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@dawriter

"यादों का रिश्ता " भाग 1

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पिथौरागढ़ में आये अभी एक महीना ही हुआ था मौसमी को, उसके पापा का स्थानांतरण मुरादाबाद से पिथौरागढ़ हो गया था।

11वी में नाम लिख गया G. G. I. C स्कूल में मानो उसका सपना पूरा हो गया...उन दिनों सरकारी स्कूलों में दाखिला लेने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती थी, खैर ट्रान्सफर केस के कारण कुछ खास दिक्कत नहीं हुयी एडमीशन मिलने में।

उसके बाद कब अगस्त से सितंबर आ गया उसे पता ही नहीं चला।पूरा जुलाई तो नयी जगह को समझने में ही चला गया।

धीरे-धीरे उसे वहाँ अच्छा लगने लगा था, वहीं पड़ोस में रहने वाली सरिता उसकी अच्छी दोस्त बन गई थी.. दोनो एक ही कक्षा में थी.. यू तो मौसमी बहुत समझदार थी लेकिन कही न कही अपरिपक्वता थी उसके अंदर.. पापा से ज्यादा जुड़ी थी वो..पापा उसकी हर बात बड़ी सरलता से मान जाते...।

इधर कुछ दिनों से वह परेशान रहने लगी थी, इसका कारण था सामने रहने वाला लड़का, अक्सर जब भी उसकी नज़र सामने जाती वो उसको अपने को देखते हुए पाती.. शुरू में तो उसे ये लगा कि शायद मै कुछ अजीब हूं इसलिए वो देखता है क्या?? और अन्दर जाती शीशे में अपने आप को बहुत ध्यान से देखती.. उसे सब कुछ ठीक लगता तो उसे इत्मीनान हो जाता..

असल मे उसकी छत से मौसमी का आंगन दिखता था तो वहां मौसमी का आना-जाना लगा रहता था, वही आंगन में एक हैंडपंप लगा था और आते जाते उधर उसकी नज़र पड़ ही जाती थी।

समय बीत रहा था और वह, १२वी में आ गई थी। यू तो मौसमी देखने में सामान्य ही लगती थी लेकिन कुछ दिनों से वो अपने ऊपर थोड़ा ध्यान देने लगी थी.. अब वो बालों को सवार कर रखती थी.. शीशे में दस बार देखती थी.. अल्हड़ सी रहने वाली मौसमी अब बड़ी हो रही थी..

देखते- देखते नया साल आ गया सब एक दूसरे को बधाई दे रहे थे.. इसी बीच सामने वाले घर के लड़के ने उसको कार्ड दिया, कार्ड बहुत सुन्दर था और उसमें लिखी लिखावट भी लेकिन मौसमी समझ नहीं पा रही थी कि उसने मुझे ही क्यों कार्ड दिया? खैर कार्ड मे केवल शुभकामनाएं लिखी थी सुन्दर लिखावट मे..
धीरे-धीरे मौसमी को वो नहीं दिखता तो वो देखने की कोशिश करती और गलती से कही दिख जाता तो घबरा के अन्दर आ जाती..

स्कूल जाने के समय जब रिक्सा वाला बुलाता तो मौसमी बाद में, वो पहले ही अपने ड्राईगं रूम का दरवाजा खोल के खड़ा रहता.. कभी-कभी मौसमी झेंप जाती और अपने आप मे बड़बड़ाती कि इनके पास कोई काम वाम नई है जब देखो तब इधर ही देखते रहते हैं.. ये सिलसिला जारी रहा.. देखने के अलावा और वो कार्ड देने के अलावा उसने कभी कुछ नहीं कहा मौसमी से।

मौसमी के परीक्षा का समय आ गया.. वो पुरी तरह तैयारी में लग गई.. बहुत मेहनत से परीक्षा की तैयारी कर रही थी वो। पहला पेपर उस दिन सुबह से ही वो तैयार थी। ममी ने दही चीनी खिलाया और वो बड़े खुशी से रिक्शे का इंतजार करने लगी..एक घंटा बीत गया लेकिन रिक्शा वाला नहीं आया.. पेपर शुरू होने मे केवल आधा घंटा बचा था.. घर में कोई भी नही था.. सिवाय ममी के अब वो रोते हुए घर से बाहर निकल गई.. घबराहट में घर से पैसे लेना भी भूल गई.. केवल दौड़ते हुए जा रही थी वो.... कि तभी पीछे से एक अजनबी से आवाज ने कहा (बाइक रोक के) रूक जाओ.. मौसमी पीछे मुड़ी तो वही सामने के घर वाला लड़का खड़ा था. कुछ भी कहने और सुनने के लिए समय नहीं था वो अपने आँसुओं को पूछते हुए बैठ गई.. जैसे ही स्कूल आ गया वो अन्दर चली गई.. थैंक्स भी नहीं बोली उसको..

पेपर के बाद घर आने पर उसका नजरिया बदल चुका था वो अब उस लड़के का रिस्पेक्ट करने लगी थी.. देखते देखते रिजल्ट भी आ गया.. अच्छे नम्बरों से पास हो गई थी वो.. इन सब के बीच मौसमी के पापा का स्थानांतरण हो गया.. और वो दिन भी आया जब वो इस शहर को छोड़कर जाने लगे.. 3 जुलाई 2003 की वो शाम अपने साथ बहुत कुछ लेकर चली गई.. बहुत सी यादे..

सारा सामान पैक हो चुका था.. देखते देखते पूरा घर खाली हो गया.. वो अलमारी जो कभी किताबों और बैग से सजी रहती थी.. अब सूनी हो गई थी..
पूरा परिवार नम आँखो से घर को खाली कर रहा था.. मौसमी भी उदास मन से घर से सामान लिये निकल रही थी.. किसी को दूढ़ रही थी वो लेकिन सुबह से एकबार भी वो नहीं दिखा.. पता नहीं कहा चला गया.. रोज तो बड़ा खड़े खडे़ देखता था.. मन में बड़बड़ाती हुई वो अपनी सहेलियों से मिलने चली गई.. सरिता बहुत रो रही थी क्योकि कुछ दिन पहले ही उसके पापा कि असमय मौत हो गई और मौसमी उसकी बेस्ट फ्रेंड छोड़ के हमेशा के लिए जा रही थी..मौसमी उसे इस हाल में छोड़कर नहीं जाना चाह रही थी लेकिन मजबूर थी वो।

पूरा मुहल्ला छोड़ने आया स्टेशन पर, वो कही नहीं दिखा.. ट्रेन भी चल दी.. तभी मौसमी कि नजर उस लड़के पर पड़ी जो एक किनारे चुप चाप खड़ा था.. देखते ही उसके चेहरे पर मुस्कान सी आ गई लेकिन तब तक ट्रेन अपनी लय में आ चुकी थी.. मौसमी का मन कर रहा था कि वो दौड़ के जाये और उससे पूछे कहा थे अब तक.. कब से वो उसे दूढ़ रही थी.. उस दिन पेपर में छोड़ने के लिए थैंक्स बोलना चाह रही थी वो.. एक बार फिर उसके सामने रोना चाह रही थी वो ताकि वो अपनी हाथो से उसके आसू पोछ सके.. ये सब सोचते कब वो चेहरा.. स्टेशन.. वो शहर सब कुछ आखों से ओझल हो गया.. रह गई तो सिर्फ़ एक याद...... एक खूबसूरत सा यादों का रिश्ता जिसे ना उसने बाधा और ना किसी ने छोड़ा .....continue.....

Image Source: hdwallpapers



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