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@dawriter

हमदर्द साथी

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varmangarhwal by  
varmangarhwal

चार जनवरी, बुधवार की रात को एक बजे उम्र में पच्चीस(25) साल का क्लीन शेव चेहरे वाला स्मार्ट और हैंडसम सुदर्शन ऑफ़िस में कुर्सी पर बैठा टेबल पर ऑवर टाइम में काम करते हुए चाँदी की ईयर रिंग चैक कर रहा था.

रात के सवा एक बजे सुदर्शन सभी ईयर रिंग चैक करके उठते हुए अपनी कुर्सी पीछे सरकाकर खड़ा हुआ और टेबल पर रखा सामान गिनकर बेसमेंट से सीढ़िया चढ़ते हुए ऊपर आया.

सामने सोफे पर उम्र में पैंतालिस(45) साल के क्लीन शेव चेहरे वाले बहुत ही स्मार्ट और हैंडसम जयसिंह अपने से चार साल बड़ी उम्र में उनचास(49) साल की बहुत ही सुन्दर पत्नी सुजाता के साथ बैठे बातें कर रहे थे.

सुदर्शन ने कहा—“सेठ जी, सभी ईयर रिंग लॉक लगाने के बाद चैक कर ली. अब बस पैक करना बाकि हैं. आप एक बार आकर देख लो.”

जयसिंह—“अब सुबह देखेंगे, यार. सारा काम टेबल पर छोड़ दो और ऊपर कपड़ा डाल देना. एक से ऊपर टाइम हो गया. अब तुम भी जाओ.”

सुदर्शन—“ये भी सही हैं.”

सुदर्शन ने सीढ़िया उतरते हुए नीचे बेसमेंट में आकर सारा सामान टेबल से उठाकर जयसिंह के केबिन में कपड़े से ढककर रख दिया और केबिन लॉक करके सीढ़िया चढ़ते हुए वापस ऊपर आकर ऑफ़िस के दरवाजे पर ताला लगाने लगा.

जयसिंह और सुजाता सोफे से उठकर खड़े हुए. सुजाता चलकर सुदर्शन के पास आई. सुदर्शन ने सुजाता को ऑफ़िस की चाबी दी और घर का दरवाजा खोलकर बाहर चला गया. सुजाता ने घर का दरवाजा अन्दर से बन्द किया और मुड़कर बैडरूम की तरफ आने लगी.

सुजाता के पास आते ही बैडरूम के दरवाजे के पास खड़े जयसिंह ने एक हाथ सुजाता के गले में डालकर कंधे पर रखते हुए दूसरे हाथ से बैडरूम के दरवाजे को खोला. दोनों पति–पत्नी बैडरूम के अन्दर चले गए और जयसिंह ने बैडरूम का दरवाजा अन्दर से बन्द कर लिया.

पूरी तरह सुनसान प्रिंस रोड़ पर बहुत ठंड भरी रात में घना कोहरा छाया हुआ था. थोड़ी–थोड़ी दूर पर सड़क किनारे लगे खम्बों पर लाईटें जल रही थी. थरथराती सर्दी में डरावनी आवाजें निकालती हुई सन–सन करती ठंडी–ठंडी हवाएँ चल रही थी.

सुदर्शन हर रोज की तरह अपने दोनों हाथ पेन्ट की जेबों में डाले कड़ाके की सर्दी से काँपते हुए प्रिंस रोड़ पर तेज–तेज कदमों से चलता हुआ जा रहा था.

सुदर्शन चलते–चलते ठंड से काँपता हुआ मन में बोला कि सेठ जी के घर और ऑफ़िस में तो सर्दी का पता ही नहीं चलता. वहाँ अन्दर तो ऐसा लग रहा था, जैसे मार्च–अप्रेल का महिना हो और बाहर आते ही पूरा शरीर काँपने लगा.

सुदर्शन चलते हुए अभी पन्द्रह मिनट दूर आया, तभी उसने देखा कि सड़क पर आगे एक गाड़ी खड़ी हैं और गाड़ी के पास एक लड़के और एक लड़की के बीच मारपीट हो रही हैं. दो अन्य लड़के उनके पास खड़े हैं. सुदर्शन चलते–चलते रुक गया और दूर खड़ा रहकर उनको देखने लगा.

लड़का और लड़की लड़ते–लड़ते एक–दूसरे के बाल खिंचते हुए सड़क पर नीचे गिरे और एक–दूसरे के ऊपर–नीचे होते हुए सड़क पर लोट–पोट होने लगे. लड़की लड़के पर भारी पड़ने लगी और लड़की ने लड़के को दबोच लिया. इसी बीच पास खड़े दोनों लड़कों ने लड़की को पकड़कर लड़के को लड़की के हाथो से छुड़ाया और लड़की को लड़के से दूर किया.

लड़की दोनों लड़कों से छुटने के लिए छटपटा रही थी. सड़क पर गिरा लड़का उठा और लड़की को घूसे(मुक्के) और लातें मारने लगा. कुछ देर लड़की को पीटने के बाद लड़के ने लड़की के बाल पकड़े. दोनों अन्य लड़के लड़की को छोड़कर पीछे हट गए. लड़की के बाल पकड़ने वाले लड़के ने लड़की को सड़क किनारे गिरा दिया और गिराने के बाद चार–पाँच लातें मारकर पास खड़े दोनों लड़कों की तरफ आया.

तीनों लड़के गाड़ी के पास जाकर कुछ देर खड़े रहे. फिर लड़की को वहीं छोड़कर तीनों लड़के गाड़ी में बैठकर चले गए.

सुदर्शन घबराकर सोचने लगा कि आगे जाऊँ या रास्ता बदल लूँ ? पता नहीं, क्या चक्कर हैं ? छोड़ यार ! क्यों मुसीबत को गले लगाना ? इन लड़कियों में भी अक्ल तो होती नहीं हैं. बेकार लोगों से प्यार, फिर ये हाल. वैसे भी आजकल टाइम बहुत खराब हैं. मैं मदद करने जाऊँ और ब्लात्कार या मर्डर के इल्जाम में खुद ही अन्दर हो जाऊँ. रहने दे, गोली मार.

सुदर्शन ने अपना रास्ता बदल लिया और दूसरे रास्ते से जाने लगा. चलते–चलते सुदर्शन ने कुछ याद करके खुद से कहा कि भूल गया क्या, सुदर्शन ? कभी तू भूख से तड़पकर कचरे में से सड़े–गले फल उठाकर खा रहा था. उस वक्त तुझे रोता देखकर एक देवी जैसी नारी तेरे पास आई और तेरे आँशू पोंछकर तुझे अपने घर ले गई. जरा सोच अगर वो नारी भी तेरी तरह मुँह फेरकर चली जाती, तो फिर तेरा क्या हाल होता ? इतनी ठंड में बेचारी लड़की सड़क पर पड़ी हैं. वो लड़के उसे कितनी बुरी तरह मारकर गये हैं और तू उसकी मदद करने की जगह रास्ता बदलकर जा रहा हैं. कहीं मर गई तो ? नहीं यार ! कम से कम एक बार जाकर देख तो सही उसको. जो होगा देखा जाएगा.

सुदर्शन तेज–तेज कदमों से चलता हुआ वापस प्रिन्स रोड़ पर आकर उसी तरफ चलने लगा. लड़की अभी तक वहीं सड़क किनारे पड़ी हुई दिखाई दी. सुदर्शन धिरे–धिरे उसके पास आया.

बटन वाला घूटने तक आता हुआ कुर्ता और जींस पहने, दिखने में बहुत ही खूबसूरत उम्र में सताईस(27) साल की लड़की शराब के नशे में पूरी तरह धुत थी. उसे बिल्कुल भी होश नहीं था. लड़की के कपड़े अस्त–वयस्त और सर के बाल बिखरे हुए थे. लड़की सड़क किनारे पड़ी–पड़ी कुछ बड़बड़ा रही थी.

सुदर्शन ने लड़की के पास बैठकर कहा—“आपका घर कहाँ हैं ? आपके घर का कोई नम्बर बता दो, मैं आपके घर से किसी को बुला लेता हूँ.”

सुदर्शन की आवाज़ सुनकर लड़की ने सुदर्शन की तरफ देखा और अपना हाथ सुदर्शन की तरफ किया. सुदर्शन ने लड़की का हाथ पकड़कर उसको सहारा देकर खड़ी किया.

लड़की खड़ी होने के बाद सुदर्शन का कॉलर पकड़कर बोली—“साले कमीने, मुझे धोखा देता हैं. छोड़ूगी नहीं तुझे.”

सुदर्शन मन में बोला कि अरे, ये क्या हो रहा हैं ?

सुदर्शन अपना कॉलर छुड़ाने की कोशिश करते हुए बोला—“मैं तो आपकी मदद के लिए आया हूँ.”

लड़की सुदर्शन को धक्का देकर लड़खड़ाखड़ाते हुए बोली—“मैनें तुझे कितना प्यार किया. तेरे लिए अपने मॉम–डेड से झगड़े किये और तू एक साल मजे लेने के बाद कहता हैं, तेरे जैसी बहुत मिलती हैं. किस–किस से शादी करूँ ?”

सुदर्शन टेन्शन में आकर मन में सोचने लगा कि लगता हैं, उस लड़के ने शादी का वादा करके टाइमपास किया और छोड़ दिया. अब ये शराब के नशे में मुझे वहीं धोखेबाज लड़का समझ रही हैं.

लड़की हाँफते हुए इधर–उधर देखकर एक पत्थर उठाकर बोली—“अब कहाँ जाएँगा बचकर ? आ सामने ! बताती हूँ तुझे, मैं कितनी बेकार हूँ.”

लड़की को पत्थर मारते देखकर सुदर्शन पीछे हटते हुए बोला—“अरे…क्या कर रही हो ? लग जाएगी.”

लड़की आँखों से गुस्सा दिखाते हुए बोली—“साले, आगे आ. पीछे क्यों हट रहा हैं ? सर फोड़ूँगी आज तेरा.”

लड़की ने सुदर्शन की तरफ पत्थर फेंका.

सुदर्शन खुद को पत्थर लगने से बचाकर लड़की के पास आया और लड़की को पकड़कर बोला—“देवी जी, मेरे ऊपर रहम करो. मैनें आपको धोखा नहीं दिया.”

लड़की खुद को सुदर्शन से छुड़ाने की कोशिश करते हुए बोली—“छोड़ कमीने, इतनी आसानी से तुझे जाने नहीं दूँगी.”

सुदर्शन ने लड़की को समझाने की कोशिश की, लेकिन लड़की सुदर्शन की बात सुनने की जगह गन्दी–गन्दी गालियाँ निकालते हुए सुदर्शन पर हाथ–पैर चलाने लगी.

जब लड़की सुदर्शन के काबू में नहीं आई तो सुदर्शन मन में बोला कि इन बेवड़ों का एक ही ईलाज हैं.

सुदर्शन ने लड़की के दोनों गालों पर एक के बाद एक पाँच जोरदार चांटे(थप्पड़) जड़ दिये. सुदर्शन के चान्टों से लड़की के दोनों गाल लाल हो गए. लड़की सड़क पर गिर पड़ी और लड़की ने रोना शुरू कर दिया.

सुदर्शन घबराकर मन में बोला कि लगता हैं ज्यादा हो गया.

सुदर्शन लड़की के पास आया और नीचे बैठकर लड़की को बिठाते हुए बोला—“एम सॉरी, प्लीज रोईये मत.”

लड़की सड़क पर बैठकर बच्चों की तरह रोते–रोते बोली—“यार ! क्या हो गया तुझे ? मेरे प्यार में क्या कमी रह गई ? तेरे लिए क्या नहीं किया मैनें ? जब तू प्रोब्लम में था, तो तुझे पैसे दिये. तेरी खुशी के लिए तेरे साथ बिस्तर पर भी सो गई. तूने जो–जो कहा, मैनें सब किया. तेरे मतलब पूरे हो गए, तो अब तू मुझे मार रहा हैं. तू चाहे जितना मरजी मार ले. लेकिन मुझे छोड़कर मत जा. मैं तेरे बिना जी नहीं सकती. प्लीज यार ! तू एकदम से इतना कैसे बदल गया ? आई लव यू, यार. लव यू सॉ मच.”

लड़की को रो–रोकर गिड़गिड़ाते हुए देखकर सुदर्शन को दया आने लगी.

लड़की सुदर्शन के पैर पकड़कर बोली—“प्लीज यार ! मैं तेरे पैर पकड़ती हूँ. तू जो बोलेगा, वो सब करूँगी. बस तू मुझे छोड़कर मत जा.”

सुदर्शन लड़की के हाथ पकड़कर अपने पैर छुड़ाते हुए बोला—“अरे, क्या कर रही हो ? आप उठो पहले.”

लड़की गरदन हिलाते हुए बोली—“नहीं, पहले तू बोल. तू मुझे छोड़कर नहीं जाएगा.”

सुदर्शन को कुछ समझ नहीं आया और वो लड़की को खड़ी करते हुए बोला—“अब क्या करें ? हाँ–हाँ, मैं कहीं नहीं जाऊँगा. आप उठो तो सही.”

सुदर्शन ने रोती हुई लड़की को खड़ी करके लड़की के कपड़े ठीक किये और लड़की के बिखरे हुए सर के बाल ठीक करता हुआ लड़की को बहलाकर चुप करवाने की कोशिश करते हुए उसे पास के बस स्टॉप पर ले आया.

सुदर्शन ने लड़की को बस स्टॉप की कुर्सी पर बिठाकर मन में कहा कि इसको संभालना अपने बस की बात नहीं हैं. बस स्टॉप पर बिठा दिया हैं. अब आगे इसकी किस्मत.

सुदर्शन बस स्टॉप से नीचे उतरकर अपने रास्ते जाने लगा.

लड़की ने सुदर्शन को जाते देखकर छोटी बच्ची की तरह कहा—“तू मुझे छोड़कर क्यों जा रहा हैं ?”

सुदर्शन जल्दी–जल्दी चलने लगा.

लड़की बस स्टॉप की कुर्सी से उठकर सुदर्शन के पीछे–पीछे आते हुए गाना गाने लगी—

“छोड़के ना जा…
छोड़के ना जा…

तेरे बिना मर जाऊँगी,
मैं…मर जाऊँगी,

प्यार बहुत हैं, दिल में मेरे,
समझता नहीं क्यूँ, दिलबर मेरे,
चला हैं कहाँ तू ? छोड़कर मुझे,
तेरे साथ जीने के सपने हैं मेरे,”

सुदर्शन चलते–चलते मन में कहने लगा कि कहाँ फँस गया, यार ! ये तो मेरे ही पीछे ही पड़ गई.

इस बीच रात में गश्त लगाने वाली पुलिसवेन सायरन बजाते हुए प्रिंस रोड़ पर आई.

पुलिसवेन देखते ही लड़की बोली—“मुझे छोड़के जाएगा ? अब देख ! तुझे पुलिस में देती हूँ. केस करूँगी तुझ पर मोहब्बत का.”

पुलिसवेन का सायरन सुनकर सुदर्शन भी रुककर मुड़ा और पुलिसवेन की तरफ देखते हुए मन में बोला कि हत तेरे की. इनको भी अभी आना था. जब वो लड़के इस लड़की की पिटाई कर रहे थे, तब नहीं आए.

लड़की सड़क के बीच में आकर पुलिसवेन के सामने खड़ी हो गई. पुलिसवेन लड़की के पास आकर रुककर बन्द(बन्द मतलब इंजन बन्द कर दिया ड्राईवर ने) हो गई.

पुलिसवेन रुकते ही लड़की ड्राइवर के पास बैठे उम्र में लगभग सैंतालिस(47) साल के पुलिसवाले के पास जाकर हाथ जोड़ते हुए छोटे बच्चों की तरह बोली—“पुलिसवाले अंकल ! देखो ना, वो मुझे छोड़कर जा रहा हैं. उसको समझाओ ना, मुझे छोड़कर ना जाए. मैं उससे बहुत प्यार करती हूँ. मैं मर जाऊँगी, उसके बिना.”

ड्राइवर के पास बैठे पुलिसवाले ने अपनी नाक पर हाथ रखकर कहा—“पीछे खड़ी हो. कितनी दारू पी रखी हैं.”

पुलिसवेन में पीछे की तरफ बैठा उम्र में लगभग बावन(52) साल का पुलिसवाला पुलिसवेन से बाहर निकलकर गरजते हुए बोला—“कौण हैं रे, इस बेवड़ी के साथ ?”

सुदर्शन पुलिसवेन से थोड़ा आगे खड़ा सोचने लगा कि अगर मैनें कहा, मैं इस लड़की को नहीं जानता, तीन लड़के इसकी पिटाई करके, इसको यहाँ छोड़कर भाग गए. तो पुलिस स्टेशन, लड़की का नशा उतरने का इंतजार, उन लड़कों को पहचानों, ये मुझे बॉयफ्रैंड क्यों बोल रही हैं ? बहुत सारे सवाल. फिर जब उन लड़कों को पकड़ा जाएगा, खुद को बचाने के लिए वो मुझे लपेटने लगे तो ? और फिर इन बिस्तर पर सोने वाली लड़कियों का कोई भरौसा नहीं होता. ये बॉयफ्रैंड के लिए सब कुछ भूल जाती हैं. बॉयफ्रैंड के लिए मुझे ही झूठा साबित कर दिया तो ? नहीं यार, इस झमेले में नहीं पड़ना. ये तुझे अपना बॉयफ्रैंड तो समझ ही रही हैं. एक बार जान छुड़ाने के लिए बोल दें, ये तेरी गर्लफ्रैंड हैं.

पुलिसवेन से बाहर खड़े पुलिसवाले ने हाथ से इशारा करके सुदर्शन को बुलाया—“ओए ! इने(इधर) आ.”

सुदर्शन पुलिसवेन के पास आकर पुलिसवाले से थोड़ा दूर खड़ा हुआ.

पुलिसवेन से बाहर खड़ा पुलिसवाला बोला—“अरे, आगे आजा. इन्वीटेशन दे ग बुलाऊ के तने ?”

सुदर्शन पुलिसवाले के पास आया.

पुलिसवाले ने सुदर्शन को देखकर कहा—“के चक्कर हैं ? क्यों आधी रात न रौळो(हंगामा) मचा राख्यो हैं ?”

सुदर्शन ने भोला–भाला बनकर मासूमियत से कहा—“रौळो म मचा राख्यो हैं ? आ देखो थे इने, दारू पीर किया बावळी हो री हैं. तो म गुस्सा म आर केयो, के म तो तन छोड़ अर जाऊ अब. बस ई बात पर आ रोण लाग गी.”(हिन्दी अनुवाद : हंगामा मैनें मचा रखा हैं ? ये देखो आप इसको, शराब पीकर कैसे पागल हो रही हैं. तो मैनें गुस्से में आकर कहा कि मैं तो अब तुझे छोड़कर जा रहा हूँ. बस इस बात पर ये रोने लगी.)

सभी पुलिसवाले सुदर्शन की बात सुनकर हँसने लगे.

पुलिसवेन में ड्राइवर के पास बैठा पुलिसवाला बोला—“झाभर जी, देख ल्यो. जमानो कित्तो बदल ग्यो. पैली आदमी दारू पीर बावळो होर घूमतो, हर लुगाई कैवती, तू दारू पीये, म तो जाऊ छोड़ अर. अब छोरी दारू पीर ड्रामा करे और छोरो केवे, तू दारू पीये ई वास्ते तन छोड़ अर जाऊँ.”(हिन्दी अनुवाद : झाभर जी, देख लो. जमाना कितना बदल गया. पहले आदमी शराब पीकर पागल होकर घूमता था और औरत कहती थी, तू तो शराब पीता हैं, मैं तो जा रही हूँ तुझे छोड़कर. अब लड़की शराब पीकर ड्रामा करती हैं और लड़का कहता हैं कि तू शराब पीती हैं, इसलिए तुझे छोड़कर जा रहा हूँ.)

पुलिसवेन में पीछे बैठा उम्र में लगभग पचास(50) साल का एक पुलिसवाला बोला—“चालो, अब आपणा बस गी बात थोड़ी हैं. आने नीबेड़ो जल्दी.”(हिन्दी अनुवाद : चलो, अब अपने बस की बात नहीं हैं. इनको निपटाओ जल्दी.)

पुलिसवेन के बाहर खड़ा पुलिसवाला—“हाँ, घर कठे हैं तेरो ?”

सुदर्शन—“आम्रपाली कॉलोनी म.”

ड्राइवर के पास बैठा पुलिसवाला—“ई छोरी न जाणे हैं नी तू ?”

सुदर्शन ने हाँ में सर हिला दिया.

पुलिसवेन के बाहर खड़े पुलिसवाले ने अपनी जेब से अपना स्मार्टफोन निकालकर पुलिसवेन के सामने खड़े होने का इशारा करते हुए कहा—“इने आओ दोन्यू जणा.”(हिन्दी अनुवाद : इधर आओ दोनों जने.)

पुलिसवेन के बाहर खड़े पुलिसवाले ने लड़की और सुदर्शन को पुलिसवेन के सामने ले जाकर पुलिसवेन की आगे की लाइट की रोशनी में एक साथ खड़ा किया और उनकी फोटो निकाली.

पुलिसवेन से बाहर खड़ा पुलिसवाला सुदर्शन से बोला—“बे लारे बैठ्या हैं, बांग खन जा हर बे पूछे जको, सच्ची–सच्ची बता दई.”(हिन्दी अनुवाद : वो पीछे बैठे हैं. उनके पास जा और वो जो पूछे, सच–सच बता देना.)

सुदर्शन पुलिसवेन में पीछे बैठे पुलिसवालों के पास आया. पुलिसवेन में पीछे बैठे उम्र में लगभग छत्तीस(36) साल और उम्र में चालीस(40) साल के दो पुलिसवाले सुदर्शन से पूछताछ करने लगे.

पुलिसवालों को बातचीत करने के बाद सुदर्शन अच्छा लड़का लगा. पुलिसवालों ने उसे ड्राईवर के पास बैठे पुलिसवाले के पास जाने के लिए कहा. सुदर्शन ड्राईवर के पास बैठे पुलिसवाले के पास आकर खड़ा हो गया.

पुलिसवेन से बाहर खड़े पुलिसवाले ने लड़की से पूछा—“ए छोरी ! तेरो के नाम हैं ?”

लड़की शराब के नशे में मुस्कुराकर बोली—“मेरो नाम प्रेम–दीवानी हैं.”

ड्राइवर के पास बैठे पुलिसवाले ने कहा—“छोरी, घरबार गो पतो–ढिकाणो बूझा. सावळ बता दें.”(हिन्दी अनुवाद : लड़की, घरबार का पता–ढिकाना पूछ रहे हैं. ठीक से बताओ.)

लड़की—“मेरो घर इंगो दिल हैं, अंकल जी. ओ अब दिल उ काडणा चावे मने. थे बताओ, म के करूँ ?”(हिन्दी अनुवाद : मेरा घर इसका दिल हैं, अंकल जी. ये अब दिल से निकालना चाहता हैं मुझे. आप बताओ, मैं क्या करूँ ?)

ड्राइवर के पास बैठा पुलिसवाला बोला—“कुँआ म पड़.”

ड्राइवर के पास बैठे पुलिसवाले ने सुदर्शन को पास बुलाया और सुदर्शन से सुदर्शन का नाम, पता और मोबाइल नम्बर लिखवाकर कहा—“अब सीधा घर चल्या जाओ. ई छोरी न तो होश कोनी, ई वास्ते खाली तेरो नाम, पतो लिख्यो हैं. कोई गड़बड़ होई, तो हिसाब लगा लई.” (हिन्दी अनुवाद : अब सीधे घर चले जाओ. ये लड़की तो होश में नहीं हैं, इसलिए सिर्फ तुम्हारा नाम–पता लिखा हैं. कोई गड़बड़ हुई, तो हिसाब लगा लेना.)

सुदर्शन ने हाथ जोड़कर कहा—“पर साब, म इन जबरदस्ती चग ग थोड़ी ले जाण लाग रेयो हूँ. फेर मेरो नाम पतो क्यों ?” (हिन्दी अनुवाद : लेकिन साहब, मैं इसको जबरदस्ती उठाकर थोड़े ही ले जा रहा हूँ. फिर मेरा नाम–पता क्यों ?)

पुलिसवेन के बाहर खड़ा पुलिसवाला—“अरे, चिन्ता आळी बात कोनी. बस म्हारी फॉर्मेलटी वास्ते लिख्यो हैं. बो भी तू ठीक छोरो लाग्यो जद. नई तो चाल बैठ म्हारे सागे. फेर सारी रात बैठ्यो रेयी जैळ म. सवेरे घरगा ही आर छुड़ावला.”(हिन्दी अनुवाद : अरे, चिन्ता करने वाली कोई बात नहीं हैं. बस हमारी फॉर्मेलिटी के लिए लिखा हैं. वो भी तुम अच्छे लड़के लग रहे हो, इसलिए. वरना चलो बैठो हमारे साथ. फिर सारी बैठे रहना जैल में. सुबह घरवाले ही आकर छुड़वाएँगें.)

सुदर्शन—“नहीं–नहीं, साब. ठीक हैं. घणो–घणो धन्यवाद थारो. म्हे चाला अब.”

ड्राइवर के पास बैठे पुलिसवाले ने कहा—“ठीक हैं.”

पुलिसवेन के ड्राइवर ने पुलिसवेन स्टार्ट की.

सुदर्शन ने लड़की के बाजू पकड़कर पीछे हटते हुए लड़की को पुलिसवेन से दूर किया.

पुलिसवेन से बाहर खड़े पुलिसवाले के वापस पुलिसवेन के पिछली साइड में बैठने के बाद पुलिसवेन चल पड़ी और गश्त करते हुए आगे निकल गई.

सुदर्शन ने लड़की के बाजू छोड़कर लड़की की तरफ देखा. लड़की शराब के नशे में मदहोश सुदर्शन की तरफ देखकर मुस्कुराने लगी.

सुदर्शन ने हाथ जोड़कर कहा—“अब चलो, देवी जी.”

लड़की सुदर्शन के गले लगकर बोली—“आई लव यू, यार.”

सुदर्शन ने लड़की को खुद से दूर करके कहा—“अरे, ठीक से चलो. पुलिस दूबारा आ गई तो प्रोब्लम हो जाएगी.”

लड़की हँसकर बोली—“तू पुलिस से डरने लगा. तू तो बोलता था, जब प्यार किया तो डरना क्या.”

सुदर्शन ने सख्त होकर कहा—“अब तुम चल रही हो या फिर मैं जाऊँ ?”

लड़की मुँह पर उँगली रखकर चुपचाप सुदर्शन के साथ चलने लगी.

सुदर्शन चलते हुए मन में कहने लगा कि ऊपरवाले मेरे मन में कुछ गलत नहीं हैं. मेरे साथ कुछ गलत मत कर देना.

लड़की ने अब पहले की तरह बोलना बन्द कर दिया और शान्त होकर चल रही थी. लड़की पैदल चलते–चलते थक गई और उसे नींद आने लगी. सुदर्शन ने लड़की को लड़खड़ाते देखकर लड़की को कमर से पकड़कर संभाला और लड़की का एक हाथ अपने कंधे पर रखकर चलने लगा.

सुदर्शन ने चलते–चलते मन में सोचा कि अभी तो गली सुनसान होगी. इसे बिल्डिंग में साथ ले जाता हूँ. सुबह उजाला होने से पहले इसे जाने के लिए कह दूँगा. बस इसका नशा उतर जाए.

सुदर्शन एक चार मंजिल की तीन–तीन बैडरूम के चार फ्लेट वाली बिल्डिंग में सबसे ऊपर वाले फ्लेट में किराये पर रहता हैं. बाकि तीन फ्लेट खाली हैं, इसलिए बिल्डिंग के मालिक ने पूरी बिल्डिंग सुदर्शन को ही संभालने के लिए दे रखी हैं.

बीस मिनट पैदल चलने के बाद सुदर्शन की बिल्डिंग आ गई. सुदर्शन ने बिल्डिंग के दरवाजे पर खड़े होकर लड़की से कहा—“मैं ताला खोलता हूँ. फिर अन्दर चलते हैं.”

सुदर्शन ने लड़की का हाथ अपने कंधे से हटाया. लड़की दीवार से पीठ लगाकर दीवार के सहारे खड़ी हो गई.

सुदर्शन ने बिल्डिंग के दरवाजे का ताला खोलकर लड़की को सहारा देते हुए सीढ़िया से चढ़कर सबसे ऊपर वाले फ्लेट के दरवाजे पर आकर फ्लेट का ताला खोला और लड़की को फ्लेट के अन्दर लाकर फ्लेट में लाईट जलाई.

सुदर्शन के फ्लेट में बस एक सिंगल बैड ही था, जो एक कमरे में लगा हुआ था और ओढ़ने–बिछाने के लिए सुदर्शन के पास एक गद्दा, एक रजाई और एक कम्बल था.

सुदर्शन ने लड़की को बैड वाले कमरे में लाकर अपने बैड पर सुला दिया और कमरे में लाइट जलाकर लड़की के सैंडल निकालकर उसे रजाई ओढ़ा दी.

सुदर्शन बिल्डिंग के मुख्य दरवाजे पर ताला लगाने के लिए सीढ़िया उतरते हुए वापस नीचे आया. मुख्य दरवाजे पर ताला लगाकर बिल्डिंग के मालिक के आदेशानुसार और चोरों के खतरे को ध्यान में रखते हुए सुदर्शन रोज की तरह सोने से पहले पूरी बिल्डिंग के सारे खिड़की–दरवाजें और ताले चैक करते हुए वापस सीढिया चढ़ते हुए सबसे ऊपर वाले फ्लेट में आया.

सुदर्शन ने फ्लेट का दरवाजा अन्दर से बन्द करके बाहर की लाईट बन्द की और कमरे में आकर कमरे की लाईट जलती छोड़कर बैड पर बैठ गया.

सुदर्शन सोचने लगा कि अब मैं कहाँ सोऊँ ? गर्मी होती, तो फर्श पर ही सो जाते. लेकिन इतनी ठंड में फर्श पर सोया तो सुबह तक मेरी कुल्फी जम जाएगी.

सुदर्शन ने कुछ देर तक सोचने के बाद ठंड से कम्पकपी बढ़ती देखकर अपने जूते निकाले और कम्बल लेकर बैड पर ही लड़की से दूरी बनाकर पीठ के बल सीधा होकर कम्बल ओढ़ते हुए लेट गया.

रात के चार बज गए, लेकिन सुदर्शन को नींद नहीं आई. इस बीच लड़की नींद में सुदर्शन के पास आकर सुदर्शन के सीने से लिपट गई. सुदर्शन चौककर थोड़ा दूर हुआ और लड़की को वापस पीछे करके ठीक से सुला दिया.

कुछ देर बाद फिर से यहीं हुआ. ऐसा तीन–चार बार होने के बाद सुदर्शन ने बैड से खड़े होकर मन में कहा कि अब समझ में आया, पराई लड़की के साथ क्यों नहीं सोना चाहिए. लेकिन अब इतनी सर्दी में कहाँ जाऊँ ? मैनें तो रजाई भी तुझे दे दी. कम से कम कम्बल में तो सोने दे.

सुदर्शन कुछ देर खड़े रहने के बाद वापस बैड पर आकर बैठ गया. सुदर्शन बैठे–बैठे लड़की के चेहरे की तरफ देखकर मन में सोचने लगा कि कितनी मासूम लड़की हैं. समझ में नहीं आता, इतनी प्यारी लड़की को इतनी बुरी तरह मारते हुए, उन लड़कों के हाथ क्यों नहीं काँपे ? चल तू भी सोजा, यार. सिर्फ साथ में सोने से कुछ नहीं होता. जब दिल और दिमाग में गन्दगी हो, तब कुछ होता हैं. मन चंगा, तो कटोती में गंगा.

सुदर्शन ने फिर से पीठ के बल सीधा लेटकर कम्बल ओढ़ लिया.

सुदर्शन को सड़क पर कहीं हुई लड़की की बातें याद आने लगी. पत्थर उठाकर मारना, आई लव यू बोलना, बच्चों की तरह रो–रोकर गिड़गिड़ाना, गाना गाकर मनाना, पुलिसवालों से समझाने के लिए कहना, प्यार से गले लगना.

इसी बीच लड़की फिर से सुदर्शन की तरफ आकर सुदर्शन के सीने से लग गई. इस बार सुदर्शन ने उसे दूर नहीं किया. लड़की के सर पर हाथ फेरते हुए सुदर्शन मन में बोला कि अगर ये बेवड़ी ना होती तो कितना अच्छा होता. समझ में नहीं आता, ये लोग अपनी मासूमियत में नशा क्यों मिला रहे हैं ? खैर, क्या कर सकते हैं ?

सुदर्शन ने लड़की को ओढ़ाई हुई रजाई अपने ऊपर भी डाल ली और लड़की को सीने से लगाए लेटा रहा. सुबह के पाँच बजे बाद सुदर्शन की भी आँख लग गई.

सुबह के पौने छः बजे सुदर्शन जाग गया. लड़की अभी तक सुदर्शन के सीने से लगकर सुदर्शन की बाहों में ही सो रही थी. सुदर्शन ने लड़की को साइड में सुलाया और बैड से खड़ा होकर लड़की को जगाने लगा.

लड़की ने आँखें खोलकर सामने सुदर्शन को देखा और चौककर बोली—“तुम कौन हो ? और मैं यहाँ कैसे ?”

सुदर्शन पीछे हटकर बोला—“मेरा नाम सुदर्शन हैं. रात को आप शराब के नशे में सड़क पर गिर गई थी, तो मैं आपको यहाँ ले आया.”

लड़की रजाई हटाकर बैड से उठी और अपनी सैंडल पहनकर कमरे से बाहर आई. सुदर्शन भी चप्पल पहनकर लड़की के पीछे–पीछे कमरे से बाहर आया.

लड़की ने इधर–उधर देखा और एक हाथ सर पर हाथ रखकर बोली—“लेकिन मैं तो दिव्यांश के साथ थी. फिर सड़क पर कैसे गिर गई ?”

सुदर्शन—“वो सब मुझे नहीं पता. मैं बस इन्सानियत के नाते आपको यहाँ ले आया. वरना इतनी ठंड में सड़क पर पता नहीं क्या हाल होता आपका ?”

लड़की घुटनों के बल नीचे बैठी और दोनों हाथ सर पर रखकर बोली—“ओह गॉड, इसका मतलब मैं रात भर तुम्हारे साथ सो रही थी ?”

सुदर्शन लड़की के पास आकर बैठा और बोला—“एम सॉरी, मैं यहाँ किराये पर रहता हूँ. मेरे पास बस एक सिंगल बैड और एक रजाई–गद्दा हैं. अब ठंड बहुत ज्यादा हैं, इसलिए कम्बल ओढ़कर मैं आपके पास ही लेट गया. लेकिन मेरा यकिन करो, मेरे मन में कुछ गलत नहीं था और ना ही मैनें आपके साथ कुछ किया हैं. मैं बस सोया ही था.”

लड़की सर से हाथ हटाकर मुँह ऊपर करके बोली—“अरे, कोई बात नहीं यार… कुछ कर भी लेते तो क्या फर्क पड़ जाता ? मैं तो वैसे भी एक कमीने का खिलौना बनकर बेवकूफों की तरह सब करवा चुकी हूँ.”

सुदर्शन बिना कुछ बोले खड़ा होकर पीछे हो गया. लड़की ने खुद के हाथ की तरफ देखा, तो लड़की के हाथ की कोहनी पर चोट लगी हुई थी.

लड़की ने कहा—“मैं तुम्हें मिली कहाँ थी ?”

सुदर्शन—“ये प्रिस रोड़ पर चित्रकूट के मोड़ से थोड़ा आगे. मैं अपने ऑफ़िस से आ रहा था. तो मैनें देखा, आपकी एक लड़के के साथ बुरी तरह हाथापाई हो रही थी. उसी मारपीट में उस लड़के ने आपको सड़क पर गिरा दिया और फिर आपको लातें मारी. ये चोट शायद तभी लगी होगी.”

लड़की चेहरा गंभीर करके गुस्से में बोली—“साला कमीना. फिर क्या हुआ ?”

सुदर्शन—“उसके साथ दो लड़के और भी थे. आपको वहीं छोड़कर वो तीनों गाड़ी में बैठकर चले गए. फिर मैं आपके पास आया. आप बहुत नशे में थी और नशे में आपने मुझे अपना बॉयफ्रैंड समझ लिया. तभी वहाँ पुलिस आ गई. अब अगर मैं पुलिस को ये बोलता कि मैं आपको नहीं जानता. आपको तीन लड़के यहाँ छोड़कर भाग गए, तो पुलिस मुझसे सवाल–जवाब करती. शायद पुलिस स्टेशन भी ले जाती. मुझे पुलिस से बहुत डर लगता हैं. इसलिए मैनें पुलिसवालों को बोल दिया कि आप मेरी गर्लफ्रैंड हो और आपको यहाँ ले आया.”

लड़की मुस्कुराकर बोली—“थैक्स.”

सुदर्शन—“इसमें थैक्स की कोई बात नहीं हैं. लेकिन एम सॉ सॉरी. अब आप यहाँ से चली जाईए. अगर आस–पड़ौस में किसी ने देख लिया, तो लोग गलत मतलब निकालेगे और इस बिल्डिंग का मालिक मुझे इस बिल्डिंग से निकालेगा.”

लड़की ने हँसकर कहा—“ओके, कोई बात नहीं.”

लड़की खड़ी होकर दरवाजे की तरफ जाने लगी.

सुदर्शन ने कहा—“रूको.”

सुदर्शन कमरे में जाकर चप्पल निकालकर जूते पहनने के बाद बैड पर पड़ा कम्बल उठाकर लाया और लड़की को कम्बल देते हुए बोला—“इसे ओढ़ लो, सर्दी बहुत ज्यादा हैं.”

लड़की ने कहा—“नहीं–नहीं, रहने दो. इसकी कोई जरूरत नहीं हैं.”

सुदर्शन—“जरूरत कैसे नहीं हैं ? इसे तो ओढ़ना ही पड़ेगा. देखो, कैसे काँप रही हो ?”

सुदर्शन ने खुद ही लड़की के कंधों पर कम्बल डाल दिया. लड़की ने कम्बल को ठीक से लपेटकर ओढ़ लिया.

सुदर्शन ने दरवाजा खोलकर कहा—“अब चलो.”

लड़की के बाहर आने के बाद सुदर्शन ने अपनी जेब से चाबी निकालकर फ्लेट को ताला लगाया और सीढ़ियों से नीचे आने लगा. लड़की भी सुदर्शन के पीछे–पीछे नीचे आने लगी. सुदर्शन नीचे आकर बिल्डिंग के मुख्य दरवाजें को खोलकर लड़की के साथ बाहर आया और बिल्डिंग का दरवाजा वापस लॉक करके लड़की के साथ आम्रपाली सर्किल की तरफ चल पड़ा.

सुबह के छः बज चुके थे, अभी तक अंधेरा और ठंड ज्यादा होने के कारण घना कोहरा छाया हुआ था.

सुदर्शन ने चलते–चलते पूछा—“आपका नाम जान सकता हूँ ?”

लड़की—“कृतिका.”

(नोट— यहाँ से आगे लड़की को ‘कृतिका’ सम्बोधित किया जाएँगा.)

सुदर्शन—“तो कृतिका जी, अब कहाँ जाएँगी आप ? मेरा मतलब आप कहाँ रहती हैं ?”

कृतिका—“मानसरोवर.”

सुदर्शन—“फिर तो बहुत दूर जाना हैं आपको. अब इतनी सुबह कोई साधन भी पता नहीं, मिलेगा या नहीं ?”

कृतिका—“कोई बात नहीं, तुम चिन्ता मत करो. मैं थोड़ा इंतजार कर लूँगी.”

सुदर्शन—“हाँ, वो तो करना ही पड़ेगा.”

कुछ देर बाद आम्रपाली सर्किल आ गया और दोनों किसी ऑटो का इंतजार करने लगे. पन्द्रह मिनट इंतजार करने के बाद भी कोई ऑटो नहीं आया. सुदर्शन ने अपनी जेब से मोबाइल निकालकर ऑटो चलाने वाले अपने एक दोस्त आलोक को फोन किया.

आलोक चारपाई पर रजाई में मुँह ढककर अपने कमरे में सोया हुआ था. आलोक के सिरहाने पड़ा आलोक का मोबाइल बजने लगा.

आलोक ने रजाई में मुँह ढके हुए अपना हाथ तकिए के पास लाकर मोबाइल रजाई के अन्दर लेकर कॉल रिसींव करके कहा—“हैलो.”

सुदर्शन—“गुदड़ों(बिस्तर) से बाहर आ गया या अभी गुदड़ों में ही पड़ा हैं ?”

आलोक—“हाँ, बोल. सुबह–सुबह कैसे याद किया ?”

सुदर्शन—“आम्रपाली चौराहे पर आजा जल्दी.”

आलोक—“अभी आया. बस दस मिनट रूक.”

उम्र में तैईस(23) साल का आलोक कॉल काटकर बिस्तर से बाहर निकला और दीवार पर टंगा कोट(सर्दी में पहनने वाला टोपी लगा हुआ) पहनकर कमरे से बाहर आया.

आलोक ने थरथराती सर्दी महसुस करके मुँह धोना कैंसल किया और घर से बाहर आकर ऑटो स्टार्ट करके ऑटो लेकर आम्रपाली सर्किल की तरफ चल पड़ा.

आलोक ने सुदर्शन के सामने ऑटो रोककर कहा—“हाँ, बोल.”

सुदर्शन ऑटो के पास आकर बोला—“यार ! इस लड़की को मानसरोवर जाना हैं.”

आलोक ने लड़की की तरफ देखकर मुस्कुराते हुए सुदर्शन को धिरे से कहा—“इतनी स्मार्ट लड़की. कौन हैं ?”

सुदर्शन—“अपनी दोस्त ही समझ ले. बस घर छोड़कर आना हैं. अब ज्यादा डिटेल पूछकर क्या करेगा ?”

आलोक—“अरे मजाक कर रहा था, यार. (कृतिका से)आओ मैडम, बैठो.”

कृतिका ऑटो की तरफ आते हुए कम्बल निकालने लगी.

सुदर्शन ने कृतिका से कहा—“कम्बल क्यों निकाल रहे हो ? ठंड लग जाएँगी.”

कृतिका—“अरे, लेकिन कम्बल तो तुम्हारा हैं ना.”

सुदर्शन—“आप जहाँ उतरो, वहाँ उतरकर कम्बल इसको दे देना. ये मुझे दे देगा.”

कृतिका मुस्कुराकर बोली—“ओके, थैक्यू सॉ मच. बाऐं.”

सुदर्शन—“टेक केयर.”

सुदर्शन ने आलोक से कहा—“ठीक से घर छोड़ देना इनको."

आलोक—“नो टेन्शन यार.”

आलोक ऑटो चलाते हुए चला गया और सुदर्शन वापस अपनी बिल्डिंग की तरफ़ चल पड़ा.

बिल्डिंग पर आकर सुदर्शन ताला खोलकर बिल्डिंग के अन्दर आया और बिल्डिंग के दरवाजे पर ताला लगाकर सीढिया चढ़ते हुए फ्लेट में आकर सोचा कि ऑफ़िस तो दस बजे जाना हैं. थोड़ा और सो लेता हूँ. नौ बजे उठ जाएँगें.

सुदर्शन कमरे में आकर बैड पर बैठा और अपने जूते निकालकर रजाई ओढ़कर सो गया.


तीन महिने बाद चार अप्रेल, मंगलवार को शाम के पाँच बजे सुदर्शन मानसरोवर इलाके में एक बस सटॉप पर खड़ा बस का इंतजार कर रहा था.

सुदर्शन के सामने एक गाड़ी आकर रूकी. जब गाड़ी के गेट का शीशा नीचे हुआ, तो सुदर्शन ने देखा कि सामने ड्राईविंग सीट पर हल्के ब्राउन कलर का चश्मा पहने कृतिका थी.

कृतिका ने चश्मा निकालकर आँखें ऊपर करके मुस्कुराते हुए कहा—“पहचाना ?”

सुदर्शन ने गाड़ी के पास आकर कहा—“पहचानेगें क्यों नहीं ?”

कृतिका—“मुझे लगा, शायद भूल गए होगे. शराब पीकर आधी रात को सड़कों पर मारपीट करने वाली एक बिगड़ैल शराबी लड़की को क्या याद रखना ?”

सुदर्शन—“नहीं–नहीं, ऐसी कोई बात नहीं हैं. अगर मैं ऐसा सोचता, तो आपको अपने साथ क्यों ले जाता ?”

कृतिका—“अोके, यहाँ कैसे ?”

सुदर्शन—“यहाँ एक दोस्त की बहन की शादी हैं, वहीं आया था. शादी हो गई, कुछ देर बाद बारात चली जाएगी. अब वापस जा रहा हूँ. आप यहाँ ?”

कृतिका—“मैं यहीं रहती हूँ. इससे पीछे वाली गली में ही हमारा घर हैं. तुम सेठ साँवरमल बागड़ी जी को जानते हो ?”

सुदर्शन—“हाँ, उनका नाम सुना हैं.”

कृतिका—“वो मेरे पापा हैं.”

सुदर्शन हैरान होकर बोला—“आप साँवरमल जी बेटी हो ?”

कृतिका ने मुस्कुराकर कहा—“हाँ, तुम कहाँ जा रहे हो ?”

सुदर्शन—“घर.”

कृतिका—“कहाँ आम्रपाली ?”

सुदर्शन—“हाँ.”

कृतिका—“चलो आओ फिर, मैं छोड़ देती हूँ.”

सुदर्शन—“नहीं–नहीं, मैं बस से चला जाऊँगा.”

कृतिका—“अरे, बैठ जाओ. मैं वहीं से जाऊँगी. रास्ते में तुम्हें उतर दूँगी.”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“ये भी सही हैं.”

सुदर्शन ने गाड़ी का गेट खोला और गाड़ी में बैठकर गेट वापस बन्द कर लिया. कृतिका अपना चश्मा पहनकर गाड़ी आगे चलाने लगी.

कृतिका ने ड्राईविंग करते हुए कहा—“तुम्हारा नाम क्या हैं ? उस दिन नाम पूछना तो भूल ही गई.”

सुदर्शन—“उस दिन सुबह उठकर सबसे पहले आपने यहीं पूछा था और मैनें बता भी दिया था. मेरा नाम सुदर्शन हैं.”

कृतिका—“ओह ! सॉरी, मैं भूल गई.”

सुदर्शन—“कोई बात नहीं.”

कृतिका—“तुम करते क्या हो ?”

सुदर्शन—“चित्रकूट में जयसिंह जी हैं, उनका जेम्स एण्ड ज्वैलरी का बिजनेस हैं. उनके पास जॉब करता हूँ.”

कृतिका—“तो रात को इतनी देर तक क्या करते हो ? ऑफ़िस तो पाँच–छः बजे ऑफ हो जाता होगा. ज्यादा से ज्यादा सात बज जाते होगे.”

सुदर्शन—“ऑफ़िस छः बजे ऑफ होता हैं. लेकिन मैं रात को दस–ग्यारह बजे तक ऑवर टाइम करता हूँ. उस रात काम बहुत ज्यादा था, इसलिए एक बज गए थे.”

कृतिका ने मुस्कुराकर कहा—“और बदकिस्मती से मैं मिल गई.”

सुदर्शन—“आप खुद के बारे में बार–बार ऐसे क्यों बोलती हो ?”

कृतिका—“अरे, तुम्हें बहुत प्रोब्लम हुई होगी ना. तुमने बताया था, वहाँ पुलिस भी आ गई थी.”

सुदर्शन—“पुलिस के आने के कारण थोड़ा टेन्शन में आया था, लेकिन इसमें बदकिस्मती वाली कोई बात नहीं हैं.”

कृतिका—“ओके.”

सुदर्शन ड्राइविंग करती हुई कृतिका को देखते हुए सोचने लगा कि परी जैसी खूबसूरत और गुडिया जैसी मासूम, छोटे बच्चों जैसी खिलखिलाहट और फूलों जैसी सादगी. आज तो लग ही नहीं रहा, ये लड़की बेवड़ी हैं. उस रात सड़क पर तो इससे दूर भागने का मन कर रहा था और आज लग रहा हैं, हमेशा पास ही रहें तो…(मन में मुस्कुराकर) छोड़ यार. तू भी क्या–क्या सोचने लगता हैं ? पता नहीं क्या–क्या कर चुकी हैं ?”

कृतिका सुदर्शन को मुस्कुराते देखकर बोली—“क्या हुआ ?”

सुदर्शन—“नहीं. कुछ नहीं.”

कृतिका—“कुछ याद आ गया क्या, जो मन में हँस रहे हो ?”

सुदर्शन—“असल में, मैं उस रात के बारे में ही सोच रहा था.”

कृतिका—“अरे, उसके लिए एम सॉ सॉरी. ड्रिंक तो मैं रोज करती हूँ, लेकिन उस रात मेरे बॉयफ्रेंड ने ड्रिंक में कुछ मिला दिया था. अब पता नहीं, उसने क्या मिलाया ? दस–ग्यारह बजे तक तो मैं उसके साथ बैठकर ड्रिंक कर रही थी. उसके बाद क्या–क्या हुआ, मुझे ठीक से याद नहीं. सुबह उठी तो सामने तुम थे.”

सुदर्शन—“कोई बात नहीं.”

सुदर्शन मन में सोचने लगा कि कितनी अजीब बात हैं. प्यार के नाम पर गर्लफ्रैंड बनकर सब कुछ करवा लिया और कोई शर्म–शर्मिन्दगी जैसा कुछ भी नहीं.

कृतिका ने पूछा—“अच्छा, तुम्हारे घर में कौन–कौन हैं ?”

सुदर्शन—“घर में मम्मी–पापा हैं, भाई–भाभी हैं, एक बड़ी बहन हैं, बहन की भी शादी हो चुकी हैं. भाई तो घर में ही एक छोटी सी दुकान करता हैं. मैं यहाँ जॉब करता हूँ.”

कृतिका—“और तुम्हारे पापा, वो क्या करते हैं ?”

सुदर्शन—“वो जमींदार हैं, अब तो सब भाई के साथ दुकान चलाते हैं.”

कृतिका—“ओके.”

सुदर्शन—“आपसे एक बात पूछूँ, अगर आप बुरा ना माने तो ?”

कृतिका—“हाँ, पूछो.”

सुदर्शन—“आप खुद को बिगड़ैल बोलती हैं. जब आपको पता हैं, आप बिगड़ैल क्यों हैं ? तो उन बातों से दूर क्यों नहीं रहती ? मेरा मतलब ये शराब पीना छोड़ दीजिए.”

कृतिका ने मुस्कुराकर कहा—“अब मुझे बिगड़ैल कहलाना अच्छा लगता हैं.”

सुदर्शन—“ये भी सही हैं.”

कृतिका ने हँसकर कहा—“सही ही हैं, यार ! जब बिना गलती के सजा मिलती हैं. तब यहीं लगता हैं, इससे अच्छा तो गलती कर ही लो.”

