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@dawriter

सॉरी माँ

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ये आजकल की लड़कियां, जाने क्या सीख कर आती हैं मायके से, ससुराल आते ही पति को अलग करना शुरू कर देती हैं। उनके लिए उनके मायके वाले ही अपने होते हैं। सिर्फ अपनी खुशी से मतलब होता है, ससुराल वालों के बारे में तो सोचती भी नहीं हैं।

ये सारी बातें लता चाची अपनी बहन से फोन पर कह रही थीं। लता चाची मेरी चाची हैं, बहुत ही विनम्र, हिम्मती और दयालु महिला हैं। मेरे चाचा जी की मौत के बाद उन्होंने अपने तीनो बेटों को बहुत हिम्मत के साथ पाला, कभी किसी की सहानुभूति पाने की कोशिश नहीं की। मेरी माँ उनकी जेठानी हैं लेकिन दोनों में बहनों जैसा प्यार है। मेरी दादी जब तक जिंदा थीं , चाची के साथ ही रहीं। वो भी चाची को बहुत प्यार करती थीं, हमेशा उन्हें आशीर्वाद देती रहती थीं, और कहती थीं, "लता भगवान तुम्हें, एकदम तुम्हारे जैसी बहू देंगे। "

चाची के तीन बेटे हैं। सबसे बड़े मयंक भैया, फिर सुवर्ण और छोटे भैया। चाचा जी की मृत्यु के समय मयंक भैया बस 16 साल के ही थे, जिम्मेदारियों ने उन्हें कम उम्र में ही बहुत समझदार बना दिया। MNIT से इंजीनियरिंग करने के बाद उन्होंने बहुत अच्छे प्राइवेट कंपनियों के ऑफर स्वीकार नहीं किये, चाची के साथ रहने के लिए लखनऊ के ही इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ाने लगे। सुवर्ण भैया कनाडा में सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं और छोटे भैया कोलकाता से मेडिकल की पढ़ाई कर रहे हैं। तीनो भाइयों में आपस में बहुत प्यार है, और वो तीनों मुझे बहुत प्यार करते हैं, मैं 'सुरभि'उनकी छोटी बहन।

सुनैना भाभी 5 महीने पहले मयंक भइया की पत्नी बनकर हमारे घर में आईं हैं। बहुत प्यारी, खुशमिजाज और उत्साह से भरपूर सुनैना भाभी के आने से पूरा घर खुशियों से चहक उठा था। शादी के कुछ दिनों बाद सब अपने अपने घर चले गए।

पर इस बार जब मैं रक्षाबन्धन पर घर आयी तो घर का माहौल काफी बदल हुआ लगा। चाची उदास रहने लगीं थीं। भाभी और चाची में ज्यादा बातें भी नहीं होती थीं। भाभी मुझसे कह रही थीं, "सुरभि तुम आती रहा करो, मेरा मन नहीं लगता यहाँ, मयंक जब कॉलेज रहते हैं तो मैं अकेली पड़ जाती हूँ घर में। अपने भाई बहन की बहुत याद आती है। "मम्मी जी को मैं पसंद नहीं सुरभि, उन्हें मेरा और मयंक का प्यार अच्छा नहीं लगता। मैंने उनसे कहा कि ऐसी कोई बात नहीं है भाभी, पर भाभी ने चाची के लिए अपने मन में एक रूप गढ़ लिया था।

मैं वहाँ से वापस आ गयी थी। चाची और माँ की जब भी बात होती, चाची परेशान ही रहतीं, वो माँ से हमेशा कहतीं कि, आप बहुत भाग्यशाली हैं दीदी, जो आपकी सुरभि जैसी बेटी है, बहू कभी बेटी नहीं बन सकती। कभी नहीं। मैं सोचती थी चाची सही ही कह रही हैं, माँ मुझसे नाराज होती हैं तो मुझे डाँटती हैं, मुझे समझाती हैं, लेकिन किसी और से फोन पर मेरी शिकायत नहीं करतीं, मैं खुद कितना भी नाराज हो जाऊं माँ से, लेकिन उनसे बिना बोले नहीं रह पाती। भाभी और चाची तो एक दूसरे से कुछ कहती ही नहीं हैं। बस दूसरों से कहती हैं। मयंक भैया भी कुछ नहीं कह सकते, उनकी तो माँ भी अपनी भाभी भी।

समय ऐसे ही बीत रहा था, भाभी और चाची के रिश्ते में एक कांच की दीवार खड़ी थी, जिसके पार एक दूसरे को देख तो सकते थे, पर किसी के मन की आवाज नहीं सुन सकते थे।

भाभी की डिलीवरी होने वाली थी, मैं और माँ चाची के पास आ गए थे। भाभी की तबियत ठीक नहीं रहती थी तो वो कुछ काम नहीं कर पाती थीं, चाची ही सब काम करती थीं और हमेशा कहती थीं कि ये आजकल की लड़कियों के नखरे हैं, मैंने तो 3 बेटे पैदा किये एक दिन भी आराम नहीं किया। मुझे आश्चर्य होता था कि जो चाची मुझे पानी का गिलास भी नही उठाने देती हैं वो इस तरह की बात कर रही हैं। उधर भाभी भी चाची के रूखे व्यवहार को देख परेशान रहती थीं मुझसे कहती थीं, सुरभि दुनिया में अपनी माँ की जगह कोई नहीं ले सकता। सास कभी भी मां नहीं बन सकतीं। कभी नहीं।

