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@dawriter

भद्र पुरुष

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भद्र बनने की कला क्या होती है ये कोई सज्जन तिवारी से पूछे। पंडित परिवार में जन्म लिया जहाँ पिता पुरोहित थे। एक बड़े से मंदिर के। अच्छी खासी आमदनी होती थी। इनके दो पुत्र हुए। अपने पूर्वजों की कला सिखाने के लिए बड़े पुत्र ने पुरोहितगिरी सीखी ...... तो वे भी इस कला में पांरगत हुए। आज के समयानुसार दोनों भाईयों ने आधुनिक शिक्षा भी ग्रहण की। छोटे भाई को इंजीनियरिंग में प्रवेश मिला...वे अधिकतर बाहर ही रहते। बड़े भाई भी M.A. हिन्दी से शिक्षित हुए।

वे एक शासकीय विद्यालय में शिक्षक नियुक्त हुये। चूंकि पुरोहितगिरी सीखी थी तो साथ साथ वह काम भी चलता रहता। बड़े ही ज्ञानवान माने जाते थे अपने इलाके में। सदा ही सदाचार की बातें, भगवान का चरित्र चित्रण सुनाते पाए जाते। समय पर उनका ब्याह हुआ.....उनकी भार्या भी हायर सेकेंडरी पास एक आकर्षक व्यक्तित्व की स्वामिनी थी। गृहकार्य में दक्ष, आज्ञाकारी जैसी की बड़े बाबू को चाहिए थी। वे हमेशा चाहते उनकी पत्नी सर पर पल्ला रखे। नीची निगाहों से बात करे। उनकी भार्या भी उनके अनुकूल ही थी। बड़ी ही सीधी सी,जो तेज आवाज में चिल्लाने पर दुबक जाती थी।

छोटे भाई सुशील कुमार आधुनिकता वादी थे। उन्हें चाहिए थी, एक आधुनिक पत्नी जो सारे नवाचार जानती हो। वे जहाँ बाहर पढ़ने गये थे तब जहां वे किराए से रहते थे वे उन्हीं के पिताजी के मित्र थे रामाश्रय जी शर्मा। उनकी ही बड़ी पुत्री माधुरी पर उनका हृदय आसक्त हो गया। हो भी क्यों ना माधुरी थी ही ऐसी.....अपने आप को इतने सलीके से रखती, नवाचार और सदाचार दोनों ही कसौटियों पर खरी। बोलती थी तो लगता सरस्वती बोल रही हो। किसी से नहीं डरती थी। मनोविज्ञान की छात्रा थी.....आगे और उच्च स्तरीय अध्ययन करने की इच्छुक। किसी स्त्री पर अत्याचार होते कभी न देख पाती। स्त्री और पुरुष समता की पक्षधर।

वहीं सुशील बाबू का व्यक्तित्व भी कम लुभावना नहीं था। वे भी स्त्री समानता के पक्षधर थे। अपने घर और गांव में फैली असमानता से वे बेहद आहत होते थे।अपनी माँ से इस विषय में विचार विमर्श किया करते थे। उन्हें समझाया करते......सुशील जी की विद्वता, विनम्रता ने माधुरी पर भी गहरी छाप छोड़ दी थी। वह भी ऐसे ही किसी पुरूष को अपना जीवन साथी बनाना चाहती थी..........वहीं सुशील जी भी आधुनिकता में लिपटी इस विदुषी स्त्री को मन ही मन अपना चुके थे। अगली बार दीवाली पर जब अपने घर गए तो अपने माता पिता से इस विषय में बात की। माता पिता भी यहीं चाहते थे कि उनका पुत्र अपने जीवन में खुश रहे..चाहे जहाँ रहे। वे सहर्ष मान गए। उधर माधुरी के माता पिता भी अपनी पुत्री की इच्छा के आगे नतमस्तक थे। अगले दो वर्षों के उपरांत इनका विवाह सादगीपूर्ण कर दिया गया। तब तक इनकी शिक्षा भी पूरी हो चुकी थी।

गांव पर जेठानी ने सब संभाल रखा था अतः माधुरी को कोई विशेष कार्य न होता गांव पर... फिर भी वे दोनों यथासंभव अपने घर जाया करते। माधुरी हमेशा यही सोचती कि वह कितनी भाग्यशाली है जो इतने सभ्य और भद्रपुरुष उसके जीवन का हिस्सा है। वह वहाँ जब भी जाती। सब कार्य बड़े ही मनोयोग से करती..सभी लोग उसकी पाककला व बुद्धि की प्रशंसा करते नहीं थकते। माधुरी ने भी कभी अपने आचरण से यह नहीं जताया कि वह कितनी प्रतिभाशाली है..उसे दिखावा करने मे विश्वास न था। उसके सारे गुणों को तो केवल सुशील बाबू ही जानते थे...जिन पर वह लट्टू हुए थे।

एक बार अचानक उसे गाँव बुलाया गया...क्योंकि उसके सास-ससुर का एक्सीडेंट हो गया था। जिसमें ससुर को तो नाममात्र की चोट आई थी, पर सास को बिस्तर पकड़ना पड़ा क्योंकि ज्यादा चोटिल होने के कारण डाक्टर ने उन्हें आराम की सलाह दी। ऊपर से बड़ी बहू भी गर्भवती थी उसे सात माह का गर्भ था।माधुरी भी अपनी जिम्मेदारियों को समझते हुए शीघ्र ही आ गई।