सुदर्शन—“अब मुझे आपकी जिन्दगी के बारे में कुछ मालूम तो नहीं हैं. लेकिन उस रात आपने जो बातें कहीं, उस तरीके से प्यार के नाम पर बेवकूफ बनना तो पूरी तरह से महामुर्खता हैं. आप शायद ये समझती हो, आपने तो सच्चा प्यार किया था. लेकिन वो लड़का धोखा देकर चला गया. अब लोग आपके सच्चे प्यार को समझ नहीं सकते और बिना गलती के सजा देते हैं, मतलब आपको गलत बोलते हैं. अब प्यार के नाम पर गलत रास्ते पर चलेंगे, तो गलत ही कहलाएगें. प्यार का ये मतलब थोड़े ही हैं, हम प्यार के नाम पर कुछ भी मनमानी करें. मुझे तो ये सब करने वाली लड़कियाँ बहुत बेकार लगती हैं.”

सुदर्शन की बात सुनकर कृतिका का खिला हुआ चेहरा गंभीर होकर तनावग्रस्त हो गया. कृतिका गाड़ी की स्पीड बढ़ाने लगी.

सुदर्शन गाड़ी की स्पीड बढ़ती देखकर कृतिका की तरफ देखते हुए मन में बोलने लगा कि क्या कर रहा हैं ? भूल गया, उस रात हाथ में पत्थर लेकर कैसे शेरनी की तरह दहाड़ रही थी ? अब तू नागिन की पूँछ पर पैर क्यों रख रहा हैं ?

सुदर्शन ने मासूमियत भरी आवाज़ बनाकर कृतिका से कहा—“कृतिका जी, मैं इतनी जल्दी मरना नहीं चाहता. अभी तो मेरी शादी भी नहीं हुई, कोई गर्लफ्रैंड भी नहीं बनाई. प्लीज ! गाड़ी धिरे चलाईए.”

कृतिका ने गाड़ी की स्पीड कम करते हुए कहा—“ओह ! एम सॉ सॉरी. एम रियली वैरि सॉरी.”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“कोई बात नहीं, इतना सॉरी बोलने की जरूरत नहीं हैं.”

कृतिका मुँह से कुछ बोले बिना चुपचाप गाड़ी की स्पीड कम करके गाड़ी चलाती रही.

सुदर्शन मन में कहने लगा कि कुछ भी हो, हमें दूसरों की भावनाओं का ध्यान रखना चाहिए. मुझे पूरी बात जाने बिना इस तरह ज्ञान नहीं बाँटना चाहिए.

इसके बाद कृतिका पूरे रास्ते कुछ नहीं बोली.

आम्रपाली कॉलोनी नजदीक आते ही सुदर्शन ने हाथ से आम्रपाली सर्किल की तरफ इशारा करके कहा—“मुझे वहाँ उतार देना.”

कृतिका ने सुदर्शन की बताई जगह पर गाड़ी रोक दी.

सुदर्शन ने कहा—“एम सॉरी, मुझे माफ़ कर दीजिये.”

कृतिका—“अरे, तुम क्यों सॉरी बोल रहे हो ? तुमने तो ठीक ही कहा, गलती तो मुझसे हुई हैं.”

सुदर्शन—“फिर भी, मुझे सोच–समझकर बोलना चाहिए. कोई भी इन्सान जान–बुझकर खुद का नुकसान नहीं करता, खुद का नुकसान तो गलती से, अन्जाने में या मजबुरी में ही करता हैं.”

कृतिका—“अब छोड़ो, यार ! मुझे तुम्हारी बात का बिल्कुल भी बुरा नहीं लगा.”

सुदर्शन—“थैक्यू, वैसे मेरे सॉरी बोलने की एक वजह और भी हैं.”

कृतिका—“क्या ?”

सुदर्शन—“उस रात मैनें भी आपको चांटे मार दिये थे.”

कृतिका खिलखिलाकर हँसते हुए बोली—“अच्छा.”

सुदर्शन हैरान होकर बोला—“आप हँस रही हैं ?”

कृतिका—“मुझे हँसी इसलिए आई. क्योंकि तुम पहले इन्सान हो, जिसने मुझे चांटे मारने के बाद माफ़ी माँगी हैं. वरना मैं तो बचपन से बहुत चांटे खा चुकी हूँ.”

सुदर्शन—“अच्छा, लेकिन ऐसा क्यों ?”

कृतिका—“बस ऐसे ही. कभी मम्मी–पापा से, कभी स्कूल टीचर से, कभी फ्रैंड्स से और कभी–कभी आप जैसे दोस्तों से. वो क्या हैं, मैं बचपन में शरारती बहुत थी और कॉलेज में आने के बाद बहुत बिगड़ गई. इसलिए डांट और चांटे खाने की आदत हैं.”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“बचपन में शरारतें बहुत लोग करते हैं.”

कृतिका—“हाँ, लेकिन मैं कुछ ज्यादा ही करती थी और उस रात भी मैनें कुछ ना कुछ ऐसा किया होगा, जिसके कारण तुम्हें हाथ उठाना पड़ा होगा. बताओ, क्या किया था मैनें ?”

सुदर्शन—“हम्म…अगर दूबारा मुलाकात हुई, तो बताऊँगा. अभी मैं चलता हूँ.”

कृतिका—“ठीक हैं.”

सुदर्शन गाड़ी का गेट खोलकर गाड़ी से उतरा और गेट बन्द करके गाड़ी के गेट के शीशे नीचे की हुई खिड़की में से कहा—“अच्छा, फिर मिलेंगे.”

कृतिका—“हाँ, जरूर. तुम वहाँ किराये पर रहते हो ना ?”

सुदर्शन—“हाँ, मैं हनुमानगढ़ का रहने वाला हूँ. साढ़े चार साल से यहाँ जॉब कर रहा हूँ. पहले दो साल तक तो हर चार–छः महिने में किराये के कमरे बदलता रहा. फिर एक जान–पहचान वाले ने इस बिल्डिंग के मालिक से मिलाया. इस बिल्डिंग के मालिक ने कहा, मेरी इस बिल्डिंग में चार फ्लेट हैं. जब तक चारों फ्लेट बिक नहीं जाते, तब तक आराम से रहो. किराये के दो हजार रुपये दे देना, आपका किराया कम लगेगा और मेरे पूरी बिल्डिंग की देखभाल हो जाएगी. तब से दो साल हो गए, यहीं रहता हूँ.”

कृतिका—“ओके, मैं अक्सर इधर से गुजरती हूँ. अब पहचान तो हो ही गई हैं. अगर कभी आते–जाते मिल जाएँ, तो हाल–चाल तो पूछ ही सकते हैं.”

सुदर्शन—“हाँ–हाँ, बिल्कुल. अच्छा अब मैं चलता हूँ.”

कृतिका—“ठीक हैं.”

सुदर्शन गाड़ी से दूर हुआ और कृतिका गाड़ी के गेट का शीशा ऊपर करके गाड़ी चलाकर आगे चली गई.

सुदर्शन मुस्कुराता हुआ अपनी बिल्डिंग की तरफ़ चला गया.



चार दिन बाद आठ अप्रेल, शनिवार की रात को पौने आठ बजे जयसिंह केबिन में अपनी चेयर पर बैठे सामने रखे कम्प्यूटर में कुछ काम पूरा करने के बाद अपनी चेयर से उठकर केबिन से बाहर आए.

सुदर्शन अपने टेबल की कुर्सी पर बैठा स्टोन(नगीने या किमती पत्थर) चैक कर रहा था.

जयसिंह—“सुदर्शन, मैं ऊपर जा रहा हूँ. तुम ये काम कर लेना.”

सुदर्शन—“ठीक हैं.”

जयसिंह बेसमेंट से सीढिया चढ़ते हुए ऊपर आए. किचन में सुजाता खाना बनाने की तैयारी कर रही थी.

जयसिंह ने किचन में आकर सुजाता के पीछे खड़े होकर सुजाता की कमर पर हाथ डालते हुए सुजाता को पेट से पकड़ के अपने पास खींचा और सुजाता के गाल पर अपना गाल मलते हुए मुस्कुराकर कहा—“क्या बना रही हो ?”

सुजाता अपना गाल दूर करके मुस्कुराकर डांटते हुए बोली—“कुछ तो शर्म करो. बच्चे तीन दिन के लिए घर पर नहीं हैं, लेकिन नीचे सुदर्शन बैठा हैं. वो पहले भी कई बार हमें देख चुका हैं. पता नहीं, क्या सोचता होगा, हमारे बारे में ?”

जयसिंह सुजाता का गाल चूमकर बोले—“क्या सोचता होगा ? यहीं सोचता होगा, शादी के चौबीस(24) साल बाद भी सेठ जी और मैडम एक–दूसरे से बहुत प्यार करते हैं. और फिर अपनी पत्नी से प्यार करने में कैसी शर्म ?”

सुजाता खुद को जयसिंह से छुड़ाकर जयसिंह को पीछे करते हुए बोली—“हाँ, ठीक हैं. लेकिन अभी बाहर जाओ.”

जयसिंह—“अरे–अरे.”

सुजाता ने मुड़कर जयसिंह को किचन से बाहर धकेलते हुए कहा—“अरे–अरे, कुछ नहीं. अभी बाहर बैठो और मुझे खाना बनाने दो. सुदर्शन के जाने के बाद बैडरूम में जितना मरजी प्यार करना.”

जयसिंह सोफे की तरफ जाते हुए बोले—“कोई बात नहीं. बना लो खाना. बैडरूम में आओ, फिर देखता हूँ तुम्हें.”

सुजाता मुस्कुराकर अपने किचन के काम में लग गई.

जयसिंह सोफे पर आकर बैठे और दो मिनट बाद खड़े होकर वापस किचन की तरफ आए.

जयसिंह किचन के दरवाजे पर खड़े होकर बोले—“अभी खाना बनाना शुरू थोड़े ही किया हैं ?”

सुजाता अपने किचन के काम में लगी हुई बोली—“क्या हुआ ? तुम्हारा कुछ खाने का मन हैं, तो बता दो. वहीं बना दूँगी.”

जयसिंह—“कुछ नहीं, खाना बनाना रहने दो. आज खाना बाहर खाते हैं.”

सुजाता ने हैरान होकर मुड़ते हुए कहा—“ये अचानक बाहर खाने का ख्याल कैसे आया ?”

जयसिंह—“अब आ गया तो आ गया. तुम जल्दी से तैयार हो जाओ. मैं सुदर्शन को भेज देता हूँ.”

जयसिंह सीढ़िया उतरकर नीचे बेसमेंट में आए और सुदर्शन को बोले—“सुदर्शन, ये कल कर लेना. यार ! आज हम खाने के लिए बाहर जा रहे हैं.”

सुदर्शन—“ठीक हैं.”

सुदर्शन खड़ा होकर टेबल पर रखा सामान समेटने लगा.

जयसिंह ने देर होती देखकर सुदर्शन से कहा—“ये सब टेबल पर ही पड़ा रहने दो. कल आकर कर लेना.”

सुदर्शन ने टेबल का सामान छोड़कर कहा—“ये भी सही हैं.”

जयसिंह ने अपना केबिन लॉक करके सुदर्शन को चाबी देकर कहा—“सारी लाईट बन्द करके ऑफ़िस लॉक कर दो.”

जयसिंह सीढ़िया चढ़कर ऊपर चले गए.

सुदर्शन सारी लाईटें बन्द करके सीढ़िया चढ़कर ऊपर आया और ऑफ़िस लॉक करके सोफे पर बैठे जयसिंह के पास आकर जयसिंह को चाबी दी.

सुदर्शन से चाबी लेकर जयसिंह ने कहा—“थोड़ी देर बैठ जाओ. मैडम तैयार होकर आ रही हैं, फिर साथ ही चलते हैं. तुम्हें छोड़ दूँगा.”

सुदर्शन जयसिंह के पास सोफे पर बैठ गया.

दस मिनट बाद बैडरूम का दरवाजा खोलकर सुजाता गले में दुप्पटा लपेटे हुए बन्द गले की घूटनों तक आने वाली कुरती और चूड़ीदार लेगिंग पहनकर बैडरूम से बाहर आई.

सुजाता को देखकर सुदर्शन के मन में ख्याल आया कि अगर कृतिका भी ऐसी होती तो कितना अच्छा होता. लेकिन वो तो बेवड़ी(शराबी) हैं. ऊपर से एक साल तक गर्लफ्रैंड बनकर सब कुछ कर चुकी हैं. छोड़ यार, अपने को क्या ? जिसके साथ उसकी शादी होगी, उसकी किस्मत फूटेगी.

जयसिंह और सुदर्शन सोफे से उठकर खड़े हुए.

जयसिंह आहे भरकर बोले—“हाए…क्या लग रही हो. बाहर जाना कैन्सल करके बैडरूम में चले ?”

सुजाता सांस भरकर मुँह फुलाते हुए बोली—“अरे, सुदर्शन खड़ा हैं. बोलने से पहले आस–पास देखकर सोच तो लिया करो, क्या बोल रहे हो और कहाँ बोल रहे हो ?”

जयसिंह ने सुदर्शन के कंधे पर हाथ रखकर कहा—“अरे यार… अच्छा सुदर्शन तुम बताओ. मैनें कुछ गलत कहा ?”

सुदर्शन मुँह से कुछ बोले बिना सिर्फ मुस्कुरा दिया.

जयसिंह—“लड़कियों की तरह शर्मा क्यों रहा हैं ? शर्माना छोड़कर बता, इतनी सुन्दर नारी सामने हो तो उसके साथ बैडरूम में जाने का मन करता हैं या नहीं करता ?”

सुजाता चलकर जयसिंह और सुदर्शन के पास आई और सुदर्शन के कंधे से जयसिंह का हाथ हटाकर खुद सुदर्शन के कंधे पर हाथ रखकर बोली—“चलो दूर हटो इससे. सुदर्शन में शर्म–लिहाज नाम की चीज हैं. इसे अपनी तरह बेशर्म मत बनाओ.”

जयसिंह हँसकर बोले—“इसमें बेशर्मी क्या हैं ? मैं अपनी पत्नी के साथ बैडरूम में जाने की बात कर रहा हूँ. किसी पराई नारी के साथ बैडरूम में जाने की बात थोड़े ही कही हैं. तुम तो ऐसे बोलकर रही हो, जैसे ये तो शादी के बाद अपनी पत्नी के साथ बैडरूम में जाएगा ही नहीं.”

सुजाता सुदर्शन के कंधे से हाथ हटाकर दोनों हाथ अपनी कमर पर रखते हुए बोली—“अब चलना हैं या यहाँ खड़े–खड़े बैडरूम–बैडरूम ही करोगे ?”

जयसिंह—“हाँ–हाँ, चलना क्यों नहीं हैं ?”

सुजाता—“हाँ तो चलिए ना फिर.”

सुजाता, सुदर्शन और जयसिंह घर से बाहर आए.

सुजाता ने अपने सैंडल पहनकर सुदर्शन से कहा—“सुदर्शन, तुम आ जाओ. वो लॉक कर देगें.”

सुदर्शन ने अपने जूते पहने और सुजाता के साथ चलते हुए बाहर गली में जाने लगा. गाड़ी में ड्राइवर के पास वाली अगली सीट पर सुजाता बैठ गई और गाड़ी की पिछली सीट पर सुदर्शन बैठ गया.

सुजाता ने कहा—“इनकी बातों पर ध्यान मत दिया करो. ये तो ऐसे ही मजाक में बोलते रहते हैं.”

जयसिंह ने घर के दरवाजे पर ताला लगाकर अपने जूते पहनकर घर के अन्दर की लाइट का स्वीच ऑफ किया और घर के मुख्य दरवाजे को बन्द करके गाड़ी की ड्राइविंग सीट पर आकर बैठ गए. जयसिंह गाड़ी स्टार्ट करके सुदर्शन को छोड़ने के लिए पहले आम्रपाली सर्किल की तरफ चल पड़े.

जयसिंह गाड़ी चलाते हुए अपना बचपन याद करके बोले—“सुजाता, मैनें तो आठ–दस साल की उम्र में ही तुमसे शादी करने का मन बना लिया था.”

सुजाता हँसकर बोली—“झूठे, इतना मत फेंको. पीछे बैठा सुदर्शन सुनेगा, तो हँसेगा. आठ–दस साल की उम्र में शादी की समझ थी तुम्हें, जो शादी करने का मन बना लिया था ?”

जयसिंह ने हँसकर कहा—“शादी की समझ नहीं थी. लेकिन फिल्मों और टीवी सीरियल में सुनता था, पति ने सारी रात बहुत तंग किया. पति रात भर सोने नहीं देता.”

सुजाता—“हाँ, तो ?”

जयसिंह—“तो तुम्हें याद होगा. बचपन में खेलते–खेलते हम बहुत बार एक–दूसरे के साथ लड़ते थे. तुम हर बार मुझे पीट देती थी और मैं रोने लगता था.”

सुजाता हँसकर बोली—“हाँ, लेकिन बाद में तुमसे सॉरी बोलकर तुम्हें मनाती भी तो थी और तुम हजार नखरे करने के बाद मानते थे.”

जयसिंह हँसकर बोले—“हाँ, बाबा, मनाती थी. तुम मनाती थी, तभी तो तुम्हारे जाने के बाद तुम्हारी बहुत याद आती थी और एक–एक दिन गिनकर मैं तुम्हारे वापस आने का इंतजार करता था. कई बार तुम्हारी बुआ और तुम्हारे भाईयों(बुआ के दो बेटे) से पूछता था, सुजाता कब आएँगी ? इस बार सुजाता आई क्यों नहीं ?”

सुजाता मुस्कुराते हुए बोली—“हम्म…मेरा भी यहीं हाल था. फिर ?”

जयसिंह—“फिर मैनें कई लोगों से पूछा, ये पति सारी रात पत्नी को तंग करते हैं, परेशान करते हैं. पति को कोई रोकता क्यों नहीं ? तो सबने कहा, पति को कोई नहीं रोक सकता. पति चाहे पत्नी को कितना भी परेशान करे, कितना भी तंग करे. और रात को तो बिल्कुल भी नहीं रोक सकते.”

सुजाता ने कहा—“फिर तुमने क्या सोचा ?”

जयसिंह—“ये बातें सुनकर उस वक्त आठ–दस साल की उम्र में मैनें सोचा. जैसे तुम मुझसे बड़ी हो, इसलिए मेरी पिटाई कर देती हो. इसी तरह सभी लड़के बचपन में किसी ना किसी लड़की से पिटते होगे. क्योंकि पति को कोई रोक नहीं सकता, इसलिए लड़के बड़े होकर शादी करके पति बन जाते हैं और फिर सारी रात पत्नी को तंग करके, पत्नी को परेशान करके बचपन की पिटाई का बदला लेते हैं. हमारे आस–पड़ौस के कई घरों में भी पति अपनी पत्नी की पिटाई करते थे, उनको देखकर मैं यहीं सोचता था, ये लोग अपने बचपन की पिटाई का बदला ले रहे हैं. लेकिन उस बचपन में पीटने वाली लड़की की शादी तो लड़के से पहले हो जाती हैं, इसलिए उसका बदला किसी दूसरी लड़की से लेते हैं. सभी लोग बहुत गलत करते हैं. पिटाई कोई और लड़की करती हैं और बदला किसी और लड़की से लेते हैं. शायद सब के सब अपने से बड़ी लड़की से डरते हैं. मैं ऐसा नहीं करुँगा. मैं तो सुजाता से ही शादी करुँगा और सुजाता से ही बचपन की पिटाई का हिसाब बराबर करुँगा.”

सुजाता खिलखिलाकर हँस पड़ी और अपनी हँसी रोककर बोली—“और आखिर तुमने मुझसे शादी कर ही ली. बचपन की पिटाई का हिसाब बराबर करने के लिए.”

जयसिंह—“अब तुम्हें तंग करके हिसाब तो बराबर करना ही था. ये तो तुम्हें पता ही हैं, मैं हिसाब का कितना पक्का हूँ.”

सुजाता—“हम्म…तुम वापस घर आओ आज. फिर मैं बताती हूँ तुम्हें, तंग करना किसको कहते हैं ?”

जयसिंह मुस्कुराते हुए बोले—“फिर तो आज बहुत मजा आएँगा. गिन–गिनकर एक–एक बात का हिसाब करेंगे.”

सुजाता मुस्कुराकर बोली—“चुप करो ! अभी तुम गाड़ी चलाओ चुपचाप.”

जयसिंह और सुजाता के बीच बातचीत करते हुए एक–दूसरे को छेड़ना–चिढ़ाना चलता रहा. कभी–कभी सुजाता भी सुदर्शन की परवाह छोड़कर जयसिंह को छेड़ने और चिढ़ाने लगती. गाड़ी में पिछली सीट पर बैठा सुदर्शन चुपचाप जयसिंह और सुजाता की बातें सुनता रहा.

आम्रपाली सर्किल पर आकर जयसिंह ने गाड़ी रोकी.

सुदर्शन ने गाड़ी का लेफ्ट साइड वाला दरवाजा खोला और गाड़ी से निकलकर बोला—“ठीक हैं, सेठ जी.”

जयसिंह—“हाँ, ठीक हैं. कल आराम से आ जाना, बारह–एक बजे तक.”

सुदर्शन—“ये भी सही हैं.”

सुदर्शन अपनी बिल्डिंग की तरफ चल पड़ा और मुस्कुराते हुए मन में कहने लगा कि सेठ जी और मैडम के हाव–भाव देखकर लग रहा हैं, सेठ जी और मैडम आज सारी रात जागेगें और कल सुबह दोपहर तक सोयेगें. वरना हमेशा तो कहते हैं, सुबह जल्दी आना. और आज कह रहे हैं, बारह–एक बजे तक आराम से आना. ये भी सही हैं. सेठ जी ना मोटे, ना पतले, गोरे रंग के स्मार्ट और हैंडसम बिना दाढ़ी–मूँछ के क्लीन शेव चेहरे वाले अच्छे शरीर के मालिक और मैडम कसावट भरे गोल–मटोल सेहतमंद और तंदरुस्त अच्छे खूबसूरत शरीर की मालकिन. मैडम के चेहरे पर ऐसी रौनक और ऐसा तेज हैं, जैसे कोई देवी हो. सेठ जी और मैडम की शादी भी बहुत मुश्किल से हुई थी. जब रिश्ता मुश्किल से बनता हैं, तो उस रिश्ते की कदर भी ज्यादा होती हैं. और फिर इनको भी खुश होने का पूरा अधिकार हैं. आखिर दोनों पति–पत्नी हैं, कुछ गलत थोड़े ही कर रहे हैं.

जयसिंह गाड़ी आगे चलाने लगे, तभी सुजाता ने कहा—“अरे, रूको.”

जयसिंह गाड़ी रोककर बोले—“क्या हुआ ?”

सुजाता—“सुदर्शन चार साल से हमारे पास काम कर रहा हैं. लड़का भी बहुत अच्छा हैं. रात को देर तक ऑफ़िस में काम करता हैं. संडे को छुट्टी के दिन भी आता हैं. हमारे किसी काम के लिए कभी मना नहीं करता. तो कभी तुम भी उसके बारे में सोच लिया करो.”

जयसिंह—“काम के बदले पैसे देता तो हूँ. रात के ऑवर–टाइम के अलग से पैसे देता हूँ, संडे के अलग से पैसे देता हूँ. अब और क्या सोचूँ ?”

सुजाता—“उफ्फ ! अरे, कल छुट्टी दे देते ना उसे. वो भी थोड़ा घूम–फिर लेगा. उसका भी मन बहल जाएगा. यहाँ अकैला रहता हैं. बस हमारा ऑफ़िस और घर. पता नहीं, मन कैसे लगता हैं उसका ?”

जयसिंह—“अरे, ये बात हैं क्या ? तो इसमें क्या प्रोब्लम हैं ? बोल देते हैं, कल मत आना.”

जयसिंह ने गाड़ी आगे बढ़ाई और सड़क पर जा रहे सुदर्शन के पास लाकर रोक दी. सुदर्शन जयसिंह की गाड़ी देखकर रूक गया.

सुजाता ने सुदर्शन से कहा—“सुदर्शन, इधर आना.”

सुदर्शन गाड़ी के पास आया.

जयसिंह ने कहा—“अरे, भई ! तुम्हारी मैडम कह रही हैं, सुदर्शन यहाँ अकैला रहता हैं. कभी उसके बारे में भी सोच लिया करो. कल उसे छुट्टी दे दो, वो भी थोड़ा घूम–फिर लेगा, उसका भी मन बहल जाएगा. तो कल तुम मत आना. परसो सोमवार को ही आ जाना.”

सुदर्शन—“ठीक हैं, सेठ जी.”

सुदर्शन जाने लगा.

सुजाता बोली—“सुदर्शन, रूको तो.”

सुदर्शन ने मुड़कर कहा—“जी, मैडम.”

सुजाता ने जयसिंह से कहा—“इसे कुछ दे तो दो.”

जयसिंह—“क्या दूँ ?”

सुजाता—“ओहो ! अपना पर्स दो.”

जयसिंह ने अपनी जेब से अपना पर्स निकाल कर सुजाता को दिया और सुजाता ने पर्स में से एक पाँच सौ का नोट निकालकर सुदर्शन से कहा—“इधर आना.”

सुदर्शन आगे आया.

सुजाता ने सुदर्शन को पाँच सौ रुपये का नोट देते हुए कहा—“ये लो. कल कहीं घूम–फिर लेना, कुछ खा–पी लेना. ठीक हैं.”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“लेकिन ये पैसे देने की क्या जरूरत हैं ? सेठ जी सैलरी देते तो हैं.”

सुजाता ने मुस्कुराकर कहा—“सेठ जी का हिसाब सेठ जी के साथ. ये मेरी तरफ से हैं. अगर तुम्हारी माँ तुम्हें जेबखर्च के लिए पैसे देती तो तुम मना करते क्या ?”

सुदर्शन ने जयसिंह की तरफ देखा. जयसिंह ने मुस्कुराकर अपनी पलकें झपकाई. सुदर्शन ने सुजाता की तरफ देखकर मुस्कुराते हुए पैसे ले लिए.

जयसिंह ने सुजाता से कहा—“अब चले.”

सुजाता—“हाँ, चलिए.”

जयसिंह गाड़ी चलाते हुए चल पड़े.

सुदर्शन उनकी जाती हुई गाड़ी को देखते हुए मुस्कुराकर मन में बोला कि ये मैडम भी यार………कभी–कभी इमोशनल कर देती हैं. इतने प्यार से बोलती हैं, कि जहर खाने को बोले, तब भी मना करना मुश्किल हैं. बहुत किस्मत वाले हो, सेठ जी. खूबसूरत पत्नी तो बहुत सारे लोगों को मिलती हैं. लेकिन आपकी पत्नी का दिल उनकी खूबसूरती से भी ज्यादा खूबसूरत हैं. मैडम की खूबसूरती के साथ–साथ कभी मैडम के खूबसूरत दिल की भी तारीफ कर दिया करो. लेकिन चलो, आप कम से कम मैडम की बुराई तो नहीं करते. वरना सौ(100) में से निनन्यानवे(99) पति अपनी पत्नी की बुराई ही करते हैं और उन निनन्यानवे(99) में से नब्बे(90) पति झूठी बुराई करते हैं. समझ में नहीं आता, ये लोग हमेशा अपनी पत्नी को कोसते क्यों हैं ? पहले तो नारियों के पीछे भागते हैं, फिर वहीं नारी जब मिल जाती हैं, तो बुराई करते हैं. बेकार लोग. खैर, इन्सान के पास जो होता हैं, इन्सान उसकी कदर नहीं करता. लेकिन सेठ जी तो मैडम की इज्जत बहुत करते हैं.

जयसिंह की गाड़ी नजरों से ओझल होने के बाद सुदर्शन अपनी बिल्डिंग की तरफ चला गया.

गाड़ी चलाते हुए जयसिंह ने सुजाता से कहा—“तुम्हें सुदर्शन को पाँच सौ रुपये देने की क्या जरूरत थी ? नहीं देते तो भी चल जाता. फिर भी अगर देने ही थे, तो सौ–पचास दे देती, वो भी बहुत थे.”

सुजाता—“ओहो, बहुत दिनों बाद तुमने आज बाहर डिनर के लिए कहा. हम दोनों इतने खुश हैं. खुशी में मैनें उसे पाँच सौ रुपये दे दिये, तो कौनसा बड़ा नुकसान हो गया ?”

जयसिंह—“अरे, तुम गलत समझ रही हो. नुकसान कुछ नहीं हुआ, मगर ऐसे पैसे देने से आदत पड़ जाती हैं. अब कल को मैं खुश होकर उसे सौ–पचास रुपये दूँगा, तो वो पाँच सौ की उम्मीद करेगा. मैडम ने तो पाँच सौ रुपये दिये थे, सेठ जी सौ–पचास रुपये से ऊपर ही नहीं उठते.”

सुजाता ने हँसकर कहा—“तुम भी ना. हर बात में बिजनेस करना नहीं छोड़ते. खुश होकर पैसे भी हिसाब लगाकर देते हो, फिर बोलते हो, लोग मुझे कन्जुस क्यों कहते हैं ?”

जयसिंह ने मुस्कुराकर कहा—“चलो, हम कन्जुस ही सही. तुम पाँच सौ–पाँच सौ देकर तारीफ बटोरती रहो. लोग दानवीर कर्ण की जगह दानवीर सुजाता बोलने लगेगे.”

सुजाता ने खिलखिलाकर हँसते हुए कहा—“तो तुम्हें मेरी तारीफ से जलन क्यों हो रही हैं ?”

जयसिंह—“जलन तो होगी ही. कहीं तुमने खुद की तारीफें सुनकर मुझे भाव देना बन्द कर दिया तो ?”

सुजाता—“फिर तो अगली बार सुदर्शन को हजार रुपये दूँगी. तुम्हें और ज्यादा जलाने के लिए.”

जयसिंह—“हाँ, देती रहो. वसूल भी तुमसे ही करुँगा, वो भी सूत समेत.”

सुजाता—“हाँ, मैं भी देखती हूँ. कैसे वसूल करते हो ?”

जयसिंह मुस्कुराकर बोले—“अभी डिनर के बाद घर वापस आकर देख लेना. जब हमेशा की तरह तुम्हें सारी रात सोने नहीं दूँगा.”

सुजाता ने मुस्कुराकर कहा—“ओह…ये तो डिनर के बाद घर आकर ही देखेगे. हमेशा की तरह कौन, किसको सोने नहीं देगा ?”

जयसिंह ने मुस्कुराकर कहा—“अच्छा…ये बात हैं.”

सुजाता मुस्कुराते हुए बोली—“हम्म………इसलिए तो सुदर्शन को कल छुट्टी दिलवाई हैं. ताकि हम दोनों प्यार करते हुए डिस्टर्ब ना हो.”

जयसिंह—“ओहो…ये तो मैनें सोचा ही नहीं.”

सुजाता—“तुम्हीं तो हर वक्त मौका ढूंढते रहते हो. मैनें सोचा, बच्चे तो मन्डे को शाम तक आएँगे. सुदर्शन को छुट्टी दे देते हैं. वो भी एक दिन घूम–फिर लेगा और मैं भी देखती हूँ, तुम कैसे बचपन का हिसाब बराबर करते हो ?”

जयसिंह—“तुमने तो दिल की बेकरारी और ज्यादा बढ़ा दी.”

सुजाता खिलखिलाकर हँसते हुए बोली—“हाँ, लेकिन अभी सामने देखकर गाड़ी चलाओ.”

जयसिंह ने एक हाथ सुजाता के हाथ पर रखकर कहा—“आई लव यू, सुजाता.”

सुजाता ने अपना दूसरा हाथ जयसिंह के हाथ पर रखकर कहा—“लव यू टू, जय.”

जयसिंह और सुजाता दोनों मुस्कुराते हुए सामने देखने लगे. जयसिंह अपना हाथ सुजाता के हाथ से हटाकर वापस गाड़ी के हैंडल पर ले आए और गाड़ी चलाते हुए जयसिंह ने एक रेस्टोरेन्ट की पार्किंग में आकर गाड़ी रोककर बन्द कर दी.

जयसिंह और सुजाता गाड़ी से उतरकर रेस्टोंरेन्ट में आए और एक टेबल पर बैठ गए.

जयसिंह ने कहा—“तो बताओ, क्या खाओगी ?”

सुजाता—“जो तुम खिलाना चाहो. तुम डिनर पर लाए हो, इसलिए आज तुम्हारी पसन्द.”

जयसिंह—“अच्छा, आज मेरी पसन्द ?”

सुजाता—“हाँ, तुम भी क्या याद करोगे ? तुम्हें तुम्हारी पसन्द से चलने वाली घरवाली मिली हैं.”

जयसिंह—“और हर वक्त जो तुम मुझ पर ऑर्डर चलाती हो वो ?”

सुजाता हँसकर बोली—“अब प्यार में इतना अधिकार तो होता ही हैं.”

जयसिंह ने मुस्कुराते हुए कहा—“चलो, जब बात प्यार की हैं, तो ठीक हैं.”

दो वेटर जयसिंह और सुजाता के पास ऑर्डर लेने के लिए आए.

जयसिंह ने सुजाता की पसन्द से खाने का ऑर्डर दिया.

पाँच मिनट बाद तीन वेटर खाना ले आए और टेबल पर लगा दिया.

जयसिंह और सुजाता मुस्कुराते हुए खाना खाने लगे.

जयसिंह खाना खाते हुए रोमांटिक होकर सुजाता के साथ बातें करते हुए सुजाता को छेड़कर चिढ़ाने लगे. सुजाता भी रोमांटिक होकर खुलकर जयसिंह की हर बात का जवाब देने लगी.

खाना खाने के पन्द्रह मिनट बाद जयसिंह ने सुजाता की पसन्द से दो आइसक्रीम मँगाई.

आइसक्रीम खाने के बाद जयसिंह ने वेटर को बुलाकर बिल मँगाया.

बिल देकर जयसिंह और सुजाता टेबल से उठे और रेस्टोंरेन्ट से बाहर आकर एक–दूसरे के हाथों में हाथ डाले रोड़ पर घूमते हुए रोमांस की बातें करने लगे.

रात के साढ़े दस बजे सुजाता ने कहा—“अब घर चले, बहुत हो गया सड़क पर रोमांस.”

जयसिंह—“चलते हैं, इतनी भी क्या जल्दी हैं ? देखो तो सही, आज मौसम भी कितना रोमांटिक हैं.”

सुजाता—“हाँ, दिख रहा हैं. लेकिन अब आस–पास सिर्फ यंगस्टर रह गए हैं. हमारी उम्र के सब कपल अपने–अपने घर चले गए.”

जयसिंह—“तो क्या हुआ ? जब तुम गाड़ी में बोल रही थी, तुम वापस घर आओ आज. फिर बताती हूँ, तंग करना किसको कहते हैं ? उस वक्त गाड़ी में पीछे बैठा सुदर्शन यंगस्टर नहीं था क्या ?”

सुजाता—“अरे, सुदर्शन की बात अलग हैं. वो बहुत अच्छा और समझदार लड़का हैं. उसे पता हैं, हम पति–पत्नी हैं और वो हमारे प्यार को भी समझता हैं.”

जयसिंह—“हम्म…और ये बाकि सब बेवकूफ हैं ?”

सुजाता ने हँसकर कहा—“इतना तो मुझे नहीं पता. लेकिन सुदर्शन हमारी बहुत इज्जत करता हैं. वो हमारे बारे में कुछ भी ऐसा–वैसा नहीं सोचेगा. अब इन सबका हमें क्या पता ? कौन कैसा हैं ? कौन क्या सोच रहा हैं ?”

जयसिंह ने मुस्कुराकर कहा—“हाँ–हाँ, मैं सब समझता हूँ. इसलिए तो मैं सुदर्शन के इलावा स्टाफ में किसी और को ज्यादा मुँह नहीं लगाता. मुझे सुदर्शन के सिवा बाकि लोगों से काम के इलावा कोई दूसरी बात करते देखा हैं तुमने ?”

सुजाता—“नहीं.”

जयसिंह—“अच्छा, चलो चलते हैं. अब यहाँ सिर्फ शराब पीने वाले ही घूम रहे हैं.”

सुजाता ने हँसकर कहा—“हाँ, चलिए. इसलिए तो कहा मैनें. कहीं हमें भी सुदर्शन की तरह साँवरमल जी की बेटी जैसी कोई प्रेम–दीवानी या कोई प्रेम–दीवाना ना मिल जाए.”

जयसिंह ने हँसकर कहा—“हाँ, चलो.”

जयसिंह और सुजाता वापस रेस्टोरेन्ट की पार्किंग की तरफ चल पड़े और गाड़ी में आकर बैठे. जयसिंह ने गाड़ी स्टार्ट करके पार्किंग से निकाली और अपने घर की तरफ़ चल पड़े.

रात के सवा ग्यारह बजे जयसिंह ने गाड़ी अपने घर के सामने लाकर रोककर बन्द कर दी.

जयसिंह ने रात के समय घर की निगरानी के लिए बहादुर नाम का एक नेपाली चौकीदार रखा हुआ हैं. बहादुर रात को दस बजे आता हैं और सुबह छः बजे तक घर की पहरेदारी करता हैं.

जयसिंह की गाड़ी रूकते ही उम्र में चालीस(40) साल का बहादुर अपनी कुर्सी से उठा और उसने घर का मुख्य दरवाजा खोला. जयसिंह और सुजाता गाड़ी से उतरकर आए. बहादुर ने उनको सल्यूट किया.

जयसिंह—“और बहादुर, सब ठीक हैं ?”

बहादुर—“हाँ, शाब.”

जयसिंह और सुजाता अन्दर आए और जयसिंह घर के अन्दर की लाइट का स्वीच ऑन करके ताला खोलने लगे. बहादुर ने बाहर का मुख्य गेट बन्द किया और अपनी कुर्सी पर बैठ गया.

जयसिंह घर का दरवाजा खोलकर अन्दर आए और अपने जूते निकालने लगे. सुजाता दरवाजा अन्दर से बन्द करने लगी. जयसिंह दरवाजे के पास जूते निकालकर बैडरूम में आए. जयसिंह ने अपना कोट(ऑफ़िस में पहनने वाला) उतारकर दीवार में लगी खूँटी पर टांग दिया और अपनी जेबो से मोबाइल, पर्स वगैरह निकालकर बैड के पास रखे हुए टेबल पर रखकर बॉथरूम में चले गए.

सुजाता दरवाजे के पास अपनी सैंडल निकालकर हॉल की लाइट बन्द करके बैडरूम में आई और अपना दुपट्टा निकालकर आईने के पास टांग कर बैड पर बैठ गई.

जयसिंह बॉथरूम से बाहर आए और तौलिए से हाथ–मुँह पोंछने लगे. सुजाता बैड से उठकर बॉथरूम में चली गई.

जयसिंह हाथ–मुँह पोंछकर तौलिया रखकर बैडरूम में रखे म्यूजिक प्लेयर के पास आए और म्यूजिक प्लेयर ऑन करके गाने सलेक्ट करने लगे.

सुजाता बॉथरूम से बाहर आई और तौलिया उठाकर आईने के सामने खड़ी होकर हाथ–मुँह पोंछने लगी.

जयसिंह ने कई रोमांटिक गाने सुनकर सलेक्ट करने के बाद रोमांटिक गानों का एक नया फोल्डर बनाकर मध्यम आवाज़ में गाने चला दिये.

गाना शुरू होने के बाद जयसिंह बैड पर आकर बैठ गए और बैड की तरफ पीठ करके आईने के सामने खड़ी होकर तौलिए से हाथ–मुँह पोंछ रही सुजाता को प्यार भरी हसरत से निहारने लगे.

म्यूजिक प्लेयर में गाना बजने लगा.

चन्दन सा बदन, चंचल चितवन,
धीरे से तेरा ये मुस्काना,
मुझे दोष न देना जगवालों,
हो जाऊं अगर मैं दीवाना,
(हो जाए अगर दिल  दीवाना)

ये काम कमान भंवे तेरी,
पलकों के किनारे कजरारे,
माथे पर सिंदूरी सूरज,
होंठों पे दहकते अंगारे,
साया भी जो तेरा पड़ जाए,
आबाद हो दिल का वीराना,

चन्दन सा बदन...

तन भी सुन्दर, मन भी सुन्दर,
तू सुन्दरता की मूरत हैं,
किसी और को शायद कम होगी,
मुझे तेरी बहुत जरुरत हैं,
पहले भी बहुत मैं तरसा हूँ,
(दिल तरसा हैं)
तू और ना दिल को तरसाना,

चन्दन सा बदन...

ये विशाल नयन, जैसे नील गगन,
पंछी की तरह खो जाऊ मैं,
सिरहाना जो हो तेरी बाहों का,
अंगारों पे सो जाऊं मैं,
मेरा बैरागी मन डोल गया,
देखी जो अदा तेरी मस्ताना,

चन्दन सा बदन...

सुजाता ने हाथ–मुँह पोंछने के बाद तौलिया साइड में रखा और अपने हाथों से चूड़ियाँ, कानों से ईयर रिंग और गले से मंगलसुत्र निकालकर आईने के सामने रखकर अपने सर के बाल खोलते हुए मुड़कर जयसिंह के सामने आकर खड़ी हुई. जयसिंह ने बैड से खड़े होकर अपनी शर्ट और बनियान निकालकर बैड के कोने पर डाल दी.

सुजाता और जयसिंह एक–दूसरे की तरफ बढ़े और आमने–सामने खड़े होकर एक–दूसरे को निहारने लगे. जयसिंह के हाथ सुजाता के कंधो से होते हुए सुजाता की कमर पर गए और सुजाता के हाथ जयसिंह के कंधों पर चले गए.

जयसिंह सुजाता की आँखों में देखते हुए प्यार भरी मुस्कुराहट के साथ बोले—“हाँ, तो रास्ते में क्या कह रही थी ? अब देखते हैं, कौन, किसको सोने नहीं देता ?”

सुजाता जयसिंह की नजरों से नजर मिलाकर प्यार से मुस्कुराते हुए बोली—“हाँ, बिल्कुल. आज और कल सो कर दिखाओ, तो जानू ?”

जयसिंह बेकाबू होते हुए बोले—“इन हसींन रातों में जागकर तुमसे प्यार करने की जगह सो कैसे जाऊँ ? मैं तो तुम्हें कल दिन में भी नहीं छोड़ने वाला.”

सुजाता बेसब्र होते हुए बोली—“तो मैं कौनसी तुम्हें छोड़ने वाली हूँ. शादी के चौबीस साल बाद भी तुम्हारे लिए उतनी ही दीवानी हूँ.”

जयसिंह मदहोश होते हुए बोले—“तुम्हारे लिए मेरा पागलपन भी बिल्कुल वैसा ही हैं और हो भी क्यों ना ? भूल गई. बहुत मुश्किलों से तुम्हें पाया था.”

सुजाता भावूक होकर बोली—“मुझे सब याद हैं. मैं भी बहुत तड़पी थी, तुम्हें पाने के लिए. मेरी तो सारी उम्मीद ही टूट गई थी, जब तुम किसी और के हो गए थे.”

जयसिंह जज़्बाती होकर बोले—“मैं भी बहुत रोया था, तुम्हारे लिए. जब तुम मुझे झूठा, धोखेबाज, फरेबी, बेवफा बोलकर गई थी.”

सुजाता अफ़सोस जताते हुए बोली—“एम सॉरी, जय. मुझे माफ़ कर दो. उस वक्त तुम्हारा दूर जाना, मैं सहन नहीं कर पाई. मैं टूटकर बिखर गई थी.”

जयसिंह ने कहा—“नहीं सुजाता, तुम माफ़ी मत माँगो. अगर तुम वो सब नहीं कहती, तो शायद हम कभी मिल नहीं पाते.”

सुजाता—“हमारा प्यार सच्चा हैं, जय. जब प्यार में सच्चाई और गहराई हो, तो प्यार करने वालों का मिलन जरूर होता हैं.”

जयसिंह—“सही कहा, तुमने. आखिर में हमारा मिलन भी हो ही गया.”

सुजाता ने जयसिंह के गाल पर हाथ रखकर मुस्कुराते हुए कहा—“हाँ, अब आओ. आज फिर एक–दूसरे में मिलकर प्यार में डूब जाए.”

जयसिंह सुजाता को अपने करीब लाते हुए मुस्कुराकर बोले—“हाँ आओ, एक–दूसरे में समाकर प्यार के सिवा हमारे बीच कुछ भी बाकि ना रहने दें.”

जयसिंह और सुजाता ने एक–दूसरे को अपनी तरफ खींचा और एक–दूसरे के होंठो को अपने होंठो में दबाकर एक–दूसरे से लिपटकर दोनों चुम्बनमगन होकर एक–दूसरे के होठों का रसपान करने लगे.

म्यूजिक प्लेयर में अगला गाना शुरू हो गया.

नारी—होटों पे बस, तेरा नाम हैं,
तुझे चाहना, मेरा काम हैं,
तेरे प्यार मे पागल हूँ मैं सुभ-ओ-श्याम,
जानम ! आई लव यू, यू लव मी.

पुरुष—होटों पे बस, तेरा नाम हैं,
तुझे चाहना, मेरा काम हैं,
तेरे प्यार मे पागल हूँ मैं सुभ-ओ-श्याम,
जानम ! आई लव यू, यू लव मी.

नारी—ये रात सोयी, हैं खोयी खोयी,
अरमान मेरे, हैं जागे जागे,
ये क्या मुझे हो गया…

पुरुष—जुल्फों के साए, चिलमन बनाए,
आ मैं दीवानी, इनको हटा दूँ,
देखूँ तेरा चेहरा…

नारी—दीवानगी, का जाम हैं,
तू इश्क का, इनाम हैं,

पुरुष—तेरे प्यार में पागल हूँ मैं सुभ-ओ-श्याम,

नारी—जानम ! आई लव यू, यू लव मी.

पुरुष—जानम ! आई लव यू, यू लव मी.

नारी—ठंडी हवाएँ, जादू जगायें,
मेरी निगाहें, हैं प्यासी प्यासी,
छाने लगा हैं नशा…

पुरुष—ये गोरी बाहें, तुझको बुलायें,
आजा मिटा दूँ, दूरी ज़रा सी,
हो न कोई फासला…

नारी—दिल का यहीं, पैगाम हैं,
तू चैन हैं, आराम हैं,

पुरुष—तेरे प्यार में पागल हूँ मैं सुभ-ओ-श्याम,

नारी—जानम ! आई लव यू, यू लव मी.

पुरुष—“जानम ! आई लव यू, यू लव मी.

नारी—होटों पे बस, तेरा नाम हैं,

पुरुष—तुझे चाहना, मेरा काम हैं,

नारी–पुरुष का सम्मिलित स्वर—तेरे प्यार में पागल हूँ मैं सुभ-ओ-श्याम…

नारी—जानम आई लव यू, यू लव मी....

पुरुष—जानम ! आई लव यू, यू लव मी.

नारी—जानम ! आई लव यू, यू लव मी.

जयसिंह कामात्तुर होकर एक हाथ सुजाता के गाल पर रखकर सुजाता के दूसरे गाल पर अपना गाल मलते हुए बोले—“आई लव यू, सुजाता.”

सुजाता कामात्तुर होकर एक हाथ से जयसिंह के सर के बाल पकड़कर जयसिंह की सांसों से सांस मिलाते हुए बोली—“लव यू टू, जय.”

सुजाता और जयसिंह एक–दूसरे को अपनी बाहों में भरकर कसते हुए दोनों आलिंगनबद्ध अवस्था में धिरे–धिरे बैड पर आ गए. दोनों के बीच प्यार भरी कुश्ती शुरू हो गई. तन के कपड़े एक–एक करके तन से अलग होकर फर्श पर गिर गए. एक–दूसरे के चुम्बन और आलिंगन से दोनों के जिस्मों में गर्माहट बढ़ने लगी. एक–दूसरे के शरीर को सहलाते हुए दोनों के मुँह से कभी सिसकियाँ और कभी आहें निकलने लगी. दोनों पर छाए चाहत के मौसम में दोनों के प्यार भरे मिलन में शरीर से शरीर टकराने की आवाज बार–बार बैडरूम में गुँजने लगी. दोनों की बढ़ी हुई धड़कनों के साथ इश्क की बिखरती खुशबू में दोनों की सांसें तेज–तेज चलने लगी. दोनों पर बरस रही मोहब्बत की मूसलाधार बरसात ने एयरकंडीशर बैडरूम में भी दोनों को पसीने से भीगो दिया.

सुजाता और जयसिंह बैडरूम के संगीतमय वातावरण में एक–दूसरे का साथ निभाते हुए एक–दूसरे को पति–पत्नी के मधुर मिलन का असीम प्रेम–आनन्द देने के लिए रुक–रुककर सुजाता और जयसिंह बार–बार एक–दूसरे में उलझकर प्यार के समुन्दर में डूबकियाँ लगाते रहें.

म्यूजिक प्लेयर में जयसिंह के लगाए हुए रोमाटिंक गाने एक के बाद एक बजते रहे.

यार को मैनें, मुझे यार ने,
सोने ना दिया,
यार को मैनें, मुझे यार ने,
सोने ना दिया,

प्यार ही प्यार किया, प्यार ने सोने ना दिया,

उसकी चूड़ियों की खनक उसकी,
वो बिंदिया की चमक.
उसकी चूड़ियों की खनक उसकी,
वो बिंदिया की चमक.

हाय कजरे की गजब धार ने,
सोने ना दिया,
प्यार ही प्यार किया, प्यार ने सोने ना दिया,

यार को मैनें, मुझे यार ने,
सोने ना दिया,

उसकी अंगड़ाई ने, क्या–क्या क्यामत ढाई,
धड़कन की बढ़ी रफ्तार ने सोने ना दिया,

प्यार ही प्यार किया ओ…
प्यार ही प्यार किया ओ…
प्यार ने सोने ना दिया,

यार को मैनें, मुझे यार ने सोने ना दिया…

सारी रात जयसिंह ने सुजाता को सोने नहीं दिया और सुजाता ने जयसिंह को सोने नहीं दिया. एक–दूसरे में समाकर सारी रात सुजाता और जयसिंह ने एक–दूसरे से बेशुमार प्यार किया.

सुबह के साढ़े चार बजे एक–दूसरे से तन का भरपूर सुख पाकर एक–दूसरे को पूरी तरह संतुष्ट करके शान्त होने के बाद सुजाता के ऊपर लेटे हुए जयसिंह के पैरों में अपने पैर उलझाए सुजाता जयसिंह के आगोश में सुजाता जयसिंह को अपनी बाहों में समेटकर सीने से लगाए हुए सुजाता जयसिंह की पीठ पर हाथ डाले जयसिंह के नीचे लेटी हुई सुजाता के होंठो से लगे हुए जयसिंह के होंठो के बीच चुम्बन चल रहा था.

म्यूजिक प्लेयर में गाना चल रहा था.

