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@dawriter

ठंडी और गर्म औरत

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पहली मुलाक़ात

वह एक ख़ूबसूरत लड़की थी। ऊँचा क़द, गोरा रंग, तीखे नैन-नक्श। पहली बार वो अपने पापा के साथ आई थी। दोनों मेरे सामने वाली कुर्सियों पर बैठ गए थे।

“हाँ, कहिये?” मैंने उसके पापा की और देख कर पूछा।

“तकलीफ इन्हें नहीं, मुझे है,” उसने तपाक से जवाब दिया।

“बताइये।”

“मुझे बहुत दिनों से थोड़ी कमजोरी रहती है। ज़्यादा काम नहीं होता, और ज़ल्दी थक जाती हूँ,” उसने सीधे मेरी तरफ देखते हुए कहा।

“अच्छा, कब से?”

“यही कोई छह महीने से।”

“कोई टेस्ट वगैरह करवाए हैं?”

“जी। इस फ़ाइल में सभी रिपोर्ट्स लगी हैं। आप देख सकते हैं।” और ये कह कर उसने फ़ाइल मेरी तरफ बढ़ा दी।

मैंने एक के बाद एक सभी रिपोर्ट्स देखी कहीं कुछ ज़्यादा ख़राबी नहीं थी, बस थोड़ा सा हीमोग्लोबिन कम था, जो लड़कियों का अक्सर रहता है।

“सब नार्मल है, थोड़ा हीमोग्लोबिन कम है, मैं दवाई दे देता हूँ। ठीक हो जाएगा,” मैंने साधारण रूप में धीरे से कहा। मैंने देखा वो मेरी तरफ कुछ इस तरह से देख रही थी जैसे कुछ कहना चाहती हो। उसके पापा चुपचाप अख़बार पढ़ रहे थे। मैंने उसकी ओर देखा तो उसने बोलना शुरू किया,

“देखिये, मेरी शादी दो साल पहले हुई थी मगर मेरे हसबैंड को मुझसे बहुत सारी शिकायतें हैं।”

“हूँ। ” मैंने सिर हिलाया।

“कभी वो कहते हैं, मुझे किचन का काम नहीं आता, कभी कहते हैं मुझे ठीक से बोलना नहीं आता या फिर मैं सलीके से रहना नहीं जानती, मसलन मुझे कपड़े पहनने की तमीज़ नहीं और मैं सेक्सी नहीं दिखती। ”

मैं चुपचाप उसकी बात सुन रहा था। वो कुछ सोचते हुए सीधे मेरी तरफ ही देख रही थी। थोड़ी देर चुप रहने के बाद फिर से बोली,

“एक साल से तो घर पर ही रह रही हूँ। वो लेने भी नहीं आया, मैं गयी भी नहीं। अच्छा, एक बात बताईये,” और ये कह कर वो रुक सा गयी।

“बोलिए,” मैंने कहा।

“ये ठंडी और गर्म औरत क्या होती है? वो मुझे बार-बार यही कहता है की तुम एक ठंडी औरत हो।” वो तपाक से बोली।

उसकी बात सुनकर मैं दंग रह गया। मैंने सुना था की दिल्ली की लड़कियां तेज़-तर्रार होती हैं परन्तु इस हद तक तेज़ होती हैं की अपने पापा के सामने ही ऐसे पूछ लें, कभी सोचा नहीं था। चिकित्सा से सम्बंधित सभी सवालों का जवाब मैं आसानी से दे देता था परन्तु ये कुछ ज़्यादा ही सीधा सवाल था जो मेरी ज़ुबान और तालू को बींधते हुए सीधा मेरी खोपड़ी में घुस गया था। या फिर आप कह सकते हैं कि ये कुछ ज़्यादा ही टेढ़ा सवाल था जिसका जवाब मैं चाहकर भी नहीं दे सकता था। इस सवाल ने मुझे एक अज़ीब सी कश्मकश में डाल दिया था। वो सीधे मेरी तरफ देख रही थी और मेरे ज़वाब का इंतज़ार कर रही थी। कुछ भी कहने से पहले मैंने उसके पापा की तरफ देखा। वो पहले की तरह ही अख़बार में सिर गड़ाए सुनकर भी अनसुना करने का नाटक कर रहे थे।

