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@dawriter

एक दर्द

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एक दर्द 

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उड़ना चाहती थी वो पर ना ही टूटे पत्तों
की तरह ना ही सूखे पत्तों की तरह
लहराना चाहती थी  पर ना ही फटे दामनों
की तरह ना ही चिथड़ों की तरह ।

सबको हँसाना चाहती थी पर ना ही खिलौनों
की तरह ना ही जोकरों की तरह
कसूर क्या था बस इतना कि
वो एक लड़की थी और जीना चाहा।

उसके पर काट दिए उसे तोड़ डाला
मरोड़ डाला बिखेर डाला
हर पल को बोझिल बना डाला
उसे जीते जी मार डाला ।

लड़की होना ही उसका अपराध हो गया
बिना जुर्म ही उसे एक सजा मिल गयी
चाहती थी खिलना पर उसे मुरझा दिया
ना खिलने दिया ना बढ़ने दिया ।

सोचा नहीं,समझा नहीं किसी ने एक पल को
सिर्फ मज़ा शब्द ने कितनों को दे दी सजा
कैसे ये बहते आँसू रूकेगें कैसे उसे रोकोगे
हर दिन बहती खून की दरिया को..

कभी माँ, कभी बहन तो कभी बेटी के दामन को
कभी पगडंडी तो कभी चौराहों पर घूरती निगाहों को
कभी घर के अंदर तो  कभी घर के बाहर
बरबस बढ़ते कदमों से कैसे बचेंगें ।

हर तरफ अंधेरा हर तरफ अविश्वास
कोई रोक सको तो रोक लो
नहीं तो हर घर रावण निकलेगा
सीता को हर ले जाएगा ।

बिना अपराध अपराधी बनती
डर के साये मे जीती  रहती
घुटती रहती सर को झुकाए सहती
हर पल हर क्षण में ऐसे जीती ।

ऐसी तकलीफ जिसे वो दिखा नहीं सकती
ऐसा दर्द जिसे बता नहीं सकती
ऐसी बात जो पुरुष कभी समझ नहीं सका
स्त्री के मान सम्मान को जान ना सका।

संस्कारों की दुहाई देते संस्कारों को भूल गए
अपनी बेटियों को सिखाया,घुट कर रहना पर..
बेटों को बताना,सिखाना भूल गए
आगे बढ़ने की चाह में कितने पीछे हो गए ।

उड़ना चाहती थी वो पर ना ही टूटे पत्तों
की तरह, ना ही सूखे पत्तों की तरह
लहराना चाहती थी पर ना ही फटे दामनों
की तरह ना ही चिथड़ों की तरह ।।

#stopsexualabuse



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