तुम मिले, दिल खिले,
और जीने को क्या चाहिए…
ना हो तू उदास, तेरे पास पास,
मैं रहूँगा ज़िन्दगी भर.
सारे संसार का प्यार मैने तुझी में पाया,

तुम मिले, दिल खिले,
और जीने को क्या चाहिए

हा तुम मिले, दिल खिले,
और जीने को क्या चाहिए,

चंदा तुझे, ओ…ओ…ओह देखने को निकला करता हैं,
आइना भी, ओ…ओ…ओह दीदार को तरसा करता हैं

इतनी हँसीं कोई नहीं,
इतनी हँसीं कोई नहीं,
हुस्न दोनों जहाँ का एक तुझ में सिमट के आया,
तुम मिले, दिल खिले,
और जीने को क्या चाहिए,

डार्लिंग, एवरी ब्रेथ यू टेक,
एवरी मूव यू मेक,
आई विल बे देयर विथ यू,
वॉट विल आई डू विथआउट यू,
आई वेंट टू लव यू,
फोरेवर एंड एवर एंड एवर,

प्यार कभी, हो…हो…हो मरता नहीं, हम तुम मरते हैं,
होते हैं वो, हो…हो…हो लोग अमर प्यार जो करते हैं,

जितनी अदा, उतनी वफ़ा…
एक नज़र प्यार से देख लो फिर से जिंदा कर दो,
तुम मिले, दिल खिले,
और जीने को क्या चाहिए,

हा तुम मिले, दिल खिले,
और जीने को क्या चाहिए,
ना हो तू उदास, तेरे पास पास
मैं रहूँगी ज़िन्दगी भर.

ना हो तू उदास, तेरे पास पास मैं रहूँगा ज़िन्दगी भर.
सारे संसार का प्यार मैनें तुझी में पाया,
तुम मिले, दिल खिले,
और जीने को क्या चाहिए,

सुजाता के होंठ जयसिंह के होंठ से अलग हुए.

जयसिंह सुजाता के गाल पर अपना गाल रखकर संतुष्टीपूर्ण ठंडी आह भरते हुए बोले—“तुमसे प्यार करके मेरी आत्मा तृप्त हो जाती हैं. सुजाता, आई लव यू.”

सुजाता अपना एक हाथ जयसिंह के सर पर ले जाकर जयसिंह के बालो में ऊँगलियाँ फिराते हुए सुकून भरी आवाज़ में बोली—“लव यू टू, जय. मेरी आत्मा तो सिर्फ तुमसे प्यार करके ही तृप्त होती हैं.”

सुजाता और जयसिंह मुस्कुराते हुए एक–दूसरे का चेहरा निहारने लगे. दोनों के प्यारभरे अनुपम मिलन के बाद दोनों के चेहरों पर पहले से भी ज्यादा अदभूत रौनक आ गई. एक–दूसरे को प्यार करके असीम प्रेम–सुख अनुभव करते हुए दोनों के चेहरों का तेज अद्वितीय हो गया.

सुजाता जयसिंह के चेहरे को निहारती हुई मुस्कुराकर जयसिंह के माथे को चूमकर मुस्कुराई. जयसिंह ने मुस्कुराकर अपने होंठ सुजाता के होंठ से लगा दिये. सुजाता और जयसिंह एक–दूसरे से लिपटे हुए करवट बदलकर आमने–सामने होकर बराबर में लेटे और एक–दूसरे में समाकर सो गए.

सुबह के साढ़े पाँच बजे रविवार का सूरज निकल आया.

सुदर्शन रोज सुबह सात बजे से आठ बजे के बीच उठता हैं. लेकिन आज सुबह छः बजे जागकर भी, ऑफ़िस नहीं जाना था, इसलिए सुबह के नौ बजे तक बिस्तर में ही लेटा हुआ था. सुदर्शन को बार–बार कृतिका याद आ रही थी.

सुबह के नौ बजे सुदर्शन बिस्तर से निकला और नहा–धोकर तैयार होने के बाद छोटे आईने(दस–बारह इंच वाला) के सामने खड़ा होकर बाल बाते हुए सोचने लगा कि ऑफ़िस से तो मैडम ने आज की छुट्टी दिलवा दी. पाँच सौ रुपये देकर नुकसान भी नहीं होने दिया. अब घूमने–फिरने कहाँ जाए ? हम्म………(मुस्कुराकर) कृतिका से मिलकर आते, लेकिन नम्बर तो लिया नहीं. लेकिन चल घर तो पता ही हैं. उसके घर के पास चलते हैं. घर से अन्दर–बाहर आते–जाते मिल जाएगी.

सुदर्शन ने बाल बा कर कंगा रखकर जूते पहने और फ्लेट से बाहर आकर फ्लेट लॉक करके सीढ़िया उतरते हुए नीचे आकर बिल्डिंग लॉक करके पैदल चलते हुए बस स्टॉप पर आया. कुछ देर बाद बस आकर रूकी. सुदर्शन बस में चढ़ गया और बस चल पड़ी.

कृतिका सुबह के दस बजे अपने घर की छत पर खड़ी सुदर्शन के साथ हुई दोनों मुलाकात याद करके सोच रही थी कि ये लड़का मुझे क्यों इतना याद आ रहा हैं ? जिससे प्यार किया, उसने दिल बहलाकर छोड़ दिया. दूसरे फ्रैंड मुझसे मिलना तो दूर बात तक नहीं करते. ये लड़का ठीक ही तो कह रहा था, प्यार के नाम पर महामुर्ख ही तो बनी हूँ मैं. दिव्यांश एक साल तक मुझसे खेलता रहा और मैं खुशी–खुशी उसे खेलने दे रही थी. उस रात भी मैं उसे शादी के लिए मनाने गई थी. उसके साथ बैठकर ड्रिंक कर रही थी. दिव्यांश ने मेरी ड्रिंक में कुछ मिलाया, जिससे मैं अपने होश खोकर एक बार फिर उसकी हवस की भूख मिटाने लगी. अपनी भूख मिटाकर दिव्यांश जाने लगा, मैं उसके पीछे–पीछे गई. दिव्यांश ने मुझे गाड़ी में बिठा लिया. गाड़ी में मैनें शादी की बात की. फिर हमारा झगड़ा शुरू हुआ. प्रिंस रोड़ पर गाड़ी रोककर दिव्यांश मुझे गाड़ी से उतारकर पीटने लगा. मैं भी उसे मारने लगी. फिर उसके दोस्त बीच में आ गए और वो तीनों मेरी पिटाई करने के बाद मुझे वहीं सड़क पर छोड़कर चले गए. फिर वहाँ सुदर्शन आ गया और मैं नशे में पागल सुदर्शन को दिव्यांश समझ बैठी. कहाँ वो हवस का भूखा जानवर दिव्यांश और कहाँ ये सीधा–साधा सुदर्शन. बेचारे को उस रात मैनें कितना परेशान किया, मुझे ठीक से कुछ याद भी नहीं हैं…………………………आज संडे हैं, सुदर्शन घर पर ही होगा. उससे मिलकर आती हूँ. लेकिन वो क्या सोचेगा ? ये शराबी और बिगड़ैल लड़की मुझसे मिलने क्यों आई हैं ? कहीं अब मुझे फँसाने तो नहीं आई ? सोचने दें, अब तू जैसी हैं, वैसा ही तो सोचेगा. और फिर मैं कौनसा उसे बॉयफ्रैंड बनाने जा रही हूँ. कुछ देर बाद वापस आ जाऊँगी. सारा दिन गाड़ी में अकैली पड़ी रहती हूँ. इस बहाने कुछ देर किसी का साथ मिल जाएगा.

कृतिका छत से नीचे आई और सीढिया उतरते हुए घर से बाहर आकर गाड़ी लेकर निकल गई.

कृतिका गाड़ी चलाते हुए गाड़ी सुदर्शन की बिल्डिंग के सामने लेकर आई और रोककर बन्द कर दी. कृतिका गाड़ी से उतरकर बिल्डिंग की तरफ आई और उसकी नजर गेट पर लगे ताले पर पड़ी.

कृतिका ने खुद से कहा—“ओह नो ! यार, तेरी किस्मत ही खराब हैं. आज संडे के दिन ये कहाँ गया होगा ?”

इधर–उधर देखते हुए कृतिका की नजर बिल्डिंग से कुछ दूर नारायण की दुकान(प्रचून या किरयाना की दुकान) पर पड़ी.

कृतिका ने मन में कहा कि वहाँ पूछकर देखती हूँ.

कृतिका ने गाड़ी में बैठकर गाड़ी स्टार्ट करके आगे बढ़ाई और नारायण की दुकान के सामने रोककर दुकान में कुर्सी पर बैठकर टीवी देख रहे उम्र में तीस(30) साल के नारायण से पूछा—“भईया, उस बिल्डिंग में एक सुदर्शन नाम का लड़का रहता हैं. वो कहाँ गया हैं ?”

नारायण ने कुर्सी से खड़े होकर कहा—“वो जहाँ काम करता हैं, वहाँ मिलेगा. संडे को छुट्टी नी(नहीं) करता वो.”

कृतिका ने मन में सोचा कि उसने बताया था, वो रात को दस–ग्यारह बजे तक ऑवर–टाइम करता हैं.

कृतिका नारायण से बोली—“वो आज भी देर से आएगा या जल्दी आ जाएगा ?”

नारायण—“ये तो पता नहीं. मेरे पास तो जब भी आता हैं, सुबह–सुबह आता हैं. नौ बजे से पहले–पहले. महिने में कभी–कभार ऐसा होता हैं, जब वो रात को आकर कुछ देर बैठता हैं.”

कृतिका—“ओके, थैक्यू भईया.”

नारायण—“कोई जरूरी काम हैं, तो उसके ऑफ़िस चले जाओ. नई(नहीं) तो फोन कर लो.”

कृतिका—“नहीं, कोई जरूरी काम नहीं हैं. थैक्यू.”

कृतिका गाड़ी चलाकर आगे चली गई और नारायण वापस अपनी कुर्सी पर बैठकर टीवी देखने लगा.

सुदर्शन दोपहर के एक बजे तक सेठ साँवरमल बागड़ी के घर के आस–पास घूमता रहा, लेकिन कृतिका नजर नहीं आई. आखिरकार सुदर्शन उसी बस स्टॉप पर आकर बैठ गया, जहाँ मंगलवार की शाम कृतिका गाड़ी लेकर आई थी.

सुदर्शन मन में सोचने लगा कि उसका नम्बर माँग लेता तो अच्छा होता. बात तो बहुत अच्छी तरह कर रही थी. शायद नम्बर के लिए इन्कार नहीं करती. लेकिन अब क्या कर सकते हैं ?

सुदर्शन का कृतिका से मिले बिना वापस जाने का मन नहीं कर रहा था. थोड़ी देर और देखता हूँ–थोड़ी देर और देखता हूँ, करते–करते शाम के पाँच बजे तक सुदर्शन कभी कृतिका के घर की तरफ चक्कर लगाता, कभी बस स्टॉप पर आकर बैठ जाता. लेकिन कृतिका कहीं नहीं दिखी.

आखिर में सुदर्शन ने सोचा कि किसी से पूछकर देखता हूँ.

सुदर्शन सेठ साँवरमल बागड़ी के घर से थोड़ी दूर एक दुकान पर गया. उम्र में लगभग चालीस–बयालिस(40–42) साल का दुकानदार दुकान के बाहर कुर्सी पर बैठा था.

सुदर्शन ने दुकानदार को एक पाँच रुपये का सिक्का देते हुए कहा—“पाँच सेन्टर फ्रैश च्यूंगम देना.”

दुकानदार ने पाँच रुपये लेकर अपनी जेब में डालते हुए कहा—“ले लो, उसमें से.”

सुदर्शन ने पाँच सेन्टर फ्रैश च्यूंगम निकालकर चार पेन्ट की जेब में डाल ली और एक का रेपर निकालकर मुँह में रख ली.

दुकानवाला कुर्सी पर बैठा–बैठा बड़बड़ा रहा था—“आजकल तो किसी पर विश्वास करना ही महापाप हैं.”

सुदर्शन ने खड़े–खड़े च्यूंगम चबाते हुए कहा—“ऐसा क्या हो गया ?”

दुकानदार—“कुछ नहीं, यहाँ पास में डेढ़ साल पहले एक आदमी रहने के लिए आया. शुरू–शुरू में एक–दो महिने तक नगद सामान लेता था. एक बार उसने एक सौ दस रुपये का सामान लेने के बाद कहा, दस का सामान कम कर दो. मेरे पास सौ ही रुपये हैं. मैनें कहा, कोई बात नहीं, दस रुपये बाद में दे देना. फिर धिरे–धिरे दस–बीस रुपये से उधार का सिलसिला शुरू हुआ, जो सौ–पचास रुपये से होते हुए हजार–पाँच सौ तक पहुँच गया. वो आदमी पहले वाली उधार के पैसे दे जाता और नई उधार के पैसे लिखवा जाता. उसका व्यवहार बहुत अच्छा था, इसलिए मैं भी खुशी–खुशी उसको उधार दे रहा था. अब छः महिने पहले उस पर आठ हजार की उधार हो गई. पिछले चार महिने से मुँह ही नहीं दिखाता. मैं पैसे माँगने उसके घर जाता हूँ, तो गालियाँ निकालते हैं, मारपीट करने पर उतर आते हैं.”

सुदर्शन—“धोखेबाजों का तो यहीं काम हैं. पहले अच्छा व्यवहार करके विश्वास जीतते हैं. विश्वास जीतकर अपना मतलब(स्वार्थ) पूरा करते हैं. मतलब पूरा होने के बाद अपना असली रंग दिखाते हैं.”

दुकानदार—“हाँ, इस तरीके से लोग मेरे एक–डेढ़ लाख रुपये खा गए, जो अब वापस नहीं आएँगें. कोई लड़ाई–झगड़े करने वाले तो अपने पैसे निकलवा लेते हैं. लेकिन हम अब दुकानदार आदमी. दुकानदारी करें या लड़ाई–झगड़े करें ?”

सुदर्शन कुछ देर तक दुकानदार के साथ इधर–उधर की बातें करते हुए दुकानदार की बातें सुनता रहा. फिर अपने मतलब पर आकर पहले सेठ साँवरमल बागड़ी और फिर सेठ साँवरमल बागड़ी की बेटी कृतिका के बारे में बात करने लगा.

दुकानदार ने बताया—“साँवरमल जी तो बहुत अच्छे आदमी हैं और उनकी पत्नी भी बहुत भली लुगाई(नारी, महिला या औरत) हैं. लेकिन बेटी तो उफ्फ………एक नम्बर की बेवड़ी और बिगड़ैल. सारी–सारी रात घर से बाहर घूमती फिरती हैं. एक लड़के के साथ उसका चक्कर भी चल रहा था. उसके माँ–बाप ने बहुत बार गली में सबके सामने उसको थप्पड़ मारे हैं. लेकिन उस लड़की पर तो थोड़ा सा भी असर नहीं होता. बहुत ही अड़ियल, जिद्दी और बेकार लड़की हैं. वो तो गई इनके हाथ से. बाकि मैं किसी की बुराई नहीं करता.”

सुदर्शन ने कृतिका के बारे में दुकानदार की बात सुनकर कहा—“अच्छा, जी. अब घर को चलते हैं.”

सुदर्शन वापस बस स्टॉप पर आकर बस स्टॉप की कुर्सी पर बैठकर मन में कहने लगा कि छोड़ यार, तू भी कहाँ एक बेवड़ी को तलाश करने आ गया. ये तो बहुत ही खराब लड़की निकली. चल घर चलते हैं. सारा दिन खराब हो गया इसके चक्कर में.

कुछ देर बाद बस आकर बस स्टॉप पर रूकी. सुदर्शन बस में चढ़ गया और बस चल पड़ी.

शाम के आठ बजे सुदर्शन बिल्डिंग से निकलकर नारायण की दुकान पर आया.

सुदर्शन को देखते ही नारायण बोला—“किया भाई, तू भी लाग ग्यो छोरियाँ ग चक्करा म ?” (हिन्दी अनुवाद : क्या भाई, तू भी पड़ गया लड़कियों के चक्कर में ?)

सुदर्शन हैरान होकर मन में सोचने लगा कि इसको कैसे पता चल गया ? आज मैं लड़की के चक्कर में घूम रहा था. मैनें तो उस बेवड़ी के घर की तरफ जाने का सोचा भी आज सुबह ही था.

सुदर्शन—“किसी छोरी ? भायजी.” (हिन्दी अनुवाद : कौनसी लड़की ? भाई जी.)

नारायण—“ओई तो म तन पूछू हूँ.” (हिन्दी अनुवाद : यहीं तो मैं तुमसे पूछ रहा हूँ.)

सुदर्शन—“बात थे काडया हो और पूछो मनै हो ?”(हिन्दी अनुवाद : बात आपने निकाली हैं और पूछ मुझे रहे हो ?)

नारायण ने हँसकर कहा—“तेरी सकल गो रंग तो ईया उडयो हैं, जाणा सच्ची म कोई छोरी गो चक्कर हैं.” (हिन्दी अनुवाद : तुम्हारे चेहरे का रंग तो ऐसे उड़ा हैं, जैसे सच में किसी लड़की का चक्कर हैं.)

सुदर्शन—“मेरो थाने पतो कोनी के ? हौळी–दयाळी हर कोई तीज–त्यौहार ग इलावा मेरो सेठ खुद आप छुट्टी दयोवे जद तो म छुट्टी करूँ. मेर खन आ फालतू कामा वास्ते टैम खठे हैं ?” (हिन्दी अनुवाद : मेरे बारे में आपको पता नहीं क्या ? हौली–दिवाली और कोई तीज–त्यौहार के इलावा मेरे बॉस खुद मुझे छुट्टी देते हैं, तब तो मैं छुट्टी करता हूँ. मेरे पास इन फालतू कामों के लिए टाइम कहाँ हैं ?)

नारायण—“अरे, मन सब ठा हैं. म तो मजाक करो हो. आज सवेरे एक छोरी आई ही, गाडी लेर. बा तेरो बूझी ही. जद म तन पूछू.”(हिन्दी अनुवाद : अरे, मुझे सब पता हैं. मैं तो मजाक कर रहा था. आज सुबह एक लड़की आई थी, गाड़ी लेकर. वो तुम्हारे बारे में पूछ रही थी. इसलिए मैनें तुमसे पूछा.)

सुदर्शन—“छोरी ! नाम कोनी बतायो के ?”(हिन्दी अनुवाद : लड़की ! नाम नहीं बताया क्या ?)

नारायण—“ना, नाम तो कोनी बतायो.”(हिन्दी अनुवाद : नहीं, नाम तो नहीं बताया.)

सुदर्शन—“दिखणा म किसी क ही ?”(हिन्दी अनुवाद : दिखने में कैसी थी ?)

नारायण—“दिखणा म तो हाई–फाई छोरी ही. चश्मो पेर राख्यो हो. गौरी भी भोत ही.”(हिन्दी अनुवाद : दिखने में तो हाई–फाई लड़की थी. चश्मा पहन रखा था. गौरी भी बहुत थी.)

सुदर्शन—“समझ ग्यो. बा थाने बताई ही नी. एक बार रात न दारू पीर छोरा सागे लड़े ही. बे तीन छोरा बिन कूट अर भाग ग्या. बा होणी.”(हिन्दी अनुवाद : समझ गया. वो आपको बताया था ना. एक बार रात को शराब पीकर लड़के के साथ लड़ रही थी. वो तीन लड़के उसकी पिटाई करके भाग गए. वो होगी.)

नारायण—“अच्छया, तो अाज के लेण आई ही ?”(हिन्दी अनुवाद : अच्छा, तो आज क्या लेने आई थी ?)

सुदर्शन—“के बेरो अब ? मिलसी, जद पूछा गा. फेर थाने भी बता द्या गा. अबार तो थोड़ी पेट–पूजा कर ल्या. आज सवेरे गी रोटी कोनी खाएड़ी.”(हिन्दी अनुवाद : क्या मालूम अब ? मिलेगी, जब पूछेगें. फिर आपको भी बता देगे. अभी तो थोड़ी पेट–पूजा कर ले. आज सुबह से खाना नहीं खाया.)

नारायण—“तो रोटी मेर खन खा ले आज.”(हिन्दी अनुवाद : तो खाना मेरे पास खाले आज.)

सुदर्शन—“नई–नई, थे पाईया भुजिया दे द्यो. आपणे इत्तो भोत हैं.(हिन्दी अनुवाद : नहीं–नहीं, आप तो दो सौ पचास ग्राम भुजिया दे दो. अपने को इतना बहुत हैं.)

नारायण—“भुजिया उ पेट भरे हैं के ? चाल आजा, रोटी मणन लाग री हैं.”(हिन्दी अनुवाद : भुजिये से पेट भरता हैं क्या ? चल आजा, खाना बन रहा हैं.)

सुदर्शन—“ठीक हैं, फेर म बिल्डिंग ग ताळो लगायाउ.”(हिन्दी अनुवाद : ठीक हैं, फिर मैं बिल्डिंग को ताला लगाकर आता हूँ.)

सुदर्शन बिल्डिंग के गेट पर ताला लगाने बिल्डिंग की तरफ चल पड़ा.

सुदर्शन नारायण के घर खाना खाने के बाद नारायण की दुकान के बाहर बैठा नारायण के साथ बातें करता रहा.

रात के साढ़े दस बजे सुदर्शन ने खड़े होते हुए कहा—“अच्छा, भाई. अब सोवा.”

नारायण—“हाँ, ठीक हैं.”

सुदर्शन अपनी बिल्डिंग की तरफ चल पड़ा और नारायण कुर्सियाँ उठाकर दुकान में रखने के बाद दुकान बन्द करके घर के अन्दर चला गया.

सुदर्शन रात को बैड पर लेटा सोचने लगा कि ये कृतिका आज क्यों आई थी ? मैं सारा दिन उसके घर के आस–पास घूमता रहा और वो यहाँ आ गई. लेकिन वो नशेड़ी और अय्याश हैं. हाँ, अगर वो नशे से दूर होती और उसने बॉयफ्रैंड ना बनाया होता. छोड़ यार, तब भी तू क्या कर लेता ? वो सेठ साँवरमल बागड़ी जी की बेटी हैं. उसके सपने मत देख. सोजा चुपचाप.

सुदर्शन ने करवट बदली और सो गया.


अगले दिन दस अप्रेल, सोमवार को सुबह सवा सात बजे उठने के बाद सुदर्शन ने नहाकर तैयार होकर सुबह नौ बजे फ्लेट से बाहर आकर फ्लेट को ताला लगाया और बिल्डिंग के सभी खिड़कियाँ–दरवाजे चैक करते हुए सीढ़िया उतरकर नीचे आया. बिल्डिंग का दरवाजा लॉक करके ताला लगाकर चाबी जेब में डालकर ऑफ़िस जाने के लिए रोज की तरह पैदल चल पड़ा.

सुदर्शन आम्रपाली सर्किल तक आया तो देखा कि कृतिका चश्मा पहने अपनी गाड़ी में ड्राईविंग सीट पर बैठी सुदर्शन की तरफ देखकर मुस्करा रही हैं.

सुदर्शन कृतिका के पास आकर बोला—“आप यहाँ ?”

कृतिका—“मैं तुम्हारा ही इंतजार कर रही थी. मैं कल भी आई थी, लेकिन तुम्हारी बिल्डिंग के पास वो दुकानवाले ने बताया, तुम संडे को भी ऑफ़िस जाते हो और सुबह नौ बजे से पहले–पहले चले जाते हो. इसलिए आज मैं पौने नौ बजे ही यहाँ आ गई.”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“लेकिन क्यों ?”

कृतिका—“पता नहीं, बस तुमसे मिलने का मन था.”

सुदर्शन—“लेकिन अभी तो मैं ऑफ़िस जा रहा हूँ और सेठ जी ने जल्दी भेज दिया तो ठीक हैं. वरना रात को दस–ग्यारह बजे बाद ही आऊँगा.”

कृतिका—“हाँ, तो कोई बात नहीं. गाड़ी में बैठ जाओ. मैं तुम्हें ऑफ़िस छोड़ दूँगी. इस बहाने थोड़ी देर तुमसे बात हो जाएगी.”

सुदर्शन—“ये भी सही हैं. चलो.”

सुदर्शन दूसरी साइड आया और गाड़ी का दरवाजा खोलकर गाड़ी में बैठ गया. कृतिका ने गाड़ी स्टार्ट की और सुदर्शन के ऑफ़िस की तरफ चल पड़ी.

कृतिका ड्राईविंग करते हुए बोली—“अब बताओ, उस रात मैनें क्या किया था, जिसके कारण तुमने मुझे चांटे मारे ?”

सुदर्शन मुस्कुराकर बोला—“तो आप ये जानने के लिए कल आयी थी और आज पौने नौ बजे से इंतजार कर रही हैं ?”

कृतिका ने मुस्कुराकर कहा—“ऐसा ही समझ लो.”

सुदर्शन—“चलिए, फिर बता ही देता हूँ. आप मुझे अपना बॉयफ्रैंड समझकर गन्दी–गन्दी गालियाँ निकालते हुए मुझ पर हाथ–पैर चला रही थी. मैनें आपको समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन आप मेरी बात सुन ही नहीं रही थी. इसलिए आपसे बचने का मुझे यही रास्ता नजर आया.”

कृतिका—“ओह…सच में बहुत बेकार हूँ मैं. बहुत अच्छा किया तुमने मुझे चांटे मारकर. मैं इसी लायक हूँ.”

सुदर्शन—“आप बेकार तो नहीं लगती. हाँ, आपके अन्दर गलत आदते बहुत हैं. आप इन गलत आदतों को छोड़कर अपनी अच्छी बातों पर ध्यान दीजिए.”

कृतिका—“मेरे अन्दर अच्छी बातें कौनसी नजर आई तुम्हें ?”

सुदर्शन—“अभी तक नजर तो नहीं आई. लेकिन हर इन्सान में कुछ ना कुछ बुरी बातें और कुछ ना कुछ अच्छी बातें जरूर होती हैं.”

कृतिका—“लेकिन मेरे अन्दर तो सिर्फ बुरी बातें ही हैं. अच्छी बात कुछ भी नहीं.”

सुदर्शन—“एक अच्छी बात तो मैं बता देता हूँ. आप जब नशे में नहीं होती, तब बहुत अच्छी तरह बात करती हैं.”

कृतिका मुस्कुराकर बोली—“अच्छा, फिर तो ये इत्तेफ़ाक अच्छा हुआ. जब पिछले हफ्ते मैं तुमसे मिली, तब मेरे पास शराब खतम हो गई थी और आज भी खतम हो गई. वरना सुबह उठते ही सबसे पहले दो घूट शराब गले में उतारती हूँ.”

सुदर्शन—“ये भी सही हैं. हर किसी का जिन्दगी जीने का अपना ढंग होता हैं.”

कृतिका ने हँसकर कहा—“तुम तो शायद नहीं पीते होगे ?”

सुदर्शन—“नहीं, मैं नशे और नशे करने वालों को बिल्कुल पसन्द नहीं करता.”

कृतिका—“हम्म…फिर तुम्हें मुझपर गुस्सा नहीं आया, सुबह–सुबह एक शराबी लड़की को अपने रास्ते में खड़ी देखकर ?”

सुदर्शन—“पसन्द नहीं करना और गुस्सा आना. इन दोनों में फर्क होता हैं. मेरे सेठ जी और मैडम को भी सभी तरह नशा और नशा करने वाले बिल्कुल पसन्द नहीं हैं, लेकिन अभी हमारे ऑफ़िस में मेरे इलावा आठ(8) लोग हैं, दो शादीशुदा और दो कुँवारी, चार लेडिज और तीन शादीशुदा और एक कुँवारा आदमी. उनमें से एक लड़की और तीन आदमी शराब पीते हैं. जो शादीशुदा आदमी शराब नहीं पीता, वो भी गुटखा, सिगरेट इन सबका नशा करता हैं. फिर भी मेरे बॉस ने उनको नौकरी पर रख रखा हैं. हाँ, ये वॉर्निंग(चैतावनी) जरूर दे रखी हैं, कि किसी भी तरह का नशा करके कोई भी घर(ऑफ़िस घर के अन्दर ही नीचे बेसमेंट में हैं) के अन्दर नहीं आएगा. अब आपकी तरह बहुत सारे लोग नशा करते हैं. किसी के कहने से कोई नहीं छोड़ता. फिर आपने मेरा क्या बिगाड़ा हैं, जो आप पर गुस्सा करूँ ? उल्टा आप तो मुझे ऑफ़िस छोड़ रहे हो, वरना रोज की तरह पैदल ही जाता.”

कृतिका ने ड्राईविंग करते हुए हैरान होकर कहा—“इतनी दूर तुम रोज पैदल जाते हो ? मुझे तो कोई दस–पन्द्रह मिनट चलने के लिए कहे, तो ये सुनकर ही मेरे पैरों में दर्द होने लगता हैं.”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“अपनी–अपनी जिन्दगी हैं. सबकी जिन्दगी अलग–अलग होती हैं.”

कृतिका—“हम्म…ये तो हैं.”

सुदर्शन के साथ बातें करते हुए कृतिका गाड़ी चित्रकूट ले आई.

सुदर्शन ने चित्रकूट आते ही कहा—“वहाँ गाड़ी रोक देना.”

कृतिका ने सुदर्शन की बताई जगह पर गाड़ी रोक दी.

सुदर्शन ने कहा—“आज तो आप आधा घंटा जल्दी ऑफ़िस ले आयी. अभी तो साढ़े नौ ही बजे हैं.”

कृतिका ने गाड़ी बन्द करके कहा—“तो अब आधे घंटे क्या करोगे ?”

सुदर्शन—“आपको कहीं जाना हैं ?”

कृतिका—“नहीं, मैं तो यू ही गाड़ी लेकर सारा दिन सारे शहर में घूमती रहती हूँ और मेरे बाप के पैसे उड़ाती हूँ.”

सुदर्शन ने मन में सोचा कि बाप के पैसे उड़ाती हूँ. पिताजी, पापा, डेडी कुछ नहीं, सीधा बाप. लेकिन ये भी सही हैं. अपने कहने से कौनसी सुधर जाएगी ? इसके बाप के पास पैसे हैं, इसलिए उड़ाती हैं. अपने बाप के पास पैसे नहीं हैं, इसलिए उल्लू की तरह कमाते हैं.

सुदर्शन ने कृतिका से कहा—“चलो फिर दस बजे तक आपसे बात ही कर लेते हैं.”

सुदर्शन और कृतिका में दस बजे तक बातें चलती रही.

दस बजते ही सुदर्शन ने कहा—“अच्छा, अब चलता हूँ. आपका बहुत–बहुत धन्यवाद. आज आप आराम से गाड़ी में ले आयी. वरना रोज तो पैदल आते हुए पौने दस और दस के बीच ही यहाँ पहुँचता हूँ.”

कृतिका—“इसमें धन्यवाद की क्या बात हैं ? जहाँ सारा दिन फालतू घूमती हूँ, वहाँ थोड़ी देर आपके काम आ गई.”

सुदर्शन ने मुस्कुराते हुए कहा—“ये भी सही हैं.”

सुदर्शन गाड़ी का दरवाजा खोलकर गाड़ी से बाहर निकला और दरवाजा बन्द करके दरवाजे की खिड़की में से बोला—“अच्छा, फिर मिलेगें.”

कृतिका ने मुस्कुराकर कहा—“हाँ, जरूर. तुमसे बातें करके बहुत अच्छा लगा.”

सुदर्शन—“मुझे भी आपसे बात करके बहुत अच्छा लगा. अब मैं चलता हूँ.”

कृतिका—“तुम दोपहर को खाना खाने कब आते हो ?”

सुदर्शन—“खाना मुझे सेठ जी खिला देते हैं.”

कृतिका हैरान होकर बोली—“दोनों वक्त ?”

सुदर्शन—“हाँ, सेठ जी और मैडम बहुत भले लोग हैं. सुबह चाय–नाश्ता भी यहीं आकर करता हूँ. दोपहर का खाना, फिर शाम की चाय, फिर रात का खाना सब यहीं करता हूँ. बस जिस दिन मैं ऑफ़िस नहीं आता या रात को जल्दी चला आता हूँ, सिर्फ उस दिन किसी होटल में खाना खाता हूँ. वरना सेठ जी और मैडम खाना खाए बिना आने ही नहीं देते. बाकि वहाँ बिल्डिंग में तो बस रात को सोता हूँ और सुबह तैयार होकर ऑफ़िस आ जाता हूँ.”

कृतिका—“फिर तो तुम्हारे सेठ जी और मैडम बहुत अच्छे लोग हैं.”

सुदर्शन—“हाँ, इनके जैसे लोग तो दुनिया में बस इक्का–दुक्का गिने–चुने ही होते हैं. सेठ जी और मैडम तो कहते हैं, हमारे घर पर ही रह लो. लेकिन मैनें सोचा, अच्छे लोगों की अच्छाई का जरूरत से ज्यादा फायदा उठाना ठीक नहीं हैं. मेरे लिए इतना करते हैं, जितना कोई किसी अपने के लिए भी नहीं करता.”

कृतिका—“अच्छा, अब तुम्हें देर हो रही होगी.”

सुदर्शन—“हाँ, मैं चलता हूँ.”

सुदर्शन जयसिंह के घर की तरफ चल पड़ा.

कृतिका गाड़ी में बैठी सुदर्शन को जाते हुए देखकर सोचने लगी कि इसके सेठ जी और मैडम इसके लिए इतना करते हैं. अगर कभी–कभी मैं भी इसे घर से ऑफ़िस और ऑफ़िस से घर छोड़ दूँ, तो इसमें क्या बुराई हैं ? वैसे भी मैं सुबह से रात तक यहाँ–वहाँ फालतू घूमती रहती हूँ. इस बहाने मेरे कुछ पाप कम हो जाएगें.

कृतिका ने मुस्कुराकर अपनी गाड़ी स्टार्ट की और सुदर्शन के मोड़ मुड़ने के बाद गाड़ी चलाकर आगे निकल गई.


एक महिने बाद दस मई, बुधवार को रात के पौने ग्यारह बजे कृतिका ने आम्रपाली सर्किल पर आकर गाड़ी साइड में करके रोककर बन्द कर दी.

कृतिका मुस्कुराते हुए सुदर्शन की तरफ देखकर बोली—“लो आ गई तुम्हारी मंजिल.”

सुदर्शन—“हाँ, मेरी मंजिल तो आ गई. लेकिन तुमसे एक बात पूछू ?”

कृतिका—“हाँ, पूछो.”

सुदर्शन—“तुमने तो कहा था, कभी–कभी तुम मुझे घर से ऑफ़िस और ऑफ़िस से घर छोड़ दोगी, तो इसमें क्या बुराई हैं ? लेकिन तुम तो पिछले एक महिने से हर रोज सुबह मुझे यहाँ से ऑफ़िस छोड़ती हो. फिर रात को जब तक मैं ना आऊँ, मेरा इंतजार करती हो और मुझे ऑफ़िस से घर छोड़ती हो. खुद अपने घर रात के बारह–एक बजे बाद पहुँचती हो. तुम ये सब क्यों करती हो ? आखिर मिलेगा क्या तुम्हें ?”

कृतिका हँसकर बोली—“पता नहीं. सुबह उठते ही दो घूट लगाकर गाड़ी लेकर निकल जाती हूँ. दिन में अगर नींद आती हैं, तो कहीं गाड़ी पार्क करके गाड़ी में ही सो लेती हूँ. कोई बात करने वाला या कोई मिलने वाला तो हैं नहीं. एक दिव्यांश था, मतलब पूरा होने के बाद वो भी अपने रास्ते निकल गया. इसलिए सुबह–शाम कुछ वक्त तुम्हारे साथ बिता लेती हूँ.”

सुदर्शन—“लेकिन तुम्हारे और फ्रैंड्स नहीं हैं ? धोखा तो सिर्फ बॉयफ्रैंड ने ही दिया हैं, बाकि फ्रैंड्स कहाँ गए ?”

कृतिका—“बाकि फ्रैंड्स………बाकि फ्रैंड्स में लड़कों के बारे में तो तुम्हें भी पता ही होगा. लड़कों को लड़की की बस एक चीज में दिलचस्पी होती हैं. इसलिए किसी से बात करने या मिलने का मन ही नहीं करता. और जो थोड़े–बहुत अच्छे लड़के हैं, वो एक बिगड़ी हुई लड़की से क्यों बात करेंगे ?”

सुदर्शन—“और लड़कियों के साथ दोस्ती नहीं हैं तुम्हारी ?”

कृतिका—“लड़कियों से दोस्ती हैं, लेकिन वहीं बात, मैं शराब पीकर रात–रातभर घर से बाहर भटकती हूँ. कुछ लड़कियों को मुझसे हमदर्दी हैं, लेकिन उन लड़कियों के घरवाले उन लड़कियों को कहते हैं, ये कृतिका बेकार लड़की हैं. इसके साथ रहोगी तो तुम भी इसकी तरह बिगड़ जाओगी. इसलिए इससे दूर रहो.”

सुदर्शन ने मन में सोचा कि अब तुमसे क्या कहूँ ? बात तो सबकी ठीक ही हैं. तुम्हें सुधरने के लिए कहूँगा, तो तुम तो सुधरोगी नहीं.

सुदर्शन को सोच में खोया देखकर कृतिका ने कहा—“क्या हुआ ? तुम ये बार–बार सोच में क्यों डूब जाते हो ? कुछ कहना हो, तो बोल दिया करो. जैसे मैं बोलती हूँ. अगर तुम्हें भी मुझसे मिलना अच्छा नहीं लगता, तो मैं कल से नहीं आऊँगी.”

सुदर्शन—“नहीं–नहीं, ऐसी कोई बात नहीं हैं.”

कृतिका—“फिर क्या सोच रहे हो ?”

सुदर्शन—“मैं सोच रहा था, तुम ये शराब पीना छोड़ क्यों नहीं देती ? आखिर इससे तुम्हें कोई फायदा तो मिल नहीं रहा. हेल्थ को तो नुकसान हो ही रहा हैं, उस पर तुम बहुत अच्छी लड़की होकर भी सिर्फ इस शराब के कारण बदनाम हो.”

कृतिका—“अरे, क्या अच्छी लड़की यार. जब शराब नहीं पीती थी, तब कौनसी मेरी तारीफ होती थी ? कोई गलती ना होते हुए भी मुझे बातें सुननी पड़ती थी. बिना गलती के मेरी पिटाई होती थी. अब कम से कम इस बात का सुकून हैं. मैं गलत हूँ, इसलिए बदनाम हूँ.”

सुदर्शन—“बिना गलती मतलब ?”

कृतिका—“बिना गलती मतलब. जब मैं स्कूल में थी, तो एक बार मेरी क्लास में एक लड़का–लड़की आपस में बातें कर रहे थे. तभी टीचर ने पूछा, ये कौन बोल रहा हैं क्लास में ? तो सबने मुझसे बदला लेने के लिए मेरा नाम लगा दिया. टीचर ने मुझे बुलाकर आठ–दस थप्पड़ मारे. मैनें टीचर से कहा, मैम, मैं बेकसूर हूँ. आपने मुझे बिना गलती के मारा हैं. तो टीचर चिढ़ गई. वो मुझे पकड़कर प्रिंसिपल सर के पास ले गई और बोली, मैनें उनको गाली निकाली हैं. क्लास के सब स्टूडेंटस ने भी मुझे सजा दिलाने के लिए टीचर की हाँ में हाँ मिला दी. फिर प्रिंसिपल सर ने मेरे मॉम–डेड को बुलाया और घर आने के बाद मॉम–डेड ने मेरी धुलाई कर दी. ऐसा मेरे साथ एक–दो बार नहीं, बहुत बार हुआ.”

सुदर्शन—“लेकिन सब के सब तुमसे बदला किस बात का ले रहे थे ?”

कृतिका ने मुस्कुराकर कहा—“वो मैं बचपन में बहुत शरारती थी. अलग–अलग तरीके से सबको बहुत परेशान करती थी. अब यू तो मैं किसी के ताबे(काबू में) आई नहीं, तो वो लोग बिना गलती के झूठी शिकायतें करके मुझसे बदला लेते थे.”

सुदर्शन—“कमाल हैं. चलो वो सब तो तुम्हारी तरह बच्चे थे, लेकिन टीचर को तो अक्ल होनी चाहिए. सजा देने से पहले ये तो देखना था, गलती की भी हैं या नहीं ?”

कृतिका—“अरे, इतना कौन सोचता हैं यार ? जब मॉम–डेड ही नहीं समझते, तो दूसरों से क्या शिकायत ?”

सुदर्शन—“हम्म………कभी–कभी माँ–बाप भी गलती कर देते हैं. उनको पहले तुम्हारी बात सुननी चाहिए थी.”

कृतिका—“गलती नहीं, मेरे मॉम–डेड की तो आदत हैं, मुझे पीटना. जब मैं कॉलेज में थी, तो कॉलेज में एक लड़की के साथ मेरा झगड़ा हुआ. जब मेरे सामने उस लड़की की दाल नहीं गली. तो उसने अपने फ्रैंड्स के साथ मिलकर मेरे मॉम–डेड के सामने ये बात फैला दी, मेरा किसी लड़के के साथ चक्कर चल रहा हैं. मैनें मेरे मॉम–डेड को बहुत समझाया, लेकिन उनको तो बस मुझे पीटना था. हफ्ते तक मुझे बातें सुना–सुनाकर पीटते रहे. जबकि मेरी लाइफ़ में दिव्यांश के सिवा कभी कोई नहीं आया. ऐसी और भी बहुत सारी बातें हैं, क्या–क्या बताऊँ ?”

सुदर्शन—“ये भी बड़ी प्रोब्लम हैं. शायद तुम्हारे मम्मी–पापा तुम्हें गलत रास्ते पर चलने से रोकने के चक्कर में जरूरत से ज्यादा सख्ती कर बैठे और उनकी इस जरूरत से ज्यादा सख्ती के कारण तुम दुःखी होकर शराब पीने लगी.”

कृतिका—“अब जो भी हो. जो कुछ हैं, तुम्हें बता रही हूँ. शराब पीना मैनें कॉलेज में शुरू किया था. कॉलेज में मेरे कुछ फ्रैंड्स शराब पीते थे, उनके साथ मैं भी पीने लगी और धिरे–धिरे उन सबसे ज्यादा बिगड़ैल बन गई.”

सुदर्शन—“और तुम्हारा वो बॉयफ्रैंड ?”

कृतिका—“वो तीन साल पहले मिला था. मुझसे पहले उसका चार गर्लफ्रैंड से ब्रेकअप हो चुका था.”

सुदर्शन—“चार गर्लफ्रैंड से ब्रेकअप हो चुका था, ये जानते हुए भी तुमने उसे अपना बॉयफ्रैंड बना लिया. हद होती हैं, मुर्खता की. पहले जान–बुझकर मुर्खता की, अब हर रोज उसके लिए आँशू बहाती हो.”

कृतिका—“यार…वो कहता था, लड़कियों ने उसको धोखा दिया हैं.”

सुदर्शन—“उसने कहा और तुमने मान लिया. इसे महामुर्खता कहते हैं.”

कृतिका ने हँसकर कहा—“अब यार सच तो यहीं हैं. मैं महामुर्ख हूँ.”

सुदर्शन—“और बॉयफ्रैंड बनाया तो बनाया, रिलेशन(शारीरिक संबंध) बनाने की क्या जरूरत थी ?”

कृतिका सर झूकाकर भावूक होते हुए बोली—“मैनें कोई एकदम से रिलेशन थोड़े ही बनाए थे. तुम तो ऐसे बोल रहे हो, जैसे मैं रिलेशन बनाने के लिए मरे जा रही थी.”

सुदर्शन—“फिर भी तुम्हें सोचना चाहिए था. उसने तुम्हें गर्लफ्रैंड बनने के लिए कहा और तुमने बिना सोचे–समझे उसे बॉयफ्रैंड बना लिया.”

कृतिका—“नहीं, मैनें उसे एकदम से बॉयफ्रैंड भी नहीं बनाया. दोस्ती होने के चार–पाँच महिने बाद अब से ढ़ाई साल पहले उसने मुझे प्रपोज किया. उस वक्त मैनें मना कर दिया था, लेकिन उससे दोस्ती बनाए रखी.”

सुदर्शन—“फिर दोस्त से बॉयफ्रैंड कैसे बनाया ?”

कृतिका ने उदासी भरी आवाज़ में कहा—“वो बहुत रोता था. अपने दुःख और परेशानियों की बातें सुनाता रहता था. कहता था, मैं बहुत अकैला हूँ. मुझे कोई नहीं समझता. सब मुझसे दूर चले जाते हैं. तू भी मुझे नहीं समझती. मेरे प्यार को नहीं समझती, मेरे जज़्बात तुझे झूठ लगते हैं. ऐसी बहुत सारी बातें बोलता था. मैं खुद अपनी लाइफ़ में परेशान और दुःखी थी. उसकी बातें सुनकर, उसको दुःखी देखकर मुझे उससे हमदर्दी हो गई. मैनें सोचा, हम दोनों मिलकर एक–दूसरे का सुख–दुःख बाँट लेगें. फिर धिरे–धिरे हमदर्दी प्यार में बदल गई और मैं उसकी गर्लफ्रैंड बन गई. गर्लफ्रैंड बनने के बाद उसने कई बार मुझे रिलेशन(शारीरिक संबंध) बनाने के लिए कहा. शुरू में हर बार मैनें मना कर दिया. लेकिन एक रात हम दोनों साथ बैठकर ड्रिंक कर रहे थे, तो हम दोनों को ज्यादा हो गई और फिर नशे में सब हो गया. कुछ दिनों तक मुझे बहुत बुरा लगा. खुद पर बहुत गुस्सा आया. फिर दिव्यांश ने समझाया, हमें शादी तो करनी ही हैं. अगर शादी से पहले रिलेशन बना रहे हैं, तो इसमें क्या बुराई हैं ? एक–दूसरे करीब होकर हमारे बीच के सारे फासले मिट जाते हैं. हमारा प्यार इतना कमजोर हैं क्या, जो शादी के बंधन में बधे बिना हम प्यार नहीं कर सकते ? और भी बहुत सारी बड़ी–बड़ी बातें करता था. लेकिन अब पिछले साल जब मैं उसे शादी के लिए कहने लगी, तब समझ में आया. वो सब उसका ड्रामा था, दुःखी होना, परेशान होना, दुःख–दर्द वाली बातें, ये सब वो लड़कियों को इम्प्रेस करने के लिए जान–बुझकर करता हैं. एक साल बाद मेरे साथ सब कुछ करने के बाद मुझे कहता हैं, जो लड़की शादी किये बिना सब कुछ करती हैं, वो सिर्फ मजे लेने के लिए होती हैं. शादी करने के लिए नहीं होती. तेरे जैसी तो रोज बहुत मिलती हैं. किस–किस से शादी करूँ ? मुझे उसकी बातें याद करके बहुत रोना आता हैं. मन करता हैं, खुद को खतम कर लूँ.”

सुदर्शन ने नरम होकर कहा—“तुमने गलती तो की हैं. लेकिन तुमने उसे धोखा नहीं दिया, उसने तुम्हें धोखा दिया हैं. तुम्हारी परेशान हालत और दुःख का गलत फायदा उठाकर. फिर तुम ऐसी बातें क्यों सोचती हो ? और तुम बिगड़ैल और बेकार नहीं हो. भटक गई हो. मैनें तुम्हारे बारे में सेठ जी और मैडम को भी सब कुछ बताया हैं, वो भी यहीं कह रहे थे. तुम भटक कर गलत रास्ते पर चली गई और उस गलत लड़के ने इस बात का फायदा उठा लिया. तुम्हें खुद के बारे में सोचने–विचारने की जरूरत हैं.”

कृतिका—“क्या सोचू–विचारू यार. उसके साथ रात–रात भर रूकती थी, अगले दिन मॉम–डेड से मार खाती थी. और वो बोलता हैं, तू तो इतनी मस्त लड़की हैं, तेरे बाप के पास पैसे भी बहुत हैं. तू तो किसी को भी पटा सकती हैं. फिर मेरे गले क्यों पड़ रही हैं ?”

कृतिका की आँखों से आँशू निकल आए. वो गाड़ी के हैंडल पर सर रखकर फूट–फूटकर रोने लगी.

सुदर्शन ने कृतिका के कंधे पर हाथ रखकर कहा—“अरे, रो क्यों रही हो ? वो बहुत ही घटिया लड़का हैं और घटिया लड़के तो यहीं करते हैं.”

कृतिका रोते हुए कहा—“तुम्हें नहीं पता, उसने क्या–क्या बोला मुझे ?”

सुदर्शन—“अब देखो, जो हो गया हैं, तुम्हारे रोने से वो बदल नहीं जाएगा. इसलिए जो हो गया, उसे भूल जाओ. और आगे के लिए ध्यान रखो, जिसको शादी करनी होगी, वो शादी से पहले रिलेशन(शारीरिक संबंध) क्यों बनाएगा ? रिलेशन तो शादी के बाद बनते ही हैं.”

कृतिका ने गाड़ी के हैंडल से सर उठाकर आँखों से आँशू टपकाते हुए कहा—“अब क्या ध्यान रखूँ ? अब उसकी बातें याद करके तो ऐसा लगता हैं, कॉलगर्ल औरतें भी मुझसे अच्छी हैं. वो पैसे के लिए मजबुरी में लोगों को मजे देती हैं. मेरी तो कोई मजबुरी नहीं थी, फिर भी एक साल तक उसकी हवस की भूख मिटाती रही.”

सुदर्शन ने कृतिका के कंधे से हाथ हटाकर कहा—“अरे, ये क्या सोचने लगी तुम ? तुमने जो किया, वो नासमझी थी. एक गलत फैसला. एक गलत इन्सान को पहचानने में गलती. अब आगे की जिन्दगी के बारे में सोचो. अतीत पर रोने से अतीत बदलता नहीं हैं.”

कृतिका वापस गाड़ी के हैंडल पर सर रखकर रोने लगी. कृतिका को बिलख–बिलखकर रोते देखकर सुदर्शन की आँखों में भी नमी आ गई.

सुदर्शन मन में खुद से बोलने लगा कि तू भी गधा हैं यार. बिना मतलब ये फालतू बातें पूछने लगा. तुझे पता हैं, ये रोने लग जाती हैं. फिर भी हर दूसरे–तीसरे दिन तू इसके जख्मों को कुरेदने लगता हैं. और तू क्या इस बेचारी को बार–बार मुर्ख–महामुर्ख बोलता रहता हैं. तू खुद भी तो कभी मुर्ख बना था. इसको तो उस लड़के ने अपने जाल में फँसाया हैं. लेकिन तू तो खुद चलकर आया था, मुर्ख बनने के लिए. तू बार–बार क्यों भूल जाता हैं ? कभी तू खुद भी इस लड़की की तरह रो रहा था.

सुदर्शन ने कृतिका का बाजू पकड़कर कहा—“प्लीज ! चुप हो जाओ. मुझे अच्छा नहीं लग रहा, तुम्हें रोते देखकर.”

कृतिका रोना बन्द करके सिसकती रही, उसके आँशू रूक नहीं रहे थे.

