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@dawriter

हैप्पी वैलेंटाइन डे

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abhidha by  
abhidha

 

 

अपने लैपटॉप पर प्रभात मेल पर आए पल्लवी के शादी के कार्ड को बार-बार पढ़ रहा था- 14 फरवरी को सगाई थी उसकी, प्रभात मन ही मन सोच रहा था कि ये कार्ड गलत छपा है। हड़बड़ी में कुछ अनमने मन से अपने फ्लैट से भागता हुआ प्रभात पार्किंग में पहुंचा। ड्राईवर के आने पर अपने शहर की ओर चल दिया। बीते लम्हों का एक-एक पल उसकी आँखों के सामने से ऐसे गुज़र रहा था मानो कि कल की ही बात हो बस कुछ ही दिन हुए हैं उसे कॉलेज छोड़े हुए।ऐसे ही अपने कॉलेज की आखरी फरवरी को याद कर रहा था प्रभात।

                  गरीबों के लिए मोहब्बत इतनी आसान नहीं होती।आज कल तो प्यार करने से पहले लोग स्टेटस मैच करते हैं।लड़के अपनी बाइक के पीछे बैठाने के लिए ऐसी लड़कियां चाहते हैं जिनको देखकर दूसरे ये कह सकें कि क्या किस्मत है साले की और लड़कियां ये देखती हैं कि सामने वाला बंदा मेरे खर्चे उठा पायेगा कि नहीं।प्यार और मोहब्बत बस यहीं तक सिमट कर रह गयी है आज की पीढ़ी के लिए।

               फरवरी का माह आते ही कॉलेज का माहोल बदल जाता है। ठण्ड भी बस गुनगुनाती सी बची हुई है। कॉलेज के ग्रीनलैंड पर या सिटी बस में या कॉलेज के बाहर चाय की टपरी पर, हर जगह बस यही चर्चा है- भाई एक हफ्ते बाद वैलेंटाइन वीक शुरू होने वाला है जेब के क्या हाल हैं, कहाँ से क्या तोहफे लेने हैं? किसको देने हैं? हर जगह बस यही बातें ज़ोरों पर हैं।

              सुबह से प्रभात का दिमाग ख़राब था, इस बार फिर मौसम ने दगा दिया था।कहने को तो कई एकड़ खेत थे उसके पास,पूरे खेतों पर सोयाबीन की फसल लहलहाई थी, पिता जी की मेहनत का फल मिलता उससे पहले ही बेमौसम पड़ते ओलों ने सब कुछ उजाड़ कर रख दिया था। किसी तरह उधारी कर के पिता जी ने बड़ी मुश्किल से उसके रहने और खाने के खर्चे के लिए पैसे भेजे थे। जब उसने कॉलेज में लोगों की बातें सुनी गिफ्ट खरीदने को लेकर तो कसमसा उठा। उसने भी बहुत सोचा था कि इस बार तो वो अपनी पल्लवी को उसके पसंद का टेडी देकर अपने मन की बात कह देगा जो उसने पिछले कई सालों से मन के किसी कोने में दबा रखी है।

               प्रभात ने टपरी पर चाय पी और क्लास में आ गया। क्लास में घुसते ही उसकी नज़रें पल्लवी पर पड़ी, जो नोट्स बनाने में मग्न थी। पल्लवी की सहेलियों ने उससे जब इस वैलेंटाइन डे पर उसकी क्या योजना है पूछी तो उसने एक बार प्रभात की ओर देखा। प्रभात ने अपनी नज़रें झुका लीं। पल्लवी ने अपनी सहेलियों से कह दिया- मैं इन सबमें विश्वास नहीं रखती और ये सब मेरे लिए कोई मायने नहीं रखता। प्रभात ने नज़रें उठाकर पल्लवी की ओर देखा और कुछ नहीं कहा।

              वैलेंटाइन वीक पर लड़के कभी महंगे फूल खरीदते, तो कभी महंगे चॉकलेट और महंगे टेडी देकर लड़कियों को अपना प्रेम प्रदर्शित करते। प्रभात सारे तमाशे चुपचाप देखता रहता।जब उसके दोस्त बाद में अपने दिए तोहफों की या फूलों की कीमत बताते तो मन ही मन सोचता इतना तो मेरे पूरे महीने का खाने का खर्च है जितना इन लोगों ने इसमें बर्बाद कर दिया।