कुछ दिनों में भाभी ने बहुत ही प्यारे बेटे को जन्म दिया। चाची बहुत दिनों बाद इतनी खुश थीं। खुशी में उन्होंने मयंक भैया को गले लगा लिया और कहने लगीं, "मेरे जीने का सहारा आ गया, मेरा कृष्णा आ गया। अब तुझे और बहू को महसूस होगा कि माँ की ममता क्या होती है। "

भाभी के मायके वाले भी आये थे, भाभी अपनी माँ को देखते ही रोने लगीं, उनसे लिपट कर बोलीं, "मम्मी आज मुझे समझ आया कि आप मुझे कितना प्यार करती हैं, कितने कष्टों से मुझे जन्म दिया होगा। मैंने आपके साथ अब तक जितनी भी नाराजगी दिखाई, कभी गुस्से में जो कुछ भी बोला उसके लिए मुझे माफ़ कर दीजिए। "दुनिया में माँ से ज्यादा अपना कोई नहीं होता मम्मी, अपने बच्चे से जितना प्यार माँ करती है उतना कोई नहीं कर सकता। ।  

"मैं खड़ी यही सोच रही थी कि एक माँ और भी है भाभी, उनसे ज्यादा भी उनके बच्चों को कोई प्यार नहीं कर सकता। "भाभी की मम्मी कुछ दिन के लिए रुक गयी थीं, पूरे दिन भाभी और बच्चे का ख्याल रखती थीं, माँ और चाची के साथ घर के काम भी करवाती थीं। घर में फिर से रौनक आ गयी थी। चाची का वक़्त अब मन्दिर के कृष्णा के साथ कम और अपने छोटे कृष्णा के साथ ज्यादा गुजरने लगा था। ।

भाभी मुझसे कहतीं देखा सुरभि , मम्मी मेरे और मेरे बेटे के लिए कितना करती हैं, ये ना होतीं तो क्या होता मेरा!

मेरी माँ अगले दिन जाने वाली थीं, चाची और माँ ने मिलकर भाभी के लिए लड्डू बनाये थे, चाची सबसे पहले लड्डू लेकर भाभी के कमरे में गयीं लेकिन दरवाजे पर उन्हें भाभी की आवाज सुनाई दी, वो भैया से कह रही थीं, मयंक , मम्मी के साथ मैं भी मायके चली जाऊँगी, उनके बिना तो यहां मर जाऊँगी, मेरा और मेरे बेटे का इतना ख्याल कौन रखेगा?भैया ने कुछ नहीं कहा, चाची ने सब सुन लिया था, वो कमरे के अंदर ना जा सकीं, जैसे ही पीछे पलटीं भाभी की मम्मी खड़ी थीं, उन्होंने भी सब सुन लिया था, चाची के आंसू भी देख लिए थे।

रात को माँ चाची के कमरे में गयीं तो देखा, चाची रो रही थीं, बहुत उदास थीं वो, माँ से कहने लगीं, "मैंने अपने बच्चों को कितनी मुश्किल से पाला है। बुखार में, हर कष्ट में, कभी आराम नहीं किया, हमेशा इन तीनों के साथ  खड़ी रही कि इन लोगों को किसी चीज की कमी न हो, मैं तो मयंक के पापा की याद में इनलोगों के सामने रोती भी नहीं थी कि मेरे बच्चे कमजोर पड़ जाएंगे। "आज मयंक ने मुझे पराया कर दिया, उसने बहू से ये नहीं कहा कि मेरी माँ ने इतने सालों तक हमारा ख्याल रखा वो तुम्हारा और बच्चे का ख्याल भी रख लेगी। कितने सपने देखे थे मैंने अपनी बहू के लिए लेकिन सुनैना ने सारे सपनों को तोड़ दिया। मैं अपने ही घर में अकेली पड़ गयी भाभी। इतनी अकेली तो मैं उनके जाने के बाद भी नहीं थी।