कृतिका दस मिनट बाद अपनी आँखें पोंछकर बोली—“एम सॉरी, यार. तुम्हें बहुत देर हो गई. अब तुम घर जाओ. तुम सारा दिन ऑफ़िस में काम करके थके हुए आते हो और मैं अपना रोना लेकर बैठ जाती हूँ.”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“एक तरफ तो तुमने मुझे अपना दोस्त बना लिया. फिर कहती हो, मैं अपना रोना लेकर बैठ जाती हूँ. दोस्त होते किसलिए हैं ? लवर से धोखा खाए हुए दोस्तों का रोना–धोना सुनने के लिए.”

सुदर्शन हँसने लगा. सुदर्शन को हँसते देखकर कृतिका को भी हल्की हँसी आ गई.

कृतिका ने मुस्कुराते हुए कहा—“अच्छा, अब तुम जाओ. बाकि रोना–धोना कल करूँगी.”

सुदर्शन—“तुम ठीक हो.”

कृतिका—“हाँ.”

सुदर्शन—“घर चली जाओगी.”

कृतिका—“हाँ, यार ! रोज जाती हूँ ना.”

सुदर्शन—“अच्छा, ठीक हैं. अपना ख्याल रखना और गाड़ी ध्यान से चलाना. तेज मत चलाना.”

कृतिका—“हम्म…”

सुदर्शन गाड़ी का गेट खोलकर गाड़ी से उतरा और कृतिका से कहा—“फिर मिलेगें. टेक केयर.”

कृतिका—“यू टू.”

सुदर्शन गाड़ी का गेट बन्द करके गाड़ी से दूर हुआ. कृतिका ने गाड़ी स्टार्ट की और गाड़ी चलाकर चली गई.

सुदर्शन अपनी बिल्डिंग की तरफ चल पड़ा और चलते–चलते सुदर्शन ने सोचा कि कृतिका बहुत अपसेट होकर रोते हुए गई हैं. उस दिन मानसरोवर से आते टाइम उसने कैसे गाड़ी की स्पीड बढ़ा दी थी. पिछले हफ्ते भी वो इसी तरह रोते हुए गई थी और दूसरे दिन एक्सीडेंट करके सर में चोट खाई हुई मिली थी. कहीं वो आज फिर से कोई एक्सीडेंट ना कर ले.

सुदर्शन ने अपनी जेब से अपना मोबाइल निकाला और कृतिका को कॉल किया.

गाड़ी चलाती हुई कृतिका को लगा कि माँ–पापा का कॉल होगा. इसलिए कृतिका ने कॉल रिसींव नहीं किया.

सुदर्शन ने अपनी बिल्डिंग तक आते–आते कृतिका को चार बार कॉल किये, लेकिन कृतिका ने रिसींव नहीं किये. जब पाँचवा कॉल आया तो कृतिका ने मोबाइल उठाया और गुस्से में नम्बर देखे बिना ही मोबाइल स्वीच–ऑफ कर दिया.

सुदर्शन ने छटी बार कॉल किया तो नम्बर स्वीच–ऑफ सुनकर सुदर्शन टेन्शन में आ गया और मुड़कर तेज–तेज कदमों से चलता हुआ वापस आम्रपाली सर्किल तक आया.

सुदर्शन सोचने लगा कि कृतिका ने कॉल रिसींव क्यों नहीं किया ? कहीं कोई प्रोब्लम तो नहीं हो गई ?

कुछ देर बाद सुदर्शन को ख्याल आया कि शायद मोबाइल साइलेंट हो या बैटरी खतम हो गई हो.

दस मिनट तक परेशान खड़ा रहने के बाद सुदर्शन वापस अपनी बिल्डिंग की तरफ़ चल पड़ा.

रात के एक बजे सुदर्शन बिस्तर पर लेटा हुआ था, आज उसे नींद नहीं आ रही थी. थोड़ी–थोड़ी देर बाद सुदर्शन कृतिका को कॉल करता रहा, लेकिन कृतिका का मोबाइल बन्द था. सुदर्शन सारी रात कृतिका के बारे में सोच–सोचकर परेशान होता रहा. सुबह के चार बजे बाद उसे नींद आई.

सुबह छः बजे उठने के बाद सुदर्शन उदास मन से रोज की तरह ऑफ़िस जाने के लिए तैयार होकर बिल्डिंग लॉक करके चल पड़ा. आम्रपाली सर्किल पर आकर उसने कृतिका की गाड़ी देखी, तो सुदर्शन की जान में जान आई.

सुदर्शन गाड़ी के पास आकर गाड़ी में बैठने के बाद नाराज होते हुए बोला—“तुमने कल रात कॉल रिसींव क्यों नहीं किया. मैं सारी रात परेशान रहा, सोया भी नहीं.”

कृतिका हँसकर बोली—“ओह………वो तुम्हारा कॉल था क्या ? एम सॉ सॉरी, मुझे लगा मॉम–डेड का कॉल हैं, तो मैनें कॉल देखे बिना ही मोबाइल बन्द कर दिया था.”

सुदर्शन—“अरे, कॉल किसी का भी हो. रिसींव करके जवाब तो देना चाहिए ना. अगर टाइम ना हो, तो फ्री होने के बाद भी जवाब दिया जा सकता हैं.”

कृतिका—“एम सॉरी यार, आगे से ऐसा नहीं करूँगी.”

सुदर्शन—“कोई बात नहीं.”

कृतिका—“लेकिन तुम इतना क्यों परेशान हो गए ?”

सुदर्शन—“अरे, मैं परेशान नहीं हो सकता क्या ? तुम्हारा बॉयफ्रैंड नहीं हूँ, तो क्या हुआ ? कम से कम दोस्त तो हूँ ही.”

कृतिका ने मुस्कुराकर गाड़ी स्टार्ट करते हुए कहा—“अब लाइफ़ में बस एक तुम ही तो दोस्त हो.”

कृतिका रोज की तरह सुदर्शन के साथ बातें करते हुए गाड़ी चलाकर जयसिंह के घर की तरफ़ ले गई.


तीन दिन बाद चौदह मई, रविवार की सुबह छः बजे नारायण की दुकान के बाहर बनी चौकी(कई दुकानदार ग्राहकों के बैठने के लिए दुकान के आगे तीन–चार लोगों के बैठने लायक जो ट्रेन की लम्बी सीट नुमा आकृति बनवाते हैं) पर बैठे सुदर्शन और आलोक के सामने कुर्सी पर बैठे नारायण के बीच बातचीत चल रही थी.

आलोक ने सुदर्शन से कहा—“भाई, उस लड़की को तेरे से प्यार हो गया हैं. रोज सुबह घर से ऑफ़िस छोड़कर आती हैं. फिर रात को ऑफ़िस से घर छोड़कर जाती हैं. बिना मतलब वो ऐसे क्यों आएगी ? वो भी एक लड़की.”

सुदर्शन—“अरे, प्यार–व्यार कुछ नहीं. कोई बात करने वाला, कोई मिलने–जुलने वाला नहीं हैं उसके पास. इसलिए आ जाती हैं.”

नाराणय—“ना भाई, जद सारो दिन निकल जावे. तो ये सुबह–शाम के दो–चार घंटे काडणा(निकालना) म के दिक्कत हैं ?”

आलोक—“हाँ, वहीं तो बात हैं.”

सुदर्शन—“नहीं यार… और वैसे भी मुझे उसमें बिल्कुल भी दिलचस्पी नहीं हैं. एक तो वो झान की(बहुत ज्यादा) दारू पीती हैं. दूसरा मुझे ये गर्लफ्रैंड बनकर रिलेशन बनाने वाली लड़कियाँ बिल्कुल पसन्द नहीं हैं. हाँ, रोज मिलती हैं. अपने पास आकर अपना दुखड़ा सुनाती हैं, इसलिए उससे थोड़ी हमदर्दी हो गई हैं.”

आलोक—“देख भाई, दारू तो छुड़ाई जा सकती हैं. और रही बात रिलेशन की. तो आज के टाइम में सती–सावित्री मिलना तो लगभग नामुनकिन हैं. कोई स्कूल में सैट होती हैं, कोई कॉलेज में सैट होती हैं, कोई जहाँ नौकरी करती हैं, वहाँ किसी के साथ सैट होती हैं और जो घर से बाहर नहीं आती, उसको कोई आस–पड़ौस वाला पटा लेता हैं. ये लड़के और आदमी चील और गिद्ध की तरह नजर रखते हैं, लड़कियों और औरतों पर. मौका मिलते ही, झपटकर दबोच लेते हैं. किसी को प्यार के नाम पर, किसी को कोई लालच देकर, किसी की मजबुरी का फायदा उठाकर और जो गुंडे–मवाली या ताकतवर लोग हैं, वो जबरदस्ती उठाकर ले जाते हैं.”

सुदर्शन—“ये जबरदस्ती और मजबुरी वाले मामलों में लड़कियों और औरतों की गलती नहीं हैं. लेकिन बाकि सब में तो देख, अगर मैं लालची हूँ, तो गलत लोग मेरे लालची होने का फायदा जरूर उठाएँगें. अगर मैं प्यार के नाम पर मुर्ख बनने वाला हूँ, तो गलत लोग मेरी मुर्खता का फायदा जरूर उठाएँगें.”

नारायण ने सुदर्शन से पूछा—“मतलब, आ छोरी मुर्ख हैं ?”

सुदर्शन—“मुर्ख ही हैं, और क्या हैं ?”

आलोक ने सुदर्शन से पूछा—“फिर तू उसके लिए परेशान क्यों हो रहा हैं ?”

सुदर्शन—“बता तो दिया, उसको रोते देखकर अच्छा नहीं लगता.”

नारायण ने सुदर्शन से कहा—“तो के(कह) दे, मत आया कर यहाँ गाड़ी लेकर. ना वो आवेगी, ना तू उसको रोता देखेगा.”

सुदर्शन ने मुस्कुराते हुए कहा—“अरे यार, ऐसे अच्छा नहीं लगता. बेचारी रोज आती हैं, मुझे ऑफ़िस छोड़कर आती हैं, घर लेकर आती हैं. अब अचानक कहूँगा, मत आया कर. तो पहले से दुःखी हैं, और ज्यादा दुःखी हो जाएँगी.”

आलोक ने सुदर्शन से कहा—“ओ रेन(रहने) दे, भाई. तुझे खुद उसकी गाड़ी में आने–जाने की आदत हो गई हैं.”

नारायण ने आलोक का साथ देते हुए कहा—“और उसके साथ बातें करने की भी.”

सुदर्शन मुस्कुराकर बोला—“यार, अब वो खुद ही आती हैं. मैं तो कभी उसके पास गया नहीं.”

नारायण और आलोक हँसने लगे.

नारायण—“अच्छा–अच्छा, ठीक हैं.”

सुदर्शन ने गंभीरता से कहा—“लेकिन इस लड़की के लिए कुछ बताओ तो सही. उस लड़के के कारण बहुत रोती हैं. उस पर बेचारी की बात सुनने और समझने वाला भी कोई नहीं हैं.”

आलोक—“तू हैं तो सही.”

सुदर्शन—“इसलिए तो बता रहा हूँ.”

नारायण ने मजाकियाँ लहजे में सुदर्शन से कहा—“अभी तो तू बोल्यो, वो मुर्ख हैं. गलत लोग मुर्ख की मुर्खता का फायदा जरूर उठाएँगें.”

सुदर्शन ने तिलमिलाते हुए कहा—“मुर्ख तो हैं, लेकिन इसका मतलब ये थोड़े ही हैं, कि मुर्ख की मुर्खता का फायदा उठाने वाले लोग सही हैं. उस धोखेबाज बेकार लड़के के होश तो ठिकाने लगाने ही चाहिए.”

नारायण ने गंभीर होकर सुदर्शन से कहा—“यार, एक बात बता. तुझे इस लड़की में कोई खास दिलचस्पी नहीं हैं. तू इस लड़की को मुर्ख भी मानता हैं. फिर तुझे उस लड़के से इतनी चिढ़ क्यों हैं ?”

आलोक ने सुदर्शन से पूछा—“हाँ, भाई. उस लड़के का जिक्र होते ही तेरी आँखों से आग बरसने लगती हैं. इसका क्या कारण हैं ?”

सुदर्शन ने शान्त होते हुए कहा—“हैं, कोई कारण. फिर कभी बताऊँगा. अभी तो बस इतना समझ लो, मुर्ख बनकर धोखा खाने का दर्द, मुर्ख बनकर धोखा खा चुके लोग ही समझते हैं.”

आलोक ने सुदर्शन से पूछा—“मतलब तूने भी धोखा खाया हैं ?”

सुदर्शन—हाँ, लेकिन अभी उस लड़के को सबक सिखाने का कोई तरीका हैं, तो बताओ ?”

आलोक—“उस लड़के ने इस लड़की से शादी करने से मना कर दिया, इसलिए ये इतनी ज्यादा दुःखी हैं ना ?”

सुदर्शन—“हाँ, पहले प्यार–मोहब्बत और शादी के सपने दिखाकर रिलेशन बनाए. फिर घटिया–घटिया, गन्दी–गन्दी बातें बोलकर छोड़ दिया.”

आलोक—“तो अगर वो लड़का इससे शादी करले, फिर ये खुश हो जाएगी ?”

सुदर्शन—“ये खुश हो या ना हो. लेकिन मैं चाहता हूँ, वो लड़का भी तड़प–तड़पकर रोए और उसे अफसोस हो, कि उसने धोखा क्यों दिया ?”

आलोक—“अगर ऐसी ही बात हैं, तो मेरी गोविन्द बिशनोई से बहुत अच्छी बनती हैं. उस लड़के को तो दो मिनट में सीधा कर सकते हैं. गोविन्द बिशनोई को वैसे भी घटिया लोगों से चिढ़ हैं. बस खाली बताना ही हैं, इस लड़के के बारे में.”

सुदर्शन—“जब वक्त आएगा, तब इसके बारे में भी सोचेगें. अभी तो उसकी धोखेबाजी सबके सामने लाने का कोई तरीका हैं, तो बता ?”

आलोक—“ये तो बहुत आसान हैं.”

सुदर्शन—“बता फिर ?”

आलोक—“इस लड़की की फेसबुक आईडी तो जरूर होगी ?”

सुदर्शन—“हाँ, हैं. कृतिका बागड़ी नाम से और आठ सौ से ज्यादा फ्रैंड भी हैं. लेकिन ब्रेकअप के बाद से वो फेसबुक ज्यादा नहीं चलाती.”

आलोक—“हाँ, तो कोई बात नहीं. अब चला लेगी. उसको बोल उस लड़के के बारे में फेसबुक पर पोस्ट करें. इससे उस लड़के के बारे में सबको पता चल जाएगा.”

नारायण—“फ्लॉप हैं, तेरो तरीको.”

आलोक—“क्यों ? वो इतने बड़े सेठ साँवरमल जी की बेटी हैं. लोग उसके पोस्ट पर ध्यान तो जरूर देगें.”

नारायण—“पर बदनामी ज्यादा छोरी गी ही होवेगी. शहर में जितने लोगों को साँवरमल जी की बेटी के बारे में पता हैं, वो सब जानते हैं. ये लड़की रात–रात भर बाहर घूमती हैं. दारू में टली रहती हैं. उल्टो असर होवेगो.”

सुदर्शन—“नारायण भाई की बात सही हैं. सबको पता हैं, ये एक नम्बर की बेवड़ी और बिगड़ैल हैं. इससे कृतिका के लिए प्रोब्लम बढ़ जाएगी.”

आलोक ने सुदर्शन की तरफ देखकर कहा—“तू एक बात बता, तेरे साथ उसने कोई गलत हरकत की ?”

सुदर्शन—“नहीं.”

आलोक—“तो फिर शराब पीना गलत बात हैं, लेकिन बिगड़ैल कैसे हुई ?”

सुदर्शन—“अरे, अब मैं महिने से उससे रोज मिलता हूँ, उसकी बातें सुन रहा हूँ, इसलिए मुझे उसके बारे में सारी बातें मालूम हैं. मैनें तुम लोगों को बता दिया, इसलिए तुम दोनों को पता हैं. लेकिन सारे शहर को थोड़े ही पता हैं, वो कैसे बिगड़ी ?”

नारायण—“यहीं तो बात हैं. ये समझ नहीं रहा.”

आलोक—“अरे यार, जैसे उसने तुझे बताया. वैसे वो उस लड़के के बारे में सबको बताएगी, तभी तो सबको पता चलेगा. और भले ही लड़के को ज्यादा फर्क ना पड़े. लेकिन उसके माँ–बाप को तो फर्क पड़ेगा ना. जब लोग कहेगें, तुम्हारा लड़का लड़कियों के साथ ऐसे करता हैं. तुम लोगों ने उसे यहीं सिखाया हैं.”

सुदर्शन ने आलोक से कहा—“क्या बात कर रहा हैं ? यार ! सब बोलेगें, उस बिगड़ैल लड़की ने ही फँसाया होगा. जवाँन लड़का हैं, फिसल गया. अब जब लड़के को समझ आई, तो कृतिका लड़की होने का फायदा उठाकर उस भोले–भाले मासूम लड़के को बदनाम कर रही हैं.”

नारायण—“हाँ, कृतिका को कोई शादी करने वाला मिल नहीं रहा, इसलिए उसे मजबुर करके उससे शादी करना चाहती हैं. ये बोलेगें सब.”

आलोक ने हँसकर सुदर्शन से कहा—“लेकिन तू तो बता रहा था, उस लड़के ने कृतिका से पहले भी चार लड़कियों को गर्लफ्रैंड बनाकर रिलेशन(शारीरिक संबंध) बनाने के बाद छोड़ दिया.”

सुदर्शन—“हाँ, तो ?”

आलोक—“तो क्या ? भोले–भाले मासूम लड़के एक के बाद एक बार–बार फिसलते हैं क्या ? ऐसी कौनसी उसमें स्पेशल जवाँनी आ गई ? हम भी तो जवाँन हैं. मेरे ऑटो में एक से एक खूबसूरत लड़कियाँ और औरतें बैठती हैं. मैनें तो कभी किसी को नहीं छेड़ा.”

नारायण—“ऑटोवालों के बारे में म्हाने बेरो(मालूम) हैं. एक बार म रात न आण लाग रयो. स्टेशन पर पेड़या खन खड़ा होर छोरया अर लुगाया न सुणा–सुणा ग ओछा गाणा गावा हा.”(हिन्दी अनुवाद : ऑटोवालों के बारे में हमें मालूम हैं. एक बार मैं रात को आ रहा था. स्टेशन पर सीढ़ियों के पास खड़े होकर लड़कियों और औरतों को सुना–सुनाकर गन्दे गाने गा रहे थे.)

आलोक ने नारायण से कहा—“अब भाई जी, मैं दूसरों की गारन्टी कैसे ले सकता हूँ ? आपने कभी मुझे कोई गलत हरकत करते देखा हैं, तो बताओ ?”

नारायण ने आलोक से कहा—“नहीं–नहीं, मैं तो उनकी ही बात बताई हैं. तेरे बारे में थोड़ी कहा हैं. मेरे कहने का मतलब, तू भी ऑटोवाला हैं और वो भी ऑटोवाले हैं. लेकिन तू बा सबसे अलग हैं.”

आलोक—“अच्छा, अब बताओ, उस लड़के का ? उसके बारे में फेसबुक पर ये चार लड़कियों वाली बात लिख सकते हैं ना ?”

सुदर्शन ने आलोक से कहा—“क्या खाक बताऊँ ? तू कृतिका को जैल भिजवाने वाले रास्ते बता रहा हैं.”

आलोक ने हैरान होकर कहा—“कृतिका जैल कैसे जाएँगी ?”

सुदर्शन—“जब कृतिका फेसबुक पर पोस्ट करेगी, दिव्यांश ने इन चार लड़कियों के साथ भी प्यार के नाम पर रिलेशन बनाए थे. तब वो चारों लड़कियाँ कहेगी, नहीं, हमारे साथ तो कुछ नहीं हुआ. हम तो सती–सावित्री हैं. ये कृतिका अपने मतलब के लिए हमें बदनाम कर रही हैं. तब कृतिका पर चार लड़कियों को बदनाम करने का पुलिसकेस नहीं बनेगा क्या ?”

आलोक—“तो उन लड़कियों का नाम लिखे बिना पोस्ट कर देगी.”

नारायण—“फिर वो दिव्यांश कहेगा, बता कौनसी चार लड़कियों को धोखा दिया मैनें ?”

आलोक—“ओह…ये तो मेरे दिमाग में नहीं आया.”

नारायण ने आलोक से कहा—“तो ही तो मैं बोल्यो, फ्लॉप हैं, तेरो तरीको.”

सुदर्शन ने आलोक को समझाते हुए कहा—“अब देख, अपने तो सिर्फ कृतिका को जानते हैं. कृतिका के बारे में अपने को मालूम हैं, कृतिका प्यार के नाम पर बेवकूफ बनी हैं. लेकिन उन बाकि चार लड़कियों के बारे में तो अपने को कुछ नहीं पता ना. क्या पता उन लड़कियों ने सब कुछ जानते और समझते हुए सिर्फ इंजॉय करने के लिए रिलेशन बनाए हो ?”

नारायण—“बेवकूफ बनी हो, तब भी. उनमें सबके सामने बताने की हिम्मत हो, ना हो ?”

आलोक—“हाँ………लेकिन अगर कृतिका के पास कोई सबूत होता, तब शायद काम बन जाता.”

सुदर्शन—“तब भी शायद वो दूसरी लड़कियों के बारे में नहीं लिख सकती.”

नारायण—“नहीं, तब लिख सकती हैं. बस उन लड़कियों की पहचान नहीं बता सकती.”

सुदर्शन ने नारायण से पूछा—“दूसरी लड़कियों के बारे में वो कैसे लिख सकती हैं ?”

नारायण—“अगर उसके पास इस बात का सबूत हो, कि उस लड़के ने कृतिका समेत पाँच लड़कियों को प्यार के चक्कर में फँसाकर उनके साथ रिलेशन बनाए हैं. तब कृतिका उन लड़कियों की पहचान उजागर किये बिना लिख सकती हैं. ऐसी हालत में ये तो साफ़ हो जाएगा, उस लड़के ने कृतिका समेत पाँच लड़कियों के साथ रिलेशन बनाए हैं. लेकिन वो बाकि चार लड़कियाँ कौन हैं ? ये पता नहीं चलेगा. अब अगर वो लड़का कृतिका पर खुद को बदनाम करने का केस करता हैं, तो कृतिका के पास उसके खिलाफ़ सबूत होने जरूरी हैं.”

सुदर्शन—“अब सबूत तो कृतिका से पूछना पड़ेगा.”

आलोक—“हाँ, तो फिर उससे पूछ ले और उसको बोल फेसबुक पर पोस्ट करने के लिए. जैसे ही लोगों को पता चलेगा, साँवरमल जी की बेटी ने पोस्ट किये हैं. तो हर कोई इस मामले को जानने में दिलचस्पी लेगा. फिर उस लड़के और उसके घरवालों पर कुछ तो असर जरूर पड़ेगा.”

सुदर्शन ने आलोक से कहा—“चल मान ले, फेसबुक पर पोस्ट करने से उस लड़के और उसके घरवालों पर असर हो गया. लेकिन फिर भी उस लड़के को तकलीफ और परेशानी होगी, इसकी क्या गारन्टी हैं ?”

आलोक—“तुका(चान्स लेकर देखना) मारकर देख लेते हैं. कभी–कभी फिल्मी फंडे भी हिट हो जाते हैं.”

सुदर्शन—“चल फिर ठीक हैं. मैं कृतिका से पूछता हूँ. अगर उसके पास कोई ऐसे सबूत हैं, जिससे इस लड़के की धोखेबाजी साबित हो जाए, तो कृतिका से पोस्ट जरूर करवाएँगें.”

नारायण—“हाँ, वो लड़की ये साबित कर सकती हैं, कि उस लड़के ने ये सब किया हैं. फिर आलोक की बात सच हो भी सकती हैं. क्योंकि थोड़ी बहुत बदनामी तो लड़के की भी होती हैं.”

आलोक ने नारायण ने पूछा—“अच्छा भाई जी, ये पहचान उजागर वाली बात में एक बात बताओ ?”

नारायण—“पूछ.”

आलोक—“किसी लड़की या औरत के साथ ब्लात्कार हो जाए, तो उस लड़की या औरत की पहचान छुपाई जाती हैं. लेकिन उस लड़की या औरत के आस–पड़ौस वालों को, परिवार और रिश्तेदारी के लोगों को तो कैसे ना कैसे पता चल ही जाता हैं. फिर ये पहचान किससे छुपाई जाती हैं ? मान लो, दिल्ली में किसी के साथ ब्लात्कार हो गया. अब अपने को उसके बारे में पता चल भी जाए, तो अपने कौनसा दिल्ली जाकर उसको परेशान करने वाले हैं ? परेशान तो आस–पास पड़ौस वाले और रिश्तेदार करते हैं और उनको सब पता चल ही जाता हैं.”

नारायण—“अरे, अब इतना तो मुझे भी पता नहीं हैं. टीवी पर खबरा म देखेड़ो बताऊँ म तो. और मेरी किसी वकालत करेड़ी हैं ?”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर खड़े होते हुए कहा—“अजीब कानून हैं. अच्छा, मैं तो चलता हूँ. फिर मिलेगें.”

नारायण—“ठीक हैं, भाई.”

आलोक खड़ा होकर बोला—“मैं भी चलता हूँ.”

नारायण—“ठीक हैं, भाई. तू भी कर कमाई.”

सुदर्शन अपनी बिल्डिंग की तरफ़ चला गया और आलोक ऑटो में बैठकर ऑटो स्टार्ट करके ऑटो चलाते हुए आम्रपाली सर्किल की तरफ चला गया.

सुबह नौ बजे सुदर्शन बिल्डिंग के मुख्य दरवाजे पर ताला लगाकर चलते हुए आम्रपाली सर्किल पर आया.

कुछ देर बाद कृतिका की गाड़ी आकर रूकी. सुदर्शन गाड़ी का दरवाजा खोलकर गाड़ी में बैठ गया. कृतिका ने गाड़ी आगे बढ़ाई.

सुदर्शन गाड़ी चलने के बाद बोला—“आज ऑफ़िस नहीं जाना.”

कृतिका—“क्यों, तुम तो संडे को भी ऑफ़िस जाते हो ना.”

सुदर्शन—“हाँ, लेकिन आज सेठ जी ने नहीं बुलाया.”

कृतिका ने खुश होते हुए कहा—“हम्म…तो फिर आज कहाँ चले ?”

सुदर्शन ने मुस्कुराते हुए कहा—“जहाँ तुम ले जाना चाहो.”

कृतिका—“तो आज तुम्हें पूरा दिन शहर घूमाऊँ ? अगर तुम्हें कोई प्रोब्लम ना हो तो ?”

सुदर्शन—“हाँ, जरूर. वैसे भी इस शहर में साढ़े चार साल से ज्यादा टाइम हो गया. लेकिन कुछ देखा ही नहीं. बस चार–पाँच दोस्त हैं, आज की तरह जब छुट्टी मिलती हैं, तो कभी–कभी उनके घर चला जाता हूँ.”

कृतिका—“चलो, फिर आज तुम्हें पूरा गुलाबी नगर दिखाती हूँ.”

कृतिका ने गाड़ी में म्यूजिंक ऑन करके गाना चलाया.

रिमझिम घिरे सावन,
उलझ–उलझ जाए मन,
भीगे आज इस मौसम में,
लगी कैसी ये अगन,

कृतिका सारा दिन जगह–जगह गाड़ी रोककर सुदर्शन को कुछ ना कुछ खिलाते–पिलाते हुए छोटी–चोपड़, बड़ी–चोपड़, आमेर, जलमहल, सांगानेर बहुत सारी जगह लेकर गई.

शाम के आठ बजे कृतिका ने गाड़ी प्रिंस रोड़ पर लाकर साइड में खड़ी करके बन्द कर दी और एक सिगरेट निकालकर मुँह में रखकर लाइटर से सिगरेट जलाने लगी.

सुदर्शन ने कृतिका की तरफ देखकर मन में कहा कि हत तेरे की. आज सारा दिन नशे से दूर रहकर चहकती–खिलखिलाती हुई कितनी अच्छी लग रही थी. शाम होते–होते एक सिगरेट तो जला ही ली.

कृतिका ने गाड़ी के बाहर मुँह से धुँआ निकाला और सुदर्शन की तरफ देखकर कहा—“तुम भी सोचते होगे. पता नहीं क्यों ये नशेड़ी लड़की मेरे पीछे पड़ गई ?”

सुदर्शन—“नहीं तो, ऐसा मैनें कब कहा ?”

कृतिका—“तुमने नहीं कहा, लेकिन मन में सोचते तो होगे ?”

सुदर्शन—“अब तुम खुद ही अपने दिमाग में उल्टा–सीधा सोचो, उसका तो कोई ईलाज नहीं हैं. मैनें पहले भी बताया हैं, मुझे किसी भी तरह का नशा बिल्कुल पसन्द नहीं हैं, लेकिन दूसरों के नशा करने से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता. क्योंकि सबको नशे से होने वाले नुकसान पता होते हैं. अब उनको जानबुझकर मरना हैं, तो मरे.”

कृतिका—“एम सॉरी, यार ! लेकिन मैं क्या करूँ ? दिव्यांश से धोखा खाने के बाद मेरी जीने की इच्छा ही खतम हो गई.”

सुदर्शन—“यहीं तो गलती हैं तुम्हारी. धोखा उसने दिया और जीने की इच्छा तुम्हारी खतम हो गई. सबक सिखाओ उसे. उसको भी वहीं तकलीफ दो, जो तुम्हें हुई हैं.”

कृतिका—“अब मैं क्या सबक सिखाऊँ उसे ? वो लड़का हैं, मैं लड़की हूँ. अगर मैनें उसे धोखा दिया होता, तब भी लोग मुझे बेकार बोलते. अब उसके धोखे के बारे में किसी को बताऊँ, तब भी बेकार मैं ही कहलाऊँगी. और मुझे तो पहले से ही सब बिगड़ैल बोलते हैं.”

सुदर्शन—“तुम मुझे अपना दोस्त मानती हो ?”

कृतिका—“तुम्हें शक हैं ?”

सुदर्शन—“शक नहीं हैं, लेकिन अगर दोस्त मानती हो, तो फिर एक प्रोमिस करो, तुम रोओगी नहीं. मैं जो पूछ रहा हूँ, रोये बिना बताओगी.”

कृतिका—“ऐसा क्या पूछ रहे हो ?”

सुदर्शन—“पहले प्रोमिस.”

कृतिका—“प्रोमिस. नहीं रोऊँगी. अब बताओ."

सुदर्शन—“तुम्हारा बॉयफ्रैंड दिव्यांश, उसे तुमसे पैसे लेने की क्या जरूरत पड़ गई ? तुम बता रही थी, तुम उसे पैसे की मदद भी करती थी.”

कृतिका—“वो अपने पापा के साथ ही, उनके बिजनेस में हेल्प करता हैं. उसने कई बार हिसाब में गड़बड़ करके अपने पापा के पैसे चुराए हैं. तो कई बार उसके पापा ने उसका ऑफ़िस जाना और उसको पैसे देना बन्द कर दिया. तब मैं उसे पैसे देती थी.”

सुदर्शन—“अच्छा, तुम्हारे पास उसके कोई मैसेज, कोई फोटो वगैरह हैं, जिससे ये पता चलता हो, वो तुम्हारा बॉयफ्रैंड था और उसने तुम्हारे साथ रिलेशन बनाए हैं.”

कृतिका—“फेसबुक पर बहुत मैसेज हैं, वॉट्सऐप पर मैसेज हैं. कुछ उसके साथ ली हुई सेल्फी हैं. बस और तो कुछ नहीं हैं.”

सुदर्शन—“और वो तुम्हारे साथ उस टाइप की बातें करता था ?”

कृतिका मुस्कुराते हुए आँखें ऊपर करके बोली—“किस टाइप की ?”

सुदर्शन—“अरे, वो………तुम समझ जाओ ना.”

कृतिका—“हाँ, करता था. बॉयफ्रैंड बनने के बाद वो ज्यादातर वैसी ही बातें करता था.”

सुदर्शन—“और तुम ?”

कृतिका—“मैं भी करती थी.”

कृतिका ने सिगरेट बाहर फेंककर अपना मोबाइल उठाते हुए कहा—“एक मिनट रूको.”

कृतिका ने मोबाइल में नेटऑन करके फेसबुक लॉग–इन की. फेसबुक पर दिव्यांश के मैसेज निकालकर मोबाइल सुदर्शन को देते हुए कहा—“अब उसने मुझे ब्लॉक कर रखा हैं. ये उसके मैसेज हैं, तुम देख लो.”

सुदर्शन ने मोबाइल लिया और कृतिका की फेसबुक में कृतिका और दिव्यांश के मैसेज पढ़ने लगा.

कृतिका ने कहा—“ये मैसेंजर में देख लो ना. बार–बार क्लिक नहीं करना पड़ेगा.”

सुदर्शन ने कहा—“इसमें तो बहुत सारे मैसेज हैं. अगर तुम बुरा ना मानो तो दो–चार दिन के लिए तुम्हारा मोबाइल मुझे दे सकती हो ?”

कृतिका—“हाँ, ले लो. बस एक सिम–कार्ड निकाल दो. वो मॉम–डेड कॉल करते हैं ना, इसलिए.”

सुदर्शन ने मोबाइल कृतिका को देते हुए कहा—“लो तुम खुद निकाल लो.”

कृतिका ने मोबाइल लेकर खोला और उसमें से एक सिम निकालकर मोबाइल सुदर्शन को वापस दे देते हुए कहा—“अब जितने मरजी दिन रख लो.”

सुदर्शन ने मोबाइल लेकर मोबाइल को वापस बन्द(मोबाइल का ढक्कन लगाकर) करके अपनी जेब में डाल लिया.

कृतिका ने गाड़ी के ड्रोअर में से एक पुराना मोबाइल निकालकर सुदर्शन को दिये मोबाइल में से निकाली हुई सिम पुराने मोबाइल में डालकर पुराना मोबाइल ऑन करके सामने छोड़ दिया.

सुदर्शन ने कहा—“अच्छा, एक बात बताओ ? तुमने कोई सवाल–जवाब किये बिना अपना मोबाइल दे दिया. अगर मैनें मोबाइल में से तुम्हारा कोई सीक्रेट निकालकर तुम्हारे लिए कोई प्रोब्लम कर दी तो ?”

कृतिका ने हँसकर कहा—“कोई बात नहीं, यार ! इस बहाने शराब पीने का एक और बहाना मिल जाएगा. मरूँगी तो शराब से ही, खुदखुशी तो नहीं करूँगी.”

सुदर्शन—“अरे, मजाक कर रहा हूँ. मैं कोई प्रोब्लम नहीं करूँगा. मुझे तुम्हारी ये मरने वाली बातें बहुत बुरी लगती हैं. तुम ऐसे मत बोला करो.”

कृतिका ने मुस्कुराते हुए कहा—“लेकिन अभी तो तुमने कहा, जिनको जानबुझकर मरना हैं, मरे.”

सुदर्शन ने नाराज होते हुए कहा—“ओहो, अब मैं चलता हूँ. तुम भी अपने घर जाओ.”

सुदर्शन गाड़ी से उतरने के लिए गाड़ी का दरवाजा खोलने लगा.

कृतिका ने सुदर्शन का बाजू पकड़कर कहा—“एम सॉरी, यार.”

सुदर्शन ने गाड़ी का दरवाजा छोड़कर कृतिका का हाथ हटाकर कहा—“अब सॉरी क्यों बोल रही हो ? तुम्हें मरना हैं ना, मरो.”

कृतिका ने स्टैरिंग पर हाथ रखकर मुँह नीचे कर लिया. कृतिका की आँखें भीग गई.

सुदर्शन ने कृतिका के आँशू निकलते देखकर कहा—“अब रोने क्यों बैठ गई ?”

कृतिका ने आँशू पोंछ लिए, लेकिन मुँह से कुछ बोली नहीं.

सुदर्शन ने मन में कहा कि क्या हैं यार ये. जब देखो, रोने लग जाती हैं.

सुदर्शन ने कृतिका का बाजू पकड़कर कहा—“तुम एक बात बताओ, अब कोई दोस्त मरने की बात करे, तो बुरा नहीं लगता क्या ? मैनें तो तुम्हारे साथ थोड़ा हँसने के लिए मजाक में कहा. तुम बोलती हो, शराब पीकर ही मरूँगी. उस रात की तरह ये भी तो बोल सकती थी, सर फोड़ूगी, फिर तेरा.”

कृतिका—“वो तुम्हें थोड़े ही कहा था. वो तो नशे में तुम्हें दिव्यांश समझकर कहा था. मुझे तो याद भी नहीं, तुमने ही बताया.”

सुदर्शन—“मेरा मतलब तुम खुद के बारे में बुरा मत बोला करो और तुम रोज रात को बारह–एक बजे बाद घर जाती हो. आज तो हम सुबह नौ बजे से साथ घूम रहे हैं. आज तो जल्दी घर जाओ.”

कृतिका—“ठीक हैं. चलो पहले तुम्हें छोड़ देती हूँ.”

सुदर्शन—“हाँ, चलो.”

कृतिका ने गाड़ी स्टार्ट की और आम्रपाली सर्किल की तरफ चल पड़ी.


सताईस दिन बाद दस जून, शनिवार को रात के दस बजे कृतिका गाड़ी चलाते हुए सुदर्शन को ऑफिस से घर लेकर आ रही थी.

सुदर्शन—“आज वहाँ नारायण की दुकान पर गाड़ी चलना. जहाँ तुमने एक बार संडे को मेरे बारे में पूछा था.”

कृतिका—“वहाँ क्यों ?”

सुदर्शन—“तुम चलो तो, कोई प्रोब्लम हैं क्या वहाँ चलने में ?”

कृतिका—“मुझे कोई प्रोब्लम नहीं हैं. लेकिन उस रात जब तुम मुझे बिल्डिंग में ले गए थे, तब तुमने ही तो कहा था, आप यहाँ से चली जाओ. अगर किसी ने देख लिया, तो गलत मतलब निकालेगें. इसलिए तो मैं यहाँ बिल्डिंग से दूर चौराहे पर गाड़ी रोकती हूँ.”

सुदर्शन ने हँसकर कहा—“अरे, वो छः महिने पुरानी बात हो गई. अब तो लोगों ने गलत मतलब निकाल भी लिए.”

कृतिका ने हैरान होकर कहा—“क्या गलत मतलब निकाल लिए ?”

सुदर्शन—“वहीं मतलब, जो एक लड़के और एक लड़की को साथ देखकर अक्सर लोग निकालते हैं. कॉलोनी में मुझे जानने वाले आधे से ज्यादा लोगों को पता हैं. पिछले दो महिने से तुम मुझे सुबह घर से ऑफ़िस और शाम को ऑफ़िस से घर छोड़कर जाती हो. हम घंटों गाड़ी में बैठे बातें करते हैं.”

कृतिका—“ओह…लेकिन सबको पता कैसे चला ?”

सुदर्शन—“किसी ने देख लिया होगा. गाड़ी में बैठते या गाड़ी से उतरते. फिर एक ने दो को बताया होगा, दो ने चार को बताया होगा, चार ने दस को बताया होगा. बस ऐसे ही फैलती हैं बातें. अब सब यहीं सोचते हैं, इस बिल्डिंग में रहने वाले सुदर्शन का उस गाड़ी वाली लड़की के साथ चक्कर चल रहा हैं. चार–पाँच दिन पहले सुबह–सुबह पड़ौस का एक आदमी हँस–हँसकर मुझे बोल रहा था, कल रात गाड़ी में क्या हो रहा था ? बारह बजे से एक बजे तक गाड़ी जोर–जोर से हिल रही थी.”

कृतिका हैरान होकर बोली—“गाड़ी कब हिल रही थी ?”

सुदर्शन ने हँसकर कहा—“गाड़ी नहीं हिल रही थी. उसका दिमाग हिला हुआ हैं. गलत सोचने वाले तो गलत सोचते ही हैं.”

कृतिका—“तो अभी दुकान पर किसलिए जा रहे हैं ?”

सुदर्शन—“अरे, वो तो दुकानवाला नारायण और आलोक, जो तुम्हें ऑटो से फ्री में घर छोड़कर आया था. उन दोनों के पास चल रहे हैं. इन दोनों को तुम्हारे बारे में सब पता हैं. ये दोनों बहुत अच्छे लोग हैं.”

कृतिका—“अच्छा.”

कृतिका ने नारायण की दुकान के सामने गाड़ी साइड में खड़ी करके रोककर बन्द कर दी. सुदर्शन और कृतिका अपनी–अपनी तरफ से गाड़ी के गेट खोलकर गाड़ी से उतरे और गेट वापस बन्द करके नारायण की दुकान पर चल पड़े.

नारायण की दुकान के आगे बनी चौकी पर आलोक के साथ बैठा नारायण खड़ा होकर दुकान के अन्दर गया. सुदर्शन आलोक के पास चौकी पर बैठ गया. नारायण दो कुर्सी लेकर दुकान से बाहर आया और एक कुर्सी कृतिका को देकर दूसरी कुर्सी पर खुद बैठ गया. एक कुर्सी पर कृतिका बैठ गई.

सुदर्शन ने जेब से कृतिका का मोबाइल निकालकर कहा—“मैनें पिछले बीस दिनों में कृतिका और दिव्यांश के बीच फेसबुक और वॉट्सऐप पर हुई बातों के सारे मैसेज पढ़कर देखे हैं और सभी मैसेज के स्क्रीन–शॉट निकालकर सारे स्क्रीन–शॉट मेरी आईडी से कृतिका की आईडी में मैसेज कर दिये हैं.”

आलोक—“बस फिर अब कृतिका जी को बोल दे, फेसबुक पर पोस्ट करने के लिए.”

नारायण—“पहले देख तो लो, कौनसे मैसेज करने हैं और कौनसे मैसेज नहीं करने.”

सुदर्शन—“सभी मैसेज पोस्ट किये जा सकते हैं. बस उन चार लड़कियों के नाम को मिटा देगें. बाकि बहुत सारे मैसेज में वो लड़का अपनी करतूत खुद ही कृतिका को बता रहा हैं. और सबसे खास बात. कृतिका ने उसे कभी कोई गलत या गन्दी बात नहीं कहीं. कृतिका ने सिर्फ उसकी गन्दी बातों के जवाब दिये हैं. इसके इलावा कृतिका ने उसको बहुत बार कहा हैं, कि मुझे ऐसी बातें करना पसन्द नहीं हैं. वो ही हर बार गन्दी–गन्दी बातें करता था.”

कृतिका हैरान होकर इधर–उधर देखते हुए सबकी बातें सुनने के बाद बोली—“कोई मुझे भी बताएगा, क्या बात हो रही हैं ?”

सुदर्शन, आलोक और नारायण तीनों हँस पड़े.

सुदर्शन—“हाँ, तुम्हें ही तो सब कुछ करना हैं. हमने तो बस सोचा हैं.”

कृतिका—“क्या ?”

सुदर्शन—“तुम उस लड़के दिव्यांश के बारे में सब कुछ, उसकी एक–एक घटिया बात फेसबुक पर पोस्ट करो. वो कैसे लड़कियों को पटाता हैं ? लड़कियों को पटाने के लिए क्या–क्या नाटकबाजी करता हैं ? पटाने के बाद लड़की को बिस्तर तक लाने के लिए क्या–क्या करता हैं ? लड़कियों के साथ कितनी घटिया और गन्दी बातें करता हैं. उसके घरवाले उसके बारे में सब कुछ जानने के बाद भी किस तरह हर बार उसको बचाते हैं ? और जब लड़की से उसका मन भर जाता हैं, फिर वो किस तरह दुत्कार कर घटिया–घटिया और गन्दी–गन्दी बातें बोलकर लड़की को छोड़ देता हैं ? ये सभी बातें पूरी डिटेल के साथ पोस्ट करो.”

कृतिका—“लेकिन इससे होगा क्या ?”

सुदर्शन—“उसके बारे में सबको सब कुछ पता चल जाएगा. हो सकता हैं, वो घबराकर तुमसे शादी कर ले.”

कृतिका—“अरे, लेकिन पता चलने से क्या होगा ? सब यहीं कहेंगे, मैनें ही उसे फँसाया होगा.”

सुदर्शन—“ये सब अनुमान हम पहले से ही लगा चुके हैं. पिछले एक–डेढ़ महिने से रोज सुबह एक–दो घंटे हम तीनों तुम्हारे बारे में ही बात करते हैं. उस लड़के को सबक सिखाने का सिर्फ एक यहीं तरीका हैं. क्योंकि उसने तुम्हारे साथ सब कुछ तुम्हारी मरजी से ही किया हैं. मैनें तुम्हारी उससे दोस्ती की शुरुआत से लेकर उसके ब्लॉक करने तक का एक–एक मैसेज पढ़ा हैं, पहले तुम्हें गर्लफ्रैंड बनाने के लिए भी वहीं हाथ धोकर तुम्हारे पीछे पड़ा था और गर्लफ्रैंड बनाने के बाद रिलेशन बनाने के लिए भी वहीं तुम्हारे पीछे पड़ा था. और मैसेज पढ़कर लगता हैं, जब उसने पहली बार तुम्हारे साथ रिलेशन बनाए, तब यकिनन उसने ड्रिंक में कुछ ऐसा मिलाया था, जिससे तुम उसे रोक ना सको. वरना ड्रिंक तो तुम रोज करती हो, लेकिन मेरे साथ तो तुमने कभी कोई ऐसी–वैसी बात नहीं की. और हाँ, इस तरीके से तुम उसे शादी के लिए मजबुर भी कर सकती हो, उसने शादी के वादे भी तो किये थे, सबूत के तौर पर ये मैसेज हैं.”

कृतिका को कुछ समझ नहीं आया और कृतिका सोच में पड़ गई कि अब क्या बोलूँ ?

आलोक ने कृतिका को सोच में डूबी देखकर कहा—“कृतिका जी, ऐसे लोगों के खिलाफ़ कुछ करेंगे नहीं, तो ये लोग कभी नहीं सुधरेंगे.”

कृतिका—“लेकिन मैं तो खुद बिगड़ैलों में गिनी जाती हूँ. मैं उसको क्या सुधारू ?”

नारायण—“देखो, बाई(बहन). हमें आपके बारे में सब पता हैं. हमें तो आप कहीं से भी बिगड़ी हुई नहीं लगती. हाँ, शराब पीना आपकी गलत आदत हैं. वो आप जल्दी से जल्दी छोड़ दो, तो बहुत अच्छी बात हैं.”

सुदर्शन—“और बिगड़ैल और बेकार वो होते हैं, जो दूसरों का बुरा करते हैं. जो दूसरों को दुःख देते हैं. तुमने गलत रास्ते पर चलकर सिर्फ खुद को नुकसान पहुँचाया हैं और पहुँचा रही हो, तुम गलत रास्ते पर चल रही हो. लेकिन तुम बेकार या तुम खुद को जितनी बुरी बोलती हो, तुम उतनी बुरी नहीं हो.”

आलोक—“और रही बात रात को घर से बाहर घूमने की. तो ये भी कोई गलत या बुरी बात नहीं हैं. हाँ, बढ़ते क्राइम को देखते हुए ये बहुत खतरनाक जरूर हैं. और खतरा तो सभी को होता हैं, आदमी भी अगर रात को बाहर निकले, तो आदमी के साथ भी लुटपाट, किडनैपिंग जैसे क्राइम हो सकते हैं. इसलिए खतरों से सावधान रहना बहुत जरूरी हैं.”

कृतिका—“आप सबकी बातें सही हैं. लेकिन सभी लोग आप लोगों की तरह नहीं सोचते ना. मैं खुद भी उसे सबक सिखाना चाहती हूँ. उसके कारण बहुत दुःख झेले मैनें. वो साथ था, तब भी और अब जब उसने मुझे छोड़ दिया, तब भी. लेकिन अगर मैं पोस्ट करूँगी, तो मेरे मॉम–डेड की भी बदनामी होगी. वो पहले से ही मेरे कारण बहुत दुःखी रहते हैं.”

सुदर्शन—“एम सॉरी, कृतिका. लेकिन क्या अब तक तुम अपने मॉम–डेड का नाम रोशन कर रही थी ? जब उस लड़के के साथ तुम रिलेशन बना रही थी, तब क्या तुम्हारे मॉम–डेड की इज्जत बढ़ रही थी ? अब तुम्हें उस धोखेबाज का कमीनापन फेसबुक पर पोस्ट करने के लिए कह रहे हैं, तब तुम्हें अपने मॉम–डेड की बदनामी की चिन्ता हो रही हैं.”

कृतिका—“लेकिन तुम मेरे मॉम–डेड को नहीं जानते.”

नारायण—“बाई, लड़कियों के माँ–बाप ऐसे ही होते हैं और इसी बात का तो गलत लड़के और गलत आदमी फायदा उठाते हैं. गलत लोगों को मालूम होता हैं, लड़की बदनामी के डर से कुछ नहीं बोलेगी और अगर बोलेगी भी तो बदनामी तो लड़की की ही होनी हैं. इसलिए बिना किसी डर के वो अपनी मनमानी करते हैं.”

आलोक—“और शर्म–लिहाज के कारण लड़कियाँ और औरतें ऐसी बातें छुपाती हैं. लेकिन लड़के और आदमी गर्व से बताते हैं, मैनें इतनी लड़कियाँ पटाई हैं, मैनें इतनी औरतों के साथ रिलेशन बनाए हैं. ऐसा सिर्फ इसलिए होता हैं, क्योंकि गलती हो या ना हो, लड़कियाँ और औरतें खुद शर्मिन्दगी महसुस करती हैं.”

सुदर्शन—“और मैनें तुम्हें बहुत बार अच्छी तरह समझाया हैं, कि तुमने धोखा दिया नहीं हैं, तुमने धोखा खाया हैं. अब तुम्हें सारी शर्म–लिहाज छोड़कर उस धोखेबाज के बारे में सबको बताना हैं. जब तुमने गलती करते वक्त शर्म नहीं की, फिर अब अपनी गलती मानकर, गलती क्यों और कैसे हुई ? ये बताने में शर्म, बदनामी की बातें क्यों कर रही हो ?”

कृतिका—“लेकिन जिस तरह पोस्ट करने के लिए तुम कह रहे हो ? उसके गन्दे–गन्दे मैसेज दिखाकर सबको बताना. ऐसे पोस्ट पढ़कर लोग मेरे बारे में भी गलत बातें करेंगे.”

सुदर्शन—“क्या गलत बातें करेगें ? यहीं ना, देखो कितनी बेशर्म लड़की हैं. लड़का इसको गन्दे–गन्दे मैसेज करता था और ये उसे जवाब देती थी. लड़का इसको हफ्ते में कितनी बार बुलाता था ? लड़का क्या–क्या करता था ? ऐसी बातें बता रही हैं.”

कृतिका—“हाँ.”

सुदर्शन—“हाँ, तो पोस्ट में अपनी इन गलतियों को मान लेना. पोस्ट में लिख देना, ऐसे मैसेज का जवाब देना मेरी गलती थी. वो मुझे बुलाता था, उसके पास जाना मेरी गलती थी. मैं प्यार में अंधी हो गई थी. मुझे हवस और प्यार का अन्तर मालूम नहीं था.”