यद्यपि यहाँ का माहौल उसके अनुरूप नहीं था। कहाँ वह बड़े शहर की आधुनिक कन्या और यह छोटा व पिछड़ा सा गांव....जहाँ स्त्रियों को हमेशा कमतर ही रखा जाता था। यहाँ काम करने..साड़ी सम्हालने में उसे बड़ी दिक्कत होती थी ऊपर से घर भी पुराने तरीके का..कामकाज के तरीके पुराने।वह शहरी तौर तरीकों से काम करने वाली महिला बस सामंजस्य बनाने की चेष्टा करती। सोचती कि थोड़े . ..ही दिनों की तो बात है। वह काम करते करते अपने जेठ की कहानियां भी सुनती और कभी कभी अपनी प्रतिक्रिया भी दे दिया करती। इसी तरह वह अपना कर्तव्य निभाए जा रही थी। वह प्रायः अपने घर के सदस्यों से हास्य विनोद किया करती।

इसी तरह एक दिन वह अंदर के कमरे की अलमारी साफ कर रही थी। अचानक से उसे अपने पिछले भाग पर कुछ हरकत महसूस हुईं। एक बार में तो उसे कुछ समझ नहीं आया वह फिर से अलमारी साफ करने लगी। दूसरे दिन भी जब वह कमरे का पंखा साफ कर रही थी तो फिर से निचले पृष्ठ भाग पर चिकोटी काटे जाने का आभास हुआ। उसने पीछे पलट कर देखा...उसका जेठ मुस्कुराते हुए उसे बड़ी ही अजीब नजरों से घूरे जा रहा था। वह स्वयं को चिकोटी काटने लगी अब उसे बात की सत्यता का आभास हुआ। चेतना लौटी..ह्रदय में स्पंदन बड़ी ही तीव्र वेग से चल रहा था। दिसंबर के महिने में वह पसीने से भीग गई। बोल जिह्वा पर आते आते रूक रहे थे...क्योंकि बगल के कमरे में सास ससुर बैठे थे।सास बीमार और ससुर ह्दयाघात के दो बार शिकार हो चुके थे। वह चाहकर भी कुछ न कर पाई।

बड़ी ही अन्नमयस्क सी हो गई उस दिन के बाद से। हंसना बोलना भूल गई.. खाना नहीं खाती थी..डर के मारे सोती भी नहीं थी। परायों से तो वह कितनी आसानी से लड़ जाती थी आज अपनों से लड़ने में उसे क्यों हिचक हो रही थी। सुशील को सब बताना चाहती थी..पर अपने भाई की सच्चाई से न जाने क्या असर हो उस पर। एक दिन हिम्मत करके सुशील को फोन पर बताया। उसने उसे अपने भाई को सही राह दिखाने की सलाह दी। उसके बाद दुगुनी हिम्मत से वह अपने जेठ से बात करने को उद्यत हुई.. जेठानी की गर्भावस्था के कारण उसे बाद में बताना उचित समझा।

वह अपने जेठ से बात करने गई, उससे इस गिरी हुईं हरकत का जबाव मांगा। वह कहने लगा "मेरी पत्नी की गर्भावस्था चल रही है, मेरा मन बहुत विचलित रहता है। जबसे तुम्हें देखा है तुम्हारी रुप मोहिनी मुझ पर छा गईं है, मैं सब भूल गया हूँ। तुम्हें पहले ही दिन से पसंद करता हूँ। घर की बात घर में रहेगी.....मैंने तुम्हारी फेसबुक प्रोफाइल देखी है.. तुम्हारे तो कितने पुरुष मित्र हैं..उन स्लीवलेस कपड़ों में, उन छोटे स्कर्ट में तुम गजब ढा रही थी..तुम तो आधुनिक स्त्री हो..तुम्हारे लिए तो ये आमबात है..इतना विचलित क्यों हो रही हो। ये फेसबुक चलाने वाली लड़कियां इसीलिए अपनी नुमाइश करती हैं ताकि पुरुष उन पर आसक्त हो। अब मुझे अपना जबाव दे भी दो।,"

माधुरी ने ये सब बाते सुनी उसकी त्यौरियां चढ़ गई, सबसे पहले तो एक जोरदार थप्पड़ उसने अपने जेठ के गाल पर जडा़ और कहा...हाँ हूँ मैं आधुनिक, जमाने के साथ चलती हूँ, जो सार्थक है, वही बात करती हूँ। आप पुरुष लोग लड़की बनकर फेसबुक पर लडकियों से दोस्ती क्यों करते फिरते हो। एक पत्नी से मन भर जाए तो दूसरी लाने की सोचने लगते हो। अपनी पत्नी को अपनी नाक के नीचे रखते हो। नौकरानी बनी रहे बस यही चाहते है आप जैसे पुरुष...थोड़ा सा स्त्री अपने बारे में सोचने लगे तो दुष्चरित्र हो गई.. लानत है आपकी सोच पर.....अब अपनी पत्नी की गर्भावस्था का बोझ आप भी उठाएंगे..आपकी भी संतान है उसकी कोख में..पालन पोषण.के साथ आपको गर्भावस्था में अपनी पत्नी की सहायता करनी चाहिए.. उसके हिस्से का काम कीजिए..,सोचिए कल को आपको कन्या हुई और बड़े होने पर शादी के बाद उसे भी मेरी तरह जेठ मिले तो आप पर क्या बीतेगी.."

माधुरी के शब्द बाणों ने अपना काम कर दिया था..वह सर झुकाए खड़ा रहा। निरूत्तर हो चुका था वह। मन में कुछ तो चल रहा था..जो कि सिर्फ वही जानता था।

इतना कहकर अपने सास ससुर से सुशील की बीमारी का बहाना करके वह घर की ओर चल पड़ी। मन में सोच रही थी...

तन का आडम्बर करके, मन में कुटिलाई भरके..

तू सज्जनता का ढोंग करे, वाह रे भद्र पुरुष।।



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