उत्तर सुनने के लिए वो मेरी तरफ टकटकी लगाए देख रही थी। जवाब तो देना ही था तो मैंने कहा,

“अरे, ये सब बहाने हैं। बात कुछ और होगी। आप पहले अपनी कमज़ोरी दूर कीजिये। मैं आपको पन्द्रह दिन की दवाई देता हूँ। और वो क्या कहता है इसके बारे में ज़्यादा मत सोचिये।”

“ठीक है।” उसने अनमने भाव से कहा।

और वो दोनों उठकर दवाई वाले काउंटर पर चले गए।

उनके जाते ही मैंने ठन्डे पानी का पूरा जग गटागट अपने गले से उतार लिया। थोड़ी देर बाद कुछ राहत महसूस हुई।

उसका वो सवाल काफी दिनों तक मेरे ज़हन में घूमता रहा। मुझे आश्चर्य भी था कि चौबीस-पच्चीस साल की एक पढ़ी-लिखी शादी-शुदा लड़की को ये मालूम नहीं है कि ठंडी और गर्म औरत का क्या मतलब होता है। ये बात तो एक नौवीं-दसवीं में पढ़ने वाली लड़की भी बता देगी। मैंने सोचा कि या तो ये लड़की बहुत सीधी है, एकदम छोटे बच्चे की तरह नादान, या फिर परले दर्जे की धूर्त और मक्कार।

ये सोचते-सोचते पंद्रह दिन बीत गए और ठीक सोहलवें दिन वो मेरे सामने थी।

दूसरी मुलाक़ात

इस बार वह अपनी मम्मी के साथ आई थी।

“कहिये?” मैंने धीरे से पूछा।

“पहले से काफी ठीक हूँ। भूख लगने लगी है और ऐसी कुछ खास कमजोरी भी महसूस नहीं होती, परन्तु। ” वो थोड़ी देर के लिए रुकी और फिर से कहना शुरू किया, “अच्छा ये बताईये कि ये बिस्तर गर्म करना क्या होता है?”

उसका ये प्रश्न सुनकर मैं फिर से सकपका गया था। मेरे लिए एक असमंजस की स्थिति खड़ी हो गयी थी। कुछ भी बोलने से पहले मैंने उसकी मम्मी की ओर देखा। वो नज़रें नीची किये बैठी थी। शायद उसे भी समझ नहीं आ रहा था कि अपनी बेटी को कैसे समझाए। शायद वो भी मेरी तरह ही एक अज़ीब से असमंजस में थी। लड़की मेरी तरफ आशा भरी निगाहों से देख रही थी कि मैं कुछ उत्तर दूँ। परन्तु जब मैं कुछ नहीं बोला तो उसने कहना शुरू किया,

“पिछले हफ़्ते वो मुझे लेने आया था। परन्तु उसकी वही शिकायत कि मुझे कुछ नहीं आता। पता नहीं मुझसे क्या चाहता है? मैं वही करती हूँ जो वो कहता है।।।फिर भी न जाने क्या चाहता है? कहता है, मुझे बिस्तर गर्म करना नहीं आता। अब ये बिस्तर गर्म करना क्या होता है, मुझे नहीं पता,” ये कहते-कहते वो थोड़ा क्रोधित भी हो गयी थी।

अब उत्तर तो मुझे कुछ देना ही था तो मैंने उसे समझाने की दृष्टि से कहा,

“मुझे वैसे आप में कोई कमी, मेरा मतलब, कोई बीमारी दिखाई नहीं देती। अब उसका ऐसा व्यवहार क्यूँ है, इसका कारण कुछ और होगा। आप अपनी चिकित्सा पूरी कीजिये।तब तक शायद उसका व्यवहार भी चेंज हो जाये।”