कृतिका—“इससे बुरी तो सिर्फ मैं ही बनूँगी ना.”

आलोक—“आप अकैले कैसे बुरी बनोगी ? दोस्ती होने के बाद वो कैसे आपके पीछा पड़ा हुआ था, आपको गर्लफ्रैंड बनाने के लिए. गर्लफ्रैंड बनाने के बाद आपके साथ रिलेशन बनाने के लिए उसने क्या–क्या किया ? वो सब भी तो लिखना हैं.”

नारायण—“हाँ, आप अपनी गलतियों को दूसरों की तरह प्यार का नाम देकर सही ठहराने की कोशिश मत करना. अपनी गलती को गलती मानकर उस लड़के की हर घटिया बात इन स्क्रीन–शॉट के साथ फेसबुक पर पोस्ट करके बताओ. इससे उसको और उसके घरवालों को भी शर्मिन्दगी झेलनी पड़ेगी.”

कृतिका—“ठीक हैं, लेकिन धोखा तो सिर्फ उसने दिया. फिर उसके घरवालों के बारे में पोस्ट करना सही होगा ?”

सुदर्शन ने सख्त होकर कहा—“बिल्कुल सही होगा. एक धोखेबाज को बचाने वाले, उसकी गलतियों पर परदा डालने वाले, सब के सब बराबर के अपराधी होते हैं. इन अपराधियों के हमदर्दों को तो अपराधियों से भी बड़ी सजा मिलनी चाहिए. इन बचाने वालों के दम पर ही तो ये अपराधी बिना किसी डर के बड़े से बड़ा अपराध कर देते हैं.”

कृतिका—“तो आप सबके हिसाब से मुझे उस धोखेबाज के बारे में फेसबुक पर पोस्ट करने चाहिए.”

सुदर्शन, आलोक और नारायण ने एक साथ कहा—“हाँ, कृतिका जी.”

आलोक—“और फेसबुक तो ऐसा साधन हैं, जहाँ किसी का असली चेहरा सामने लाने के लिए हमें किसी का सहारा लेने की भी जरूरत नहीं हैं. बस हमारी बात सच होनी चाहिए.”

सुदर्शन—“हाँ.”

कृतिका—“ठीक हैं, फिर कल सुबह ही एक पोस्ट करूँगी. जो होगा, देखा जाएगा.”

सुदर्शन—“सिर्फ कल एक पोस्ट नहीं करना हैं. ये सारे स्क्रीन–शॉट हर रोज दो–दो, चार–चार पोस्ट करने हैं. उस धोखेबाज को इन पोस्ट से परेशानी होनी चाहिए. चाहे बार–बार रिपीट पोस्ट करने पड़ जाए.”

कृतिका—“हाँ, समझ गई.”

सुदर्शन, आलोक और नारायण ने एक साथ कहा—“ऑल–द–बेस्ट.”

कृतिका—“थैक्यू, वैसे एक बात पूछू ?”

सुदर्शन—“हाँ, जरूर.”

कृतिका—“सुदर्शन तो मेरा दोस्त हैं, इसलिए मेरे बारे में इतना सोचता हैं. लेकिन आप दोनों…? अगर मैं उस लड़के को सबक सिखाने में कामयाब होती हूँ, तो इससे आप दोनों को क्या फायदा होगा ?”

नारायण ने मुस्कुराकर कहा—“देखिये, दोस्ती में फायदा–नुकसान नहीं देखा जाता. दोस्त अगर गलत रास्ते पर चल रहा हो, तो दोस्त को समझाकर रोकना चाहिए और अगर दोस्त सही रास्ते पर चल रहा हो, तब दोस्त का साथ देना चाहिए. हम बस एक बेकार लड़के का कमीनापन सबको बताने के लिए कह रहे हैं. मेरी भी एक बेटी हैं, कल को वो भी बड़ी होगी. बड़ी होने के बाद वो स्कूल भी जाएगी, कॉलेज भी जाएगी, बाजार भी जाएगी. ना तो मैं उसको घर में कैद करके रख सकता हूँ और ना मैं चौबीस घंटे उसके साथ रह सकता हूँ. आज जो आपके साथ हुआ हैं, कल को मेरी बेटी के साथ भी हो सकता हैं.”

आलोक—“और फिर कृतिका जी आप सुदर्शन की दोस्त हैं और सुदर्शन हमारा दोस्त हैं. दोस्त की दोस्त, दोस्त ही होती हैं ना.”

कृतिका ने मुस्कुराकर कहा—“हम्म…”

सुदर्शन—“अच्छा, अब तुम घर जाओ.”

कृतिका ने कुर्सी से खड़ी होकर कहा—“हाँ, ठीक हैं. कल सुबह से करूँगी, उस कमीने के बारे फेसबुक पर पोस्ट.”

सुदर्शन ने खड़े होकर कहा—“हाँ, कर देना. तुम्हारा ये मोबाइल मेरे पास ही हैं.”

कृतिका—“कोई बात नहीं. मैं चलती हूँ अब. बाऐं.”

सुदर्शन ने कृतिका का मोबाइल वापस जेब में डालते हुए कहा—“टेक केयर, फिर मिलेगें.”

कृतिका अपनी गाड़ी की तरफ चल पड़ी.

सुदर्शन ने आलोक और नारायण से कहा—“मैं भी चलता हूँ.”

आलोक और नारायण ने कहा—“हाँ, ठीक हैं.”

सुदर्शन अपनी बिल्डिंग की तरफ़ चल पड़ा और कृतिका गाड़ी में बैठकर गाड़ी स्टार्ट करके गाड़ी चलाते हुए चली गई.


अगले दिन ग्यारह जून, रविवार को रात के सवा दस बजे सुदर्शन ने जयसिंह के घर से बाहर आकर अपने जूते पहने और जयसिंह के घर के मुख्य दरवाजे से बाहर आकर हर रोज की तरह कृतिका की गाड़ी की तरफ चल पड़ा.

कृतिका की गाड़ी के पास आकर सुदर्शन ने गाड़ी का दरवाजा खोला और गाड़ी में बैठकर गाड़ी दरवाजा वापस बन्द कर लिया.

कृतिका ने गाड़ी स्टार्ट की और आगे चल पड़ी.

कृतिका ने ड्राईविंग करते हुए गाड़ी में सामने रखा अपना मोबाइल उठाकर सुदर्शन को देते हुए कहा—“ये देख लो, आज सुबह दो स्क्रीन–शॉट के साथ मैनें ये पोस्ट किया. इस पर मेरे किसी फ्रैंड ने तो ध्यान भी नहीं दिया. दो–चार लोगों ने हमदर्दी भरे कॉमेन्ट किये. लेकिन बाकि सब लड़कों ने मेरे बारे में कितने घटिया कॉमेन्ट किये हैं.”

सुदर्शन ने मोबाइल लिया और सारे कॉमेन्ट पढ़ने के बाद कहा—“कोई बात नहीं, तुम इन घटिया कॉमेन्ट करने वालों को कुछ गलत मत बोलना. इनकी हर बात का सही और अच्छे शब्दों में जवाब दो. तुम लिखो, बात लड़के और लड़कियों की नहीं हैं. बात सही–गलत और अच्छे–बुरे की हैं. अगर कोई लड़का मेरी(सुदर्शन की तरह) तरह रात को ग्यारह–बारह बजे सुनसान सड़क पर पैदल आ रहा हो और चार लड़कियाँ उसके साथ मारपीट करके उसके पैसे छीनकर भाग जाए, तो गलती किसकी हैं ? लड़का रात को ऑफ़िस में ऑवर–टाइम करके आ रहा हो, उसकी गलती हैं या उन लूटपाट करने वाली लड़कियों की ? यहीं बात जब उल्टी हो, मतलब ऐसा किसी लड़की के साथ हो, तब हम सारी गलती लड़की की क्यों बता देते हैं ? गलत को गलत कहने की जगह लड़का–लड़की का राग क्यों अलापते हैं ? हाँ, ये ठीक हैं. माहौल खतरे से भरा हैं, अपराध बहुत हो रहे हैं. अपराधियों के खतरे से सावधान रहना चाहिए. लेकिन अगर अपराध हो जाए, तो हम अपराधी को सही क्यों बताने लगते हैं ?”

कृतिका—“अरे, इन लोगों पर कोई असर नहीं होगा.”

सुदर्शन—“मत होने दो, लेकिन तुम अपनी तरफ़ से अगले पोस्ट में इस तरीके से जवाब दे देना.”

कृतिका—“ठीक हैं.”

सुदर्शन—“और तुम इन गन्दे कॉमेन्ट करने वालों से बहस मत करना. ऐसे लोगों को इंग्नोर करना चाहिए, और इनके लिए अलग से पोस्ट कर देना बस.”

कृतिका—“हाँ, देखो ना. बिना सर–पैर के कॉमेन्ट करने लगे. लड़कियाँ छोटे कपड़े क्यों पहनती हैं ? रात को बाहर क्यों निकलती हो ?”

सुदर्शन ने हँसकर कहा—“अरे, ये घटिया और गन्दे लोग हैं. ये इस तरह ज्ञान देने वाले लोग खुद लड़कियों और महिलाओं के साथ घटिया और गन्दी हरकते करते रहते हैं. इसलिए जब कोई ऐसी बातें पोस्ट करता हैं या करती हैं, तो इनके तन–बदन में आग लग जाती हैं. अब ये तो बोल नहीं सकते, कि हम घटिया हैं, हम गन्दे हैं. इसलिए दूसरों को गलत बोलने लगते हैं.”

कृतिका—“हम्म…लेकिन इनको बोले क्या ? सबसे ज्यादा यहीं लोग कॉमेन्ट करते हैं.”

सुदर्शन—“ये फालतू बातें करने वाले, ये बिना वजह लड़कियों और महिलाओं के साथ बहस करने वाले, ये सब हवस के भूखे जानवर होते हैं, तुम्हारे बॉयफ्रैंड की तरह. इनको जवाब देना हैं, तो इनको बुरी तरह बैईज्जत करो. अगर इनको बैईज्जत नहीं कर सकती तो इनके कॉमेन्ट का कोई रिप्लॉय मत करो. सिर्फ पोस्ट करो.”

कृतिका—“और पोस्ट में इनके लिए लिखूँ क्या ?”

सुदर्शन—“लिख दो, लड़कियों के कपड़ों से लड़के काबू में नहीं रहते, तो लड़कों को घर में बैठना चाहिए, घर से बाहर ही नहीं निकलना चाहिए. लड़कियाँ चाहे कुछ भी पहने, लड़कों को लड़कियों से छेड़छाड़ और बदतमीजी करने का अधिकार किसने दिया ? अगर कोई लड़का दाढ़ी–मूँछ रखता हैं और लड़कियाँ उनकी दाढ़ी–मूँछ का मजाक उड़ाए. जैसे लड़के लड़कियों को गन्दी–गन्दी बातें बोलते हैं, उसी तरह लड़कियाँ दाढ़ी–मूँछ के कारण लड़कों को जंगली या आदिमानव कहने लगे, तो लड़कों को कैसा लगेगा ? महिलाएँ अगर पजामें–चोले और धोती–कुरतें के कारण पुरुषों को ओल्ड फैशन या ग्वार कहने लगे, तो पुरुषों को कैसा लगेगा ? लड़कियाँ अगर घूटने से फटी हुई जींस और अजीब–अजीब हेयर–कटिंग करने वाले लड़कों को भिखारी, लंगूर, बन्दर या जोकर कहने लगे, तो लड़कों को कैसा लगेगा ?”

कृतिका ने हँसकर कहा—“ये सब लिख दूँ ?”

सुदर्शन—“हाँ, बिल्कुल.”

कृतिका—“लेकिन आलोक, नारायण जी और तुम्हारे जैसे अच्छे लोगों को बुरा लगा तो ?”

सुदर्शन—“अच्छे लोगों को क्यों बुरा लगेगा ? जो लोग कोई गलत काम नहीं करते, उनको गलत बातों के विरोध से क्यों प्रोब्लम होगी ? प्रोब्लम या परेशानी सिर्फ उन लोगों को होगी, जो गलत काम करते हैं. अब मैनें कभी किसी लड़की या किसी महिला के साथ कोई गलत हरकत नहीं की, तो मेरे बारे में कोई लड़की या कोई महिला कुछ गलत क्यों बोलेगी ?”

कृतिका—“हाँ, ये तो हैं.”

सुदर्शन—“हाँ, तुम खुद ही सोच लिया करो. लड़कों और पुरुषों को अपने हिसाब से सजने–सँवरने और जीने का अधिकार हैं, तो फिर ये अधिकार लड़कियों और महिलाओं से क्यों छिना जाता हैं ? तुम इस टाइप के पोस्ट करके इन घटिया और गन्दे कॉमेन्ट करने वालों को जवाब दो. लेकिन कॉमेन्ट में बहसबाजी मत करना.”

कृतिका—“ठीक हैं, कल से एक पोस्ट इनके लिए भी किया करूँगी.”

सुदर्शन—“हम्म…और इस बात का ध्यान रखना. हमें लड़का–लड़की और नारी–पुरुष वाला कॉम्पीटिशन नहीं करना. जो गलत हैं, वो गलत हैं. चाहे कोई भी हो. तुम्हें सिर्फ एक धोखेबाज की धोखेबाजी सबको बतानी हैं.”

कृतिका—“हाँ, सभी लोग एक जैसे नहीं होते. कुछ लड़कियाँ और महिलाएँ भी गलत होती हैं.”

सुदर्शन ने हँसकर कहा—“यहीं तो बात हैं. इन गलत लोगों के कारण अच्छे लोगों का जीना हराम हो गया हैं. अब सभी लड़के लड़कियाँ थोड़ी छेड़ते हैं, लेकिन इन घटिया लड़कों के कारण लोग अच्छे लड़कों को भी शक की नजर से देखा जाता हैं.”

कृतिका—“हम्म…सही बात हैं.”

गाड़ी में ड्राईविंग करती कृतिका के साथ सुदर्शन की बातचीत चलती रही और गाड़ी आगे चलती गई.


पाँच दिन बाद सोलह जून, शुक्रवार को रात के दस बजे सुदर्शन को ऑफ़िस से रिसींव करके कृतिका गाड़ी चलाते हुए आ रही थी.

कृतिका के मोबाइल पर कॉल आया. कृतिका ने मोबाइल उठाकर देखा तो दिव्यांश का कॉल था.

सुदर्शन—“किसका कॉल हैं ?”

कृतिका—“दिव्यांश का.”

सुदर्शन—“तो फिर रिसींव करो और बात करो.”

कृतिका ने गाड़ी साइड में रोककर कॉल रिसीव करके मोबाइल कान से लगाया.

उम्र में तीस(30) साल का दिव्यांश कॉल पर पहले गन्दी–गन्दी गालियाँ निकालने के बाद बोला—“साली, ये क्या नाटक शुरू किया हैं, तूने ?”

कृतिका गुस्से में बोली—“ओए, मुँह संभालकर बात कर, समझा ना.”

दिव्यांश—“अरे, तू इसी लायक हैं. ये फेसबुक पर मेरे बारे में क्या लिख रही हैं ? हमारे बीच में जो कुछ भी हुआ, सब दोनों की मरजी से हुआ, समझी. मैनें कोई ब्लात्कार नहीं किया तेरा.”

कृतिका—“हाँ, सब मरजी से हुआ और मैनें लिखा भी यहीं हैं. सब हम दोनों की मरजी से हुआ. लेकिन तूने प्यार और शादी के वादे किये थे, इसलिए मैं तेरे साथ सब कुछ करने के लिए तैयार हुई. वरना मुझे कोई शौक नहीं चढ़ा था, तेरे साथ बिस्तर पर सोने का.”

दिव्यांश—“लेकिन तेरी मरजी तो थी ना. फिर अब क्यों तिलमिला रही हैं ? उस वक्त तो तू भी बहुत लव यू–लव यू बोलकर मुझसे लिपटती थी. अब सारी गलती मेरी बता रही हैं.”

कृतिका—“मैं तेरी बातें सुनकर, तेरे नाटक देखकर, तुझसे प्यार कर बैठी थी. इसलिए तेरी खुशी के लिए तुझसे लिपटती थी. समझा.”

सुदर्शन ने कृतिका के हाथ से मोबाइल छीनकर अपने कान पर लगाया.

दिव्यांश—“हाँ, मेरी खुशी के लिए. जैसे तूने तो मजे लिए ही नहीं. अब कान खोलकर मेरी बात सुन. ये सारे पोस्ट डिलेट कर और दूबारा तेरे किसी पोस्ट में मेरा नाम नहीं आना चाहिए. वरना उस रात तो तुझे जिन्दा छोड़ दिया था. इस बार बचेगी नहीं.”

सुदर्शन—“उस रात मुझे भी मालूम नहीं था, तू इतना घटिया और कमीना इन्सान हैं. वरना आज तेरी उस करतूत का वीडियो भी देख रहे होते लोग. और कान खोलकर तू सुन. ना तो कोई पोस्ट डिलेट होगा और ना पोस्ट में तेरा नाम आना बन्द होगा.”

दिव्यांश—“तू कौन हैं ?”

सुदर्शन—“मैं कोई भी हूँ, उससे तुझे मतलब नहीं हैं.”

दिव्यांश—“समझ गया………तो कृतिका नया यार बना कर, नये यार के दम पर उछल रही हैं. साली ने गजब का मस्त नशीला खूबसूरत बदन पाया हैं, किसी को भी.”

सुदर्शन बीच में बोला—“मुझे पता था, गन्दा इन्सान, गन्दी बात ही सोचेगा. मैं कृतिका का यार भी हूँ, तब भी तेरे से तो अच्छा ही हूँ. और तू इतना घबरा क्यों रहा हैं ? कृतिका के साथ फेसबुक और वॉट्सऐप पर हुई बातों के मैसेज तो तेरे पास भी होगे. अगर कृतिका के पोस्ट में कोई बात झूठ हैं, तो पुलिस के पास चला जा.”

दिव्यांश ने चार–पाँच गन्दी–गन्दी गालियाँ निकालकर कहा—“तू रूक जा. तुझे तो मैं फुरसत से बताता हूँ, मैं कहाँ–कहाँ जा सकता हूँ ?”

दिव्यांश ने आखिर में एक और गन्दी गाली निकालकर कॉल काट दिया. सुदर्शन ने मोबाइल कृतिका को वापस दिया.

कृतिका ने मोबाइल लेकर सामने रखते हुए सुदर्शन से कहा—“क्या बोल रहा था ?”

सुदर्शन—“क्या बोलेगा ? जिनके पास कुछ बोलने के लिए नहीं होता, वो लोग गाली निकालते हैं. वहीं निकाल रहा था.”

कृतिका—“तुम्हें उसके साथ बात नहीं करनी थी. उसके साथ उसके जैसे और भी बहुत लड़के हैं. सब के सब मारपीट करने वाले, गुंडे टाइप.”

सुदर्शन—“तुम चिन्ता मत करो. अभी नारायण की दुकान पर चलकर इसका ईलाज करते हैं.”

कृतिका ने गाड़ी चलाते हुए गाड़ी आगे बढ़ाई और आम्रपाली सर्किल पर आकर कृतिका ने गाड़ी नारायण की दुकान की तरफ मोड़कर रोज की तरह नारायण की दुकान के सामने लाकर गाड़ी रोककर बन्द कर दी.

नारायण की दुकान के बाहर नारायण और आलोक बैठकर बातें कर रहे थे. सुदर्शन और कृतिका गाड़ी से उतरकर रोज की तरह आलोक और नारायण के पास आकर बैठे.

सुदर्शन ने आलोक से कहा—“यार, आज इसके मोबाइल पर अभी कुछ देर पहले उस लड़के का कॉल आया.”

नारायण—“ले भाई, आलोक. अब पड़ गी तेरी जरूरत.”

आलोक—“कोई बात नहीं, क्या बोल रहा था ?”

सुदर्शन—“बोलना क्या हैं ? बस गालियाँ निकालकर धमकी दे रहा था.”

कृतिका—“उसके बहुत कॉन्टेक्ट हैं, शहर में.”

नारायण—“देख लेते हैं, उसके कॉन्टेक्ट.”

आलोक—“कृतिका जी, आप डरो मत. आप तो बस उसका नम्बर बताओ.”

कृतिका ने आलोक को अपना मोबाइल देते हुए कहा—“लास्ट कॉल उसी का हैं.”

आलोक ने कृतिका से मोबाइल लेकर अपनी जेब से खुद का मोबाइल निकाला और फोनबुक में से गोविन्द बिशनोई को कॉल लगाया.

उम्र में छत्तीस(36) साल के गोविन्द बिशनोई ने कॉल रिसीव करके कहा—“हाँ, आलोक बेटा.”

आलोक—“राम–राम काका(चाचा) जी.”

गोविन्द बिशनोई—“राम–राम.”

आलोक—“वो मैनें आपको मेरे दोस्त सुदर्शन और कृतिका के बारे में बताया था ना.”

गोविन्द बिशनोई—“हाँ.”

आलोक—“तो आज वो लड़का, जिसने कृतिका को गर्लफ्रैंड बना रखा था और एक रात अपने दो दोस्तों के साथ कृतिका की पिटाई करके कृतिका को सड़क पर छोड़कर भाग गया था. वो लड़का अभी थोड़ी देर पहले कृतिका के मोबाइल पर कॉल करके सुदर्शन और कृतिका को गालियाँ निकालकर धमकी दे रहा था.”

गोविन्द बिशनोई—“अच्छा बेटा, तू उसका मोबाइल नम्बर और उसका कोई फोटो हैं तो मुझे वॉट्सऐप पर मैसेज कर. और सुदर्शन और उस लड़की को बोल दें, डरने या घबराने की कोई जरूरत हैं. सुदर्शन के पास तो मेरा नम्बर हैं ही. उस लड़की को भी मेरा नम्बर दे देना और बोलना, दूबारा कभी उस लड़के का कोई फोन, कोई रास्ता रोकना, कोई भी ऐसी–वैसी बात हो, तो मुझे मिसकॉल कर दें. फिर मैं सब देख लूँगा.”

आलोक—“ठीक हैं, काका.”

गोविन्द बिशनोई—“और कोई समस्या ?”

आलोक—“नहीं, काका. और तो सब आपकी दया हैं.”

गोविन्द बिशनोई—“दया तो सब मालिक की हैं. अच्छा, मैं रखता हूँ.”

आलोक—“ठीक हैं, काका जी. राम–राम.”

गोविन्द बिशनोई—“राम–राम, बेटा.”

गोविन्द बिशनोई के कॉल काटने के बाद आलोक ने कृतिका के मोबाइल में से दिव्यांश का नम्बर और फोटो निकालकर गोविन्द बिशनोई को मैसेज कर दिया.

आलोक ने कृतिका को मोबाइल वापस देते हुए कहा—“लो, कृतिका जी. अब दूबारा कभी उस लड़के का कोई कॉल या मैसेज आ जाए, तो मेरा नाम बदल देना.”

कृतिका ने मुस्कुराकर पूछा—“कौन हैं, तुम्हारे काका जी ?”

नारायण ने हँसकर कहा—“इसके काका जी, शहर के सारे भाई लोगों के दादा जी हैं.”

कृतिका हैरान होते हुए बोली—“भाई लोगों के दादा जी, मतलब ?”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“भाई लोग मतलब, जो गुंडे–बदमाश होते हैं ना.”

कृतिका—“मतलब इसके काका जी भी गुंडे–बदमाश हैं ?”

सुदर्शन—“नहीं–नहीं, गोविन्द जी बहुत अच्छे आदमी हैं.”

नारायण—“बाई………सीधी और साफ़ बात. गलत और बेकार लोगों के लिए गोविन्द जी गुंडे–बदमाश हैं और आपके–हमारे जैसे लोगों के लिए मददगार. अब देखो, किसी लड़की को कोई लड़का परेशान करता हो और वो लड़की अगर पुलिस के पास मदद माँगने जाती हैं, तो पुलिस उस लड़के को वॉर्निग, चैतावनी देकर छोड़ देती हैं. फिर वो लड़का अपने साथ पाँच–सात लड़कों को लेकर लड़की के घर आता हैं और लड़की और लड़की के घरवालों की बुरी तरह पिटाई करके चला जाता हैं. लेकिन अगर लड़की गोविन्द जी से मदद माँगें, तो गोविन्द जी उस लड़के को ऐसा सबक सिखाते हैं, फिर वो लड़का अपनी घरवाली को छेड़ने से भी डरता हैं.”

कृतिका हँसकर बोली—“अच्छा.”

आलोक—“हाँ, एक बार शहर के बाहर एक गांव में गरीब लोगों के घरों पर कब्जा करने के लिए सत्तर–अस्सी गुंडे गए. उन गुंडों ने सारे गांववालों को लाठी–डंडों से बुरी तरह पीटा. औरतों को, बच्चों को, बुढ़ों को, किसी को भी नहीं छोड़ा. तीन–चार दिन तक सारे गांव में मातम सा छाया रहा. लोगों को समझ नहीं आ रहा था, कि अब क्या करें ? बड़े नेताओं का दवाब था, इसलिए पुलिस भी कुछ नहीं कर रही थी. फिर गांव के किसी आदमी ने यहाँ रहने वाले अपने रिश्तेदार को सारी बात बताई. उस रिश्तेदार ने गोविन्द काका से कहा. फिर बस. सात–आठ दिन के अन्दर–अन्दर गांव के जितने घर तोड़े थे, सारे घर उन तोड़ने वालों से ही दूबारा बनवाए. वो भी पहले से बढ़िया.”

कृतिका—“हम्म…फिर तो बहुत अच्छे आदमी हैं. गरीब और मजबुर लोगों की मदद करते हैं.”

नारायण—“नहीं–नहीं, अमीर–गरीब, जाँत–पाँत से उनको मतलब नहीं हैं. वो बैकसूर और मासूम लोगों की मदद करते हैं.”

आलोक—“हाँ, मैनें आपके बारे में सब कुछ उनको बताया था. उन्होंने कहा, जो हो गया, उसको तो छोड़. अब दूबारा कोई ऐसी–वैसी बात हो, तो बस मिसकॉल कर देना.”

कृतिका—“ओके, थैक्यू सॉ मच.”

सुदर्शन—“अच्छा, अब तुम घर जाओ. देर हो रही हैं.”

कृतिका कुर्सी से खड़ी होकर बोली—“हाँ, ठीक हैं.”

सुदर्शन—“ध्यान से जाना और गाड़ी धिरे चलाना.”

कृतिका ने जाते हुए मुड़कर कहा—“हाँ, यार. रोज जाती हूँ ना.”

कृतिका मुस्कुराते हुए अपनी गाड़ी में जाकर बैठी और गाड़ी स्टार्ट करके चली गई.


छः दिन बाद बाईस जून, गुरुवार को रात के साढ़े दस बजे जयसिंह और सुजाता फर्श पर बिछाए हुए कालीन पर बैठकर अपने तीनों बच्चों उम्र में तैईस(23) साल की सृष्टी, उम्र में बीस(20) साल का अंकुश, उम्र में सोलह(16) साल का संयम और सुदर्शन के साथ खाना खाते हुए सबके साथ टीवी में न्यूज देख रहे थे.

टीवी में न्यूज ऐंकर बोल रहा था—“राजस्थान के जाने–माने बिजनेसमैन सेठ साँवरमल बागड़ी की बेटी कृतिका बागड़ी ने पिछले कुछ दिनों में फेसबुक पर एक के बाद एक बहुत से पोस्ट करके अपने धोखेबाज बॉयफ्रैंड दिव्यांश के बारे में कई खुलासें किये. अपनी बातों की सच्चाई साबित करने के लिए कृतिका ने बाकायदा दिव्यांश के फेसबुक और वॉट्सऐप पर किये गए बहुत से मैसेज के स्क्रीन–शॉट अपडेट किये हैं. इन सभी स्क्रीन–शॉट में दिव्यांश खुद बड़ी बेशर्मी से अपनी करतूतें कबूल कर रहा हैं.

तीस साल का दिव्यांश शहर के बड़े कारोबारी किशन गंगवानी का छोटा बेटा हैं. दिव्यांश ने कृतिका से पहले भी कई लड़कियों को अपने प्यार के जाल में फँसाकर उन लड़कियों से संबंध बनाए और मन भर जाने के बाद गन्दी–गन्दी बातें, जो हम यहाँ आपको बता भी नहीं सकते. ऐसी बातें बोलकर उन लड़कियों को छोड़ दिया. कृतिका के फेसबुक पोस्ट से प्रेरणा लेकर उनमें से एक लड़की ने हिम्मत दिखाई और उसने भी दिव्यांश के बारे में सोशल साइट्स पर पोस्ट करके कई खुलासे किये हैं.

आप यकिन नहीं करेंगे, जब लड़की को अपने प्यार के जाल में फँसाना हो, तब ये दिव्यांश इतनी अच्छी–अच्छी और इतनी मिठ्ठी–मिठ्ठी बातें करता हैं, जैसे ये दुनिया का सबसे अच्छा लड़का हैं. दिव्यांश की नोटंकी भरी बातें आप पढ़ेगें, तो हैरान रह जाएँगे. कभी वो सत्यवादी राजा हरीशचन्द्र बन जाता हैं. कभी ऐसे दिखाता हैं, जैसे दुनिया का सबसे परेशान और दुःखी आदमी हैं. लड़कियाँ दिव्यांश की इसी नाटकबाजी से प्रभावित होकर दिव्यांश के प्रेमजाल में फँस जाती हैं.

बहरहाल, कृतिका ने दिव्यांश के खिलाफ कोई पुलिसकेस नहीं किया हैं. कृतिका ने अपने फेसबुक पोस्ट में कहा हैं, कि वो सिर्फ इस लड़के की सच्चाई सबको बताना चाहती हैं. उसका अब दिव्यांश से शादी करने का भी कोई इरादा नहीं हैं.

कृतिका ने न सिर्फ दिव्यांश के बारे में लिखा हैं, बल्कि ये भी बताया, कि दिव्यांश के घरवालें दिव्यांश के बारे में सब कुछ जानते हुए भी किस तरह हर बार दिव्यांश को बचा लेते हैं और दिव्यांश को भोला–भाला और मासूम बताकर दिव्यांश की शिकार बन चुकी लड़कियों और महिलाओं को ही चरित्रहीन साबित कर देते हैं.

इसके इलावा कृतिका ने कई ऐसे सवालों के जवाब भी दिये हैं, जो अक्सर लड़कियों पर उठाए जाते हैं.

कृतिका खुद शराब पीने और रात–रातभर घर से बाहर घूमने के लिए बदनाम हैं. कृतिका ने अपने कुछ पोस्ट में स्वीकार किया, शराब पीना बहुत गलत बात हैं. वो खुद अब धिरे–धिरे शराब पीना छोड़ रही हैं. शराब के आदी हो चुके लोगों को शराब छोड़ने के लिए कहना या शराब पीने से रोकना बहुत अच्छी बात हैं. लेकिन अगर कोई शराब पीने वाला या शराब पीने वाली किसी दूसरे के साथ कुछ बुरा नहीं करें, तो उस शराब पीने वाले के साथ कुछ गलत करना सही नहीं ठहराया जा सकता.

रात को बाहर घूमने के बारे में कृतिका ने लिखा, रात को घर से बाहर निकलना गलत नहीं हैं. लेकिन बढ़ते अपराध को देखते हुए बहुत खतरनाक हैं और खतरनाक सिर्फ लड़कियों और महिलाओं के लिए ही नहीं, बल्कि पुरुषों के लिए भी हैं. बहुत से पुरुषों के साथ लूटपाट और गुंडे–मवालियों के साथ मारपीट की घटनाएँ होती हैं. ऐसा सिर्फ रात में ही नहीं, सुनसान जगहों पर दिन में भी होता हैं. इसलिए लड़का हो या लड़की, नारी हो या पुरुष, हम सबको इन खतरों से सावधान रहना चाहिए. कुछ लोग रात में नौकरी करते हैं, तो उनको रात के समय ही घर से बाहर निकलना पड़ेगा. कभी घर में अचानक रात के समय किसी की तबीयत खराब हो जाए, तो वो डॉक्टर के पास जाने के लिए सुबह होने का इंतजार नहीं कर सकते. ऐसे में अगर उनके साथ कुछ गलत लोग कुछ बुरा कर देते हैं, तो गलत बुरा करने वाले होते हैं. जिनके साथ बुरा हुआ हैं, वो गलत नहीं होते.

इसके इलावा लड़कियों के कपड़ों, लड़कियों के नौकरी करने पर सवाल उठाने वालों को भी कृतिका तो बहुत सटीक जवाब देकर उनसे पूछा हैं कि लड़की अगर सलवार–सूट या साड़ी पहनती हैं तो लड़कियों को बहन जी या अन्टी जी बोलकर चिढ़ाया जाता हैं, उनका मजाक उड़ाया जाता हैं. लड़कियों और महिलाओं को बोला जाता कि लड़कियों और महिलाओं को क्या पता ? पैसे कैसे कमाए जाते हैं ? और अगर लड़कियाँ और महिलाएँ फैशन के हिसाब से कपड़े पहने, नौकरी करें तो उनको बेशर्म बोलते हैं. आखिर लड़कियाँ और महिलाएँ अपनी मरजी से क्यों नहीं जी सकती ?

कृतिका ने अपने कुछ पोस्ट में शादी के वादे पर भरोसा करके प्यार के नाम पर शारीरिक संबंध बनाने के लिए राजी होने वाली लड़कियों को भी सलाह देते हुए लिखा, जिस लड़के को शादी करनी हैं, वो शादी से पहले शारीरिक संबंध बनाने की जिद क्यों करेगा ? शादी के बाद शारीरिक संबंध तो बनाने ही हैं, शादी के बाद बच्चे भी होगें. जो लड़के कहते हैं, मैं अभी शादी नहीं कर सकता, लेकिन प्यार के बिना नहीं रह सकता. ऐसे लड़के असल में हवस के भूखे जानवर होते हैं, वो अपनी हवस को प्यार का नाम देते हैं. ऐसी बातें करने वाले लड़के भरोसे के लायक नहीं होते, इनको जहाँ कोई खूबसूरत लड़की या कोई खूबसूरत महिला दिखती हैं, ये वहीं फिसल जाते हैं. इसलिए लड़कियों को अगर खुशहाल शादीशुदा जिन्दगी बितानी हो, तो ऐसे लड़कों से तुरन्त दूर हो जाना चाहिए.

अब कृतिका की ये सलाह कितनी लड़कियाँ मानती हैं ? ये तो लड़कियों पर ही निर्भर करता हैं.

सुनने में आया हैं, कृतिका ने ये पोस्ट वैशाली नगर के आम्रपाली इलाके में रहने वाले कुछ लड़कों की सलाह पर किये हैं. उनमें से एक लड़के का नाम सुदर्शन बताया जा रहा हैं, जो शहर के बड़े व्यवसायी जयसिंह के ऑफ़िस में नौकरी करता हैं. कृतिका सुदर्शन को जनवरी की शुरुआत में एक रात नशे की हालत में सड़क पर पड़ी मिली थी, जहाँ कृतिका का बॉयफ्रैंड अपने कुछ दोस्तों के साथ कृतिका को पीटने के बाद छोड़कर भाग गया था. सुदर्शन ने पुलिस के चक्कर में पड़ने से बचने के लिए पुलिस को तो कुछ नहीं बताया, लेकिन कृतिका को अपने घर ले गया.

जयसिंह ने मुस्कुराकर कहा—“क्या बात हैं, सुदर्शन. तुम तो छा गए.”

सुदर्शन खाना खाते हुए मुस्कुरा दिया.

सुजाता ने हँसकर कहा—“और इसके साथ आपका नाम भी टीवी पर आया.”

सृष्टी—“लेकिन पापा, अगर इस लड़के को सजा मिलती तो और भी अच्छा होता. फेसबुक पर पोस्ट करने से इसे क्या फर्क पड़ेगा ?”

जयसिंह—“सजा मिलनी तो चाहिए. लेकिन कृतिका ने इतना कर दिया वहीं बहुत हैं. वरना लड़कियाँ और महिलाएँ ऐसी बातें बोलती कहाँ हैं ? अब कम से कम हर कोई इसके बारे में जान तो गया. सब कुछ जानने के बाद कोई जान–बुझकर कुँए में गिरना चाहे, उसका कोई ईलाज नहीं हैं.”

सुदर्शन अपना खाना खतम करके उठा और हाथ–मुँह धोकर कहा—“अच्छा सेठ जी. मैं चलता हूँ.”

जयसिंह—“हाँ, ठीक हैं.”

अँकुश ने दरवाजे की तरफ मुड़ते सुदर्शन से कहा—“भईया, अब कृतिका के साथ सुबह–शाम आना–जाना छोड़ दो.”

सुदर्शन ने रूककर कहा—“क्यों ? क्या हुआ ?”

अँकुश—“मेरा मतलब, कृतिका से शादी करके हमेशा कृतिका के साथ ही रहो ना.”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“बेवकूफ, ऐसा कुछ नहीं हैं. मैं सिर्फ उसे दोस्त मानता हूँ.”

सृष्टी—“बस–बस, ज्यादा बनो मत. हमें सब पता हैं.”

सुजाता—“अरे…क्यों छेड़ रहे हो, भईया को ? सुदर्शन, तुम जाओ. ये तो दोनों तो बस मजाक कर रहे हैं.”

सुदर्शन मुस्कुराते हुए मुड़कर दरवाजें की तरफ आकर दरवाजा खोलकर घर से बाहर आया और अपने जूते पहनकर मुख्य दरवाजे से बाहर आकर मुख्य दरवाजा बन्द करते हुए कुर्सी पर बैठे बहादुर से बोला—“कैसे हो, बहादुर जी ?”

बहादुर—“अच्छा हूँ. खाना खा लिया सबने ?”

सुदर्शन—“हाँ, मैनें तो खा लिया. बाकि सब अभी खा रहे हैं. ठीक हैं फिर, चलते हैं.”

सुदर्शन चलते हुए कृतिका की गाड़ी के पास आकर गाड़ी का दरवाजा खोलकर गाड़ी में बैठा और गाड़ी का दरवाजा वापस बन्द करके बोला—“कॉन्ग्राचुलेशन, अभी सेठ जी के घर टीवी में तुम्हारे फेसबुक पोस्ट की न्यूज देखकर आ रहा हूँ. अब तो न्यूज देखने वाले सभी लोग उस लड़के के कमीनेपन के बारे में जान जाएगें.”

कृतिका—“हम्म…चलो, आलोक और नारायण जी को भी बताते हैं.”

सुदर्शन—“हाँ, चलो.”

कृतिका गाड़ी स्टार्ट करके चल पड़ी और नारायण की दुकान के सामने आकर गाड़ी रोककर बन्द कर दी.

सुदर्शन और कृतिका गाड़ी के दरवाजे खोलकर गाड़ी से उतरे और दरवाजे बन्द करके नारायण की दुकान पर आए.

आलोक के साथ चौकी पर बैठा नारायण चौकी से उठकर दुकान के अन्दर गया और दो कुर्सियाँ लाकर बाहर रख दी. सुदर्शन और कृतिका कुर्सियों पर बैठ गए. नारायण वापस आलोक के पास चौकी पर बैठ गया.

सुदर्शन कुर्सी पर बैठकर बोला—“आज तो कृतिका के पोस्ट न्यूज में भी आ गए. न्यूज में उसका नाम सुना धोखेबाज बॉयफ्रैंड दिव्यांश.”

नारायण—“हम तो सुबह से ही देख रहे हैं.”

आलोक—“ये अब देखकर आया होगा.”

सुदर्शन ने कृतिका से कहा—“तुम चुप क्यों हो ?”

कृतिका—“मुझे तुमसे एक बात पूछनी थी

सुदर्शन—“हाँ, तो पूछ लो. सोच क्या रही हो ?”

कृतिका सुदर्शन से बोली—“मुझे दिव्यांश पर गुस्सा आता हैं, मुझे उससे चिढ़ होती हैं. क्योंकि उसने मुझे धोखा दिया. लेकिन तुम उससे इतनी नफ़रत क्यों करते हो ? उसको बुरा तो नारायण जी और आलोक भी बोलते हैं. लेकिन उसके लिए तुम्हारा गुस्सा………दिव्यांश के लिए तुम्हारा गुस्सा देखकर कभी–कभी बहुत हैरानी होती हैं.”

सुदर्शन ने हँसकर कहा—“मुझे हर धोखेबाज से नफरत हैं. धोखा चाहे प्यार के नाम पर दिया गया हो या रुपये–पैसे लुटने के लिए किसी को मुर्ख बनाया हो. बस चिढ़ हैं मुझे, धोखेबाजों से.”

कृतिका—“लेकिन इतनी चिढ़ ? इतनी चिढ़ तो उसी को हो सकती हैं, जिसके साथ कोई ना कोई बड़ा धोखा हुआ हो.”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“ये बात आलोक और नारायण भी मुझसे कई बार पूछ चुके हैं. चलो, आज तुम तीनों को बता ही देता हूँ.”

आलोक—“हाँ, बता भाई.”

नारायण—“आज राज से परदा उठा ही दें.”

सुदर्शन—“हाँ, तो सुनो. अखबारों और टीवी में कुछ ऐड(विज्ञापन) तो तुम सबने पढ़े और देखे ही होंगे. पाँच दिन में काले से गोरे हो जाओ, दस दिन में मोटे से पतले हो जाओ, पन्द्रह दिन में दुबले–पतले से बॉडी–बिल्डर बन जाओ. इसके इलावा ये यंत्र रखने या पहनने से कष्ट दूर हो जाएगे. वो यंत्र रखने से लक्ष्मी माता प्रसन्न हो जाएगी. हमारी मालाएँ पहनने से भगवान खुश हो जाएगे, हमारे ताबिज पहनने से अल्लाह खुश हो जाएगा. इस तरीके से औरत वश में आ जाती हैं, उस तरीके से संतान–सुख मिलेगा. प्रेम–समस्या, गृह–क्लेश, सौतन से छुटकारा वगैरह–वगैरह. इस तरह के बहुत सारे विज्ञापन अखबारों में और आजकल तो कई टीवी चैनलों में भी आते रहते हैं.”

नारायण—“हाँ, भाई. भोत(बहुत) आवे.”

आलोक—“और बहुत सारे लोग ये ऐड और विज्ञापन पढ़कर लूट भी जाते हैं.”

सुदर्शन—“हम्म………अब से साढ़े चार साल पहले मैनें भी अखबार में ऐसे ही एेड पढ़े. घर बैठे बीस हजार कमाओ, घर बैठे तीस हजार कमाओ, घर बैठे पचास हजार कमाओ. उन विज्ञापनों में से एक विज्ञापन पढ़कर एक दिन मैनें एक जगह कॉल किया. उन लोगों ने बहुत प्यार और अपनेपन से बहुत इज्जत देकर बात की और कहा कि आप आ जाओ. आपको बहुत बढ़िया सी नौकरी दे देगें. ये कर देगें, वो कर देंगे, वगैरह–वगैरह. मिठ्ठी–मिठ्ठी बातें की.”

कृतिका—“फिर ?”

सुदर्शन—“फिर मैनें सोचा इतने बढ़िया तरीके से प्यार और अपनेपन से बात कर रहे हैं. ये लोग तो बहुत अच्छे हैं. मुझे जरूर कोई बढ़िया सी नौकरी दिला देगें.”

नारायण—“फिर तू यहाँ आ गया.”

सुदर्शन—“हाँ, फिर मैं खुशी–खुशी यहाँ आने के लिए तैयार हो गया. मेरे घरवालों ने मुझे बहुत मना किया, लेकिन मैनें उनकी एक नहीं सुनी. मैनें सोचा, ये तो ऐसे ही जाहिल लोग हैं. इनको क्या पता, नौकरी के बारे में ?” अखबार के ऐड झूठे तो हो नहीं सकते.”

कृतिका—“फिर तुमने क्या किया ?”

सुदर्शन—“फिर मेरे घरवालों ने मुझे पैसे देने से मना कर दिया और मेरे खुद के पैसे भी मुझसे छीन लिए. मैनें अपने पाँच दोस्तों से एक–एक हजार करके पाँच हजार रुपये उधार लिए और अपने मम्मी–पापा और भाई–भाभी को बहुत भला–बुरा बोलकर, बहुत बातें सुनाकर घर से निकल आया.”

नारायण—“ये तो तूने गलत किया, तेरे घरवाले तेरे भले की बात कर रहे थे.”

सुदर्शन—“हाँ, ये बात मुझे बाद में समझ आई.”

आलोक—“फिर यहाँ आने के बाद क्या हुआ ?”

सुदर्शन—“यहाँ आने के बाद मैनें उन नौकरी देने वालों को कॉल किया, उन लोगों ने पता–ढिकाना बता दिया. ये गुलाब गैस एेजेन्सी के पास उनका ऑफ़िस था. मैं यहाँ उनके ऑफ़िस आया, ऑफ़िस में साड़ी और सुट पहने हुए चार–पाँच लड़कियाँ और महिलाएँ थी. कोट–पेन्ट पहने हुए चार–पाँच लड़के और आदमी थे. सबसे पहले तो उन लोगों ने पाँच सौ रुपये कोई रजिस्ट्रेशन करने के माँग लिए.”

कृतिका—“फिर तुमने दे दिये ?”

सुदर्शन—“पहले मैनें उन लोगों से कहा, आपने तो कहा था, कोई पैसे नहीं लगेगे. उन लोगों ने कहा, लेकिन फार्म भरने और रजिस्ट्रेशन के पैसे तो देने पड़ेगें. मैनें पाँच सौ रुपये रजिस्ट्रेशन के और पन्द्रह सौ रुपये कोई फार्म भरने के दे दिये. उन लोगों ने कौनसा रजिस्ट्रेशन किया और कौनसा फार्म भरा, मुझे आज तक नहीं पता. मैनें सोचा, चलो दस–बीस हजार की नौकरी के लिए दो हजार खर्च करने में क्या बुराई हैं ?”

आलोक—“फिर.”

सुदर्शन—“फिर उन लोगों कहा, पाँच हजार और जमा करवा दो और तुम भिवाड़ी चले जाओ. वहाँ तुम्हें दस हजार की नौकरी मिल जाएगी.”

नारायण—“हाँ, ये लोग फ्रोड होवे. फेर के होयो ?”

सुदर्शन—“फिर मैनें कहा, कौनसी नौकरी मिलेगी ? मुझे करना क्या होगा ? इसके बारे में तो कुछ बताओ ? तो उन्होंने कहा, ये सब वो भिवाड़ी वाले ही बताएगें. मैनें कहा, ये तो सरासर धोखा हैं. पहले बोलते हो, कोई पैसा नहीं लगेगा. अब बात–बात पर रुपये माँग रहे हो.”

कृतिका—“फिर क्या कहा, उन लोगों ने ?”

सुदर्शन—“वो लोग बोले, पैसे हैं, तो भिवाड़ी चले जाओ. वरना भागो यहाँ से.”

आलोक—“तुझे जूता निकालकर मारना था उन सबको.”

सुदर्शन—“मैं पहली बार आया था, यार. वो भी घरवालों को गालियाँ निकालकर.”

नारायण—“हाँ, समझ गया. पूरी बात बता, फेर आगे क्या हुआ ?”

सुदर्शन—“फिर मैनें कहा, लाओ मेरे दो हजार वापस करो. मुझे नहीं करनी नौकरी. उन लोगों ने कहा, ये अब नहीं मिलेगें.”

आलोक—“फिर ?”

सुदर्शन—“फिर मैं उनसे झगड़ा करने लगा तो मुझे धक्के मारकर बाहर निकाल दिया. मैनें मन में सोचा, घरवालों को इतना भला–बुरा बोलकर आया हूँ. अब तो वो लोग मुझे घर में घूसने भी नहीं देगें. वापस गया तो दोस्त लोग भी अपने पैसे माँगेगें. इस तरह की बातें सोचकर मैनें उन लोगों के पास जाकर हाथ जोड़कर कहा, मैं कोई पैसे वाला नहीं हूँ. मेरा बड़ा भाई घर पर एक छोटी सी दुकान करके सारा घर चलाता हैं. मेरे पास पैसे नहीं हैं. मेरे ऊपर दया करो.”

आलोक—“फिर ?”

सुदर्शन—“फिर वो सब गालियाँ निकालकर बोले, पैसे नहीं हैं तो भाग जा. जा पुलिस में रिपोर्ट लिखा दे हमारे खिलाफ़.”

कृतिका—“ओह…फिर ?”

सुदर्शन—“फिर मैनें हजार रुपये अपने पास रख लिए और उनको दो हजार देकर कहा, मेरे पास इतने ही हैं. उन लोगों ने कहा, इतने में तो पाँच हजार वाली नौकरी मिलेगी.”

कृतिका—“फिर दिलवाई उन लोगों ने नौकरी.”

नारायण—“कौनसी नौकरी ? बाई… चार हजार डकार लिए होगे.”

आलोक—“पहले पूरी बात तो सुन लो, यार.”

नारायण—“हाँ, बता भाई. पहले पूरी बात बता.”

सुदर्शन—“फिर मैनें उनसे कहा, वो पाँच हजार वाली नौकरी ही दिला दो. मैनें सोचा, चलो चार हजार रुपये देकर पाँच हजार रुपये महिने की नौकरी मिल रही हैं. दो महिने नौकरी करके दस हजार लेकर घर चले जाएगें. पैसे देखकर शायद घरवालें घर में घूसा ले.”

आलोक—“फिर ?”

सुदर्शन—“फिर ये सोचकर मैं भिवाड़ी चला गया. शाम को वहाँ दो पच्चीस–तीस(25–30) साल के बिल्कुल नशेड़ी लड़के मुझे रिसींव करने आए. पता नहीं कौनसा नशा करते थे, एक दम नशेड़ी थे काले–पीले रंग के. वो दोनों मुझे एक मौहल्ले में ले गए. उस मौहल्ले में सब उन लड़कों की तरह नशेड़ी, सब के सब नशे में दिखाई दे रहे थे. उस मौहल्ले में एक खण्डर जैसा घर, फर्श टूटा–फूटा कंकर बिखरे हुए. दीवारें पुरानी सी, दीवारों को देखकर लग रहा था, जैसे अभी गिरेगी. छत टूटी हुई सी. उस घर में ले जाकर उन लड़कों ने मुझे कहा. ये तेरे रात को रहने की जगह हैं.”

कृतिका—“ओह…बहुत ही कमीने लोग निकले वो.”

सुदर्शन—“अभी आगे तो सुनो, मेरी हालत क्या हुई ?”

कृतिका—“हाँ, बताओ ?”

सुदर्शन—“मैनें वो घर देखकर कहा, मैं इन्सान हूँ, भूत नहीं हूँ. मैं यहाँ नहीं रह सकता. उन लड़कों ने मुझे धक्का देकर कहा, रहना तो यहीं पड़ेगा. एक महिने से पहले तू कहीं नहीं जा सकता.”

आलोक—“फिर ?”

सुदर्शन—“फिर मैं डरकर बूरी तरह घबरा गया और चुपचाप बैठ गया. रात को एक लड़का खाना लेकर आया. एक दम बेकार खाना आया, दो–तीन दिन की सुखी रोटियाँ और सड़ी–गली बासी हुई सब्जी. मैनें कहा, ये मैं नहीं खा सकता. वो लड़का बोला, यहाँ तो यहीं मिलता हैं. खाना हैं, तो खा. मैं बिना खाना खाए ही सो गया.”

