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@dawriter

विचित्र बात

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“क्या बात है, उदास क्यों हो ?” दरवाज़ा खोलते ही पत्नी ने सवाल किया।

“कुछ नहीं,” मैंने घर में घुसते हुए दूसरी तरफ़ देखते हुए ज़वाब दिया।

“नहीं, नहीं, कुछ बात तो है, क्या मैं तुम्हें नहीं जानती?”

“नहीं यार, कुछ नहीं,” मैंने नज़रें चुराते हुए ज़वाब दिया।

ये कहकर मैं डाईनिंग टेबल पर बैठ कर अख़बार के पन्ने पलटने लगा। पढ़ने में मेरा कोई ध्यान नहीं था, न ही मैं पढ़ना चाहता था। पत्नी किचेन से पानी का गिलास ले आई थी। गिलास टेबल पर रखते ही उसने मेरे हाथ से अख़बार खींच लिया और कड़क आवाज़ में मुझसे पूछा, “तुम्हें मुझसे ज़्यादा कोई नहीं जानता। मेरी आँखों से कुछ नहीं छुप सकता – बोलो क्या बात है ? किसी के साथ कोई झगड़ा तो नहीं हुआ, या फिर तुम्हारे शेयर पिट गए ?”

“देखो, मैं शेयर्स में इन्वेस्ट इसलिए करता हूँ कि उनमें रिटर्न ज़्यादा है और कम पूँजी में काम चल जाता है। पता नहीं क्यूँ तुम मेरे शेयर्स के पीछे पड़ी रहती हो ? एक-दो को छोड़कर कभी घाटा नहीं हुआ, फिर भी ? और मैं किसी से झगड़ा-वगड़ा करके नहीं आया हूँ...” मैंने खिन्न होकर कहा।

“तो फिर मुंह क्यों लटका रखा है ?” पत्नी ने रौब से पूछा।

“यार, तुम पहले तो खाना दो, फिर बात करेंगे।”

“मुझे पता है, हॉस्पिटल में तुम्हारी किसी से नहीं पटती, अपने बॉस को भी तुम कुछ नहीं समझते, तो दिक्कतें तो आएँगी।”

“देखो, तुम अगर ये चाहती हो कि मैं लोगों की ग़लत बातों की भी हाँ में हाँ मिलाता रहूँ, चाहे वो मेरा बॉस ही क्यूँ न हो, तो ये मुझसे नहीं हो सकता।”

रोज़ाना की तरह ही पत्नी ने मेरी बात सुनकर समझ लिया था कि मुझे समझाना बेकार है। और वो थोड़ी मायूसी के साथ किचेन में खाना लेने चली गयी थी। मैंने फिर से अखबार उठाया और पढ़ने का नाटक करने लगा। वह खाना लेकर आई और मेरे सामने टेबल पर रखने के बाद चुपचाप बैठ कर अपनी ठुड्डी पर हाथ रख कर बाहर की तरफ देखने लगी थी। उसने अब मेरी उदासी के बारे में पूछना छोड़ दिया था क्योंकि वह मुझे अच्छी तरह से जानती थी कि थोड़ी देर में मैं ख़ुद ही बताने लग जाऊँगा कि क्या हुआ था। इसलिए वो चुप रहकर मेरे बोलने का इंतज़ार करने लगी।

एक कमरे में दो व्यक्ति जब चुप रहते हैं तो वातावरण बोझिल होने लगता है, और मैं ऐसे में अधिक देर तक नहीं रह सकता – घुटन होने लगती है। दूसरे किसी भी बात को मैं अपने अन्दर बहुत देर तक दबाकर नहीं रख सकता – मुझे लगने लगता है कि मेरा दम घुट जाएगा – तो फिर जो मेरे अंदर होता है उसे बाहर निकालने के लिए बोलने लगता हूँ।

वही होना था और मैंने बोलना शुरू किया, “आज बड़ी विचित्र बात हुई !”

पत्नी ने प्रश्नवाचक निगाहों से मेरी ओर देखा। मैं फिर से चुपचाप खाना खाने लगा क्योंकि मैंने सोचा कि आगे वो पूछेगी कि क्या हुआ, परन्तु उसने कुछ नहीं पूछा और फिर से बाहर देखने लगी। मुझे लगा – ये तो अन्याय है, एक आदमी बताने को तैयार है, और दूसरा पूछ भी नहीं रहा है कि क्या हुआ ? बिना पूछे क्या बताना चाहिए ? नहीं, क्योंकि पूछने पर बताने का जो मज़ा आता है वो बताने वाला ही जानता है ! वो पूछ नहीं रही है और मुझे तो बताना ही है, तो अब क्या करूँ?