“ठीक है,” उसने मुझसे सहमती दर्शाते हुए अपना सिर हिलाया।

वो दवाई लेकर चली गयी और मेरे लिए फिर से एक अनसुलझी पहेली छोड़ गयी।

“ये बिस्तर गर्म करना क्या होता है?” मैंने अपने आप से सवाल किया।

“पढ़ी-लिखी, ग्रेजुएट लड़की वो भी दिल्ली जैसे शहर में पली-बढ़ी और उसको ये भी पता नहीं कि बिस्तर....” अज़ीब बात है। और मेरे लिए इस प्रश्न का उत्तर देना कितना कठिन है उसे शायद इसका अनुमान नहीं। या फिर वो नाटक कर रही है। मैंने निर्णय कर लिया था कि इस बार उसके मम्मी या पापा को उसे किसी साईकोलोजिस्ट की सलाह लेने के लिए बोल दूंगा। ये सब सोचते-सोचते पंद्रह दिन फिर से गुज़र गए।

तीसरी मुलाक़ात।।।

“नमस्ते सर।”

“नमस्ते, बैठिये।” मैंने अपनी मजबूरी छिपाने के लिए थोड़ा मुस्कुराकर जवाब दिया।

“सर, ये मेरी बड़ी बहन है।”

“अच्छा-अच्छा और कहिये कैसी हैं आप?” मैंने उस लड़की के प्रिस्क्रिप्शन की तरफ देखते हुए पूछा।

“पहले से बहुत अच्छी हूँ। वो भी आया था। कह रहा था कि मैं पहले की अपेक्षा अच्छी लगने लगी हूँ। परन्तु उसकी वो शिकायत ख़त्म नहीं हुई।” वो भी थोड़ा हँसकर बोली।

मैं चुपचाप सुनता रहा।

“अब आप ही बताओ, क्या मैं ठंडी औरत हूँ?” और ये कह कर उसने अचानक अपना हाथ मेरे हाथ पर रख दिया।

उसकी ये हरकत मुझे पसंद नहीं आई परन्तु वो एक रोगी थी और मुझे उससे थोड़ी सहानुभूति भी थी इसलिए मैं उसे कुछ न कह सका। मैंने सामने बैठी उसकी बहन की तरफ देखा। वो भी परेशान सी दिखाई दी।

“अब तो आपने देख लिया कि मैं ठन्डी औरत नहीं हूँ।” उसने अपना हाथ मेरे हाथ से उठाते हुए कहा।

“हाँ, ऐसा तो कुछ नहीं है।” मैं धीरे से उसे सांत्वना देते हुए बुदबुदाया।

“तो क्या आप मुझे एक ऐसा सर्टिफिकेट दे सकते हैं की मैं गर्म-औरत हूँ?”

उसका ये सवाल हथौड़े की तरह मेरे सिर पर पड़ा। अज़ीब सवाल था ये। और ऐसा सर्टिफिकेट तो मैंने पहले किसी को दिया नहीं था। फिर क्या करूँ? मैं ये सोच ही रहा था कि उसने फिर से मेरी ओर देख कर कहा,

“आप चाहें तो मेरा अंग-अंग देख सकते हैं। कोई भी टेस्ट करा लो, मगर मैं उस आदमी को सबक सिखाना चाहती हूँ कि मैं ठंडी नहीं हूँ। फिर चाहे वो मुझे रखे या छोड़ दे, परवाह नहीं।”

मैं और उसकी बहन बेबस से उसकी बात सुन रहे थे। जब उसकी बहन को लगा कि वो कुछ अधिक ही उत्तेजित हो रही है तो उसने अपना हाथ उसके हाथ पर रख उसे शांत रहने का इशारा किया।

अब वो चुप हो गयी थी।

“देखिये, ऐसा तो कोई सर्टिफिकेट नहीं होता। आप बस अपने पति को समझाने की, संतुष्ट करने की कोशिश कीजिये। सब ठीक हो जाएगा।” मैंने अपना पल्ला झाड़ते हुए कहा, “और हो सके तो आप दोनों किसी काउंसलर की सलाह ले लें।”

“इसमें काउंसलर क्या करेगा?” उसने कुछ निराश होकर कहा।

अब हम सब चुप थे।

मुझे कहीं से भी वो मानसिक रूप से बीमार तो नहीं लग रही थी मगर औरत-मर्द के संबंधों के मामले में थोड़ी अनभिग्य और उम्र के हिसाब से अपरिपक्व ज़रूर लगी।

बाद में मुझे किसी ने बताया कि इसी की वज़ह से उसका अपने पति से तलाक़ हो गया था।

राजीव पुंडीर

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