               ये वैलेंटाइन भी पहले की तरह खाली चला गया। कॉलेज का आखरी साल ख़त्म होने में बस कुछ महीने ही बचे थे अभी तक प्रभात का कहीं प्लेसमेंट भी नहीं हुआ था।पल्लवी का चयन टी सी एस में हो गया था। एक आखरी कंपनी और आनी थी कॉलेज में। प्रभात का रिटेन और जी डी निकल गया था। इंटरव्यू देर रात तक चलने थे। पल्लवी हॉस्टल से झूठ बोलकर आ गयी कि उसका भी इंटरव्यू होना है।

          ग्रीन लैंड पर पल्लवी को अकेले बैठा देख प्रभात हैरान था। वह उससे बात करना चाहता था पर हिम्मत नहीं हुई। एक-एक कर सब इंटरव्यू के लिए जा रहे थे। थोड़ी देर बाद एक बहुत अपनी सी आवाज़ प्रभात के कान में पड़ी, वह पलटा तो पल्लवी थी। प्रभात ने उसकी आँखों में देखा तो पल्लवी कहने लगी- मैंने उस दिन झूठ कहा था कि मुझे टेडी पसंद है और मुझे चाहने वाले को मेरे लिए टेडी लाना होगा। प्रभात ने अपनी नज़रें झुका लीं। पल्लवी कहने लगी- मैं जानती हूँ कि इस बार फिर मौसम ने बहुत बुरा किया है तुम्हारे परिवार के साथ। प्रभात ने हैरानी से पूछा कि तुम्हें कैसे पता।पल्लवी मुस्कराते हुए बोली- इस बार मेरे खाते में पापा ने बहुत सारे पैसे जमा करवाए थे, घर पर जब पता किया तो बड़े भैया ने कहा कि इस बार फिर बहुत पैसे आए हैं, फिर से फसलें बर्बाद हुई हैं तो उनका मुआवज़ा आया है,जो मर्ज़ी चाहे खरीद ले जितनी पार्टी करनी हो कर ले,मेरे पापा तहसीलदार हैं न सारा पैसा उन्हीं को बाँटना होता है।

          पल्लवी दो पल के लिए ख़ामोश हो गयी। प्रभात ने उसकी ओर देखा तो अब उसने अपनी नज़रें झुका रखी थी। प्रभात ने उससे कहा- ये सब तुम मुझे क्यूँ बता रही हो।पल्लवी ने हिम्मत बटोरते हुए कहा- मुझे तुमसे कोई टेडी नहीं चाहिए प्रभात। इतने में प्रभात से किसी ने कहा कि तुम्हें अन्दर बुला रहे हैं। गेट के पास पहुंचकर प्रभात ने मुड़कर पल्लवी की ओर देखा और अन्दर चला गया।उसका चयन नहीं हुआ था। बाहर आया तो पल्लवी जा चुकी थी।

         कॉलेज छोड़ने के पहले एक आखरी बार सब मिले, प्रभात बहुत कुछ कहना चाहता था पर नहीं कह पाया,वक़्त ने जैसे कई सारी बेड़ियाँ ज़िम्मेदारी की तरह उसे पहना दी थीं।अपने चारों ओर चल रहे शोर को सुनता रहा, खामोश नज़रों से पल्लवी को देख कर जैसे ही जाने लगा कि उसे पल्लवी की आवाज़ आई। वह पलटा और बस इतना ही कह पाया- मैं शायद कभी भी तुम्हारे लिए टेडी नहीं ला पाऊंगा, बहुत सारी जिम्मेदारियां हैं मुझ पर। इतना कहकर प्रभात चला गया और पल्लवी उसे जाता देखती रह गयी।

