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@dawriter

​बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ और बेटी को समझो भी

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बहुत दिन हुए आपको कोई कहानी नहीं सुनाई ना चलिए तो आज एक कहानी सुनाता हूँ । मैं ये नहीं कहता की आपको पसंद आएगी ही आएगी हाँ मगर मेरे मन की बेचैनी ज़रूर कम हो जाएगी । गौर से सुनिएगा अगर कुछ समझ आजाए तो समझ लीजिएगा और अपने आस पास ऐसे किरदार को खोज कर ज्यादा कुछ नहीं तो उसके लिए दुआ कर दीजिएगा ।
एक लड़की थी, जिसे शब्दों से बहुत प्यार था, ठीक वैसे ही जैसे प्रेमिका को होता है अपने प्रेमी से मिले पहले गुलाब से, जैसे प्रेमिका अपने उस गुलाब को सबसे छुपा कर किताब में रखती है वैसे ही ये लड़की भी अपने शब्दों को अपनी डायरी में छुपा कर रखती थी । हाँ मगर एक बात थी लड़की के शब्द उस गुलाब की तरह सूखते नहीं थे, बल्कि उसकी मायूसी के साथ वो शब्द और हरे हो जाते थे । ऐसा नहीं था कि वो अनाथ थी या गरीब थी या उसे किसी तरह का पारिवारिक दुःख था । उसे दुःख था बस समाज का, उसे कभी कभी अपने हक़ की लड़ाई लड़ने का मन करता था । ये हक़ अपनी मर्ज़ी से खाने  पहनने और घूमने का हक़ नही ये हक़ था बस अपनी बात कहने का । अपनी वो बातें जो लड़की के अंदर खौलती थीं जो उसकी नींदे उड़ा देती थीं । वो सारे घिनौने अहसास वो लिखना चाहती थी जो उसने महसूस किए थे जब उसे किसी अपने ने ही ज़बरदस्ती छूने की कोशिश की, उसे अपनी बात कहने से रोका गया उसे अपनी सूझ बूझ से कुछ भी करने पर मना किया गया । 
वो ये सब बोलना चाहती थी चिल्ला चिल्ला कर मगर उसका मुंह हर बार उसके अपने ही बंद कर देते रिश्तों और इज्ज़त का हवाला दे कर । जो सोते जागते बस यही सोचती कि आखिर करे क्या कैसे अपनी बात कहे किसी से । ऐसे ही बच्चपन से सोचते सोचते ख़यालों को छुप छुपा कर डायरी में लिखते हुए वो जवान हो गई । जैसे जैसे उसकी उम्र बढ़ी वैसे वैसे अनकही बातों का बोझ बढ़ता गया । कागज़ के पन्नें भी आखिर कितना सुनें । कोई तो ऐसा चाहिए था जो सुने तो समझे भी समझे तो कुछ कहे भी । और फिर आखिर उसे कोई मिल ही गया जिसे वो दिल ओ जान से ज़्यादा चाहने लगी जिसने उस लड़की की बातों को सुना फिर समझा और फिर अपने मन का कहा भी । दो इंसानों की कुंडली मिल जाने से रिश्ता अमर नही होता रिश्ता मजबूत होता है दो इंसानों की सोच मिलने से और इनकी सोच मिल चुकी थी । दोनों मन ही मन हमेशा एक होने का सोच चुके थे । 
मगर जब उसने ये बात अपने घर बताई तो सबने उसका विरोध किया । उसने सोचा क्यों ना अपनी बात को एक किताब के द्वारा सब तक पहुंचाया जाए । क्यों ना समाज की बुराईयों और उसकी गिरी हुई सोच का आईना दिखाया जाए । मगर उसे इसके लिए भी रोका गया यह कह कर कि समाज हंसेगा खानदान की बेईज्ज़ती होगी । लड़की को अपने दोनों सपनों को मारना पड़ा । क्योंकि उसे अपने परिवार से प्यार था अपने पिता का ख़याल था । अगर वो मनमौजी होती तो शायद खुश होती मगर उसने अपनी खुशी मार कर सबको खुश करना सही समझा । और फिर एक दिन वो लड़की घुट घुट कर मर गई, ज़िंदा रहीं तो चंद सांसें और कुछ ज़िम्मेदारियाँ मगर वो लड़की जिसके पास सपने थे वो अपने ही अन्दर मर कर दफ़न हो गई । मुस्कुराहटें भी थीं हंसी भी थी मगर वो सुकून मर गया उसके अंदर जो एक वक्त में उसके चेहरे का नूर हुआ करता था । आज उसे रोता देख भी समाज खुश है क्योंकि वो जीत गया था लड़की हार गई थी ।
खैर ऐसी तो कितनी लड़कियाँ अपने ही अंदर मर जाया करती हैं किस किस का शोक मनाया जाए । बाकि कल बालिका दिवस था ना सबको बहुत बहुत बधाई हो । बेटियाँ सबको प्यारी हैं मगर उनकी खुशी में सब पीछे हट जाते हैं । आप परिवार हैं समाज हैं बड़े हैं तो जिस पर वो चलना चाहती हैं उस रस्ते की जाँच करिए और फिर उसे चलने को कहिए, बिना जाँचे परखे उसका उस रास्ते पर जाने की पाबंदी ना लगाईए । अपनी खुशियों को मारते मारते कब आपकी लाडली एक ज़िंदा लाश बन जाएगी आपको पता भी नहीं चलेगा । 
बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ और बेटी को समझो भी 
धीरज झा 



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