कृतिका—“फिर ?”

कृतिका—“फिर रात को मेरे सोने के बाद उन लोगों ने मेरे पैसे भी निकाल लिए. वो तो अच्छा हुआ मैनें पाँच सौ रुपये अलग से छुपाकर रखे हुए थे, इसलिए वहाँ से आ सका. दूसरे दिन मुझसे एक फैक्टरी में कचरा और गन्दगी साफ़ करवाई, जो कचरा जम जाता हैं, काले रंग का वो.”

नारायण—“फेर ?”

सुदर्शन—“फिर मैं रात को दो–तीन बजे चोरी–छुपे अपना बैग उठाकर चलते–चलते बहुत दूर तक आकर एक ऑटो स्टैण्ड पर आया और छुपकर बैठ गया. सुबह होने के बाद एक ऑटो में बैठकर वहाँ से दूसरी जगह आया. फिर वहाँ से बस पकड़कर गुड़गांव आया. फिर गुड़गांव से वापस इस शहर में आकर उनके ऑफ़िस गया तो देखा, उनके ऑफ़िस पर तो ताला लगा हुआ था. आस–पास के लोगों से उनके बारे में पूछा, तो पता चला. उन लोगों एक महिने के लिए वो ऑफ़िस किराये पर लिया था और सात–आठ दिन बाद ही गायब हो गए.”

नारायण—“ऐसे लोगों का यहीं धंधा हैं. सीधे–साधे, भोले–भाले लोगों को लालच देकर ठगना.”

सुदर्शन—“हाँ, उस दिन मैं इतने गुस्से में था. अगर वो लोग मिल जाते, तो या मैं उन लोगों को मार डालता या फिर वो लोग मुझे मार डालते. लेकिन मेरे वापस आने से पहले ही वो सब भाग गए.”

कृतिका—“फिर तुमने क्या किया ?”

सुदर्शन—“मैं क्या करता ? घरवालों को इतना ज्यादा भला–बुरा बोलकर आया था, जिसके कारण घर वापस जाने की और घरवालों को अपना हाल बताने की हिम्मत नहीं थी. वहाँ भिवाड़ी में गन्दा काला कचरा साफ़ करने के कारण मेरे कपड़े पूरी तरह खराब थे और मेरे पास सिर्फ पचास रुपये बचे थे. उन पचास रुपयों से मैनें पहले दिन तो खाना खा लिया. फिर अगले तीन दिन तक भूख से बूरी तरह तड़पा. चौथे दिन एक सब्जीमंडी में खड़ा था. मेरी हालत इतनी ज्यादा खराब थी, कोई मुझे अपने पास खड़ा भी नहीं होने दे रहा था. सब दुत्कार कर दूर भगा रहे थे. चल हट, हूड़, भाग यहाँ से. रात के ग्यारह बजे बाद सब्जीमंडी के सारे सब्जी वाले अपनी सड़ी–गली बची हुई फल–सब्जियाँ नीचे कचरे में फेंककर चले गए. सबके जाने के बाद जब वहाँ कोई नहीं था, तब भूख से तड़पते हुए मैनें रोते–रोते कचरे में से चीकू, आम, केले, संतरे वगैरह उठाए और एक मन्दिर के आगे लगे पानी के नल से धोकर वो सड़े–गले फलों से अपनी भूख मिटाई. अगले तीन दिन में मैनें दो बार उस सब्जीमंडी के कचरे में से फल उठाकर धोकर खाए थे.”

आलोक—“अरे, यार………”

सुदर्शन—“एक और बात, दिन में तो मुझे मन्दिर के पास भी खड़ा नहीं होने देते थे. इतनी खराब हालत हो गई थी मेरी.”

कृतिका—“फिर क्या हुआ ?”

सुदर्शन—“फिर मैं जैसे तुम खुद को कोस–कोस कर गाड़ी में रोती थी, मैं भी उसी तरह रोते हुए खुद को कोसता रहता था. आठवें दिन सुबह–सुबह मैं एक दुकान की सीढ़ियों पर बैठा रोते हुए सोच रहा था, ये घर बैठे बीस–तीस, पचास हजार कमाने वाले विज्ञापन पढ़कर बीस–तीस, पचास हजार की नौकरी के चक्कर में घर में मम्मी–पापा और भाई–भाभी सबको बैईज्जत करके आया और यहाँ आकर क्या हालत हो गई ? उसी वक्त वहाँ से सुजाता मैडम अपनी गाड़ी से गुजरी. उनकी नजर मुझ पर पड़ गई. मुझे रोते देखकर उन्होंने गाड़ी रोकी और गाड़ी से उतरकर मेरे पास आकर मेरे रोने कारण पूछा. उनको लगा, कोई भिखारी भूख से तड़पकर रो रहा होगा. मैनें रोते हुए अपनी आपबीती उनको सुनाई. मेरी पूरी बात सुनने के बाद सुजाता मैडम ने मेरे आँशू पोंछकर कहा, रोना बन्द करो. चलो उठो, गाड़ी में बैठो और मेरे साथ चलो. वो मुझे गाड़ी बिठाकर अपने घर ले आई और सेठ जी के कपड़े देकर नहाने के लिए बोली. नहाने के बाद मैडम ने मुझे खाना खिलाया और नीचे सेठ जी के पास ले जाकर सेठ जी को सारी बात बताई. सेठ ने मुझसे मेरे बारे में पूछा और कहा, नौकरी तो तुम हमारे पास कर लो. मैं दो–चार दिन में कोई किराये का कमरा दिलवा दूँगा. तब तक एक बार दो–चार दिन के लिए हमारे घर रूक जाओ. मैनें तो सुजाता मैडम और सेठ जी के पैर पकड़ लिए और कहा, अगर आप लोग मेरी मदद नहीं करते, तो पता नहीं मेरा क्या हाल होता ?” शाम को मैडम और सेठ जी मुझे बाजार ले जाकर दो जोड़ी कपड़े भी दिलवा लाए. मेरे घर पर फोन करके मेरे घरवालों को भी सारी बात बताई और कहा, अब सुदर्शन हमारे पास हैं. आप बिल्कुल भी चिन्ता मत करो. तब से साढ़े चार साल से ज्यादा टाइम हो गया. मैं सेठ जी के पास ही नौकरी कर रहा हूँ. हौली–दिवाली–रक्षाबन्धन और कोई काम हो, तो बस दो–चार दिन के लिए घर जाता हूँ. बाकि टाइम यहीं नौकरी करता हूँ.”

कृतिका—“हम्म………रियली तुम्हारे सेठ जी और सुजाता मैडम तो बहुत भले लोग हैं.”

आलोक—“हाँ, ऐसे लोग तो आजकल मिलते ही नहीं हैं.”

नारायण—“वाह…भाई. लोग हो तो तेरे सेठ जी और मैडम जैसे.”

सुदर्शन—“हाँ, सुजाता मैडम और सेठ जी की तो जितनी तारीफ़ करूँ, उतनी कम लगती हैं. जब सब मुझे दुत्कार कर दूर भगा रहे थे, उस वक्त सुजाता मैडम मेरे आँशू पोंछकर मुझे अपने घर ले आई और सेठ जी ने अपने पास नौकरी दे दी.”

कृतिका—“सही बात हैं.”

सुदर्शन—“लेकिन वो धोखेबाज लोग आज भी मुझे खटकते हैं, जिनके कारण मेरी वो हालत हुई थी. मैं उन लोगों का तो कुछ नहीं बिगाड़ पाया. लेकिन मुझे हर धोखेबाज में वहीं लोग नजर आते हैं. जब भी किसी धोखेबाज के बारे में सुनता हूँ, तो मेरा खून खोलने लगता हैं. मुझे यहाँ बुलाकर मेरी वो हालत करने वालों में लड़कियाँ और महिलाएँ भी थी. इसलिए मैनें तुमसे कहा था, अपने को लड़का–लड़की या नारी–पुरुष का कॉम्पीटिशन नहीं करना. अपने को एक धोखेबाज की धोखेबाजी सबको बतानी हैं.”

कृतिका—“अब जो लोग गलत हैं, वो तो गलत ही हैं. इसमें लड़का–लड़की और नारी–पुरुष क्या करना ?”

आलोक—“तो इसलिए तुझे कृतिका जी से हमदर्दी और उस लड़के से नफ़रत हो गई.”

सुदर्शन—“हाँ, धोखे अलग–अलग हैं, लेकिन हम दोनों का दर्द एक जैसा ही था. मैं जब भी कृतिका को रोते हुए देखता था, तो मुझे अपनी हालत याद आ जाती थी. मैं पैसे के लालच में खुद ही मुर्ख बनने यहाँ आया था और कृतिका प्यार के लालच में उसकी बातों के जाल में फँस गई.”

नारायण—“सब ऐसे ही फँसते हैं. फर्क सिर्फ इतना हैं, जिसने खुद दुःख–दर्द देखे हैं, वो दूसरों के दुःख–दर्द समझता हैं. बाकि लोग बस मजाक उड़ाते हैं, बातें करते हैं.”

सुदर्शन—“मेरा तो ये मानना हैं, जब तक अपराधी के मन में डर नहीं होगा, तब तक वो अपराध करता रहेगा. इसलिए हर अपराधी को बुरी से बुरी सजा मिलना बहुत जरूरी हैं. अपराधी दो तरह के होते हैं, एक तो अन्जाने में या मजबुरी में अपराध करने वाले. दूसरे सोच–समझकर जान–बुझकर अपराध करने वाले. इन सोच–समझकर जान–बुझकर अपराध करने वालों को किसी भी हालत में माफ़ नहीं करना चाहिए. ये लड़की छेड़ने वाले, महिलाओं से बदतमीजी करने वाले, प्यार के चक्कर में फँसाने वाले, ऐसे घटिया लोगों की कोई मजबुरी नहीं होती. इन लोगों को अच्छी तरह पता होता हैं, ये गलत कर रहे हैं. इनको तो किसी भी हालत में छोड़ना नहीं चाहिए. लेकिन इसके उस बॉयफ्रैंड को सजा दिलाने का तो कोई रास्ता नजर आया नहीं. क्योंकि कृतिका ने सब कुछ अपनी मरजी से किया था. इसलिए मैनें सोचा, सजा नहीं तो कम से कम उसकी धोखेबाजी तो सबके सामने आए.”

आलोक—“चलो, ये काम तो हो गया. उस लड़के के बारे में इतना सब जानने के बाद. अब शायद ही कोई लड़की उससे शादी करेगी.”

नारायण—“नहीं, शादी तो उसकी हो जाएगी. अब नहीं, तो कुछ साल बाद हो जाएगी.”

आलोक—“उसके बारे में सब कुछ जानने के बाद भी कौनसी लड़की उससे शादी करना चाहेगी ?”

नारायण—“दुनिया में लालची, मुर्ख और महान लड़कियाँ बहुत हैं. वो बहुत पैसे वाला हैं, इसलिए कोई पैसे की लालची लड़की उससे शादी कर सकती हैं. कुछ मुर्ख लड़कियों को लड़के के गलत करमों के बारे में सब कुछ मालूम होता हैं, फिर भी वो मुर्ख लड़कियाँ सोचती हैं, अब आगे भविष्य में लड़का कोई गलत काम नहीं करेगा और कुछ महान लड़कियाँ होती हैं, जो गलत, बेकार, घटिया और गन्दे लड़कों को प्यार और अपनेपन से सुधारने के नाम पर किसी घटिया लड़के से शादी कर लेती हैं. इस लड़के को भी देर–सवेर कोई ना कोई ऐसी लालची, मुर्ख या महान लड़की मिल जाएगी.”

सुदर्शन—“बस इसलिए तो दुनिया में गलत लोगों का बोलबाला हैं. और सबसे ज्यादा गुस्सा तो इन महान लोगों पर आता हैं. क्योंकि लालची और मुर्ख लड़कियाँ तो एक से बचेगी, तो दूसरे का शिकार बन जाएगी. दूसरे से बचेगी, तो तीसरे या चौथे का शिकार बन जाएगी. लेकिन ये महान लड़कियाँ सब कुछ जानते हुए भी अच्छे लोगों को ठोकर मारकर घटिया लोगों को प्यार और अपनापन देती हैं.”

कृतिका ने हँसकर कहा—“इनमें से मैं कौनसी कैटेगरी में आती हूँ ?”

सुदर्शन—“तुम मुर्ख लड़कियों वाली कैटेगरी में आती हो और मैं लालची लोगों वाली कैटेगरी में आता हूँ. क्योंकि मैं भी साढ़े चार साल पहले पैसे के लालच में धोखा खाने के लिए खुद चलकर गलत लोगों के पास आया था.”

आलोक—“कोई बात नहीं, भाई. अब भूल जाओ, सारी पुरानी बात.”

सुदर्शन—“हाँ, अब तो भूल ही गए हैं.”

नारायण—“अब जो हो गया, उसको बदल तो सकते नहीं. इसलिए भूलने में भी फायदा हैं.”

सुदर्शन ने कृतिका से कहा—“हाँ, तुम भी सब कुछ भूल जाओ और इसके बारे में और जितनी बातें रह गई हैं. वो सब पोस्ट कर दो. फिर अपने फ्यूचर(भविष्य) के बारे में सोचो.”

कृतिका—“अब कैसा फ्यूचर ? मेरे मॉम–डेड के बारे में तो तुम्हें बताया ही हैं. घर में मॉम–डेड, बाहर ये दिव्यांश जैसे लोग. अच्छा, अब मैं चलती हूँ. जब से मैनें फेसबुक पर पोस्ट करने शुरू किये हैं, मॉम–डेड दोनों बहुत नाराज हैं.”

सुदर्शन—“तुम चिन्ता मत करो. मैं मेरे सेठ जी और मैडम से इस बारे में बात करूँगा. वो तुम्हारे मम्मी–पापा को जानते भी हैं, वो जरूर तुम्हारी मदद कर देगें.”

कृतिका कुर्सी से खड़ी होकर बोली—“चलो, बाद में सोचेगें इस बारे. अभी मैं चलती हूँ.”

सुदर्शन—“हाँ, ठीक हैं.”

कृतिका—“बाऐं नारायण जी, बाऐं आलोक.”

कृतिका गाड़ी की तरफ जाने लगी.

नारायण—“ध्यान से जाना, गाड़ी धिरे चलाकर.”

कृतिका ने अपनी गाड़ी का दरवाजा खोलकर कहा—“अरे, क्यों इतनी चिन्ता करते हो ? अब तो मैनें ड्रिंक करके गाड़ी चलाना भी छोड़ दिया.”

नारायण—“ये तो बहुत अच्छी बात हैं. धिरे–धिरे शराब बिल्कुल बन्द कर दो.”

कृतिका गाड़ी में बैठकर गाड़ी का दरवाजा बन्द करके गाड़ी स्टार्ट करते हुए बोली—“जल्दी ही आपको ये न्यूज भी सुना दूँगी.”

नारायण—“हम इंतजार करेगें.”

कृतिका—“अच्छा, अब चलती हूँ. कल मिलते हैं.”

कृतिका गाड़ी चलाते हुए चली गई.


अगले दिन तैईस जून, शुक्रवार को सुबह के सात बजे उम्र में उनसठ(59) साल के सेठ साँवरमल बागड़ी अपने से दो साल छोटी उम्र में सत्तावन(57) साल की पत्नी राजलक्ष्मी के साथ घर के हॉल में सोफे पर बैठे बातें कर रहे थे.

सेठ साँवरमल बागड़ी—“अब पाणी सिर उ ऊपर चल ग्यो. छोरी हैं–छोरी हैं बोल ग घणो ही सहन कृयो, पर आ छोरी तो नई माने.”(हिन्दी अनुवाद : अब पानी सर से ऊपर चला गया. लड़की हैं–लड़की हैं बोल कर बहुत ही सहन किया, लेकिन ये लड़की तो नहीं सुधरी.)

राजलक्ष्मी—“बेरो नी कुणसा ईसा करम कृआ हा, झक्को आ टिंगरी पल्ले पड़ी. चयार लुगाया म जाण जोगी कोनी छोडी.”(हिन्दी अनुवाद : मालूम नहीं कौनसे ऐसे करम किये थे, जो ये लड़की किस्मत में आई. चार औरतों में जाने लायक नहीं छोड़ा.)

सेठ साँवरमल बागड़ी—“हाँ, की समझ म कोनी आवे, कढ़े गलती होई ? जित्ती इने सीधा रस्ता पर घालणा गी कोशिश करी, आ तो बित्ता ही ज्यादा उल्टा रस्ता पकड़या.”(हिन्दी अनुवाद : हाँ, कुछ भी समझ में नहीं आता, कहाँ गलती हुई ? जितना इसको सीधे रस्ते पर चलाने की कोशिश की, इसने तो उतने ही ज्यादा गलत रास्ते पकड़े.)

राजलक्ष्मी—“म तो क्योउ हूँ, अब ईंगो घर उ बारे आणो–जाणो पूरी तरिया बन्द कर द्यो. नई तो फेर आपा न मरनो पड़अगो.”(हिन्दी अनुवाद : मैं तो कहती हूँ, अब इसका घर से बाहर आना–जाना पूरी तरह बन्द कर दो. वरना फिर हमें मरना पड़ेगा.)

कृतिका ऊपर अपने कमरे का दरवाजा खोलकर कमरे से बाहर निकली और सीढिया उतरते हुए नीचे आकर बाहर की तरफ जाने लगी.

सेठ साँवरमल बागड़ी ने खड़े होकर गरजते हुए कहा—“ऐ छोरी, इने आ.”(हिन्दी अनुवाद : ऐ लड़की, इधर आ.)

पिता की आवाज़ सुनते ही कृतिका के पैर जहाँ थे वहीं जम गए. राजलक्ष्मी भी सोफे से खड़ी हो गई. कृतिका मुड़कर अपने माता–पिता के सामने आकर खड़ी हुई.

सेठ साँवरमल बागड़ी—“अब तू सीदो–सीदो ओ बता, तू के चावे हैं ? म्हाने मारनो हैं, तो बिय्या ही मार–मूर दें.”(हिन्दी अनुवाद : अब तू सीधे–सीधे ये बता, तू क्या चाहती हैं ? हमें मारना हैं, तो वैसे ही मार–मूर दें.)

कृतिका—“अब म के कृओ हैं ?”(हिन्दी अनुवाद : अब मैनें क्या किया हैं ?)

सेठ साँवरमल बागड़ी ने कृतिका के गाल पर चांटा मारकर कहा—“बताउ, तने के कृओ हैं ? अबी भी बूझे हैं. जाऊँ बढ़े, लोग हांस–हांस ग देखे. के ओ हैं, बी कुलछणी गो बाप हर ओजू मने ही बूझे, म के कृओ हैं ?”(हिन्दी अनुवाद : बताऊँ,  तुझे क्या किया हैं ? अभी भी पूछ रही हैं. जहाँ जाता हूँ, लोग हँस–हँसकर देखते हैं. कि ये हैं, उस कुलछिणी का बाप और अभी मुझसे ही पूछ रही हैं, मैनें क्या किया हैं ?)

कृतिका लड़खड़ाने के बाद सम्भलते हुए बोली—“ईया थाप मारना उ म कोनी मरूँ. इती ही खारी लागू, तो गळो घोंट द्यो मेरो.”(हिन्दी अनुवाद : ऐसे थप्पड़ मारने से मैं नहीं मरूँगी. इतनी ही बुरी लगती हूँ, तो गला घोंट दो मेरा.)

सेठ साँवरमल बागड़ी—“म सोचू, अब जुआन छोरी पर हाथ उठाणो ठीक कोनी. पर तू ईया कोनी माने.”(हिन्दी अनुवाद : मैं सोचता हूँ, अब जवाँन लड़की पर हाथ उठाना सही नहीं हैं. लेकिन तू ऐसे नहीं मानेगी.)

सेठ साँवरमल बागड़ी कृतिका का बाजू पकड़कर कृतिका को लेकर सीढ़िया चढ़ते हुए कृतिका के कमरे की तरफ चल पड़े. राजलक्ष्मी भी उनके पीछे–पीछे चल पड़ी. चलते–चलते सेठ साँवरमल बागड़ी ने दीवार के पास पड़ा एक डंडा उठा लिया. सेठ साँवरमल बागड़ी ने कृतिका को कमरे में लाकर धकेला और कृतिका को डंडे से पीटने लगे.

राजलक्ष्मी ने सेठ साँवरमल बागड़ी को रोकते हुए कहा—“के कृरो हो ? जमा ही पागल होग्या के ?”(हिन्दी अनुवाद : क्या कर रहे हो ? बिल्कुल ही पागल हो गए क्या ?)

सेठ साँवरमल बागड़ी ने डंडा फेंक कर कहा—“पागल नई होवा तो और के कृरा ? आ तो सामू जवाब देण लाग गी अब ? ईतो सब कर दियो, फेर ही मुंडा पर शर्म नाम गी चीज ही कोनी. ऊपर उ आपगा कारनामा सोशल साईटा पर बतावे और हैं.”(हिन्दी अनुवाद : पागल नहीं होए तो और क्या करे ? ये तो सामने जवाब देने लगी अब. इतना सब कर दिया, फिर भी मुँह पर शर्म नाम की चीज ही नहीं हैं. उस पर अपने कारनामें सोशल साइट्स पर और बता रही हैं.)

राजलक्ष्मी—“थे चालो, बारे चालो. आज उ ईगो ई कमरा उ बारे आणो बन्द. पड़ी रेण द्यो अठेई.”(हिन्दी अनुवाद : आप चलो, बाहर चलो. आज से इसका इस कमरे से बाहर आना बन्द. पड़ी रहने दो यहीं.)

राजलक्ष्मी ने सेठ साँवरमल बागड़ी को समझा–बुझाकर कमरे से बाहर भेजा और कृतिका से मोबाइल छीनकर बोली—“तेरो डोळ देखअर तेर खातर कोई छोरो बी कोनी मिले. नई तो सासरे घाल अर गेल छुटा लेता.”(हिन्दी अनुवाद : तेरे बिगड़ैल होने के कारण, तेरे लिए कोई लड़का भी नहीं मिलता. वरना ससुराल भेजकर पीछा छुड़ा लेते.)

राजलक्ष्मी कमरे से बाहर गई और कमरे का दरवाजा बाहर से बन्द करके कृतिका को अन्दर बन्द कर दिया.

कृतिका चुपचाप हाथ की कोहनी पर लगे डंडे की चोट सहलाते हुए गंभीर मुद्रा में खड़ी थी. कमरा बाहर से बन्द होने के कुछ देर बाद कृतिका पीछे होते हुए दीवार से पीठ लगाकर नीचे बैठकर अपने घुटनों पर सर रखकर बैठ गई.

सुबह के नौ बजे आम्रपाली सर्किल पर खड़ा सुदर्शन कृतिका का इंतजार करते हुए जेब से मोबाइल निकालकर मोबाइल में टाइम देखकर बोला—“नौ बज गए, आज कृतिका क्यों नहीं आई ? कॉल करके देखता हूँ.”

सुदर्शन ने कृतिका का नम्बर लगाकर मोबाइल कान से लगाया. कृतिका का मोबाइल स्वीच–ऑफ था. सुदर्शन ने मोबाइल जेब में रखते हुए मन में बोला कि ये आज कहाँ रह गई ?

साढ़े नौ बजे तक इंतजार करने के बाद सुदर्शन ने मन में कहा कि साढ़े नौ बज गए. अब ऑफ़िस चलते हैं. शाम को आकर देखेगें.

सुदर्शन पैदल ही कृतिका के बारे में सोचते हुए धिरे–धिरे ऑफ़िस की तरफ चलने लगा.

दस बजकर तीस मिनट पर सुदर्शन ने जयसिंह के घर पहुँचकर जयसिंह के घर का मुख्य दरवाजा खोला और  अन्दर दाखिल होकर घर के बाहर जूते निकालकर घर का दरवाजा खोलकर सीढ़िया उतरते हुए नीचे बेसमेंट में आकर अपने टेबल की कुर्सी पर बैठ गया.

ऑफ़िस में स्टाफ के सभी लोग आज सुदर्शन से पहले आकर अपने–अपने टेबल की कुर्सी पर बैठे थे.

जयसिंह केबिन के शीशे से सुदर्शन को देखकर अपनी चेयर से उठे और केबिन का दरवाजा खोलकर बोले—“सुदर्शन.”

सुदर्शन ने जयसिंह की तरफ देखकर कहा—“हाँ, सेठ जी.”

जयसिंह सुदर्शन को अन्दर आने के इशारा करके वापस जाकर अपनी चेयर पर बैठ गए. सुदर्शन खड़ा होकर केबिन में आकर जयसिंह के सामने खड़ा हुआ.

जयसिंह—“क्या बात हैं ? आज लेट कैसे हो गया ? तुम तो हमेशा टाइम से पहले आते हो.”

सुदर्शन—“आज कृतिका नहीं आई, इसलिए पैदल आया हूँ. उसके साथ गाड़ी में आने की आदत पड़ गई. इसलिए पहले पैंतीस–पैंतालिस मिनट में पहुँचता था. आज घंटा लग गया.”

जयसिंह ने मुस्कुराकर कहा—“कोई बात नहीं, तुम आज पहली बार लेट हुए, इसलिए पूछा. वो ब्रेसलेट के लॉक चैक करने हैं. वो ले जाओ.”

सुदर्शन ने कारपेट लगे फर्श पर नीचे रखे ब्रेसलेट उठाए और केबिन से बाहर आकर अपने काम में लग गया.

सुदर्शन आज उदास मन से अपना काम कर रहा था. आस–पास बैठे स्टाफ के अन्य लोगों से भी बात नहीं की.

शाम के साढ़े छः बजे सुदर्शन के इलावा स्टाफ के सभी लोग जा चुके थे. केबिन में जयसिंह और सुजाता अपनी–अपनी चेयर पर बैठे अपना–अपना काम कर रहे थे.

सुदर्शन ने खड़े होकर अपने टेबल से सामान उठाकर केबिन में लाकर रखा और मुड़कर बोला—“सेठ जी, आज मैं जल्दी चला जाऊँ ?”

जयसिंह ने सुदर्शन की तरफ देखकर कहा—“कृतिका नहीं आई, इसलिए परेशान हैं क्या ? अरे यार, कोई तबीयत वगैरह खराब हो गई होगी. कॉल करके पूछ लेता.”

सुदर्शन—“उसका मोबाइल ही बन्द बता रहा हैं. सुबह से कई बार कर लिया.”

सुजाता—“ओह…घर में कोई काम हो गया होगा और मोबाइल में प्रोब्लम हो गई होगी. तुम परेशान मत हो. कल आए जब पूछ लेना, आज क्यों नहीं आई ?”

सुदर्शन—“वो तो ठीक हैं, मैडम. लेकिन आज मन भी नहीं लग रहा काम में.”

जयसिंह—“चलो, कोई बात नहीं. आज जल्दी चले जाओ.”

सुदर्शन—“थैक्यू, सेठ जी.”

जयसिंह—“कल सुबह आ जाना, टाइम पर.”

सुदर्शन—“ठीक हैं, सेठ जी.”

सुजाता ने निराश मुद्रा में मुड़ते हुए सुदर्शन से कहा—“खाना खा लेना, टाइम से. आज दिन में भी तुमने सिर्फ दो ही रोटी खाई थी.”

सुदर्शन—“हाँ, मैडम खा लूँगा.”

सुजाता—“ठीक हैं, जाओ.”

सुदर्शन केबिन से बाहर आकर सीढिया चढ़ते हुए ऊपर आया और घर से बाहर आकर अपने जूते पहनकर कृतिका से मिलने की जगह(जयसिंह के घर से थोड़ी दूर जहाँ रोज कृतिका गाड़ी में बैठकर सुदर्शन का इंतजार करती हैं) चल पड़ा.

सुदर्शन को कृतिका का इंतजार करते–करते आठ बज गए. सुदर्शन मन में सोचने लगा कि डेढ़ घंटे से उसका इंतजार कर रहा हूँ. कृतिका हर रोज शाम को कभी छः बजे, कभी सात बजे, कभी आठ बजे यहाँ आकर गाड़ी लगाती हैं. वो हर रोज इतनी देर कैसे इंतजार कर लेती हैं ? मैं तो समझता था, उसका क्या हैं ? गाड़ी में चाहे जितनी मरजी देर तक बैठे रहो. लेकिन आज पता चल रहा हैं, इंतजार करना कितना मुश्किल हैं ? और हैरानी की बात ये, उसने तो कभी शिकायत भी नहीं की.

रात के नौ बजे कृतिका के कमरे का दरवाजा खुला और राजलक्ष्मी कृतिका के लिए थाली में खाना लेकर कमरे में आई. कृतिका घूटनों पर सर रखे बैड पर बैठी थी.

राजलक्ष्मी ने बैड पर थाली रखकर कहा—“ल, रोट गिट ल.”(हिन्दी अनुवाद : लो, खाना खालो.)

कृतिका ने मुँह फेरकर गुस्से में कहा—“पाछो ले जा. मन कोनी खाणो.”(हिन्दी अनुवाद : वापस ले जाओ. मुझे नहीं खाना.)

राजलक्ष्मी ने गुस्से से उबलकर कहा—“तू क्यू कृह हैं ईय्या ? ईसो म्हे के बिगाड़ दियो तेरो ? क्यागो बदलो काडन लाग री हैं म्हारा उ………?”(हिन्दी अनुवाद : तुम क्यों कर रही हो ऐसा ? ऐसा हमने क्या बिगाड़ दिया तेरा ? किस बात का बदला ले रही हो हमसे………?)

कृतिका—“म कोई बदलो ल्योउ नी. थे मन कमरा म बन्द कर दियो. म कि केयो के ? अब मन ऐकली छोड़ द्यो.”(हिन्दी अनुवाद : मैं कोई बदला नहीं ले रही हूँ. आप लोगों ने मुझे कमरे में बन्द कर दिया, मैनें कुछ कहा क्या ? अब मुझे अकैली छोड़ दो.)

राजलक्ष्मी ने कृतिका को चांटा मारकर कहा—“चुल्ला म पड़. गिटणी हैं तो गिट ल, नई तो मर जा कढई जार. पतो नी कद गेल छोडःगी ?”(हिन्दी अनुवाद : भाड़ में जाओ. खाना हैं तो खा, नहीं तो मर जा कहीं जाकर. पता नहीं कब पीछा छोड़ेगी ?)

राजलक्ष्मी खाने की थाली छोड़कर कमरे से बाहर चली गई और कमरे का दरवाजा बाहर से बन्द कर दिया.

कृतिका ने खाने की थाली की तरफ देखा और मुस्कुराकर मन में कहा कि मैं तो खुद ही जीना नहीं चाहती, माँ. बस खुदखुशी करने की हिम्मत नहीं हुई. वरना बहुत पहले आपका और पापा का पीछा छोड़ देती.

सुदर्शन ने रात के दस बजे तक परेशान होते हुए कृतिका का इंतजार करने के बाद मन में खुद से कहा कि लगता हैं, आज नहीं आएगी. चल चलते हैं. कल सुबह मिलते ही गुस्से से बरस पड़ेगें. कम से कम बता तो देती, क्यों नहीं आई ?

सुदर्शन अपने रास्ते पर चलने लगा. पौने ग्यारह बजे सुदर्शन नारायण की दुकान पर पहुँचा. नारायण की दुकान भी बन्द हो चुकी थी.

सुदर्शन ने मन में कहा कि आज ये भी टाइम से पहले ही दुकान बन्द कर गया. रोज तो ग्यारह बजे तक बैठा रहता हैं. चल कोई बात नहीं. कल देखेगें सबको.

सुदर्शन अपनी बिल्डिंग की तरफ चल पड़ा.


रात के दो बजे सुदर्शन बैड पर पीठ के बल सीधा लेटा हुआ था. आज कृतिका के बारे में सोच–सोचकर सुदर्शन को भूख का तो एहसास भी नहीं हुआ. सुदर्शन थोड़ी–थोड़ी देर बाद करवट बदलते हुए सोने की कोशिश करता रहा, लेकिन कृतिका की याद उसे सोने नहीं दे रही थी.

रात के तीन बजे कृतिका अपने कमरे में बैड पर पत्थर की मूरत बनी बैठी थी. खाने की थाली अभी तक ज्यों की त्यों पड़ी थी.

कृतिका के दिमाग में विचार चल रहे थे कि ना तो मैं अपने माँ–पापा से खुश हूँ, ना माँ–पापा मुझसे खुश हैं. समझ में नहीं आता, मैं क्या करूँ ? लेकिन कुछ भी हो, अब माँ–पापा और मेरे बीच इतनी दूरियाँ आ गई हैं, जो कभी खतम नहीं हो सकती. माँ ठीक कह रही थी, अब मुझे यहाँ से चले जाना चाहिए.

कृतिका बैड से उठकर खड़ी हुई और इधर–उधर कुछ ढूंढने लगी. अलमारी के ऊपर उसे एक हथोड़ा मिल गया. कृतिका ने हथोड़ा उठाया और अपनी सैंडल पहनकर कमरे की खिड़की की तरफ आकर हथोड़े से खिड़की की जाली तोड़ने लगी.

हथोड़े की आवाज सुनकर सेठ साँवरमल बागड़ी और राजलक्ष्मी जाग गए. दोनों उठकर अपने कमरे से बाहर निकलकर कृतिका के कमरे की तरफ दौड़े.

कृतिका ने खिड़की की जाली पूरी तरह तोड़ने के बाद हथोड़ा फेंका और खिड़की से बाहर कूद गई. सेठ साँवरमल बागड़ी और राजलक्ष्मी ने कृतिका के कमरे का दरवाजा खोलकर अन्दर आकर देखा, खिड़की टूटी हुई हैं और कृतिका गायब हैं.

कृतिका दो मंजिल से जमींन पर आकर गिरी और उसे हाथ–पैर और सर में चोट लग गई. लेकिन कृतिका अपनी चोटों की परवाह ना करके खड़ी होकर भाग गई.

सेठ साँवरमल बागड़ी और राजलक्ष्मी कृतिका के कमरे से बाहर आकर घर के नौकरों और चौकीदारों को आवाज़ देते हुए सीढिया उतरकर नीचे आए और घर के दो नौकरों और दो चौकीदारों के साथ घर से बाहर आकर कृतिका को ढूंढने लगे.

कृतिका भागते–भागते अपने घर से चौथी गली में एक घर के सामने आकर रूक गई. कृतिका ने इधर–उधर देखने के बाद अपनी सैंडल निकालकर हाथों में ली और धिरे से आवाज़ किये बिना घर की दीवार कूद कर घर के अन्दर दीवार के पास ही छूपकर बैठ गई.

सेठ साँवरमल बागड़ी और राजलक्ष्मी आस–पास किसी को कृतिका के घर से भागने के बारे मालूम ना चल जाए, इसलिए किसी से कुछ पूछताछ किये बिना नौकरों और चौकीदारों के साथ सुबह के साढ़े चार बजे तक कृतिका को ढूंढते रहे, लेकिन कृतिका के नहीं मिलने पर निराश होकर घर वापस आ गए.

सुबह के पाँच बजे कृतिका घर की दीवार के पास बैठी–बैठी सोच रही थी कि यार…मोबाइल माँ ने लिया और क्रेडिट कार्ड, पैसे वगैरह सब गाड़ी में पड़े हैं. पैसे के नाम पर एक रुपया नहीं हैं. अब कहाँ जाऊँगी और कैसे जाऊँगी ? और तो और तुझे पैसे देने वाला भी कोई नहीं हैं. घर वापस गई तो दूबारा घर से निकलने का मौका नहीं मिलेगा………चल अब सुबह होने वाली हैं. यहाँ से निकल पहले.

कृतिका खड़ी होकर दीवार कूदकर घर से बाहर आ गई और अपनी सैंडल पहनकर पैदल ही चल पड़ी.

सुबह के सात बजे सुदर्शन जागते हुए बिस्तर पर लेटा हुआ था. सारी रात जागने के बाद सुदर्शन बिस्तर से उठा और नहाकर तैयार होने के बाद बिल्डिंग लॉक करके आम्रपाली सर्किल पर आकर कृतिका के इंतजार में टहलने लगा.

सुबह के दस बजे तक इंतजार करने के बाद सुदर्शन ने अपनी जेब से मोबाइल निकालकर जयसिंह को कॉल किया.

जयसिंह कॉल रिसींव करके मोबाइल कान पर लगाकर बोले—“हाँ, सुदर्शन.”

सुदर्शन—“सेठ जी, मैं आज बारह बजे बाद आऊँगा.”

जयसिंह—“क्यों ? क्या हुआ ?”

सुदर्शन—“आज फिर कृतिका नहीं आई और उसका मोबाइल अभी तक बन्द हैं. मैं उसके घर जा रहा हूँ.”

जयसिंह—“अरे, ऐसे अचानक घर जाएगा, कृतिका के घरवाले क्या सोचेगें ? कृतिका तुझे जानती हैं, उसके माँ–बाप थोड़े ही जानते हैं.”

सुदर्शन—“तो क्या हुआ, सेठ जी ? मैं कौनसा उसे घर से भगाने के लिए जा रहा हूँ ? मैं तो बस उसका हाल–चाल पूछने जा रहा हूँ.”

जयसिंह—“अरे लेकिन………”

सुदर्शन—“नहीं, सेठ जी. एक बार उससे मिलकर तो जरूर आऊँगा. मेरा मन नहीं मान रहा.”

जयसिंह—“अच्छा, ठीक हैं जा. और सुन, कोई प्रोब्लम हो तो मुझे कॉल कर देना.”

सुदर्शन—“ठीक हैं, सेठ जी.”

जयसिंह—“ठीक हैं.”

जयसिंह के कॉल काटने के बाद सुदर्शन ने मोबाइल जेब में डाला और बस स्टॉप पर आकर खड़ा हो गया. कुछ देर बाद बस आई. सुदर्शन बस स्टॉप पर खड़े लोगों के साथ बस में चढ़ गया और बस आगे चल पड़ी.

कृतिका के घर के पास बस स्टॉप पर बस से उतरकर सुदर्शन ने सोचा कि सेठ जी ठीक कह रहे थे. कृतिका के माँ–बाप मुझे नहीं जानते, पहले कृतिका के घर के पास उस दुकानवाले से कृतिका के बारे में पूछकर देखते हैं.

सुदर्शन चलकर कृतिका के घर के पास वाली दुकान पर आया और दुकान से एक सेन्टर फ्रैश च्यूंगम खरीदकर च्यूंगम का रेपर उतारकर च्यूंगम मुँह में डालकर दुकानदार से पूछा—“भाई साहब, आपने साँवरमल जी की लड़की को आते–जाते देखा हैं ?”

दुकानदार—“नहीं, कल से नहीं देखा. वरना तो रोज सुबह सात बजे के आस–पास गाड़ी लेकर यहीं से निकलती हैं. मुझे तो लगता हैं, वो घर छोड़कर चली गई या फिर साँवरमल जी ने उसे घर से निकाल दिया.”

सुदर्शन—“क्यों, आपको ऐसा क्यों लगता हैं ? हो सकता हैं, उसकी तबीयत खराब हो. आजकल शराब पीना बहुत कम कर दिया ना उसने.”

दुकानदार—“अब क्या कम करेगी ? सब कुछ तो कर लिया उसने. कल–परसो टीवी पर भी उसके किस्से बता रहे थे. आजकल बिगड़ैल लड़कियाँ तो और भी बहुत हैं, लेकिन इसके जैसी बेशर्म और घटिया लड़की नहीं देखी. खुद ही फेसबुक पर पोस्ट करके अपने और उस लड़के के बारे में सब कुछ बता रही हैं.”

सुदर्शन को कृतिका के बारे में दुकानदार की बात सुनकर बहुत गुस्सा आया, लेकिन सुदर्शन ने अपने गुस्से को दबाकर कर कहा—“भाई साहब, एक बात बताओ. मैं ढ़ाई–तीन महिने पहले जब पहली बार आपकी दुकान पर आया था. तब आपने बताया, कि कुछ लोग दो–चार महिने तक नगद में सामान खरीदते हैं. फिर दस–बीस रुपये की उधार से उधार का सिलसिला शुरू करते हैं और आगे चलकर सौ–पचास से होते हुए हजार–पाँच सौ रुपये तक पहुँच जाते हैं. आखिर में एक–डेढ़ साल बाद या दो साल बाद पाँच हजार या दस हजार का चूना लगाकर चले जाते हैं. कुछ लोग तो बीस हजार–तीस हजार तक खाकर मुकर जाते हैं. फिर आप उनसे अपने उधार दिये हुए सामान के पैसे माँगते हो, तो गालियाँ देते हैं, लड़ाई–झगड़े करने पर उतर जाते हैं.”

दुकानकार—“हाँ, आपको बताया तो था, कई लोग मेरे एक–डेढ़ लाख रुपये खा गए इस तरीके से.”

सुदर्शन—“अब अगर मैं कहूँ, आप घटिया हो, आपने उन लोगों को उधार सामान क्यों दिया ? आपके रुपये तो खाने ही चाहिए. आप उधार देते हो, इसलिए सारी गलती आपकी ही हैं. वो आपके पैसे खाने वाले तो सीधे–साधे, शरीफ लोग हैं. उनको बदनाम मत करो. तो मेरी ये बात सुनकर आपको कैसा लगेगा ?”

दुकानदार ने सुदर्शन की तरफ़ देखकर कहा—“ये तो आप भी अच्छी तरह जानते हो, कैसा लगेगा ?”

सुदर्शन—“बिल्कुल मैं जानता भी हूँ और समझता भी हूँ. उन धोखेबाजों ने पहले अच्छा व्यवहार करके आपका विश्वास जीत लिया और विश्वास जीतकर आपके पैसे लूट लिए. अब मैं उन धोखा देने वालों को घटिया कहने की जगह आपको बुरा बताऊँ, तो यकिनन आपको बुरा लगेगा. आप कहेगें, एक तो मेरे साथ धोखा हुआ, उस पर मुझे ही घटिया बोला जा रहा हैं.”

दुकानदार—“हाँ, अब कोई जानबुझ कर तो धोखा खाता नहीं हैं.”

सुदर्शन—“तो क्या इस लड़की ने जानबुझ कर धोखा खाया होगा ? यहीं सब इस कृतिका के साथ हुआ. पहले उस दिव्यांश नाम के लड़के ने प्यार और अपनापन दिखाकर कृतिका का विश्वास जीता. फिर प्यार और शादी के वादे किये. फिर जिस तरह आप अपनी मरजी से उधार सामान दे रहे थे, बिल्कुल उसी तरह कृतिका ने भी अपनी मरजी से उस लड़के के साथ वो रिश्ते बना लिए, जो शादी के बाद बनाने चाहिए. और मतलब पूरा होने के बाद उस लड़के ने बिल्कुल उसी तरह लड़की को अपनी जिन्दगी से निकालकर फेंक दिया, जैसे आपकी उधार देने की लिमिट खतम होने के बाद धोखेबाज ग्राहकों ने आपकी दुकान छोड़ दी. कृतिका जब उस लड़के से शादी की बात करती, तो वो लड़का उसी तरह कृतिका को गालियाँ निकालकर कृतिका के साथ मारपीट करने लगा, जैसे आपके पैसे खाने वाले पैसे माँगने पर आपको गालियाँ निकालकर आपसे लड़ाई–झगड़ा करने पर उतारू हो जाते हैं.”

दुकानदार सोच में पड़ गया.

सुदर्शन—“क्या हुआ ? आपने धोखेबाजों को अपनी दुकान से खाने–पीने का सामान अपनी मरजी से खुशी–खुशी खिलाया और कृतिका ने एक धोखेबाज के सामने खुद को पेश कर दिया. पैसे तो दुबारा कमाए जा सकते हैं, फिर भी आप उन धोखेबाज ग्राहकों को कई सालों बाद भी कोस रहे हो और उनकी धोखेबाजी के बारे में सबको बताते भी रहते हो. लेकिन इज्जत दुबारा वापस नहीं मिलती, फिर भी कृतिका का उस धोखेबाज की धोखेबाजी के बारे में सबको बताना घटिया बात हैं. कई तरह के धोखें अलग–अलग तरीके से बहुत सारे लोगों के साथ होते रहते हैं. अब कोई धोखेबाज अपने गलत इरादों में कामयाब हो जाए, तो क्या करें ? धोखेबाज को सजा देने की जगह धोखा खाने वाले को घटिया और बेकार बताएँ ?”

दुकानदार—“हम्म………ये तो गलत हैं.”

सुदर्शन—“चलिए, कोई बात नहीं. उम्मीद हैं, आप आगे से घटिया लोगों को ही घटिया कहेंगे. घटिया लोगों के शिकार हो चुके लोगों को घटिया नहीं कहेंगे.”

दुकानदार—“हाँ, भाई. अब बात समझ में आ गई.”

सुदर्शन—“वैसे कृतिका सच में घर छोड़कर चली गई हैं ?”

दुकानदार—“हाँ, कल से देखा तो नहीं. अगर घर में होती, तो बाहर जरूर आती.”

सुदर्शन—“लेकिन अगर वो घर छोड़कर जाती, तो उसके माँ–बाप उसे ढूंढने की कोशिश तो करते ?”

दुकानदार—“अब पूरी बात तो पता नहीं. साँवरमल जी और उनकी पत्नी कृतिका के बारे में घर से बाहर कोई बात नहीं करते. लेकिन घर में होते हुए, वो घर में टिकने वाली लड़की नहीं हैं.”

सुदर्शन ने मन में सोचा कि कृतिका अचानक घर छोड़कर क्यों जाएँगी ? और अगर साँवरमल जी ने उसे घर से निकाला होता, तो वो मेरे पास आ जाती. अब जब वो घर पर ही नहीं हैं, तो उसके घर जाकर क्या करूँगा ?

सुदर्शन दुकान से चलकर बस स्टॉप पर आया और जेब से मोबाइल निकालकर आलोक को कॉल लगाया.

आलोक ने कॉल रिसींव करके कहा—“हाँ, भाई.”

सुदर्शन—“यार कल से कृतिका घर पर नहीं हैं. कुछ समझ नहीं आ रहा, ऐसे अचानक कहाँ जा सकती हैं ?”

आलोक—“तू टेन्शन मत ले, तू कहाँ हैं ? मैं अभी आता हूँ, फिर देखते हैं.”

सुदर्शन—“मैं कृतिका के घर के पास वाले बस स्टॉप पर बैठा हूँ.”

आलोक—“मैं आधे घंटे में पहुँचता हूँ.”

आलोक का कॉल कटने के बाद सुदर्शन ने मोबाइल जेब में डाला और बस स्टॉप पर टहलते हुए आलोक का इंतजार करने लगा.

पौने घंटे बाद आलोक ने बस स्टॉप पर खड़े सुदर्शन के सामने ऑटो लाकर रोका.

सुदर्शन ऑटो में पीछे बैठा. आलोक ने ऑटो आगे बढ़ाकर साइड में खड़ा किया.

आलोक ने पीछे मुड़कर कहा—“अब बता, क्या बात हैं ?”

सुदर्शन—“मैनें कृतिका के घर के पास वाली दुकान पर पूछा था. उसने बताया, कल से कृतिका घर से निकली ही नहीं. मतलब परसो रात वो अपने पास से घर के लिए चली थी, उसके बाद से उसका कुछ पता नहीं हैं.”

आलोक—“कल और परसो टीवी पर कृतिका की न्यूज भी चल रही थी. कहीं उस लड़के ने तो कोई गड़बड़ नहीं की ?”

सुदर्शन—“हो भी सकता हैं.”

आलोक—“रूक फिर, इसकी तो आज अच्छी तरह खबर लेते हैं.”

आलोक ने जेब से मोबाइल निकालकर गोविन्द बिशनोई को कॉल लगाकर मोबाइल कान से लगाया.

गोविन्द बिशनोई ने कॉल रिसींव करके कहा—“हाँ, बेटा.”

आलोक—“काका, कल से वो लड़की घर से गायब हैं. हमें लगता हैं, टीवी में न्यूज आने के बाद उस लड़के ने ही कोई पंगा किया हैं. परसो रात तो वो सही–सलामत हमारे पास से घर के लिए निकली थी.”

गोविन्द बिशनोई—“तू चिन्ता मत कर. मैं अभी उस लड़के के घर जाता हूँ. अगर उस लड़के ने कुछ किया हैं, तो तोते की तरह उगल देगा.”

आलोक—“ठीक हैं, काका जी. मैं भी पहुँचता हूँ.”

आलोक ने कॉल काटकर मोबाइल जेब में डाला और ऑटो चलाकर दिव्यांश के घर की तरफ चल पड़ा.

सुदर्शन—“क्या हुआ ?”

आलोक—“उस लड़के के घर चल रहे हैं. गोविन्द काका भी वहीं आ रहा हैं. अगर उसने कुछ किया हैं, तो सब उगलवा लेगें.”

आलोक ने ऑटो दिव्यांश के घर के पास लाकर रोककर बन्द किया. सुदर्शन और आलोक ऑटो से उतरकर दिव्यांश के घर की तरफ चल पड़े.

गोविन्द बिशनोई पहले से दिव्यांश के घर के सामने खड़ी गाड़ी के अन्दर ड्राईवर के पास वाली सीट पर बैठे हुए थे. गाड़ी के सामने गोविन्द बिशनोई के उम्र में पच्चीस(25) साल से पैंतीस(35) साल तक के पाँच आदमी दिव्यांश को बुरी तरह पीट रहे थे. दिव्यांश के घर के आगे वाले कमरे में बन्द दिव्यांश की माँ, छोटी बहन और बड़ा भाई कमरे की खिड़की में से रो–रोकर दिव्यांश को छोड़ने के लिए कह रहे थे.

आलोक और सुदर्शन चलते हुए गोविन्द बिशनोई के पास आए.

आलोक ने गोविन्द बिशनोई के पैर छूकर कहा—“राम–राम, काका जी. कुछ बताया इसने, कृतिका के बारे में ?”

गोविन्द बिशनोई ने मुस्कुराकर कहा—“अभी तक पूछा ही नहीं मैनें. इतने महान काम किये हैं, पहले अच्छी तरह खातिरदारी तो कर दें.”

दिव्यांश को पीट–पीटकर अधमरा करने के बाद गोविन्द बिशनोई के आदमियों ने उसे छोड़ा. गोविन्द बिशनोई गाड़ी से उतरकर जमींन पर पड़े दिव्यांश के पास आने लगे. सुदर्शन और आलोक गोविन्द बिशनोई के पीछे–पीछे आए.