मैंने फिर से बोला, “आज बड़ी विचित्र बात पता लगी !” और मैं फिर से चुप हो गया।

थोड़ी देर बाद जब मैं कुछ नहीं बोला तो उसने कहा, “क्या हुआ? जो बोलना है जल्दी बोलो – मेरे पास ज़्यादा टाइम नहीं है, और खाना जल्दी खा कर बर्तन खाली करो, कामवाली बस आने ही वाली है।”

खाना मैं पूरी तल्लीनता से स्वाद लेकर ही खाना पसंद करता हूँ। जल्दी-जल्दी मुझसे खाया नहीं जाता। हाँ, इमरजेंसी की बात अलग है, तब तो खाना ही पड़ता है। मगर – कामवाली आने वाली है, ये तो कोई इमरजेंसी नहीं है। अरे, कामवाली ही तो है, थोड़ी देर इंतज़ार कर लेगी। परन्तु, कामवाली की वजह से मेरे घर में हर तरह की इमरजेंसी लगी रहती है, और बहुत सारे प्रतिबन्ध जैसे – यहाँ मत खड़े हो, अभी सफाई चल रही है, उस कमरे में मत जाओ, वहां कामवाली पोंछा लगा रही है, अभी कपड़े मत बदलो, कमरों में कामवाली काम कर रही है, इत्यादि,इत्यादि। एक दिन तंग आकर मैंने अपनी पत्नी से पूछ ही लिया, “कामवाली के काम करने से मेरे कपड़े बदलने का क्या सम्बन्ध है? क्या मैं एक घंटा ऐसे ही सूट-टाई में गला घोंटकर बैठा रहूँ?”

“अरे, आप नहीं समझते ! ये कामवालियां बड़ी नकचढ़ी होती हैं, जिस कमरे में आप कपड़े चेंज करोगे ये वहां छोड़ देगी, मेरी तो सफ़ाई रह जायेगी। और फिर आपको पता नहीं है, पड़ोस वाले शर्माजी का कपड़े बदलते हुए तौलिया खुलकर नीचे गिर पड़ा था और वहीँ पर उनकी कामवाली पोंछा लगा रही थी, बस तभी से उसने उनका काम छोड़ दिया और अब कोई तैयार नहीं हो रही है। अब तुम ही बताओ, कामवाली के बिना काम कौन करेगा ? तुम ?”

पत्नी का ज़वाब सुनकर मैं चुप लगा गया था।

थोड़ी देर बाद मैंने फिर शुरू किया, “हाँ, मैं कह रहा था, कि आज बड़ी विचित्र बात हुई,” फिर मैंने इधर-उधर देख कर पूछा, “ध्रुव कहाँ है ?”

“वो सो गया है।”

“देखो, तुम इसे अपनी सहेलियों से थोड़ा दूर ही रखना,” मैंने कुछ रहस्यमय होकर कहा।

“क्या मतलब?”

“मेरा मतलब, इसे उनके साथ ज़्यादा घुलने-मिलने मत देना। ज़माना बड़ा खराब है। तुम सोच भी नहीं सकती।” मैंने रहस्यपूर्ण तरीके से ज़वाब दिया।

पत्नी मेरी ओर उत्सुकताभरी निगाहों से देख रही थी। थोड़ी देर सोचने के बाद बोली, “ऐसा क्या हुआ जो इसे अपनी सखी-सहेलियों से बचाने की ज़रुरत पड़ गयी ? फिर ये तो अभी बहुत छोटा है !”

“छोटे-बड़े का सवाल ही नहीं रहा। ज़माना हमारी सोच से कहीं आगे निकल चुका है – अभी से ध्यान रखेंगे तो ठीक रहेगा।”

“साफ़-साफ़ बोलो क्या हुआ ?” पत्नी ने थोड़ी अधीरता से पूछा।

बात कुछ ऐसी थी कि मैं उसको बताना तो चाहता था परन्तु कहने की हिम्मत नहीं हो रही थी। वैसे भी मेरी बातों को वह अधिक गंभीरता से नहीं लेती थी। फिर इस बात पर उसे कैसे विश्वास होगा, यही सोचकर मेरे अंदर एक झिझक घर कर गयी थी। परन्तु बताये बिना मैं रह नहीं सकता इसलिए मैंने कुछ इस प्रकार शुरू किया था जैसे परीक्षा में किसी कठिन विषय पर कोई निबंध लिखने को कहा गया हो। प्रस्तावना तो चल ही रही थी, अब मुख्यविषय की बारी थी।