             प्रभात वापस अतीत के झरोखे से लौट आया और कार की खिड़की से झांककर रोड के किनारे लगे पत्थर पर किलोमीटर का हिसाब कर रहा था। पल्लवी की सगाई वाले दिन एक बार वापस अपने शहर पहुंचा।अपने उजड़े खेत देखता हुआ अतीत के कडवे साल याद कर रहा था।अचानक अपने स्कूल  को देख सारे पल उसके आँखों के सामने तैरने लगे थे- जब एक बार स्कूल से लौटते समय पल्लवी के बड़े भाई ने उसे बहुत मारा था, ये कहते हुए कि उसने अपनी औकात से बाहर जाकर उसकी बहन के बारे में सोचा भी कैसे। घसीटते हुए प्रभात को अपने पिता के पास ले गया। कैसे पल्लवी के पिता ने उसका अपमान किया था ये कहकर कि वह तो पल्लवी को कभी एक महंगा टेडी भी खरीद कर नहीं दे सकता। जब देखो तब उसके पिता उनके पास मुआवज़े के लिए भीख मांगते खड़े रहते हैं। सब कुछ पल्लवी की आँखों के सामने हुआ था। पल्लवी भरी आँखों से सब देखती रह गयी थी। उस वक़्त उसके भाई और पिता शायद ये नहीं जानते थे कि पल्लवी भी प्रभात को उतना ही चाहती है जितना कि प्रभात उसे।

         अपनी सोच में खोया प्रभात आखिर उस होलिका दहन को याद करने लगा जिस रात उसकी आँखों ने सच का अलग रूप देखा था। जिस रात उसके माता-पिता ने कर्ज़ के बोझ तले आत्महत्या की थी और उसकी बड़ी बहन को उसके जिम्मे छोड़ गए थे। किसी तरह ज़मीन बेंचकर उसने बहन का रिश्ता तय किया था परन्तु अंत समय जब लड़के वाले दहेज़ के लिए अड़े थे उस समय कोई उसकी मदद को तैयार नहीं था। रात के अँधेरे में पल्लवी नोटों का बण्डल लेकर उसके घर के पीछे थी। प्रभात ने ये कह कर उसे लौटा दिया कि बेईमानी के पैसों से अपनी बहन का घर नहीं बसाएगा वो।पल्लवी ने हिम्मत कर कहा ये मेरी मेहनत की कमाई है प्रभात। प्रभात ने बस इतना ही कहा तुम भी मेरी मजबूरी का मजाक बना रही हो पल्लवी। उदास आँखों से पल्लवी लौट गयी थी,उस दिन के बाद से न तो उसने पल्लवी को देखा था और न ही बात की थी उससे। अपना घर गहन रख दिया था उसने पल्लवी के चाचा के पास।बहन की शादी के बाद उस शहर को छोड़ कर चला गया था।दिल्ली जाकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने लगा था।सब कुछ छीन लिया था इस शहर ने उससे।

       आज लौटा, वो भी पल्लवी की सगाई वाले दिन, वह उसके घर पहुँच गया। घर बड़े ही चाव से सजाया गया था, बड़ा तगड़ा इन्तेजाम था शादी का, देखकर एक कसक उठी उसके मन में,सब गरीबों का पैसा है। उसे वहां देख पल्लवी का भाई अनमने मन से बोला- तुम इस वक़्त यहाँ। प्रभात ने कहा- पल्लवी से मिलना चाहता हूँ, पल्लवी तिवारी से मिलना है मुझे बस आखरी बार, कुछ पुराना हिसाब बाकी है। उसने उसे ऊपर की ओर इशारा किया।जैसे ही प्रभात ऊपर पहुंचा पल्लवी के कमरे में, उसे सभी लोग हैरानी से देख रहे थे। जैसे ही उसने कहा- एक आखरी बार पल्लवी तिवारी से मिलना है मुझे। सालों बाद उस आवाज़ को सुन, पलटी पल्लवी।उसने सबको बाहर जाने का इशारा किया। प्रभात बहुत देर तक पल्लवी को देखता रहा, उसके बाद अपने हाथों से एक गिफ्ट पैक उसकी ओर बढा दिया ये कहकर कि यदि आज नहीं देता तो शायद कभी नहीं दे पाता।पल्लवी प्रभात को देखती रही।उसके लाये गिफ्ट को देख ही रही थी कि प्रभात ने कहा- मैंने इसे देने में देर कर दी न पल्लवी। दरवाज़े तक ही पहुंचा था प्रभात कि पल्लवी ने कहा- मुझे बस पंद्रह मिनट दो, मैं भी साथ चल रही हूँ,दम घुटता है मेरा यहाँ।