गोविन्द बिशनोई दिव्यांश के पास नीचे बैठकर बोले—“सुना हैं, बहुत कॉन्टेक्ट हैं तेरे. बड़े–बड़े पॉवरफूल लोगों में उठना–बैठना हैं, जिनके दम पर एक बार जो लड़की या जो औरत तुझे पसन्द आ गई, उसे किसी भी तरह से हासिल करके छोड़ता हैं. न्यूज में तेरी सिर्फ पाँच गर्लफ्रैंड के बारे में बताया हैं. लेकिन असल में तू अब तक छब्बीस(26) लड़कियों और औरतों को अपनी हवस का शिकार बना चुका हैं, उनमें से आठ लड़कियाँ और औरतें तो बेकार हैं. उनके तेरे इलावा भी कई लोगों से चक्कर हैं. लेकिन बाकि अठारह में से पाँच को तूने प्यार के नाम पर बेवकूफ बनाया, जिनके बारे में अब सबको पता हैं. चार शादीशुदा औरतों को तूने ब्लैकमेल करके अपना शिकार बनाया. नौ लड़कियों को डरा–धमकाकर और जोर–जबरदस्ती से तूने अपना शिकार बनाया. इन अठारह बेकसूर और मासूम लड़कियों और औरतों को शिकार बनाने के कारण ही मैनें तेरी ये हालत की हैं.”

दिव्यांश ने गोविन्द बिशनोई के पैर पकड़कर लड़खड़ाती आवाज़ में कहा—“मुझे माफ़ कर दो.”

गोविन्द बिशनोई ने दिव्यांश को थप्पड़ मारकर कहा—“माफ़, महान लोग करते हैं. जिनको घटिया लोगों से प्यार होता हैं. मैं तो घटिया लोगों को ऐसी दर्दनाक सजा देता हूँ, कि दूबारा कोई घटिया काम करने के बारे में सोचते ही उनकी रूह काँप जाए. महिनेभर पहले तेरे बारे पता चला. मैनें तेरी डिटेल निकाली और सोचा, पहले बच्चे अपना हिसाब कर ले. फिर मैं तो कभी भी तुमसे मिल सकता हूँ. लेकिन मेरे फोन पर समझाने के बाद भी तू नहीं समझा. चल बता, कृतिका कहाँ हैं ?”

दिव्यांश—“मुझे नहीं पता.”

गोविन्द बिशनोई ने चार–पाँच थप्पड़ मारकर कहा—“देख मुझे गुस्सा मत दिला, सीधे–सीधे बता दें.”

दिव्यांश फूट–फूटकर रोते हुए कहने लगा—“मुझे सच में नहीं पता, अब आप चाहे मेरी जान लेलो. जब मुझे मालूम ही नहीं तो कैसे बताऊँ ? हाँ, मैनें उसे मारने का सोचा था. लेकिन फिर मुझे लगा, अगर अभी मैनें उसे मार दिया. तो सीधा शक मेरे ऊपर ही आएगा. लेकिन मैनें बस अपने दोस्तों से इस बारे में बात ही की थी. कुछ किया नहीं.”

दिव्यांश की बात सुनकर सुदर्शन को बहुत गुस्सा आया और सुदर्शन दिव्यांश को लाते मारने हुए बोला—“कृतिका को मारेगा तू. अब ये सोच कि तू जिन्दा कैसे बचेगा ? बहुत शौक हैं तुझे लड़कियों और औरतों का.”

सुदर्शन ने दिव्यांश का हाथ मरोड़ते हुए कहा—“इन्हीं हाथों से तू लड़कियों और औरतों को पकड़ता हैं ना. याद कर, इसी हाथ से तूने कृतिका के बाल पकड़कर उसे सड़क पर फेंका था ना. बोल कृतिका कहाँ हैं ?”

दिव्यांश की दर्द के मारे जान निकलने लगी.

गोविन्द बिशनोई ने सुदर्शन को पकड़कर दिव्यांश से दूर करके कहा—“इसको सच में नहीं पता. बोलने वाले की आवाज़ सुनकर पता चल जाता हैं, कौनसी बात सच हैं ? और कौनसी बात झूठ ? आलोक, ले जा इसको.”

आलोक सुदर्शन के पास आकर सुदर्शन को पकड़कर दिव्यांश से दूर ले आया.

गोविन्द बिशनोई ने सुदर्शन से कहा—“तुम चिन्ता मत करो. कृतिका को आज नहीं तो कल मैं ढूंढ लूँगा.”

गोविन्द बिशनोई ने अपने एक आदमी से कहा—“जा, उनको खोल दे.”

गोविन्द बिशनोई का आदमी दिव्यांश के घर में गया और दिव्यांश के घर के बाहर वाले जिस कमरे में दिव्यांश के घरवाले बन्द थे, उस कमरे का दरवाजा खोल दिया.

दिव्यांश के घरवाले रोते–बिलखते दौड़कर सड़क पर अधमरी हालत में पड़े दिव्यांश के पास आए और दिव्यांश को उठाकर घर के अन्दर ले जाने लगे.

गोविन्द बिशनोई ने कहा—“सुनो, हालत तो तुम सबकी भी यहीं करनी चाहिए. तुम लोगों को इसकी हर करतूत अच्छी तरह पता थी, लेकिन फिर भी दूसरों पर इल्जाम लगाकर हर बार इसे बचाते रहे. वो लड़की ही बेकार हैं, वो औरत ही घटिया हैं. उसी ने फँसाया हैं, हमारे भोले–भाले, मासूम बच्चे को.”

दिव्यांश के घरवालें हाथ जोड़कर माफ़ी माँगते हुए बोले—“हमसे गलती हो गई. हम बस अपना घर देखने के चक्कर में सही–गलत सब भूल गए.”

गोविन्द बिशनोई ने अपने आदमियों से कहा—“चलो.”

सुदर्शन आलोक के साथ आलोक के ऑटो की तरफ चल पड़ा.

गोविन्द बिशनोई ड्राईवर के पास वाली सीट पर, गोविन्द बिशनोई का ड्राईवर ड्राईविंग सीट पर और गोविन्द बिशनोई के बाकि चार आदमी गाड़ी में पीछे बैठ गए.

गोविन्द बिशनोई के ड्राईवर ने गाड़ी स्टार्ट की.

गोविन्द बिशनोई ने दिव्यांश को लेकर घर के अन्दर दाखिल होते दिव्यांश के घरवालों से कहा—“और सुनो, पुलिस के पास जाकर मेरे खिलाफ़ रिपोर्ट भले ही लिखवाओ. लेकिन इतना ध्यान रखना, इस लड़के के बाकि पच्चीस लड़कियों और औरतों के साथ किये कारनामें और तुम बाकि घरवालों के अब तक छुपे हुए सारे काले कारनामें भी शहर का बच्चा–बच्चा जान जाएगा. अगर पुलिस मेरे पास आई तो.”

गोविन्द बिशनोई ने अपने ड्राईवर से कहा—“अब चलो.”

गोविन्द बिशनोई का ड्राईवर गाड़ी चलाकर ले गया.

आलोक ऑटो में ड्राईविंग सीट पर और सुदर्शन ऑटो में पीछे बैठ गया. आलोक ने ऑटो स्टार्ट किया और चल पड़ा.

आलोक ने ऑटो चलाते हुए कहा—“तू टेन्शन मत ले, यार. मिल जाएगी, कृतिका. आजकल में ढूंढ लेगें.”

सुदर्शन—“लेकिन कहाँ ढूंढें, यार ? कहाँ गई होगी ?”

आलोक—“देखते हैं, चल पहले कुछ खा लेते हैं. भूख लग गई.”

सुदर्शन—“मेरी तो कल से भूख ही मर गई. कल दोपहर को सुजाता मैडम ने खाने के लिए कहा था, बस उस वक्त दो रोटी खाई थी.”

आलोक—“अरे, यार………ऐसे थोड़ी चलता हैं. चल पहले घर चलते हैं.”

सुदर्शन चुपचाप कृतिका के बारे में सोचने लगा.

आलोक—“वैसे एक बात बता, तुझे तो इस लड़की में कोई दिलचस्पी ही नहीं थी. तू तो उस धोखेबाज लड़के की धोखेबाजी सबके सामने लाना चाहता था. वो तो अब सबके सामने आ गई. सब कुछ न्यूज में भी आ गया. आज उसको छः–आठ महिने के लिए हॉस्पीटल भी भेज दिया. फिर अब इस लड़की के लिए इतना परेशान क्यों हो रहा हैं ?”

सुदर्शन—“इन्सानियत के नाते. पिछले ढ़ाई–तीन महिने से रोज मिलती हैं. अब कल से अचानक गायब. तो परेशान तो होना ही था.”

आलोक—“नहीं, भाई. तूने जिस तरह कृतिका को मारने की बात सुनते ही उस लड़के को मारा. उससे साफ़ पता चलता हैं. अब बात कुछ और हैं. अगर गोविन्द काका तुझे नहीं पकड़ता तो तू उसे मार ही डालता.”

सुदर्शन—“तू यू ही सोच रहा हैं. ऐसी कोई बात नहीं हैं.”

आलोक—“चल ठीक हैं.”

आलोक ऑटो चलाते हुए सिंधी केम्प बस स्टैण्ड के सामने से गुजरा. सुदर्शन की नजर बस स्टैण्ड के वैटिंग रूम पर पड़ी और वैटिंग रूम में किसी को देखकर उसे कृतिका के बैठी होने का एहसास हुआ.

सुदर्शन—“अरे, रोक–रोक.”

आलोक—“क्या हुआ ?”

सुदर्शन—“मुझे बस स्टैण्ड के अन्दर वाले वैटिंग रूम में कृतिका दिखी.”

आलोक ने साइड में ले जाकर ऑटो रोककर कहा—“वो यहाँ कहाँ होगी ?”

सुदर्शन ने ऑटो से उतरकर जाते हुए कहा—“चलकर देखेगें, तभी तो पता चलेगा.”

आलोक ऑटो बन्द करके सुदर्शन के पीछे–पीछे आया. दोनों दौड़कर वैटिंग रूम की तरफ आए.

आलोक—“हाँ, यार. कृतिका ही हैं.”

वैटिंग रूम में कृतिका दोनों हाथ चेहरे पर रखे एक कुर्सी पर बैठी थी. सुदर्शन और आलोक वैटिंग रूम के अन्दर आकर कृतिका के पास आए.

सुदर्शन—“कृतिका, यहाँ क्या कर रही हो ?”

कृतिका अपने चेहरे से हाथ हटाकर चेहरा ऊपर करके सामने सुदर्शन और आलोक को देखकर खड़ी होते हुए बोली—“तुम दोनों ?”

सुदर्शन—“हम तो तुम्हें ही ढूंढ रहे हैं. कल से तुम्हारा मोबाइल भी बन्द हैं. आज सुबह तुम्हारे घर पास जाकर उस दुकानवाले से पूछा, उसने बताया, तुम कल से घर से बाहर नहीं निकली. या तो तुम छोड़कर भाग गई हो या फिर तुम्हारे पापा ने तुम्हें घर से निकाल दिया हैं.”

कृतिका—“किसी ने घर से निकाला नहीं हैं. मैं खुद ही घर छोड़कर आ गई. मॉम–डेड को बहुत परेशान कर लिया. सोचा, अब उन्हें चैन से रहने दूँ.”

सुदर्शन—“ऐसे क्यों सोच रही हो ? अचानक ऐसा क्या हो गया और सर पर ये चोट कैसे लगी ?”

कृतिका—“कुछ नहीं, यार. तुम मुझे चार–पाँच हजार रुपये दे सकते हो ? मैं ये शहर छोड़कर कहीं ओर जाना चाहती हूँ.”

सुदर्शन—“कहाँ जाना चाहती हो ?”

कृतिका—“कहीं भी, यहाँ से दूर.”

सुदर्शन—“तुम मेरे साथ चलो. घर बैठकर बात करते हैं.”

कृतिका—“नहीं यार, मुझे अब कहीं नहीं जाना. चार–पाँच हजार नहीं दे सकते तो, हजार–दो हजार ही दे दो. मैं बाद में वापस दे दूँगी.”

सुदर्शन—“ओहो…पैसे की बात नहीं हैं, चाहे दस हजार ले लेना. लेकिन अभी मेरे साथ चलो. मैं तुम्हारा दोस्त हूँ ना, तो मेरी बात नहीं मान सकती क्या ?”

कृतिका कुछ नहीं बोली.

सुदर्शन ने कृतिका का बाजू पकड़कर कहा—“चलो मेरे साथ. फिर आराम से बताना, क्या हुआ ?”

सुदर्शन कृतिका का बाजू पकड़कर कृतिका को साथ लेकर चलने लगा. आलोक भी उनके पीछे–पीछे चल पड़ा.

ऑटो के पास आकर आलोक ड्राईवर की सीट पर बैठा और सुदर्शन कृतिका को ऑटो में बिठाकर खुद भी ऑटो में बैठ गया.

आलोक ने जेब से मोबाइल निकालकर गोविन्द बिशनोई को कॉल लगाया.

गोविन्द बिशनोई ने कॉल रिसींव करके कहा—“हाँ, बेटा.”

आलोक—“काका, वो कृतिका मिल गई. आप अब मत ढूंढना उसको.”

गोविन्द बिशनोई—“कहाँ मिली ? सब ठीक तो हैं ना ?”

आलोक—“हाँ, सब ठीक हैं. यहीं सिंधी केम्प बस स्टैण्ड पर बैठी थी. कृतिका के फेसबुक पोस्ट न्यूज में आने के कारण घरवालों ने डांट दिया, इसलिए नाराज होकर आ गई थी.”

गोविन्द बिशनोई—“उफ्फ………ये लड़कियों के घरवाले भी अजीब होते हैं. जो लड़की घटिया लोगों के खिलाफ बोलना चाहती हैं, उसको बोलने नहीं देते. चल अब क्या कर सकते हैं ? समझा–बुझाकर घर भेज देना.”

आलोक—“हाँ, काका जी.”

गोविन्द बिशनोई के कॉल काटने के बाद आलोक ने मोबाइल जेब में डाला और सुदर्शन से कहा—“पहले इनको डॉक्टर के पास लेकर चले क्या ? सर में सूजन आई हुई हैं. हाथ की कोहनी से चमड़ी छिली हुई हैं.”

कृतिका—“अरे नहीं, ये तो अपने आप ठीक हो जाएगी.”

सुदर्शन—“तुम चुप करो. तू चल यार, वो डॉ. सुशीला सहारण के क्लीनिक चल. वो सुजाता मैडम की सहैली हैं.”

आलोक ऑटो स्टार्ट करके ऑटो चलाने लगा.

सुदर्शन ने चलते हुए ऑटो में कृतिका से पूरी बात पूछना शुरू किया. कृतिका ने अपने पीठ पर और हाथ पर डंडे के निशान दिखाकर सुदर्शन को सारी बातें बताई.

आलोक ऑटो चलाते हुए क्लीनिक ले आया और डॉ. सुशीला सहारण के क्लीनिक के सामने साइड में लगाकर ऑटो बन्द किया.

सुदर्शन और आलोक कृतिका को साथ लेकर डॉ. सुशीला के क्लीनिक में आए और कृतिका की चोट पर मरहम पट्टी करवाने के बाद कृतिका के लिए दवाई लेकर वापस कृतिका के साथ ऑटो में आकर बैठे.

आलोक ऑटो स्टार्ट करके ऑटो चलाते हुए सुदर्शन की बिल्डिंग के सामने आकर रूका. कृतिका और सुदर्शन ऑटो से उतरे.

आलोक—“ठीक हैं, भाई. चलता हूँ.

सुदर्शन—“हाँ, ठीक हैं.”

आलोक ऑटो चलाते हुए चला गया.

सुदर्शन बिल्डिंग के दरवाजे का ताला खोलकर कृतिका के साथ बिल्डिंग में आया और सीढ़िया चढ़ते हुए ऊपर आकर फ्लेट का ताला खोलकर फ्लेट में आकर कृतिका के साथ कमरे में आया.

सुदर्शन—“अब तुम आराम कर लो. मैं कुछ खाने के लिए लेकर आता हूँ.”

कृतिका—“नहीं, रहने दो. मुझे भूख नहीं हैं.”

सुदर्शन—“मुझे तो हैं. मैनें कल दोपहर बाद से कुछ नहीं खाया.”

कृतिका—“लेकिन क्यों ?”

सुदर्शन—“अब ये भी बताना पड़ेगा ?”

कृतिका—“हाँ.”

सुदर्शन—“मतलब खाना ना खाऊँ, पहले तुम्हें बताऊँ ?”

कृतिका—“ओह………सॉरी. ठीक जाओ, पहले खाना खाओ.”

सुदर्शन ने छत के पंखे का बटन दबाकर कहा—“हम्म…तुम आराम करो. मैं बस कुछ ही देर में आया.”

कृतिका ने बैड के पास जाकर अपनी सैंडल उतारी और बैड पर लेट गई.

सुदर्शन कमरे से बाहर आकर सीढिया उतरते हुए नीचे आकर बिल्डिंग से बाहर आया और आम्रपाली सर्किल की तरफ चल पड़ा.

नारायण ने सुदर्शन को अपनी दुकान के सामने से जाते देखकर कहा—“सुदर्शन, के होयो ? आज काम पर कोनी ग्यो के ?(हिन्दी अनुवाद : सुदर्शन, क्या हुआ ? आज काम पर नहीं गया क्या ?)

सुदर्शन ने दुकान पर आकर नारायण को सारी बात बताकर कहा—“बिन बिल्डिंग म सुआ ग आयो हूँ. अब कोई होटल पर उ खाणो ले ग आऊँ. मैं भी खा ल्यूगा, बा बी खा ल गी.”(हिन्दी अनुवाद : उसको बिल्डिंग में सुलाकर आया हूँ. अब किसी होटल से खाना लेकर आ रहा हूँ. मैं भी खा लूँगा, वो भी खा लेगी.)

नारायण ने कहा—“खाणो म मणूवा द्यू, यार. तू बैठ. तेरी भाभी न क्योउ, रोटी मणाण बई.”(हिन्दी अनुवाद : खाना मैं बनवा देता हूँ, यार. तुम बैठो. तुम्हारी भाभी से कहता हूँ, खाना बनाने के लिए.)

सुदर्शन—“तू क्यू परेशान होवे ?”(हिन्दी अनुवाद : तुम क्यों परेशान होते हो ?)

नारायण—“इमे परेशानी के हैं ? रोटी मणना म के टेम लागे, बार रोटी मणी.”(हिन्दी अनुवाद : इसमें परेशानी क्या हैं ? खाना बनने में कितना टाइम लगता हैं, कुछ ही देर में खाना बन जाएँगा.)

नारायण दुकान के पिछले दरवाजे से घर के अन्दर गया और उम्र में उनतीस(29) साल की पत्नी को सुदर्शन और कृतिका के लिए खाना बनाने का बोलकर दुकान में वापस आकर सुदर्शन से बातें करने लगा.

कुछ देर बाद सुदर्शन का मोबाइल बजने लगा. सुदर्शन ने जेब से मोबाइल निकालकर देखा तो सुजाता मैडम का कॉल था.

सुदर्शन ने कॉल रिसींव करके मोबाइल कान पर रखकर कहा—“हैलो, मैडम.”

सुजाता—“हाँ, अभी मेरी वो डॉक्टर फ्रैंड सुशीला का कॉल आया था. उसने बताया, तुम कृतिका को लेकर गए थे.”

सुदर्शन ने सारी बातें एक–एक करके सुजाता को बताई.

सुजाता ने सारी बातें सुनने के बाद कहा—“उफ्फ ! समझ में नहीं आता, कुछ लोग इतनी सी बात क्यों नहीं समझते, बुरे लोगों से धोखा खाने के बाद चुप रहने से बुराई को बढ़ावा मिलता हैं.”

सुदर्शन—“हाँ, मैडम. लेकिन अब नहीं समझते तो क्या कर सकते हैं ?”

सुजाता—“हम्म…अच्छा तुमने खाना खा लिया ?”

सुदर्शन—“नहीं, मैं नारायण की दुकान पर बैठा हूँ. ये बनवा रहा हैं खाना.”

सुजाता—“अच्छा, ठीक हैं. और कोई प्रोब्लम हो, तो मुझे या तुम्हारे सेठ जी को कॉल कर लेना.”

सुदर्शन—“हाँ, मैडम.”

सुजाता—“कल ऑफ़िस आ जाना. मैं इनको बता दूँगी.”

सुदर्शन—“ठीक हैं, मैडम.”

सुजाता के कॉल काटने के बाद सुदर्शन ने मोबाइल जेब में डाला और नारायण के साथ बातों में लग गया.

कुछ देर बाद नारायण की पत्नी ने एक बरतन में सब्जी और एक बरतन में रोटी डालकर घर के दरवाजे से बाहर आकर सुदर्शन को दी.

सुदर्शन ने खाना लेते हुए कहा—“धन्यवाद, भाभी. माफ़ करियो, आज थाने परेशान करवायो ई खातर.”(हिन्दी अनुवाद : धन्यवाद भाभी. माफ़ कीजिएगा, आज आपको परेशान करवाया इसलिए.)

नारायण की पत्नी—“इमे परेशानी गी के बात हैं ? थे भी तो म्हाने कोई काम वास्ते कदी नटो कोनी. फेर पड़ौसी ही पड़ौसी ग काम आवे.”(हिन्दी अनुवाद : इसमें परेशानी की क्या बात हैं ? आप भी तो हमें कोई काम के लिए मना नहीं करते. फिर पड़ौसी ही पड़ौसी के काम आते हैं.)

सुदर्शन—“हाँ, वो तो हैं. ठीक हैं, नारायण भाई. ये बरतन–भांडा म काल दे जाऊँगा.”

नारायण—“कोई दिक्कत कोनी.”

सुदर्शन खाना लेकर चलने लगा.

नारायण ने खड़े होकर कहा—“अरे सुण, खावेगो क्या म ? तेर खन तो बरतन–भांडा ही कोनी.”(हिन्दी अनुवाद : अरे सुन, खाएगा किसमें ? तेरे पास तो बरतन ही नहीं हैं.)

सुदर्शन रूका और मुड़कर नारायण की तरफ देखकर मुस्कुराने लगा.

नारायण ने हँसकर अपनी पत्नी से कहा—“टाबरिया न थाळी–कौली देर भेज दे, सागे.”(हिन्दी अनुवाद : बच्चे को थाली और कटोरिया देकर इसके साथ भेज दो.)

नारायण की पत्नी ने घर के अन्दर जाकर अपने उम्र में चार(4) साल के बेटे को दो थाली, दो कटोरी, दो चम्मच देकर कहा—“जा, सुदर्शन काका ग सागे चल जा.”(हिन्दी अनुवाद : जाओ, सुदर्शन चाचा के साथ चले जाओ.)

नारायण का लड़का हाथों में बरतन लिए घर से बाहर आया और सुदर्शन के साथ चल पड़ा.

सुदर्शन खाना लेकर बच्चे के साथ बिल्डिंग में आकर सीढिया चढ़ते हुए फ्लेट में आया और किचन में आकर खाना रखकर बच्चे से बरतन लेकर रख दिये.

बच्चे ने कहा—“अब म जाऊँ ?”

सुदर्शन—“हाँ, जा.”

बच्चा चला गया और सुदर्शन ने कमरे में आकर देखा कृतिका सो रही थी.

सुदर्शन ने सोचा कि लगता हैं, दवाई और इंजेक्शन के कारण नींद आ गई. मैं भी खाना बाद में इसके साथ ही खा लूँगा.

सुदर्शन छत पर आकर खड़ा हो गया.

कृतिका शाम को आठ बजे नींद से जागी और बिस्तर से उठकर अपनी सैंडल पहनकर कमरे से बाहर आई.

कृतिका ने सोचा कि ये सुदर्शन कहाँ रह गया. अभी तक आया नहीं. मुझे इसके साथ नहीं आना था, बेकार में ही मेरे कारण ये परेशान होगा.

कृतिका फ्लेट से बाहर आई तो देखा कि ऊपर छत पर जाने का दरवाजा खुला हुआ हैं. कृतिका ऊपर छत पर आ गई. सुदर्शन सामने खड़ा शहर को देख रहा था.

कृतिका—“तुम खाना खाकर आ गए ?”

सुदर्शन ने मुड़कर कहा—“उठ गई तुम. बस तुम्हारे जागने का ही इंतजार कर रहा था. खाना तो नारायण ने बनवा दिया था. मैनें सोचा, तुम हॉस्पीटल से दवाईयाँ लेकर और इंजेक्शन लगवाकर आई हो. तुम्हें थोड़ी देर सोने देना चाहिए.”

कृतिका—“चलो, फिर अब तो खाना खालो.”

सुदर्शन—“हाँ, चलो.”

सुदर्शन और कृतिका छत से नीचे आने लगे. सुदर्शन ने छत का दरवाजा बन्द करके ताला लगाया और फ्लेट में आकर सुदर्शन अपने जूते और कृतिका अपनी सैंडल निकालकर दोनों हाथ–मुँह धोने के बाद किचन में आए.

सुदर्शन ने रोटी और सब्जी वाले बरतन उठाकर कहा—“तुम ये थाली और कटोरी उठालो. कमरे में बैठकर खाना खाते हैं.”

सुदर्शन कमरे में जाने लगा. कृतिका बरतन उठाकर सुदर्शन के पीछे–पीछे कमरे में आ गई. सुदर्शन और कृतिका खाना बैड पर रखकर दोनों बैड पर आमने–सामने बैठ गए. सुदर्शन ने एक थाली और एक कटोरी कृतिका के सामने रखकर एक थाली और एक कटोरी खुद के सामने रख ली.

सुदर्शन ने दोनों की कटोरी में सब्जी डालकर रोटियाँ रखने के बाद कहा—“अब शुरू करें.”

कृतिका—“हम्म………”

सुदर्शन—“अरे…पानी तो रह ही गया. मैं लेकर आता हूँ.”

सुदर्शन उठकर किचन में गया और एक जग में पानी भरकर ले आया.

पानी से भरा जग नीचे रखकर सुदर्शन वापस बैड पर बैठकर बोला—“अब शुरू करो.”

कृतिका और सुदर्शन खाना खाने लगे.

कृतिका खाना खाते हुए सुदर्शन की तरफ देखकर सोचने लगी कि काश सुदर्शन पहले मिल गया होता, तो शायद मैं इतनी नहीं बिगड़ती.

कृतिका के आँखें भीग गई.

सुदर्शन कृतिका की आँखों में आँशू देखकर बोला—“अरे, क्या हुआ ? तुम रोने क्यों लगी ? अब देखो, गरीब लोग तो ऐसा ही खाना बनाते हैं. थोड़ा–बहुत एडजस्ट तो करना पड़ेगा.”

कृतिका आँखें पोंछकर बोली—“अरे नहीं, खाना तो बहुत अच्छा हैं. ये आँशू तो मेरे कारण तुम्हें परेशान देखकर निकल आए.”

सुदर्शन—“ओहो…मैं कोई परेशान नहीं हूँ. अब रोये बिना चुपचाप खाना खाओ.”

कृतिका अपनी आखें पोंछकर मुस्कुराते हुए खाना खाने लगी.

रात को पौने ग्यारह बजे सुदर्शन और कृतिका बैड पर बैठे बातें कर रहे थे.

सुदर्शन—“अच्छा, तो अब सोया जाए ?”

कृतिका—“हाँ ठीक हैं.”

सुदर्शन—“फिर सो जाओ, तुमने दवाई भी ली हैं.”

कृतिका बैड पर लेट गई.

सुदर्शन बैड से उठकर कमरे से बाहर आया और किचन में से एक चटाई लाकर फर्श पर बिछाई. सुदर्शन बैड से एक तकिया उठाकर फर्श पर बिछी चटाई पर लेटने लगा.

बैड पर लेटी हुई कृतिका बैठकर बोली—“तुम वहाँ क्यों सो रहे हो ?”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“अब तुम्हारे साथ एक बिस्तर पर तो नहीं सो सकता ना.”

कृतिका—“क्यों ?”

सुदर्शन—“अब ये भी बताना पड़ेगा.”

कृतिका—“हाँ, पहले भी तो सोये थे. फिर आज क्या प्रोब्लम हैं ?”

सुदर्शन—“उस वक्त सर्दी थी. इसलिए मजबुरी में सोया. अब तो गर्मी हैं, अगर यहाँ चोरों का खतरा ना हो तो छत पर जाकर भी सो सकता हूँ.”

कृतिका—“कोई जरूरत नहीं हैं. तुम यहाँ बैड पर सो जाओ.”

सुदर्शन—“लेकिन………”

कृतिका—“लेकिन क्या ? जिनको गलत सोचना हैं, वो तो तुम नीचे सोओगे, तब भी गलत ही सोचेगे. दिखावे के लिए अलग–अलग बिस्तर लगाए हैं, रात को एक साथ सो जाते होगे. और रही बात हमारे एक बिस्तर पर सोने से हमारे बीच कुछ हो ना जाए ? तो जब उस सर्दी की रात में नशे की हालत में कुछ नहीं हुआ, तो अब तो मैं होश में हूँ. और फिर दिल और दिमाग साफ़ होना चाहिए. जिनके दिमाग में गन्दगी भरी हो, वो तो अलग–अलग कमरों में सो कर भी मौका देखकर एक कमरे में आ जाते हैं.”

सुदर्शन—“तुम्हारी बातें पहले से बहुत अलग हो गई हैं.”

कृतिका ने मुस्कुराकर कहा—“तुमने ही ये सब बताया था. भूल गए क्या ?”

सुदर्शन—“मैनें ही बताया था क्या ?”

कृतिका बैड से उतरते हुए बोली—“अच्छा, ठीक हैं. अगर तुम्हें प्रोब्लम हैं, तो मैं नीचे सो जाती हूँ. तुम यहाँ आ जाओ.”

सुदर्शन—“अरे, रूको–रूको. मैं भी वहीं सो जाता हूँ.”

सुदर्शन ने खड़े होकर तकिया बैड पर रखा और चढ़ाई समेटकर बैड पर आकर पीठ के बल सीधा होकर लेट गया.

सुदर्शन—“अब ठीक हैं.”

कृतिका ने मुस्कुराकर सुदर्शन की तरफ मुँह करके बैड पर लेटते हुए कहा—“हाँ, ठीक हैं.”

सुदर्शन ने मजाक करते हुए कहा—“अब रात को कुछ हो जाए, तो ब्लात्कार का इल्जाम मत लगा देना. आजकल की लड़कियाँ भी धोखा देने में कम नहीं हैं.”

कृतिका ने हँसकर कहा—“नहीं लगाऊँगी.”

सुदर्शन—“वैसे घबराना मत. कुछ नहीं होगा.”

कृतिका—“मालूम हैं.”

सुदर्शन और कृतिका मुस्कुराते हुए अपनी लिमिट को ध्यान में रखते हुए अपने बीच दूरी रखकर सो गए.


अगले दिन पच्चीस जून, रविवार की सुबह छः बजे सुदर्शन जाग गया. कृतिका अभी तक सो रही थी. सुदर्शन ने कृतिका के चेहरे की तरफ देखा और मुस्कुराकर बैड से उठकर नहाने के लिए चला गया.

नहाते हुए सुदर्शन ने सोचा कि कृतिका ने आजकल सुबह–सुबह शराब की जगह चाय पीने की आदत डाली हैं और अपने को ना चाय बनानी आती हैं, ना अपने पास चाय बनाने का सामान हैं. चल जल्दी से नहा ले, फिर चौक वाली चाय की दुकान से चाय लेकर आते हैं.

सुदर्शन नहाकर कपड़े पहनने के बाद कमरे में आया. कृतिका को अभी तक सोती देखकर सुदर्शन चाय लाने चला गया.

पौने सात बजे कृतिका की नींद खुल गई. कृतिका ने बैड से उठकर कमरे से बाहर आकर सुदर्शन को ना पाकर कहा—“अब ये सुबह–सुबह कहाँ चला गया ?”

कृतिका वापस कमरे में आकर बैड पर बैठ गई और सुदर्शन का इंतजार करने लगी.

पन्द्रह मिनट बाद एक हाथ में थैली में डली चाय और दूसरे हाथ में चार डिस्पोजल कप लिए सुदर्शन फ्लेट में आकर किचन में जाकर डिस्पोजल में चाय डालने लगा.

कृतिका बैड से उठकर कमरे से बाहर आकर बोली—“सुबह–सुबह कहाँ चले गए थे ?”

सुदर्शन दोनों हाथों में चाय से भरे डिस्पोजल कप लेकर किचन से बाहर आते हुए बोला—“तुम्हारे लिए चाय लेने गया था.”

कृतिका—“तुम खाने–पीने का सामान और बरतन वगैरह ले आओ ना. हम यहीं बना लेगें.”

सुदर्शन एक डिस्पोजल कप कृतिका को देते हुए बोला—“तुम्हें बताया तो था, मुझे चाय–खाना कुछ भी बनाना नहीं आता.”

कृतिका एक डिस्पोजल कप लेकर बोली—“अरे, मैं बना लूँगी. मुझे तो बनाना आता हैं.”

सुदर्शन ने हँसकर कहा—“तुम मेरी बीवी थोड़े ही हो, जो मेरे लिए चाय–खाना बनाओगी. और फिर इस बिल्डिंग के मालिक से भी पूछना पड़ेगा, वो तुम्हें यहाँ रहने देगा या नहीं ?”

कृतिका—“अगर उसने मुझे यहाँ रहने से मना कर दिया तो ?”

सुदर्शन—“तो दूसरी जगह देख लेगें. चलो, अन्दर बैठकर चाय पिलो. फिर नहाना हो तो नहा लेना. कपड़े तो एक बार यहीं पहनने पड़ेगें. हाँ, अगर मेरे कपड़े पहनना चाहो, तो पहन सकती हो. लेकिन मेरे पास बस ऐसे सिम्पल पेन्ट–शर्ट ही हैं, जींस वगैरह तो मैं पहनता नहीं.”

कृतिका कमरे के अन्दर आकर बैड पर बैठकर बोली—“तुम्हारे कपड़े मुझे आ जाएगें ?”

सुदर्शन कमरे के दरवाजे के पास खड़ा होकर बोला—“शरीर में तो हम दोनों एक जैसे ही हैं. बस हाईट में तुम डेढ़–दो इंच छोटी हो.”

कृतिका ने हँसकर कहा—“चलो, ठीक हैं. ट्राई करके देख लूँगी.”

सुदर्शन ने एक अलमारी की तरफ इशारा करके मुस्कुराकर कहा—“उसमें मेरे आठ जोड़ी कपड़े पड़े हैं, जो पसन्द आए, पहन लेना.”

कृतिका—“ठीक हैं, मैं दिन में नहा लूँगी. मुझे तो सारा दिन घर पर ही रहना हैं.”

सुदर्शन ने कृतिका की चाय खतम होती देखकर कहा—“जैसे तुम्हारी मरजी. चाय और हैं, किचन में.”

कृतिका—“नहीं–नहीं, तुम लेलो.”

सुदर्शन—“अरे नहीं–नहीं क्या ? मैं तो वैसे भी रोज ऑफ़िस में जाकर चाय पीता हूँ, तुम पिलो.”

कृतिका—“ठीक हैं.”

कृतिका उठकर चाय लेने के लिए किचन में चली गई.

सुबह नौ बजे सुदर्शन ने कृतिका से कहा—“अच्छा, मैं अब ऑफ़िस जा रहा हूँ. आज शाम को जल्दी आ जाऊँगा. तुम अपना और बिल्डिंग का ख्याल रखना. किसी को अन्दर मत घुसने देना और कुछ चाहिए हो, तो ये पास में नारायण की दुकान से ले आना. पैसे मैं दे दूँगा उसको.”

कृतिका—“ठीक हैं.”

सुदर्शन कमरे से निकलकर फ्लेट से बाहर जाकर सीढिया उतरते हुए चला गया.

बैड पर बैठी हुई कृतिका को दिव्यांश की कहीं हुई बातें याद आने लगी. कृतिका की आँखें नम होने लगी. कृतिका ने मन में सोचा कि काश मैं तुम्हारी बीवी बनकर तुम्हारे लिए खाना बनाने के लायक होती. लेकिन मैं तो उस कमीने पर भरोसा करके किसी की बीवी बनने लायक रही ही नहीं. मेरे जैसी शादी किये बिना प्यार के नाम पर सब कुछ करने वाली लड़कियाँ सिर्फ मजे लेने के लिए होती हैं, शादी करने के लिए नहीं होती.

शाम के पाँच बजे सुदर्शन जयसिंह का दिया हुआ काम पूरा करके कुर्सी से उठते हुए कुर्सी पीछे सरकाकर खड़ा हुआ और अपने टेबल पर रखा सामान उठाकर जयसिंह के केबिन में रखकर सीढिया चढ़ते हुए ऊपर आया.

सोफे पर बैठी सृष्टी पढ़ रही थी.

सुदर्शन—“सृष्टी, पापा कहाँ हैं ?”

सृष्टी बूक रखकर खड़ी होते हुए बोली—“अभी बुलाती हूँ.”

सृष्टी दूसरी मंजिल पर जाती सीढियों के पास आकर जोर से बोली—“पापा, सुदर्शन भईया बुला रहे हैं.”

सृष्टी वापस सोफे पर आकर अपनी बुक लेकर बैठ गई. जयसिंह सीढिया उतरते हुए नीचे आए.

जयसिंह—“हाँ, वो हो गया क्या ?”

सुदर्शन—“हाँ, सारे नेकलेस कड़ी लगाकर केबिन में रख दिये.”

जयसिंह ने बेसमेंट की सीढियों की तरफ मुड़ते हुए कहा—“चल फिर दूसरा काम देता हूँ.”

सुदर्शन—“सेठ जी.”

जयसिंह रूककर सुदर्शन की तरफ मुड़कर  बोले—“हाँ.”

सुदर्शन—“आज मैं जल्दी चला जाऊँ ?”

जयसिंह—“लेकिन अभी तो पाँच ही बजे हैं.”

सुदर्शन—“सेठ जी, वो कृतिका अकैली होगी ना.”

जयसिंह सुदर्शन की तरफ देखकर मुस्कुराते हुए बोले—“अरे यार, तू तो शादी से पहले ही पत्नीवर्ता बन रहा हैं. पहले शादी तो कर ले.”

सुदर्शन ने शर्माकर मुस्कुराते हुए कहा—“नहीं, सेठ जी. ऐसी कोई बात नहीं हैं. बस वो जिन्दगी में परेशान हैं, इसलिए थोड़ी हमदर्दी हैं.”

जयसिंह—“कोई बात नहीं, ठीक हैं. जा.”

सुदर्शन ने मुड़कर घर का दरवाजा खोला.

जयसिंह—“अरे सुन.”

सुदर्शन रूककर जयसिंह की तरफ देखकर बोला—“हाँ, सेठ जी.”

जयसिंह—“तू उसके साथ रह तो रहा हैं, लेकिन अपनी लिमिट का ध्यान रखना. वो तो उसके माँ–बाप गलत हैं, वरना मैं तुझे उसके साथ रहने नहीं देता. इसलिए ये बात हमेशा याद रखना, उससे तेरी शादी नहीं हुई हैं.”

सुदर्शन—“मैं सब समझता हूँ, सेठ जी. मैं हर बात हमेशा ध्यान में रखता हूँ.”

जयसिंह—“बहुत अच्छी बात हैं. अब जाओ.”

सुदर्शन घर से बाहर चला गया.

सोफे पर बैठी सृष्टी ने बुक से हटाकर चेहरा ऊपर करके कहा—“पापा, आपसे एक बात पूछू ?”

जयसिंह सृष्टी की तरफ मुड़कर बोले—“हाँ, पूछो.”

सृष्टी—“पापा, सुदर्शन भईया उस लड़की के साथ रहते–रहते उसके साथ रिलेशन बना लेते हैं, तो क्या ये गलत होगा ? क्योंकि सुदर्शन भईया को तो हम सब बहुत अच्छी तरह जानते हैं. सुदर्शन भईया उस लड़के दिव्यांश की तरह कृतिका को धोखा तो बिल्कुल नहीं देगें.”

जयसिंह सृष्टी के पास सोफे पर बैठकर सृष्टी के कंधे पर हाथ रखकर बोले—“बेटा, ये सोच–समझकर विचार करने वाली बात हैं. सुदर्शन ने तो उस लड़की को इसलिए अपने साथ रखा हैं, क्योंकि उस लड़की के माँ–बाप ने उसकी मदद करने की जगह उसके साथ बहुत बुरा व्यवहार किया. वो लड़की सुदर्शन से चार–पाँच हजार रुपये माँगकर इस शहर को छोड़कर जा रही थी. अब आजकल टाइम कितना खराब हैं, ये तो तुम भी जानती हो. इसलिए सुदर्शन का उसको अपने पास रखना सही हैं. लेकिन अगर कोई लड़का सुदर्शन के देखा–देखी, कि सुदर्शन लड़की को अपने साथ रख रहा हैं, तो मैं भी किसी लड़की को अपने साथ रख लेता हूँ. तब उस लड़के का लड़की को अपने साथ रखना सही हैं या गलत ?”

सृष्टी—“हम्म………शायद नहीं.”

जयसिंह—“लगता हैं, तुम्हें समझ नहीं आया. देखो, पहली बात तो ये हैं, कि सुदर्शन ऐसा कुछ करेगा ही नहीं. लेकिन अगर सुदर्शन उस लड़की के साथ रिलेशन बनाए तो हमें पता हैं, सुदर्शन उस लड़की को धोखा नहीं देगा और आज नहीं तो कल लड़की से शादी कर लेगा. लेकिन इस बात का फायदा उस दिव्यांश नाम के लड़के जैसे गलत लोग उठा सकते हैं. फोर एग्जामपल सुदर्शन के आस–पास रहने वाला कोई गलत लड़का सुदर्शन का उदाहरण देकर कहे, कि देखो सुदर्शन शादी किये बिना एक लड़की के साथ रिलेशन में हैं, तो हम क्यों नहीं रह सकते ? अब जो लड़की हमारी तरह सुदर्शन को जानती हैं, वो क्या सोचेगी ? कि सुदर्शन जैसा अच्छा लड़का शादी किये बिना रिलेशन में रह रहा हैं, तो इसमें कुछ गलत नहीं होगा. मैं भी मेरे बॉयफ्रैंड के साथ रह लेती हूँ. जैसे सुदर्शन बाद में शादी करेगा, उसी तरह मैं भी मेरे बॉयफ्रैंड से बाद में शादी कर लूँगी.”

सृष्टी—“और बॉयफ्रैंड अपना मतलब पूरा होने के बाद पलट जाता हैं. लड़की ने एक अच्छे लड़के को फोलो किया, लेकिन पूरी बात जाने और समझे बिना गलत लड़के को चुन लिया.”

जयसिंह ने सृष्टी के कंधे से हाथ हटाकर कहा—“हाँ, अब तुमने सही कहा. तुम्हें ये तो पता ही हैं, तुम्हारी मम्मी से पहले मेरी शादी किसी ओर से हो गई थी. बाद में उससे अलग होने के बाद मेरी शादी तुम्हारी मम्मी से हुई. अब कोई मेरा उदाहरण देकर अपनी पत्नी को छोड़कर किसी ओर से शादी करे, तो क्या ये सही होगा ?”

सृष्टी—“लेकिन आपकी शादी तो दादाजी और उसके(पहली पत्नी के) घरवालों ने जबरदस्ती की थी. और आपने उससे शादी करने के बाद भी उसे अपनी पत्नी माना ही नहीं था. आप तो मम्मी को ही अपनी पत्नी मानते थे.”

जयसिंह—“हाँ, लेकिन गलत लोग सारी बात नहीं बताएँगें. गलत लोग सिर्फ आधी–अधुरी बात बताएँगें और अपनी गलत मनमानी को सही साबित करने की कोशिश करेंगे. अगर कोई आदमी एक बार किसी नारी को अपनी पत्नी मानकर अपना ले, फिर उस आदमी का अपनी पत्नी को छोड़ देना, पूरी तरह से गलत हैं. या तो किसी को जीवनसाथी बनाओ मत और अगर किसी को जीवनसाथी बना लिया तो फिर पूरी ईमानदारी रिश्ता निभाओ.”

सृष्टी—“हम्म………मतलब सुदर्शन भईया उस लड़की के साथ रिलेशन बनाए तो गलत नहीं हैं, क्योंकि सुदर्शन भईया उसे धोखा नहीं देगें. लेकिन कहीं मैं सुदर्शन भईया को फोलो करके बिना किसी मजबुरी के किसी गलत लड़के के चक्कर में फँस गई और अपनी मनमानी करने लगी. तब गलत हो जाएगा.”

जयसिंह ने हँसकर कहा—“हाँ बेटी, हर माँ–बाप के मन में यहीं डर रहता हैं.”

सृष्टी जयसिंह के गले लगकर बोली—“डॉन्ट वैरि पापा, मैं ऐसा कुछ नहीं करूँगी. अगर मेरी जिन्दगी में कोई लड़का आया भी तो मैं सबसे पहले उसे आपसे और मम्मी से मिलवाऊँगी. अगर वो आप दोनों को पसन्द आया, तो ठीक हैं. वरना वहीं लव का द एंड कर दूँगी.”

जयसिंह ने मुस्कुराकर सृष्टी को गले लगाकर कहा—“आई एम प्राउड ऑफ यू.”

शाम के छः बजे सुदर्शन बिल्डिंग की छत पर खड़ा कृतिका के साथ बातें कर रहा था. सुदर्शन ने नीचे की तरफ देखा, बिल्डिंग के मालिक राज किशोर की गाड़ी बिल्डिंग के सामने आकर रूकी.

उम्र में बयालिस(42) साल के राज किशोर गाड़ी बन्द करके गाड़ी का गेट खोलकर गाड़ी से उतरे और गाड़ी का गेट बन्द करके ऊपर देखकर सुदर्शन को नीचे आने का इशारा किया.

सुदर्शन ने छत से नीचे जाने लगा. कृतिका भी सुदर्शन के पीछे–पीछे चल पड़ी.

सुदर्शन ने सीढिया उतरते हुए मन में सोचा कि ये आज अचानक कैसे आया हैं ?

नीचे आकर बिल्डिंग से बाहर आते हुए सुदर्शन ने कहा—“राम–राम, अंकल जी. आज अचानक कैसे आना हुआ ?”

राज किशोर—“क्यों, मेरी बिल्डिंग में आने के लिए तुमसे इजाज़त लेनी पड़ेगी क्या ?”

कृतिका नीचे आकर बिल्डिंग के दरवाजे पर खड़ी होकर सुदर्शन और राज किशोर की बातें सुनने लगी.

सुदर्शन—“नहीं–नहीं, आप तो बुरा मान गए. मैं तो वैसे ही पूछ रहा था. असल में मैं खुद भी आपसे मिलने आने वाला था.”

राज किशोर—“अब तूने काम ही ऐसा कर दिया, बुरा तो लगना ही था. मैनें ये बिल्डिंग सस्ते किराये में तुझे रहने के लिए इसलिए दी थी, क्योंकि बिजी होने के कारण मेरा इस साइड चक्कर कम लगता हैं. तू यहाँ रहेगा, तो बिल्डिंग की देखभाल होती रहेगी. लेकिन तू तो लड़की लाकर मेरी बिल्डिंग को अय्याशी करने का अड्डा बना रहा हैं.”

सुदर्शन—“अंकल, मैं यहाँ कोई कॉलगर्ल लेकर नहीं आया और ना ही किसी को जबरदस्ती उठाकर लाया हूँ. ये सेठ साँवरमल जी की बेटी हैं और मैं इसके साथ कोई अय्याशी नहीं कर रहा हूँ.”

राज किशोर—“हाँ, मुझे भी पता हैं, ये किसकी बेटी हैं. इसके तो अब गली–गली में चर्चें हो रहे हैं. तू इसके साथ कुछ भी कर, लेकिन मेरी बिल्डिंग से बाहर.”

सुदर्शन—“कौनसे चर्चें हो रहे हैं ? एक लड़के ने प्यार और शादी के वादे करके इसको धोखा दिया, इसने उस लड़के के बारे में फेसबुक पर पोस्ट करके सबको बताया. उस लड़के का कमीनापन सबके सामने आ गया. अब जो उस लड़के जैसे घटिया लोग हैं, वो तो चर्चा करेगें ही. उनको डर लग रहा होगा, कल को कोई लड़की कृतिका की तरह उनकी पोल ना खोल दें.”

राज किशोर—“मुझे तेरे साथ कोई बहस नहीं करनी. तू तो बस अभी के अभी इस लड़की को मेरी बिल्डिंग से बाहर निकाल या फिर तू खुद भी इसके साथ निकल जा.”

सुदर्शन—“ठीक हैं, मैं दो–चार दिन में कोई दूसरी जगह देख लेता हूँ. फिर आपकी बिल्डिंग खाली कर दूँगा.”

राज किशोर—“मुझे कोई दो–चार दिन नहीं देखने. तू अभी निकल यहाँ से.”

सुदर्शन—“लेकिन अभी अचानक हम कहाँ जाएगें ?”

राज किशोर—“वो मुझे क्या पता, भाई ? मेरे भाहे सड़क पर रह. मैं बिल्डिंग को ताला लगाकर जा रहा हूँ. पच्चीस दिन का किराया देकर अपना सामान निकालकर ले जाना.”

सुदर्शन—“रूकिये ! मैं एटीएम से पैसे निकालकर लाता हूँ. अभी सामान निकाल रहा हूँ.”

राज किशोर—“हाँ, तो निकाल जल्दी.”

कृतिका चलकर सुदर्शन के पास आकर बोली—“मैं चली जाती हूँ ना. तुम क्यों परेशान हो रहे हो ?”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“तुम टेन्शन मत लो. सामान नारायण के घर छोड़कर दो–चार दिन किसी होटल में रह लेगें.”

कृतिका—“लेकिन…”

सुदर्शन—“बस अब सामान निकालने दो. वरना ये ताला लगाकर चले जाएगें.”

सुदर्शन ने चलकर गाड़ी के सामने आकर चौराहे पर खड़े होकर बातें कर रहे उम्र में चौदह(14) साल से अठारह(18) साल तक के पाँच लड़कों को आवाज़ लगाकर कहा—“करन ! इन चारों को लेकर इधर आ, यार.”

पाँचों लड़के सुदर्शन के पास आए.

सुदर्शन ने पाँचों लड़कों से कहा—“तुम सब कृतिका के साथ ऊपर सबसे ऊपर वाले फ्लेट में जाओ और वहाँ से मेरा जितना भी सामान हैं, मेरे कपड़े, घड़ा, बिस्तर, बैड, प्रेस सब नीचे लाकर वहाँ नारायण की दुकान के सामने रख दो. ठीक हैं, रखवा दोगे ना ?”

एक लड़का बोला—“हाँ–हाँ, भईया. अभी रख देते हैं. आप चिन्ता मत करो.”

सुदर्शन—“ठीक हैं. फिर रखवा दो. मैं इनको किराया देने के लिए एटीएम से पैसे लेकर आ रहा हूँ.”

सुदर्शन ने कृतिका की तरफ़ देखकर कहा—“कृतिका, तुम इनके साथ ऊपर जाओ. देख लेना, कुछ रह ना जाए.”

कृतिका पाँचों लड़कों को लेकर बिल्डिंग में ऊपर चली गई. सुदर्शन आम्रपाली सर्किल की तरफ एटीएम से पैसे लाने चल पड़ा.

