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@dawriter

तलाक्नामा

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रमाकांत एक छोटी सी फ़ैक्टरी में मुलाज़िम थे। अपने तीन बच्चों के परिवार को पालने पोसने में दिन -रात एक कर दिया। घरवालों की मदद और अपनी जमापूंजी से किस तरह सर पर छत हो गई। पत्नी और बच्चों के साथ सम्मान का जीवन व्यतीत कर रहे थे। बच्चे देखते देखते ही कब बड़े हो गए पता ही न चला। बेटा नमन सबसे बड़ा था और दोनों बेटियां छोटी। नमन पढ़ने में ठीक ठाक था किन्तु कोई बड़ा अफसर बन जाता इतनी पढ़ाई न की उसने। उसके यार दोस्त बड़े घरों के लड़के थे। उनकी सलाह मान कर पिता से काम में लगाने के लिए पैसे मांगने की ज़िद करने लगा। कहाँ से लाते बेचारे मना करने पर न जाने कहाँ से उसने प्रबंध कर लिया और ठेके पर मकान बनाने का काम शुरू किया। रमाकांत डरते थे की कहीं बेटा क़र्ज़ में न डुबो दे।

सब दिन होत न एक समाना - आखिर नमन की मेहनत रंग ले आयी और परिवार के दिन बदल गए। घर में अच्छा खासा धन आने लगा। नमन पैरों पर खड़ा क्या हुआ उसके रिश्त आने लगे। एक जगह बात बनी। लड़की देखने में अच्छी थी, पढ़ी लिखी भी थी। नमन का विवाह हो गया। घर में ख़ुशी की लहर दौड़ गयी। जब आस पड़ोस में सबने बहू की सुंदरता की तारीफ की तो सास फूली न समायी। बहू की बलाएँ लेती थकती न थी माया। लाड़ बरसाते मन नहीं भरता था। उसे ज़मीन पर पाँव न रखने देती थीं। आभा, विभा दोनों भाभी के आस- पास ही मंडराती रहती थीं। शॉपिंग जातीं तो साथ, पिक्चर जाती तो साथ, नमन को तो काम से फुर्सत न थी वे तीनो ही अक्सर घूमने फिरने जाती थीं।

एक दिन रमाकांत के एक मित्र ने जब उनक बिटिया आभा को देखा तो अपने बेटे के लिए उसका रिश्ता मांग लिया, लड़का इतना अच्छा था कि रमाकांत से इंकार करते न बना और तीन ही महीने के अंदर शादी करने का निश्चय किया गया। अब रिश्ता तो हो गया किन्तु रमाकांत इसी उधेड़बुन में थे कि शादी के लिए पैसों का इंतज़ाम समय पर हो पायेगा या नहीं। आश्वस्त थे कि बेटा सब संभाल लेगा।

सब कुछ ठीक चल रहा था अचानक एक दिन रमाकांत पत्नी से बोले ,

"कुछ दिनों से नमन कुछ परेशान सा दिख रहा है, तुम्हे भी लगता है या मुझे ही लग रहा है। .." पत्नी ने सरसरी तौर पर कहा ,

"चिंता मत कीजिये सब ठीक है, काम करता है, होगा थोड़ा अधिक व्यस्त. "

बात आयी गयी हो गयी लेकिन धीरे धीरे नमन की परेशानी बढ़ती देख माँ ने पूछ ही लिया। पता लगा कि नमन ने किसी से काम में लगाने को उधार लिया था जिसे वह काम मंदा होने की वजह से चुका नहीं पा रहा है। नमन की चिंता माँ से देखी न गयी उसने अपने और बहू के सब गहने उसे दे दिए यहाँ तक कि बेटियों के लिए जो बचा रखा था वह भी उसे देकर काम निकालने को कहा और दिलासा दिया कि सब ठीक हो जायेगा।

बेटी की शादी के दिन नज़दीक आने लगे नमन ने जैसे- तैसे रुपयों का प्रबंध किया। लड़के वाले समृद्ध परिवार के थे और साथ ही नेकदिल भी उनकी तरफ से किसी भी प्रकार की कोई मांग नहीं थी लेकिन नमन ने कोई कसर नहीं छोड़ी। क़र्ज़ लेकर ही शादी हो पायी लेकिन इन सब बातों से रमाकांत अनभिज्ञ थे।

कुछ दिन फिर तसल्ली से बीत गए लेकिन सब ठीक न होना था न हुआ। नमन क़र्ज़ में दबता ही जा रहा था और इधर माया पति से चोरी छुपे उसकी मदद कर रही थी घर में इतना सब चल रहा था किन्तु माँ बेटे के अलावा किसी को भनक तक न थी। माँ ने एक दिन तो अति कर दी घर क कागज़ात बेटे को दे कर बोली- "बेटा तू अपना काम चला ले घर गिरवी रख कर काफी पैसा मिल जायेगा। " शायद माँ का दिल था कि मानने को तैयार न था।