               प्रभात नीचे आकर अपनी गाड़ी के पास खड़ा था। पल्लवी ने अपने सारे गहने और लहंगे उतारे, एक साधारण सी साडी पहनी। एक बैग में अपनी कमाई से ख़रीदे कुछ कपड़े रखे,हाथ में टेडी पकड़ अपने पापा के कमरे की ओर चल दी। उनके सामने जाकर उसने टेडी टेबल पर रख कहा- मैं जा रही हूँ पापा, प्रभात मुझे लेने आया है। उसके पापा ने आश्चर्य से उसे देखा।पल्लवी अपने घर से जा रही थी, उसके पापा उसे आवाज़ देते हुए पीछे आए उसके।पल्लवी की माँ ने उसे रोकने की कोशिश की मगर वह नहीं रुकी।दृढ़ता के साथ घर से निकली,बाहर पहुंचकर उसके भाई ने जैसे ही पल्लवी का हाँथ पकड़ा, प्रभात ने उसे अलग करा और गुस्से से अबकी उसके भाई को देखा।अपनी तरफ का दरवाज़ा खोल उसने पल्लवी को अन्दर बैठने का इशारा किया। पल्लवी के अन्दर बैठते ही प्रभात ने उसके पिता को देखा और अपने हाथ जोड़ कर कहा- अब इस लायक हो गया हूँ कि आप की बेटी की हर ज़रुरत पूरा कर सकता हूँ, अब और उसे यहाँ मैं तड़पने के लिए नहीं छोड़ सकता, आज्ञा दें कहकर, गाड़ी में बैठ चल दिया।आज प्रभात पर कोई ज़ोर आजमाइश नहीं कर पाया सी.बी.आई. ऑफिसर जो बन गया था अब वह।उसके बड़े ओहदे के सामने आज बाकि के सब बहुत छोटे हो गए थे।

         पल्लवी की आँखों में आँसू थे।प्रभात ने अपने टूटे घर के पास गाड़ी रुकवाई।पल्लवी को गाड़ी में रुकने का कह,वह घर की ओर चल दिया। अन्दर पहुँच कर हैरान रह गया था,उसका पूरा घर साफ सुथरा जगमगा रहा था। वह हैरान हो गया,तभी उसके कंधे पर पल्लवी के हाथों को महसूस किया उसने।हैरानी से पलटा तो वह कहने लगी- मैंने इस ताले की दूसरी चाबी बनवा ली थी, मुझे यकीन था कि तुम ज़रूर आओगे। प्रभात ने उससे कहा- तुम ऐसे चली आई पल्लवी, तुम्हारे पिता जी लड़के वालों को क्या जवाब देंगे?

       पल्लवी ने मुस्कराते हुए प्रभात का चेहरा अपने हाथ में पकड़ते हुए कहा- वो कार्ड झूठा था, आज मेरी छोटी बहन की सगाई है।प्रभात ने हैरानी से पल्लवी को देखा और बोला तुम्हें विश्वास था कि मैं आऊँगा। पल्लवी ने कहा- हाँ मैं अपने विश्वास को आजमाना चाह रही थी। बहुत मन होता था कई बार तुमसे मिलने का,बात करने का पर पापा ने जो किया,उस शर्मिंदगी के अहसास ने तुम तक जाने वाले सारे रास्ते बंद कर दिए थे मेरे लिए।पल्लवी ने एक चटाई बिछाई,अपने बैग से खाना निकाला और प्रभात से बोली- मुझे पता है कि कार्ड देखने के बाद से तुमने कुछ खाया नहीं होगा चलो खाना खा लो।प्रभात पल्लवी को और उसके विश्वास को देखते हुए बोला, अगर मैं नहीं आता पल्लवी तो। पल्लवी ने हँसते हुए कहा- ऐसे कैसे नहीं आते, कितनी रातों को जाग कर वो कार्ड बनाया था मैंने। प्रभात उसकी गोद में सर रख सो गया था जैसे सालों बाद चैन की नींद सोया हो।पल्लवी हौले से उसके कानों में बुदबुदाई- 'हैप्पी वैलेंटाइन डे प्रभात।'

                                         अभिधा शर्मा।।



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