगा सोचने लगी सब ऐसे ही है इस दुनिया में। सोचने लगी कब तक मुझे ऐसी ज़िन्दगी जीनी होगी आखिर कब तक मैं अपने ज़ख्म छुपाउंगी.. कब मैं अपने लिए आवाज़ उठाउंगी बस यह कर गुज़र जाने की हिम्मत नहीं थी... नहीं थी इतनी हिम्मत की इस दुनिया से लड़ पाऊँ .. मुझे इस का भी डर था की हर कोई मुझे ही बुरा कहेगा मेरे घर की ही बदनामी होगी..।

 

पर एक दिन ऐसा आया उसे हमारे घर से जाना पड़ा वो अब हमेशा के लिए जा चूका था मेरी ज़िन्दगी से अब रोज़ का दर्द तो ख़त्म हो गया पर अब मुझे वो पल हर वक़्त याद आते हैं। मेरे दिल में उसकी इतनी दहशत थी डर लगता था कोई भी जब घर की कुण्डी खटखटाता तो मेरी दिल की धड़कना बढ़ जाती और दिमाग सोचने लगता कहीं वो वापस तो नहीं आ गया। पर वो अब हमेशा के लिए मेरी ज़िन्दगी से जा चुका था बस अब मेरा दर्द था मेरे साथ .अब मैंने अपनी ज़िन्दगी फिर से जीना शुरू कर दी भुला तो नहीं पायी मैं पर उस सब को मैं याद भी नहीं रखना चाहती थी फिर से मैंने अपनी ज़िन्दगी शुरू कर दी।

 

अब वो वक़्त जा चूका था और में अब आगे बढ़ चुकी हूँ .. लेकिन ये बात मैंने अभी तक किसी को नहीं बताई पर अब सोच रही हूँ कि गलत थी मैं ऐसे शख्स को छोड़ना नहीं चाहिए.. और यह कोई मेरी बनायी कहानी नहीं है.. बस मेरा दर्द है जो आज मौका मिला तो कह दिया... लास्ट में थैंकू कहना चाहूंगी कि अपने मुझे मौका दिया अपने दर्द को बयां करने के लिए।

#stopsexualabuse

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