मैंने दूसरी ओर देखते हुए बोलना शुरू किया।

“आज मेरी ओपीडी में दो लड़के आए थे। उनकी उम्र 18-19 साल के क़रीब होगी – 20 भी नहीं। मैं आश्चर्य में पड़ गया जब उन्होंने मुझसे सेक्सुअल पॉवर बढ़ाने की दवाई लिखने को कहा। मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि इतनी कम उम्र में सेक्सुअल पॉवर बढाने की क्या ज़रुरत पड़ गयी।”

मैंने उनसे पूछा, “तो क्या तुम लोगों को सेक्सुअल वीकनेस महसूस होती है ? उन्होंने गर्दन हिलाते हुए कहा, “हाँ सर।”

मैं सोचने लगा था कि ज़माना कितना बदल गया है। आज की जनरेशन हमसे काफी आगे बढ़ चुकी है। एक हम थे कि लड़कियों की परछाईं से भी डर लगता था और सेक्स – वो भी इस उम्र में – सोच भी नहीं सकते थे। और दूसरी तरफ ये लड़के ! उम्र सिर्फ़ 18 -19 साल, और सेक्सुअल वीकनेस ? तो क्या इन्हें सेक्स का काफी अनुभव है ? बहुत सारी गर्ल फ्रेंड्स होंगी !!

फिर भी कौतुहलवश मैंने पूछा, “ तुम लोगों को सेक्सुअल वीकनेस ? समझ नहीं आता, आख़िर तुम लोगों को मौका कहाँ मिलता होगा इतना कि वीकनेस आ जाए ?”

मैंने देखा उन लोगों के चेहरे पर किसी तरह का संकोच या शर्म का भाव नहीं था। मेरी बात सुनते ही एक ने तपाक से ज़वाब दिया, “हम तो खूब करते हैं सर।”

“मगर कहाँ, गर्ल फ्रेंड्स ?”

“गर्ल फ्रेंड्स नहीं सर, आंटियों के साथ – हमारी मम्मी की सहेलियां,” दूसरे ने बेशर्मी से तपाक से कह दिया।

मेरी आँखें विस्मय से फट गयी थीं।

मैंने फिर पूछा, “क्या कह रहे हो ? क्या तुम दोनों भाई हो ?”

“नहीं सर, हम दोस्त हैं, एक ही एरिया में रहते हैं, पास-पास डीडीए फ्लैट्स मुनिरका।”

“और ये आंटीयां ?”

“सर, आप हमारे दोस्त जैसे हैं, हम सच कहते हैं, हमारी मम्मी की सहेलियां जो रात-दिन उनके साथ उठती-बैठती हैं, वो ही मौका मिलने पर हमें बुला लेती हैं – ब्लू फिल्म दिखाती हैं, शम्पेन और व्हिस्की भी पिलाती हैं, और फिर सेक्स। सर, आप सच मानिए, कभी-कभी तो हमारा बिलकुल मन नहीं करता मगर वो कुछ इस कदर मज़बूर कर देती हैं कि करना ही पड़ता है।”

मुझे अभी तक उनकी बातों पर यकीन नहीं हो रहा था, मैंने फिर एक सवाल किया, “ और उनके हस्बैंड ? क्या उन्हें कोई शक नहीं हुआ ? और कभी पकड़े भी नहीं गए तुम लोग?”

“सर, उनके हस्बैंड हमेशा ही टूर पर रहते हैं और हम उनके बच्चों जैसे हैं, हम पर कोई शक नहीं करता। वैसे भी दिन-रात हम लोग एक दूसरे के घर आते-जाते रहते हैं, बस जैसे ही उनको मौका मिलता है, हमें बुला लेती हैं।”

मुझे अब आगे कुछ भी पूछने की हिम्मत नहीं हुई। मैंने उनकी दवाई लिखी और अपनी कुर्सी पर निढाल होकर पीठ टिका दी। उनके जाते ही मुझे अपने बेटे, अपनी पत्नी और उसकी सहेलियों का ख़याल आया।

मेरी बातें सुनकर मेरी पत्नी ने आश्चर्य से कहा, “तुम जो कह रहे हो – मुझे यकीन नहीं होता !”

“हाँ, यकीन तो मुझे भी नहीं हुआ, परन्तु, यकीन न करने का कोई कारण भी मुझे समझ नहीं आता। आख़िर इस तरह की बात कोई झूठ क्यों बताएगा ?”

अक्सर हम सभी लोग अज़नबी लोगों से सच बोलते हैं क्योंकि उनसे हमें कोई डर नहीं होता।

शायद उन लड़कों ने भी सच ही कहा होगा – मगर है बहुत कड़वा !!

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