माँ, चाची के आँसू पोंछते हुए बोलीं, "लता तुम इस तरह की बातें मत सोचो, मयंक पराया नहीं हुआ बल्कि उसकी जिम्मेदारियां बढ़ गयी हैं, वो जानता है कि तुम्हे रात को प्यास लगती है इसलिए तुम्हारे सिरहाने पानी रख कर सोता है , कि तुम्हे रात को पानी पीने रसोई में न जाना पड़े, तुम्हारी दवाइयाँ खत्म होने से पहले ही नई दवाइयाँ ले आता है, बेटे तो ऐसे ही होते हैं उनका प्रेम प्रदर्शित का तरीका अलग होता और सुनैना भी खराब नहीं है बस तुम्हारी उम्मीदों से अलग है। हमारे समय में बेटियों को दूसरे घर जाने और सारा घरेलू काम सम्भालने का प्रशिक्षण देकर पाला जाता था। अब जमाना बदल गया है, बेटे बेटियों का फर्क मिटा है तो उनके परवरिश का फर्क भी मिटा है। अब लड़कियां भी उच्च शिक्षा ले रही हैं तो माता- पिता उनसे घर के काम भी नहीं करवाते। फिर तुम खुद भी तो सुरभि को कुछ नहीं करने देती। कभी सोचा है, ये सुरभि ससुराल जाते ही सब जिम्मेदारियों को कैसे निभाएगी?सुनैना छब्बीस साल में अपने परिवार को छोड़कर एकदम नए माहौल में आ गयी उसे कितनी मुश्किल हुई होगी ये सब अपनाने में। तुमने मयंक को इतने अच्छे संस्कार दिए हैं इसीलिए वो बहू को इतना प्यार देता है और ये उम्र भी तो ऐसी ही है लता, अपना जमाना याद करो  जब हम चाहते थे कि अम्मा जी कब घर से बाहर जाएं और हम अपने पतियों के साथ अकेले में समय बिताएं। अभी वो दोनों एक दूसरे में ही खोये हुए हैं कुछ समय दो उनको। बहू को बेटी बनाने के लिए खुद भी माँ बनना पड़ता है लता, उसकी गलतियों को ठीक करने के लिए उसे प्यार से समझाओ, उसे थोड़ा समय दो सब ठीक हो जाएगा। ।

उधर सुनैना भाभी की मम्मी, भाभी से कहने लगीं, "याद है सुनु जब तुम्हारे कॉलेज का टूर मनाली जा रहा था और मैंने तुम्हें जाने नहीं दिया था, कितना रोयीं थीं तुम, बहुत नाराज भी थी मुझसे। "

हाँ मम्मी मुझे आज भी अफसोस होता है, मेरी सभी दोस्तों ने आकर वहाँ के किस्से सुनाए थे।

हाँ बेटा, मैंने गलती की थी लेकिन हमारे परिवार में कभी कोई लड़की अकेले बाहर नहीं गयी थी इसी डर से तुझे भी नहीं भेज पायी। तू कुछ दिन नाराज रही फिर एक दिन मेरे गोद में सिर रख कर बोली, चलो मम्मी खीर बनाओ, अब झगड़ा खत्म।।

भाभी हँसने लगी और कहने लगीं कोई अपनी माँ से कितने दिन रुठ सकता है।

हाँ बेटा, ऐसा कितनी बार हुआ था, तू जब भी गुस्साती थी, थोड़े देर बाद खुद ही मेरे पास आकर गले लग जाती थी और कहती थी "मम्मी अब झगड़ा खत्म"।

हाँ मम्मी लेकिन आज आपको ये सब क्यों यादआ रहा है?

क्योंकि एक और माँ तेरी प्रतीक्षा कर रही है, कि तू उनके गले लग के उनके और अपने बीच की सारी दूरियाँ मिटा दे।

आप माँ की बात कर रही हैं, उन्होंने तो मुझे कभी अपना समझ ही नहीं मम्मी, हमेशा मुझमें कमियाँ ढूंढती रहीं। उन्होंने भी कभी मुझे गले नहीं लगाया। कभी मेरी तारीफ नहीं की।

बेटा मैंने तुम्हें जन्म दिया है, तुम्हे मारा है, डांटा है तो गले भी लगाया है, एक सास के लिए इतना आसान नहीं होता ये सब। उनको लेकर अपने मन में कोई भी पूर्वाग्रह पालने से पहले ये तो सोचो जिस पति की तुम तारीफ करते नहीं थकती उसको ये संस्कार भी तो उसी माँ के दिये हुए हैं। जिन परिस्थितियों में उन्होंने अपने बेटों को पाला है वो हम कल्पना भी नहीं कर सकते। हो सकता है कहीं वो भी गलत हों लेकिन तुमने भी तो उनसे जुड़ने की कोई कोशिश नहीं की। वो भी माँ है 'सुनु'और माँ की ममता पर कभी सन्देह मत करना।

अगली सुबह सूरज की रश्मियों ने घर के हर कोने में उजाला फैला दिया था। लता चाची मेवे का हलवा और दूध का गिलास लेकर भाभी के कमरे में गयीं और भाभी उनसे लिपट कर बोलीं , "माँ" झगड़ा खत्म। मुझे माफ कर दीजिए और अपने हाथों से हलवा खिलाइए। दोनों के आंखों से प्रेम और अपनत्व छलक रहा था और नन्हे कृष्णा अपनी लीला रच मोह के धागे में हम सबको उलझा रहे थे। ।

दोस्तों आप सबको मेरी कहानी कैसी लगी, ऐसा हम सबके साथ होता है कि छोटी छोटी खुशियों को हम अपने अहम में अनदेखा कर देते हैं। जिंदगी में खुशियां पाने के लिए एक दूसरे की गलतियों को माफ़ कर दीजिए फिर देखिए ये खुशियां आपको कैसे गले लगाती हैं। अपने विचार मुझे जरूर बताइयेगा।

Image Source: womenpla



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