बेचारे रमाकांत इस सब से बेखबर थे लेकिन उन्हें उस दिन सब पता चल गया जब बैंक से मकान की कुरकी का आदेश आया। उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गयी। उन्होंने किसी तरह खुद को संभाला। किसी तरह भाग दौड़ करके इधर- उधर से उधार मांग कर घर बचा पाए। लेकिन लेनदार आये दिन सर पर चढ़े आते थे। रमाकांत की इतने दिन की कमाई इज़्ज़त मिटटी में मिल रही थी और वे बेबस से सब देख रहे थे।

उधर बहू यह जान चुकी थी कि उसक गहने बिक चुके हैं। उसने अब अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया था नमन से रोज़ के झगड़े आम बात हो गयी थी। एक दिन झगड़ा हद से बढ़ गया और नमन की माँ ने समझाने की कोशिश की तो बहू ने पलट कर झट जवाब दिया -

"मैं किसी की बातें सुनने नहीं आयी हूँ इस घर, आपको मुझे कुछ कहने का कोई अधिकार नहीं है। "

इस पर नमन के क्रोध की सीमा न रही। उसने आव देखा न ताव शुभा को एक तमाचा जड़ दिया।

माँ ने बीच -बचाव करने की कोशिश की तो शुभा ने उन्हें पीछे धकेल दिया और गुस्से में चली खुद को फांसी लगाने नमन ने जैसे तैसे उसे पकड़ा और समझाया लेकिन उस दिन के बाद से उसका रुख ही बदल गया किसी से सीधे मुंह बात न करती, न ही काम -काज को हाथ लगाती। किसी काम के लिए अगर नमन भी कह देता तो उसे सीधा जवाब मिलता , " नौकरानी नहीं हूँ तुम्हारे घर की। "

उसने अपने मायके वालों के सामने घर के हालात खोल कर रख दिए। उसकी माँ ने समझने के स्थान पर उलटी शिक्षा दी और उसे अपने पास बुला लिया।

उसने अपना सामान बाँधा और बिना किसी से कुछ कहे घर से चली गयी शाम को नमन घर आया तो सीमा को घर पे न पाकर वह उसके मायके पहुँच गया। मायके वालों ने उसका बहुत अपमान किया वह खून का घूंट पीकर रह गया

घर तो वह लौट आया लेकिन उसने सोच लिया था कि अब वह तलाक लेकर ही रहेगा। उसने कुछ दिन इंतज़ार किया कि शायद अब शुभा का गुस्सा उतर चुका हो और वह घर लौट आये लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ एक महीना बीत चुका था। शुभा नहीं लौटी और हार कर नमन को तलाकनामा तैयार करना पड़ा। उसने वह तलाकनामा शुभा को भेज दिया। शुभा को ऐसी उम्मीद कतई नहीं थी वह सोचे बैठी थी कि नमन मना कर ले जायेगा। लेकिन पासा उल्टा ही पड़ गया।

शुभा समझ नहीं पा रही थी कि करे तो क्या करे ! माँ की बातों में आकर वह भूल कर बैठी थी, किन्तु वह नमन के बिना जीने की कल्पना भर से सिहर उठी। उसकी आँखों से आंसू अविरल बह रहे थे उसकी माँ कहने लगी, " बेटी तू रोती क्यों है ? चिंता की क्या बात है ? तेरी माँ अभी मरी नहीं है। ...यह अब भी तेरा ही घर है तू आराम से यहाँ रह. "

शुभा इस बीच अपने घर वापस जाने का मन बना चुकी थी। इस तलाकनामे को देखकर उसकी सारी ज़िद और सारा गुस्सा काफूर हो चुका था। उसने कहा , "तुम रहने ही दो माँ , अगर तुमने उसी दिन मुझे समझा दिया होता तो आज यह नौबत कभी न आती। "

अगले ही दिन शुभा सुबह - सुबह अपने घर लौट गयी।

घर पहुँचते ही सबने उसका खुले दिल से स्वागत किया सास ने गले लगते हुए कहा ,"बेटी आज के बाद कभी ऐसा मत करना। अच्छा -बुरा समय तो आता- जाता रहता है लेकिन रिश्तों के बंधन इतने कच्चे नहीं होने चाहिए की छोटे मोटे झटकों से टूट जाएँ। "

शुभा से कुछ कहते न बना बस उसकी आँखों से बहते पानी से दिलों का सारा मैल धुल गया.....

शायद नमन ने तलाकनामा इसी मकसद से भेजा था। कभी कभी गलत दिखने वाला कोई कदम कितना सही हो जाता है।

Image Source: jagran



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