सुदर्शन ने नारायण की दुकान के सामने आकर कहा—“नारायण भाय जी, बे छोरा मेरो समान ले ग आवे. थे अठे थारे घृहे रखवा ल्यो एक बारी. बो बिल्डिंग गो मालिक क्योवे, अभी के अभी बिल्डिंग खाली कर. मैं बिन किरोयो देण वास्ते एटीएम उ पिसा ले ग आऊँ.”(हिन्दी अनुवाद : नारायण भाई जी, वो लड़के मेरा सामान लेकर आ रहे हैं. आप यहाँ आपके घर में रखवा लो, एक बार. वो बिल्डिंग का मालिक कह रहा हैं, अभी के अभी बिल्डिंग खाली कर. मैं उसको किराया देने के लिए एटीएम से पैसे लेकर आ रहा हूँ.)

नारायण—“क्यों ? इसी के बात होई ?”(हिन्दी अनुवाद : क्यों ? ऐसी क्या बात हो गई ?)

सुदर्शन—“बस ईया ई, कृतिका ग कारण क्योवे ?”(हिन्दी अनुवाद : बस ऐसे ही, कृतिका के कारण बोल रहा हैं.)

नारायण—“कित्तो किरायो बाकि हैं ?”(हिन्दी अनुवाद : कितना किराया बाकि हैं ?)

सुदर्शन—“मैं तो दो हजार पूरा ही पकड़ा द्यूगा. हिसाब–हुसुब कोनी लगाऊँ म.”(हिन्दी अनुवाद : मैं तो दो हजार पूरे ही पकड़ा दूँगा. हिसाब–हुसुब नहीं लगाता मैं.)

नारायण ने अपनी जेब से दो हजार रुपये निकालकर कहा—“ल तो पकड़ाया फेर. तू मन दे दई बाद म.”(हिन्दी अनुवाद : लो तो पकड़ा दो फिर. तुम मुझे दे देना बाद में.)

सुदर्शन—“ये भी सही हैं.”

सुदर्शन ने नारायण से दो हजार रुपये लिए और वापस आकर राज किशोर को पैसे और बिल्डिंग की चाबियाँ देकर पाँचों लड़कों और कृतिका के साथ मिलकर अपना सारा सामान बिल्डिंग से निकालकर नीचे रखने लगा.

राज किशोर बिल्डिंग में आकर पूरी बिल्डिंग चैक करने लगा.

सुदर्शन के कृतिका और पाँचों लड़कों के साथ मिलकर सारा सामान बिल्डिंग से बाहर निकालने के बाद राज किशोर बिल्डिंग से बाहर आकर बिल्डिंग को ताला लगाकर अपनी गाड़ी में बैठकर चले गये.

सुदर्शन कृतिका और पाँचों लड़कों के सहयोग से अपना सामान नारायण के घर में रखने लगा.

सुदर्शन ने सारा सामान नारायण के घर में रखने के बाद नारायण से कहा—“अच्छा, म्हे जावा अब.”(हिन्दी अनुवाद : अच्छा, हम जा रहे हैं अब.)

नारायण—“कढ़े ?”(हिन्दी अनुवाद : कहाँ ?)

सुदर्शन—“दो–चार दिन कोई नई जगह नई मिले, इत्ते कोई होटल म ठहरा गा.”(हिन्दी अनुवाद : दो–चार दिन कोई नई जगह नहीं मिलती, तब तक किसी होटल में रूक जाएगें.)

नारायण—“अरे होटल म क्यू जावे ? अठे मेर खन रे ले.”(हिन्दी अनुवाद : अरे होटल में क्यों जा रहा हैं ? यहाँ मेरे पास रह ले.)

सुदर्शन—“नई यार, तन दिक्कत होवेगी. फेर नयो घर मिलना म के बेरो, कित्तो क टैम लागे ?”(हिन्दी अनुवाद : नहीं यार, तुझे प्रोब्लम होगी. फिर नया घर मिलने में क्या पता, कितना टाइम लगे ?)

नारायण—“कि दिक्कत कोनी होवे, चार दिन म. कोई रिश्तेदार आवे, जद बी तो धिकावा ही हाँ. आपणे मायने दो कमरा हैं, एक म आ बाई हर तेरी भाभी सो ज गी. दूसरा म आपा दोनों भाई सो जा गा.”(हिन्दी अनुवाद : कोई प्रोब्लम नहीं होगी, चार दिन में. जब कोई रिश्तेदार आते हैं, तब भी तो एडजस्ट या मैनेज करते ही हैं. अपने अन्दर दो कमरे हैं, एक में तेरी भाभी और ये बहन सो जाएगी. दूसरे में हम दोनों भाई सो जाएगें.)

सुदर्शन—“लेकिन यार…”

नारायण—“यार–यूर की कोनी, तू होटल–हाटल छोड़. अठेई टिक जा. आपणा खन बडो घर कोनी, तो के होयो ? आपणो दिल घणो ही बडो हैं.(हिन्दी अनुवाद : यार–यूर कुछ नहीं, तुम होटल–वोटल को छोड़ो. यहीं टिक जाओ. अपने पास बड़ा घर नहीं हैं, तो क्या हुआ ? अपना दिल बहुत बड़ा हैं.)

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“ये भी सही हैं.”

रात को दस बजे सुदर्शन और कृतिका ने नारायण के परिवार के साथ बैठकर हँसते–खिलखिलाते बातें करते हुए खाना खाया.

रात के ग्यारह बजे सुदर्शन नारायण के साथ अलग कमरे में सो गया और कृतिका नारायण की पत्नी के साथ अलग कमरे में सो गई.


अगले दिन छब्बीस जून, सोमवार की सुबह पौने दस बजे फर्श पर बिछे कालीन पर बैठकर जयसिंह और सुजाता अपने तीनों बच्चों के साथ नाश्ता कर रहे थे.

सुदर्शन दरवाजा खोलकर घर के अन्दर आया.

सृष्टी खड़ी होते हुए बोली—“सुदर्शन भईया आ गए, मैं उनके लिए थाली लेकर आती हूँ.”

सुदर्शन—“नहीं, आज मैं नाश्ता करके आया हूँ.”

सृष्टी वापस बैठ गई और अपना नाश्ता करने लगी.

जयसिंह—“बैठ जा फिर. मैं नाश्ता कर लूँ, फिर नीचे चलते हैं.”

सुदर्शन ने आगे आकर सोफे पर बैठकर कहा—“सेठ जी, कोई किराये का कमरा या एक–दो कमरो वाला कोई किराये का घर हैं क्या आपके ध्यान में ?”

जयसिंह—“किसलिए ?”

सुदर्शन—“मेरे रहने के लिए.”

जयसिंह—“वो बिल्डिंग के फ्लेट को क्या हुआ ?”

सुदर्शन—“वो कल शाम को मेरे यहाँ से जाने के बाद बिल्डिंग के मालिक राज किशोर जी आए थे. उन्होंने खाली करवा लिया.”

जयसिंह ने हैरान होकर कहा—“अचानक कैसे खाली करवा लिया ?”

सुदर्शन—“मैनें कृतिका को अपने साथ रख लिया इसलिए.”

जयसिंह—“फिर क्या हो गया ? बोल देता, तेरी दोस्त हैं. कुछ दिन तेरे साथ रहेगी.”

सुदर्शन—“कहा था, लेकिन वो नहीं माने. उन्होंने कहा, या तो कृतिका को अभी बाहर निकाल या फिर तू भी निकल जा.”

जयसिंह अपना नाश्ता खतम करके खड़े होकर हाथ धोने जाते हुए बोले—“हाँ, तो फिर टाइम तो माँगता. बोल देता, एक तारीख को खाली कर दूँगा.”

सुदर्शन—“कहा था, सेठ जी. लेकिन वो बोले, मैं तो ताला लगाकर जा रहा हूँ. पच्चीस दिन का किराया देकर अपना सामान ले जाना.”

सुजाता—“फिर कल रात को कहाँ सोए ?”

सुदर्शन—“बिल्डिंग के पास वो दुकानवाला नारायण हैं ना. मैं तो सामान उसके घर छोड़कर किसी होटल में जा रहा था. लेकिन नारायण ने कहा, जब तक दूसरी जगह नहीं मिलती, मेरे घर रूक जा. फिर कल रात को मैं और कृतिका उसके घर सोए थे.”

जयसिंह हाथ धोकर तौलिए से हाथ–मुँह पोंछते हुए बोले—“तो तुम मुझे फोन कर देते. तुम्हें बोला हुआ हैं ना, ऐसी कोई बात हो तो मुझे या मैडम को फोन कर दिया करो. फ्लेट उसने किराये पर दिया हैं, कोई फ्री में तो दिया नहीं हैं और किराया तुम हमेशा टाइम पर देते हो. फिर ऐसे अचानक कैसे निकाल सकता हैं ? यू ही सामान उठाकर निकल गया.”

सुजाता अपना नाश्ता खतम करके हाथ धोने आई. जयसिंह हाथ–मुँह पोंछकर बैडरूम में गए और ऑफ़िस की चाबी लेकर वापस आए.

जयसिंह ने सुदर्शन को चाबी देते हुए कहा—“चल ऑफ़िस खोल, मैं कपड़े बदलकर आता हूँ.”

सुदर्शन चाबी लेकर सीढिया उतरते हुए नीचे चला गया. सुजाता तौलिए से हाथ–मुँह पोंछकर बैडरूम में आकर बैड पर बैठ गई.

सुजाता ने आईने के सामने खड़े होकर शर्ट के बटन लगा रहे जयसिंह से कहा—“जय, एक बात कहूँ ?”

जयसिंह—“बोलो.”

सुजाता—“वो कृतिका कोई आवारा लड़की तो हैं नहीं और सुदर्शन बता रहा था, अब उसने शराब पीना भी बहुत कम कर दिया हैं. तो जब तक सुदर्शन को दूसरी जगह नहीं मिलती, तब तक सुदर्शन और कृतिका को हम अपने घर रख ले ?”

जयसिंह ने मुड़कर कहा—“मैं तो खुद यहीं सोच रहा था. वो बेचारा नारायण, उसके घर में दो कमरे हैं. फिर भी वो इनकी मदद कर रहा हैं. हमारे घर में तो एक कमरा खाली पड़ा हैं.”

सुजाता—“तो फिर कहा क्यों नहीं ?”

जयसिंह—“मुझे लगा, शायद कृतिका को अपने घर में रखने के लिए तुम ना मानो.”

सुजाता—“मैं क्यू नहीं मानूँगी ? जब वो गलत रास्ता छोड़कर, सही रास्ते पर आना चाहती हैं, तो हमें उसकी मदद करनी चाहिए.”

जयसिंह ने दीवार पर टंगा हुआ अपना कोट हाथ में लेकर पहनते हुए कहा—“हाँ, ये तो सही बात हैं.”

जयसिंह ने कोट पहनकर नाश्ता करने के बाद सोफे पर बैठे संयम से कहा—“संयम बेटा, नीचे से सुदर्शन भईया को बुलाना.”

संयम ने सोफे से उठकर दरवाजे के पास आकर आवाज़ लगाई—“सुदर्शन भईया, पापा बुला रहे हैं.”

संयम वापस सोफे पर आकर बैठ गया. सुदर्शन सीढिया चढ़ते हुए ऊपर आया.

जयसिंह ने बैडरूम से बाहर आकर कहा—“अरे, वो कृतिका ने शराब पीनी छोड़ दी क्या ?”

सुदर्शन—“पूरी तरह तो नहीं छोड़ी. लेकिन घर से आने के बाद अभी तक एक बार भी नहीं पी. वो पहले ज्यादा पीती थी, इसलिए कभी–कभी शराब के लिए बैचेन हो जाती हैं. तब मैं उसे कोल्ड ड्रिंक पिला देता हूँ.”

जयसिंह ने हँसकर कहा—“कोल्ड ड्रिंक पीने से शराब की बैचेनी दूर हो जाती हैं क्या ?”

सुदर्शन—“पता नहीं, लेकिन ज्यादातर बेवड़े खाना खाने से पहले भूखे पेट शराब पीते हैं. मैनें सोचा, जब पेट भर जाएगा तो शराब के लिए जगह ही नहीं रहेगी. इसलिए कोल्ड ड्रिंक लाकर पिला देता हूँ.”

जयसिंह—“अच्छा, तुम तो जानता हो, अपने घर में शराब और नॉनवेज नहीं चलता. इसलिए पूछा.”

सुदर्शन—“नहीं सेठ जी, बस उसमें ये शराब पीने की गलत आदत हैं और इसे भी वो अब छोड़ रही हैं. बाकि वो हर तरह से बहुत अच्छी लड़की हैं और नॉनवेज भी नहीं खाते वो लोग.”

जयसिंह—“ठीक हैं, फिर तुम ऐसा करो. तेरा बाकि सामान तो नारायण के घर पड़ा रहने दे. जब दूसरी जगह मिल जाएगी, तब नारायण के घर से उठा लेना. तेरे कपड़े लेकर कृतिका को यहाँ अपने घर ले आ. जब तक दूसरी जगह नहीं मिलती तुम दोनों यहाँ रह लो. तुम तो ये सामने वाले कमरे में सो जाना. कृतिका ऊपर सृष्टी के पास सो जाएगी.”

सुदर्शन—“लेकिन सेठ जी, आपको प्रोब्लम नहीं होगी ?”

जयसिंह—“अरे, प्रोब्लम क्या होगी ? तुम ले आओ.”

संयम ने सुदर्शन से कहा—“और अगर कृतिका अकैली सोना चाहे, तो आप मेरे कमरे में सो जाना.”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“ठीक हैं.”

सुदर्शन नीचे जाने लगा.

जयसिंह—“नीचे कहाँ जा रहा हैं ?”

सुदर्शन—“थोड़ा काम.”

जयसिंह—“काम आकर कर लेना. पहले ले आ उसको. फिर सारा दिन काम ही करना हैं.”

सुदर्शन—“ये भी सही हैं.”

सुदर्शन मुड़कर घर का दरवाजा खोलकर बाहर चला गया.

जयसिंह ने सोफे पर बैठी सृष्टी से कहा—“कोई प्रोब्लम तो नहीं हैं ना, कृतिका तुम्हारे कमरे में सोए तो ?”

सृष्टी—“नहीं–नहीं, कोई प्रोब्लम नहीं हैं.”

जयसिंह—“चलो, फिर ठीक हैं.”

जयसिंह सीढिया उतरते हुए नीचे बेसमेंट में चले गए.


दो दिन बाद अठाईस जून, बुधवार को शाम के सात बजे जयसिंह के घर के सामने सेठ साँवरमल बागड़ी की गाड़ी आकर रूकी. सेठ साँवरमल बागड़ी गाड़ी से उतरकर घर का मुख्य दरवाजा खोलकर राजलक्ष्मी के साथ अन्दर आए और घर के दरवाजे पर आकर बेल बजाई.

सोफे पर बैठकर टीवी देखते हुए हाथ में प्लेट लिए काँटे से चाउमीन खा रही सृष्टी ने चाउमीन की प्लेट सोफे पर रखकर सोफे से उठी और चलकर दरवाजे के पास आकर दरवाजा खोला.

सेठ साँवरमल बागड़ी—“जयसिंह जी घर पर हैं ?”

सृष्टी—“हाँ, आप अन्दर आईये. मैं उनको बुलाती हूँ.”

सेठ साँवरमल बागड़ी राजलक्ष्मी के साथ अन्दर आए. सृष्टी ने सोफे से चाउमीन की प्लेट उठाकर उन्हें सोफे पर बिठाया और चाउमीन की प्लेट हाथ में लिए सीढिया उतरते हुए नीचे बेसमेंट में आकर केबिन में आई.

जयसिंह अपनी चेयर पर बैठे सामने रखे कम्प्यूटर में कुछ काम कर रहे थे. सुजाता और कृतिका कारपेट लगे फर्श पर नीचे बैठकर ज्वैलरी पैक कर रही थी. केबिन के बाहर सुदर्शन कुर्सी पर बैठा अपने टेबल पर लैम्प जलाकर स्टोन चैक कर रहा था.

सृष्टी—“पापा, कृतिका दीदी के मम्मी–पापा आए हैं. मैनें उनको सोफे पर बिठा दिया.”

जयसिंह कम्प्यूटर से नजर हटाकर बोले—“चाय–नाश्ता तैयार करो फिर उनके लिए. मैं आता हूँ.”

सृष्टी मुड़कर वापस चली गई.

कृतिका ने कहा—“अंकल, अगर वो मुझे लेने आए हैं, तो आप उनसे साफ़–साफ़ कह देना. मुझे उनके साथ नहीं जाना. मैं यहाँ आपके पास जॉब करके बहुत खुश हूँ.”

जयसिंह—“ऐसे नहीं बोलते, बेटी. पहले उनसे बात तो करे, क्या कहते हैं वो ?”

कृतिका—“उनकी बातें मुझे पता हैं. उनके साथ रहकर ना मैं खुश रहती हूँ, ना वो खुश रहते हैं. इससे अच्छा, मैं उनसे अलग ही रहूँ.”

सुजाता—“अलग रहना कोई सोल्यूशन नहीं होता, कृतिका. अब हम बात करते हैं उनसे. फिर देखते हैं, तुम्हारे और उनके बीच की प्रोब्लम का क्या सोल्यूशन हैं ?”

कृतिका—“कोई सोल्यूशन नहीं हैं, अन्टी.”

जयसिंह मुस्कुराकर बोले—“और अगर कोई सोल्यूशन निकल आया तो ?”

कृतिका—“अंकल, जब एक बार कोई धागा टूट जाता हैं, फिर वो दूबारा जुड़ता भी हैं, तो एक गाँठ के साथ. जो बार–बार कहीं ना कहीं अटकती रहती हैं.”

जयसिंह—“तुम चिन्ता मत करो, हम वो अटकने वाली गाँठ नहीं रहने देगे.”

कृतिका कुछ नहीं बोली और उदास हो गई.

जयसिंह ने कृतिका को उदास होते देखकर कहा—“देखो, कभी–कभी माँ–बाप भी अन्जाने में अपने बच्चों के साथ कुछ गलत कर देते हैं. हम उन्हें समझाने की कोशिश करते हैं, शायद वो समझ जाए. लेकिन अगर हम कोशिश ही नहीं करेंगें. तब तो वो बिल्कुल नहीं समझेंगे. इसलिए कोशिश करना बहुत जरूरी हैं.”

सुजाता—“आप ऊपर जाओ, वो लोग इंतजार कर रहे होगे. कृतिका को मैं समझाती हूँ.”

जयसिंह चेयर से उठते हुए बोले—“ठीक हैं.”

जयसिंह केबिन से बाहर आकर सीढ़िया चढ़ते हुए ऊपर आकर सोफे पर बैठे सेठ साँवरमल बागड़ी और राजलक्ष्मी की तरफ आते हुए हाथ जोड़कर मुस्कुराते हुए बोले—“राम–राम, साँवरमल जी. कहिये, क्या सेवा करे आपकी ?”

सेठ साँवरमल बागड़ी और राजलक्ष्मी हाथ जोड़कर सोफे से खड़े हुए.

सेठ साँवरमल बागड़ी—“राम–राम, जयसिंह जी.”

जयसिंह—“अरे, आप लोग खड़े क्यों हो गए ? बेठिये–बेठिये. (सृष्टी को आवाज़ देकर) सृष्टी, चाय बनी नहीं अभी तक ?”

किचन में से सृष्टी की आवाज़ आई—“बस पापा, बन रही हैं.”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“चाय रहने दीजिये. हम तो बस कृतिका को लेने आए हैं. मुझे पता चला, वो आपके पास जॉब करने वाले किसी लड़के के साथ रह रही थी और अब आपके घर पर हैं. उसे बुला दीजिये.”

जयसिंह ने सोफे पर बैठकर कहा—“अब हम लोग इतने भी बुरे नहीं हैं, जो आप हमारे घर की चाय नहीं पी सकते. आपकी बेटी कृतिका हमारे घर पर हैं. बिल्कुल सही सलामत हैं. उसकी चिन्ता मत कीजिये.”

राजलक्ष्मी—“आप भी अजीब बात करते हैं, जयसिंह जी. जिनकी बेटी पाँच दिन से गायब हैं. उनको बोल रहे हैं, चिन्ता मत करो.”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“पिछले पाँच दिनों से हमारी क्या हालत हैं ? ये हम ही जानते हैं. ऊपर से उसके करम ऐसे हैं, पुलिस में जाकर शिकायत भी नहीं कर सकते.”

जयसिंह—“मैं सब समझता हूँ, साँवरमल जी.”

राजलक्ष्मी—“अब रहने दीजिये, जयसिंह जी. ये झूठी हमदर्दी मत दिखाईए. अगर आप सब समझते, तो कृतिका आपके पास नौकरी करने वाले लड़के के साथ हैं, ये बात जानते हुए भी हमसे छुपाते नहीं.”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“छोड़ो, किर्ती(कृतिका को घर पर किर्ती कहते हैं) की माँ. जब अपना ही सिक्का खोटा हो, तो दूसरों से क्या शिकायत करनी.”

सेठ साँवरमल बागड़ी ने जयसिंह से कहा—“आप तो कृतिका की बुला दीजिये, हम जाना चाहेंगे.”

जयसिंह—“कृतिका को मैं बुला दूँगा. वो नीचे मिसेज(पत्नी) के साथ हैं. लेकिन पहले तो हाथ जोड़कर आपसे माफ़ी चाहूँगा, मैनें कृतिका के बारे में आपको बताया नहीं इसलिए. फिर कृतिका के बारे में ही आपसे कुछ बातें करनी हैं. लीजिये, पहले चाय पीजिये. चाय आ गई.”

सृष्टी ट्रे में तीन कप चाय और तीन प्लेट में नाश्ता रखकर ले आई.

जयसिंह ने खड़े होकर सृष्टी से ट्रे लेकर बोले—“बेटा, वो टेबल यहाँ खिसका लो.”

सृष्टी ने टेबल खिसका कर सोफे के आगे कर दिया.

जयसिंह ने टेबल पर ट्रे रखकर कहा—“लीजिए, चाय लीजिए.”

सृष्टी—“मैं जाऊँ, पापा ?”

जयसिंह—“हाँ, जाओ.”

सृष्टी सीढिया उतरते हुए नीचे बेसमेंट में चली गई.

सेठ साँवरमल बागड़ी, राजलक्ष्मी और जयसिंह ने चाय का एक–एक कप उठा लिया.

जयसिंह—“हाँ, तो मैं कह रहा था. सबसे पहले तो मैं आपसे माफ़ी चाहूँगा, मैनें कृतिका के बारे में बताया नहीं इसलिए.”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“कोई बात नहीं, अब जाने दीजिए. बार–बार माफ़ी माँगकर शर्मिन्दा ना करें. हमारी सड़कों पर आवारा घूमने वाली बिगड़ैल बेटी शहर के एक बहुत इज्जतदार घर में हैं, यहीं बहुत हैं.”

जयसिंह—“इज्जत तो आप सब बड़ों के आशिर्वाद से हैं. जहाँ तक बात हैं, कृतिका के बिगड़ैल होने की. तो पहले हम भी कृतिका को बिगड़ैल ही समझते थे. लेकिन पिछले ढ़ाई–तीन महिने में कृतिका ने अपनी बहुत से बातें मेरे पास जॉब करने वाले सुदर्शन को बताई और सुदर्शन ने हमें बताई. कृतिका की सारी बातें जानने के बाद हमें पता चला, वो बिगड़ैल नहीं हैं, वो भटकी हुई हैं. बिगड़ैल लोगों में और भटके हुए लोगों में बहुत फर्क होता हैं. बिगड़ैल होते हैं, कृतिका को चीट करने वाले उस लड़के जैसे लोग. जो दूसरों की जिन्दगी खराब करते हैं और भटके हुए होते हैं, कृतिका जैसे लोग. जो खुद की जिन्दगी खराब करते हैं.”

राजलक्ष्मी—“अब जो भी कहिये, हमें तो उसने कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं छोड़ा. शर्म के कारण कई सालों से हम दोनों ने कहीं आना–जाना भी बन्द कर रखा हैं.”

जयसिंह—“इसी के बारे में तो आप लोगों से बात करना चाहता हूँ, ताकि इस समस्या का हल निकले.”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“अब क्या हल निकलेगा, जयसिंह जी ? बहुत कोशिश की इस लड़की को सही रास्ते पर लाने की. लेकिन ये तो दिन ब दिन पहले से ज्यादा बिगड़ती गई.”

जयसिंह—“अब तक क्या–क्या कोशिशे की हैं आप लोगों ने ?”

राजलक्ष्मी—“क्या नहीं किया हमने उसके लिए ? बड़ी मिन्नतो के बाद ये पैदा हुई थी, हमने कहा, चलो बेटा ना सही, बेटी ही सही. लक्ष्मी का रूप हैं. उसे जो चाहिए, उसके माँगने से पहले उसे लाकर दिया. अच्छी से अच्छी एज्यूकेशन दिलाई. किसी भी तरह के गलत रास्ते पर चलने से हमेशा उसे रोका. कॉलेज में आई तो उसने कहा, मुझे गाड़ी चाहिए. उसे गाड़ी दिला दी. सोचा था, इकलौती बेटी हैं, इसे किसी चीज के लिए मना करेंगे, तो कहीं भटक कर गलत रास्ते ना पकड़ ले. लेकिन किस्मत फूटी हो तो कोई क्या करे ? उसने तो ऐसे उल्टे रास्ते पकड़े, हमें कहीं का नहीं छोड़ा. इससे अच्छा तो बेऔलाद रहते. कम से कम ये तो कहते, हमारी कोई औलाद ही नहीं हैं.”

जयसिंह—“एकबार आप लोग ठंडे दिमाग से सोचकर देखो, इतना सब करने के बाद भी आखिर ऐसी क्या वजह रही, जो आज आपको ये बात कहनी पड़ रही हैं ?”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“वजह क्या रहनी हैं, सब किस्मत की बात हैं. जब किस्मत में बच्चों के दुःख लिखे हो तो कौन रोक सकता हैं ?”

जयसिंह—“ऐसी बात नहीं हैं. मुझे नहीं मालूम, आपको पता हैं या नहीं पता ? लेकिन कृतिका ने अब शराब पीना छोड़ दिया हैं.”

सेठ साँवरमल बागड़ी हैरान होकर बोले—“उसने शराब पीना छोड़ दिया हैं ? इस पर तो विश्वास करना मुश्किल हैं. हम तो हार गए, उसकी शराब छुड़ाने की कोशिश करते–करते.”

जयसिंह—“लेकिन ये सच हैं. वो परसो से हमारे घर हैं. पहले ज्यादा शराब पीती थी, इसलिए कल उसको शराब नहीं पीने के कारण बहुत बैचेनी सी हो रही थी. लेकिन उसने शराब नहीं पी. मिसेज उसको डॉक्टर के पास लेकर गई, अब वो शराब पूरी तरह छोड़ने के लिए दवाई ले रही हैं.”

राजलक्ष्मी—“अगर ये बात सच हैं. फिर तो ये हमारे लिए बहुत खुशी की बात हैं. ये खुशखबरी सुनाकर तो आपने हमारी सारी नाराजगी दूर कर दी. वरना हम आपसे बहुत नाराज थे.”

जयसिंह—“आप रूकिये तो सही, धिरे–धिरे आपकी सारी नाराजगी दूर करके ही आपको यहाँ से भेजेगें. आप लोग कृतिका की शराब इसलिए नहीं छुड़ा पाए, क्योंकि पहले कृतिका शराब नहीं छोड़ना चाहती थी. लेकिन अब वो खुद इस ज़हर को अपनी जिन्दगी से दूर करना चाहती हैं. हम सबको बस उसकी मदद करने की जरूरत हैं. और एक बात ये भी हैं, परसो से वो मेरे ऑफ़िस में काम भी कर रही हैं. और कहती हैं, अंकल, अब मैं नौकरी करके सेल्फ डिपेन्ड होकर अपने खुद के पैसों से एक गाड़ी खरीदना चाहती हूँ.”

सेठ साँवरमल बागड़ी हैरान होकर बोले—“ये बात कृतिका कह रही थी या आप हमारे साथ मजाक कर रहे हो ?”

जयसिंह ने हँसकर कहा—“जी नहीं, ये मजाक नहीं हैं. बिल्कुल सौ प्रतिशत सच हैं.”

राजलक्ष्मी—“लेकिन अचानक पाँच दिन में ये बदलाव आया कैसे ? वो भी इतना ज्यादा, कि एकदम से इतनी बदल गई.”

जयसिंह—“जी हाँ, सोचने और विचार करने वाली बात यहीं हैं. कि पिछले दो–ढ़ाई महिने में ऐसा क्या हुआ, जो वो इतना बदल गई ? अभी तक मैनें आपको अच्छी बातें बताई, लेकिन अब मैं आपके बारे में कुछ कड़वी बातें बता रहा हूँ. कृतिका हमारे घर पर हैं, फिर भी मैनें आपको इसलिए नहीं बताया, क्योंकि मैं सोच रहा था, कुछ दिन आप लोग कृतिका से दूर रहोगे तो आपको कृतिका की बुराईयों के साथ–साथ उसका भोलापन, उसकी मासूमियत, उसकी नादानियाँ, उसका बचपना, उसकी बचपन की शरारतें, ये सब बातें भी याद आएँगी. वो क्या हैं, जब कोई हमारे पास होता हैं, तब हमें उसकी कमियाँ ज्यादा नजर आती हैं. लेकिन जब कोई हमसे दूर हो जाए, तो लाख बुराईयाँ होने पर भी हमें उसकी अच्छाई ज्यादा नजर आती हैं. तो बताईए, इन पाँच दिनों में आपको कृतिका की कौनसी बातें ज्यादा याद आई ? कृतिका की बुराईयाँ या…”

सेठ साँवरमल बागड़ी और राजलक्ष्मी की आँखें भीग गई. दोनों ने चाय के कप टेबल पर रखी हुई ट्रे में रख दिये.

जयसिंह अपना कप ट्रे में रखकर बोले—“अरे, आप रोईये नहीं. मेरा इरादा आपको आपकी बेटी से दूर करना नहीं हैं. हम दिल से चाहते हैं, कृतिका आपके साथ बहुत खुश रहें. कृतिका दिल की बुरी नहीं हैं. हमारे घर आने के बाद इन तीन दिनों में उसका नटखटपन देखकर लगता हैं, जैसे अभी तक वो दस–पन्द्रह साल की बच्ची हैं और मेरे तीनों बच्चों के साथ तो ऐसे घुलमिल गई, जैसे पता नहीं, कब से जान–पहचान हैं.”

सेठ साँवरमल बागड़ी और राजलक्ष्मी दोनों ने अपनी आँखें पोंछकर कृतिका के बचपन को याद करते हुए कृतिका की बहुत सी बातें जयसिंह को बताई.

सेठ साँवरमल बागड़ी बहुत सी बातें बताने के बाद बोले—“ऐसी थी कृतिका. कृतिका हमारे जीवन में इतनी खुशियाँ लेकर आई, हमें कभी इस बात का एहसास नहीं हुआ, हमारा बेटा नहीं हैं. हम एक बेटी के माँ–बाप बनकर बहुत खुश थे. फिर इसकी बहुत शिकायतें आने लगी. कृतिका गन्दी–गन्दी गालियाँ निकालती हैं, दूसरे बच्चों के साथ मारपीट करती हैं. बड़ों को बैईज्जत करती हैं. और भी बहुत सी शिकायतें. अपनी इकलौती बेटी को बिगड़ते देखकर हम डर गए और उसे बिगड़ने से बचाने के लिए बहुत सख्त हो गए. हमने सोचा, कहीं ज्यादा लाड़–प्यार देकर हम कृतिका को बिगाड़ ना दें. लेकिन कृतिका तो दिन बा दिन और ज्यादा खराब होती गई. कॉलेज में आने के बाद गलत लड़के–लड़कियों की संगत में आकर शराब पीने लगी. रात–रात भर घर से बाहर घूमने लगी. फिर इस लड़के दिव्यांश के चक्कर में पड़ गई. हमने बहुत समझाया, ये लड़का ठीक नहीं हैं. लेकिन उसने हमारी एक नहीं सुनी. फिर जो कुछ हुआ, सब आपके सामने हैं.”

राजलक्ष्मी—“एक इकलौती बेटी, वहीं जब सीधे मुँह बात ना करें. तो माँ–बाप के मन पर क्या गुजरती हैं ? ये सिर्फ वहीं माँ–बाप समझ सकते हैं, जिनके साथ ऐसा हुआ हो.”

जयसिंह—“होता क्या हैं ? कभी–कभी हम समझ नहीं पाते, हमें क्या करना चाहिए ? आपकी सारी बातें सही हैं. आप भी सभी माँ–बाप की तरह अपनी बच्ची का भला ही सोचते हो. लेकिन कृतिका को सही रास्ते पर चलाने के लिए आपने तरीके गलत अपनाए. चाहे लाड़–प्यार हो, चाहे सख्ती हो. जब कुछ भी जरूरत से ज्यादा हो जाए तो वो नुकसान करता हैं. आप लोगों के मन में एक डर आ गया, कहीं इकलौती बच्ची हाथ से निकल ना जाए और इस चक्कर में आप लोग घबराकर कुछ ज्यादा सख्त हो गए. परिणाम ये हुआ, कृतिका को आपसे मिलने वाली डांट और आपसे होने वाली पिटाई की कोई परवाह ही नहीं रही.”

राजलक्ष्मी—“तो आप ही बताईए, इकलौती बेटी का ये हाल देखकर हम क्या करते ?”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“अब ये क्या कर रही थी ? वो भी आपको पता ही हैं. टीवी में खबरें आई. सारी इज्जत मिट्टी में मिला दी. बाप की पगड़ी उछालने में कोई कसर बाकि नहीं रखी.”

सुजाता सीढिया चढ़ते हुए ऊपर आई और जयसिंह के पास आकर सोफे पर बैठ गई.

जयसिंह ने सेठ साँवरमल बागड़ी और राजलक्ष्मी से कहा—“देखिये, कई बार क्या होता हैं ? बच्चे हमारे पास आकर बोलते हैं, मम्मी या पापा, हमें आपसे कुछ कहना हैं. हम तिलमिलाकर बोलते हैं, क्या हैं ? तेरी बात बाद में पहले ये काम कर. हमेशा हमें परेशान करते हो. इस बार क्या गलती की हैं तूने ? बहुत सारे माँ–बाप अपने बच्चों के साथ इस तरीके से बात करते हैं, जैसे बच्चे नहीं हैं, भेड़–बकरी हैं. बच्चे अपने दिल की बात कहने के लिए माँ–बाप के पास आते हैं, तो माँ–बाप को चाहिए, प्यार से बच्चों की बात सुनकर बच्चों को प्यार से समझाए. लेकिन समझाना तो बहुत दूर की बात हैं. बहुत से माँ–बाप बच्चों के साथ सीधे मुँह बात तक नहीं करते. ये सच्चाई हैं. बच्चे नादान हैं, बच्चे शरारती हैं, बच्चे कुछ समझते ही नहीं. अरे…जब माँ–बाप बच्चों को कुछ समझाएगें, तभी तो बच्चे समझेगें. कोई दूसरा थोड़े ही आएगा, हमारे बच्चों को समझाने के लिए.”

सुजाता—“और सबसे बड़ी गलती होती हैं, बच्चे बड़े होकर अपने आप सब समझ जाएँगें, ये सोचना. अपने आप तो बच्चे बोलना भी नहीं सीखते. बोलना भी सिखाना पड़ता हैं. फिर हम ये कैसे सोच लेते हैं, बड़े होकर बच्चे अपने आप समझदार हो जाएँगें ?”

जयसिंह—“और माँ–बाप के बच्चों की बात नहीं सुनने का फायदा गलत लोग उठाते हैं. माँ–बाप तो अपने बच्चों की बात सुनकर बच्चों को कुछ समझाना जरूरी नहीं समझते, क्योंकि बच्चे मुर्ख हैं, बच्चे शरारती हैं, बच्चे नासमझ हैं, बच्चों को समझाने का कोई फायदा नहीं हैं. बड़े होकर अपने आप सब समझ जाएँगें. लेकिन गलत लोग बच्चों की बात सुनकर बच्चों को गलत बातें बहुत अच्छी तरह प्यार से समझा देते हैं और बच्चे खुशी–खुशी गलत रास्ते पर चल पड़ते हैं. यहीं आपकी कृतिका के साथ हुआ हैं.”

सुजाता—“और हाँ, बच्चों को डरा–धमकाकर या पिटाई करके तो हम कभी बच्चों को सही रास्ते पर नहीं चला सकते. जब तक बच्चों के मन में हमारा डर होता हैं, तब तक बच्चे चोरी–छिपे गलतियाँ करते हैं और जब बच्चों के मन से डर निकल जाता हैं, फिर बच्चे किसी की परवाह किये बिना मनमानी करने लगते हैं.”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“शायद आपकी बात ठीक हैं. ऐसी गलतियाँ तो हमसे भी हुई हैं. लेकिन मनुष्य क्या करें ? जीवन में घर–परिवार भी होता हैं. रिश्तेदारी भी देखनी पड़ती हैं. कारोबार देखना भी जरूरी हैं. जीवन में इतनी भागदौड़ होती हैं, कभी–कभी हम भविष्य पर विचार नहीं कर पाते.”

सुजाता—“देखिये, जीवन में सब कुछ जरूरी हैं, इसलिए हमें सभी बातों में संतुलन बनाकर करना चाहिए. जब हम किसी एक बात पर जरूरत से ज्यादा ध्यान देते हैं और दूसरी बात को हल्के में ले लेते हैं, तब संतुलन बिगड़ जाता हैं.”

राजलक्ष्मी—“आपकी बात सही हैं. लेकिन अब क्या कर सकते हैं ? हम तो बेटी को अपना जीवन बर्बाद करते देखकर कुछ समझ नहीं पाए और जो बातें आप लोग बता रहे हैं, वो सारी गलतियाँ हम कर बैठे हैं. अब तो अगर आप लोग कहो, तो हम कृतिका से माफ़ी माँग लेते हैं.”

जयसिंह—“अरे, कैसी बातें कर रही हैं आप ? ऐसा कुछ करने की जरूरत नहीं हैं. कृतिका को प्यार और अपनेपन की जरूरत हैं, डांट और डंडे से पिटाई की जरूरत नहीं हैं. आप लोग बस उसे प्यार और अपनापन दो. माफ़ी–वाफ़ी की कोई जरूरत नहीं हैं.”

सुजाता—“डांट और पिटाई से बच्चों को डराने की जगह हमें बच्चों को हर एक समझाने की कोशिश करनी चाहिए. बच्चे फिर कभी नहीं बिगड़ते. बस हमारे समझाने का तरीका ऐसा हो, कि बच्चों को हमारी बातें भाषणबाजी या लेक्चरबाजी ना लगे.”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“हाँ, डांट और डंडे से पिटाई तो बहुत कर चुके हैं और उसका परिणाम भी देख लिया हैं.”

सुजाता—“अब पुरानी बातें भूल जाईये, भाई साहब. जो होना था, वो तो हो गया. उस पर अफ़सोस करने से कुछ नहीं मिलने वाला.”

जयसिंह—“और हाँ, इस बार उस लड़के के बारे में सोशल साइट्स पर पोस्ट करके कृतिका ने कुछ गलत नहीं किया. अगर इन घटिया और बेकार लोगों के खिलाफ़ कुछ करेंगे नहीं, तो ये लोग इसी तरह बिना किसी डर के किसी ना किसी मासूम को अपना शिकार बनाते रहेंगे. फोर एग्लामपल ये घटिया लड़के, ये बेकार आदमी लड़कियों और महिलाओं के शरीर पर वहाँ कुछ गलत हरकत करते हैं, जहाँ लड़की या महिला को बताने में शर्म महसुस होती हैं. पहली बात तो हैं, ज्यादातर लड़कियाँ और महिलाएँ कुछ बोलती ही नहीं हैं, बस चुपचाप सहन करती हैं. अगर कोई हिम्मत वाली लड़की या महिला बोलकर विरोध करें, तो ये घटिया और बेकार लोग कहते हैं, बताओ जरा, हमने किया क्या हैं ? लड़की या महिला शर्म के कारण सब कुछ साफ़–साफ़ नहीं बता पाती और ये घटिया लोग लड़की या महिला को गलत साबित करके हँसते हुए निकल जाते हैं. लड़कियों और महिलाओं का ये शर्म करके चुप रहना ही, इन घटिया लोगों की ताकत हैं. जिस तरह कृतिका ने हिम्मत करके उस लड़के की एक–एक गलत और गन्दी बात पूरी डिटेल के साथ फेसबुक पर पोस्ट की हैं. अगर हर लड़की और हर महिला इसी तरह घटिया और गन्दे लोगों की हर बात कोई शर्म किये बिना सबको बताने लगे, तो इन घटिया और बेकार लोगों के मन में भी एक डर पैदा होगा. और ऐसा सिर्फ वहीं लड़की कर सकती हैं, जो बहुत अच्छी हो, जो खुद गलत ना हो. जो लड़कियाँ खुद जान–बुझकर लड़कों के चक्कर में फँसती हैं, वो ऐसा कभी नहीं कर सकती. इसलिए हमें कृतिका जैसी अच्छी और हिम्मत वाली लड़कियों की मदद करनी चाहिए. ताकि दूसरी अच्छी लड़कियों को भी गलत लोगों के खिलाफ़ बोलने की हिम्मत मिले.”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“ये सब कहने की बातें हैं, जयसिंह जी. हम रोज भुगत रहे हैं.”

जयसिंह—“आप इसलिए भुगत रहे हो, क्योंकि आपकी और आपकी बेटी की कोई गलती ना होते हुए भी आप लोग खुद को गलत मानते हो.”

सुजाता—“और भाई साहब, कहने वाले तो टीवी पर सुदर्शन के साथ इनका नाम आने के बाद हमें भी बोल रहे हैं. लेकिन हम उन कहने वालों को सही और सटीक जवाब देते हैं. उनसे पूछते हैं, गलत करने वाला बुरा होता हैं या जिसके साथ गलत हुआ हो, वो बुरा होता हैं ? जो अच्छे और समझदार लोग हैं, वो हमारी बात समझ जाते हैं और गलत लोग इसलिए नहीं समझते, क्योंकि उनको गलत रास्ते पर ही चलना हैं.”

जयसिंह—“हाँ, बिल्कुल.”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“लेकिन लोगों के मुँह तो फिर भी बन्द नहीं होते ना.”

जयसिंह—“देखिये साँवरमल जी, कृतिका ने किसी को धोखा दिया नहीं हैं. कृतिका ने किसी से धोखा खाया हैं. तो फिर आप क्यों शर्मिन्दगी महसुस करते हो ? अगर कृतिका गलत रास्ता छोड़कर सही रास्ते पर चल रही हैं, तो आप बस उसकी मदद करो. अगर लोग आपके सामने कुछ बोलते हैं, तो उनको जवाब दो. हाँ, पहले कुछ वजह थी, कुछ कारण थे, इसलिए हमारी बेटी भटक कर गलत रास्ते पर चली गई. और हमारी बेटी भटक गई थी, बिगड़ी नहीं थी. हमारी बेटी ने किसी का बुरा नहीं किया. हमारी बेटी के साथ बुरा हुआ था. लेकिन अब उसने सही रास्ता पकड़ लिया हैं. इसके बाद दुनिया कुछ भी कहें, दुनिया की परवाह मत करो. लोग कुछ ना कुछ तो कहते ही हैं और इन कहने वालों का कोई ईलाज नहीं हैं. जब हमारी शादी हुई थी, उस वक्त हमें भी लोग बहुत कुछ कहते थे. मुझे कहते थे, ये जयसिंह तो अन्टी का दीवाना हैं. मिसेज को कहते थे, सुजाता ने एक बच्चे को फँसा लिया. और भी बहुत कुछ कहते थे. लेकिन हमें पता था, हमने कुछ भी गलत नहीं किया. अपने घरवालों की मरजी से, सारे रीति–रिवाजों के साथ शादी करके हम पति–पत्नी बने हैं. फिर भी लोग बातें करते हैं, तो करने दो. जब हमने कुछ गलत नहीं किया, तो हम क्यों लोगों को सफाई देते फिरे ? हाँ, हमारे सामने कुछ बोलने की किसी में हिम्मत नहीं थी. यहीं बात मैं आप लोगों से कहूँगा, पहले जो होना था, वो हो गया. अब आगे से पुरानी गलती नहीं दोहराएँगें. फिर भी लोग बातें करते हैं, तो उनको करने दो. लोगों को बातें करके खुश हो लेने दो.”

राजलक्ष्मी—“लेकिन भाई साहब, लड़की के बारे में ये सब जानने के बाद लड़की से कौन शादी करता हैं ? आपकी बातें सारी ठीक हैं, लेकिन दुनियादारी और समाज को भी तो देखना पड़ता हैं.”

सुजाता—“हाँ, आपकी बात सही हैं. लेकिन दुनिया में अच्छे और समझदार लोग भी बहुत हैं. जो लोग कृतिका की नासमझी के कारण की हुई गलती को माफ़ करके कृतिका की अच्छाईयाँ देखेंगे, उनको कोई प्रोब्लम नहीं होगी, कृतिका को अपने घर की बहू बनाने में.”

जयसिंह—“और अभी आप लोग कृतिका की शादी के बारे में मत सोचो. वो अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती हैं, इसमें उसकी मदद करो. अभी उसे हम सबके साथ की जरूरत हैं. शादी हो जाएगी, टाइम आने पर.”

सुजाता—“और इस बार तो किस्मत अच्छी थी, जो कृतिका के पास पैसे नहीं थे. सुदर्शन को वो बस स्टैण्ड पर बैठी मिल गई और सुदर्शन उसे अपने साथ ले आया. वरना वो तो ये शहर छोड़कर कहीं ओर जा रही थी.”

सेठ साँवरमल बागड़ी ने अपने माथे पर हाथ रखते हुए कहा—“हे भगवान………”

जयसिंह—“अब छोड़ो, इन सब बातों को. आपको अगर कृतिका को कैद ही करना हैं, तो उसे प्यार और अपनेपन की जंजीर में बाँध कर अपने दिल के कमरों में कैद कीजिये. किसी को कैद करने के लिए सबसे अच्छी चीज होती हैं, प्यार और अपनेपन की जंजीर. जब हम किसी को प्यार और अपनेपन की जंजीरों में बाँध लेते हैं, फिर वो खुद ही कभी इन जंजीरों से आजाद नहीं होना चाहता.”

राजलक्ष्मी—“ठीक हैं, भाई साहब. आपकी ये बात हम जरूर ध्यान में रखेंगे. लेकिन कृतिका को बुला तो दीजिये. पाँच दिन से आँखें तरस गई, उसे देखने के लिए.”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“हाँ, उस पर हाथ उठाकर हम अन्दर ही अन्दर कितना रोते हैं ? ये हम ही जानते हैं. जब से वो घर से गई, हमारा तो खाना–पीना सब छुट गया.”

जयसिंह—“ओह…फिर तो आज का खाना आप हमारे यहाँ ही कृतिका के साथ बैठकर खाओ.”

राजलक्ष्मी—“नहीं–नहीं, भाई साहब.”

सुजाता—“नहीं–नहीं क्या ? कोई बहाना नहीं चलेगा. अब आप लोगों ने खाना खाए बगैर जाने की जिद की, तो हम कृतिका को भी नहीं ले जाने देगें.”

जयसिंह—“अब इनके सामने मेरी भी नहीं चलती. पहले ही बता देता हूँ.”

सेठ साँवरमल बागड़ी मुस्कुराकर बोले—“ठीक हैं.”

सुजाता सोफे से उठकर बोली—“आप लोग बातें करो. मैं खाने की तैयारी करती हूँ.”

राजलक्ष्मी खड़ी होते हुए बोली—“चलिये, मैं भी आपकी कुछ मदद कर दूँ.”

सुजाता—“अरे, आप बैठिये, आपकी बेटी हैं ना. मदद के लिए. वो अब हमारे घर की सदस्य बन गई हैं.”

राजलक्ष्मी वापस बैठ गई. सुजाता खाना बनाने में मदद के लिए कृतिका और सृष्टी को बुलाने सीढिया उतरते हुए नीचे बेसमेंट में चली गई.


सवा तीन महिने बाद आठ अक्टूबर, रविवार को शाम के पाँच बजे कृतिका और सुदर्शन एक पार्क में आकर एक बैंच पर बैठ गए.

सुदर्शन—“तो गाड़ी लाने से मना कर दिया क्या तुम्हारे मम्मी–पापा ने ?”

कृतिका—“नहीं यार, वो तो खुद कहते हैं, जब गाड़ी हैं, तो बस में क्यों जाती हो ?”

सुदर्शन ने मजाकियाँ लहजे में कहा—“वहीं तो ! तुम्हारा असली घर तो तुम्हारी गाड़ी थी और तुमने वहीं लानी बन्द कर दी.”

कृतिका—“मजाक मत करो.”

सुदर्शन ने हँसकर कहा—“अच्छा–अच्छा, लेकिन तुमने गाड़ी लाना बिल्कुल ही बन्द क्यों कर दिया ? जब कहीं आना–जाना हो, तब तो ले आया करो.”

कृतिका—“नहीं, बिल्कुल बन्द थोड़े ही किया हैं. पापा के साथ ऑफ़िस आना–जाना गाड़ी से ही करती हूँ. कभी मम्मी को कहीं ले जाना हो और ड्राईवर ना हो, तो गाड़ी ले जाती हूँ. बस पहले की तरह फालतू में गाड़ी ले जाना बन्द कर दिया. पापा से पॉकेट–मनी की जगह सैलरी लेती हूँ और उस सैलरी से अपना खर्च चलाती हूँ. जब मैं अपनी कमाई पर गाड़ी मैनेज करने लायक हो जाऊँगी, फिर ले लूँगी गाड़ी.”

सुदर्शन—“चलो, अच्छी बात हैं. और तुम्हारे ऑफ़िस में स्टाफ के लोग तुम्हें क्या कहते हैं ? सिर्फ कृतिका या कृतिका मैडम ?”

कृतिका—“दोनों.”

सुदर्शन—“एक महिना हो गया, तुम्हें जॉब करते हुए ?”

कृतिका—“नहीं, पिछले महिने पन्द्रह से ही जॉइन किया था.”

सुदर्शन—“तो कौनसी जॉब ज्यादा अच्छी लगी ? सेठ जी के पास या तुम्हारे पापा के पास ?”

कृतिका—“हम्म…जॉब के हिसाब से सोचा जाए, तो पापा के पास ज्यादा सही हैं. वैसे जय अंकल के पास ज्यादा अच्छा लगता था.”

सुदर्शन—“हम्म…अभी नई–नई हो ना वहाँ. धिरे–धिरे वहाँ भी मन लग जाएगा.”

कृतिका—“अरे, मन तो लग गया. लेकिन वहाँ पापा और एक–दो लोगों के सिवा कोई मेरे काम पर ध्यान ही नहीं देता.”

सुदर्शन—“कोई बात नहीं, जो लोग ध्यान देते हैं, उनसे हेल्प ले लिया करो.”

कृतिका—“फिर भी यार, थोड़ा अजीब सा लगता हैं. मैं तो यहाँ जय अंकल के पास ही जॉब करना चाहती थी. लेकिन जय अंकल ने कहा, जब तुम्हारे पापा का इतना बड़ा बिजनेस हैं, तो हमारे पास जॉब क्यों कर रही हैं ? पहले तो मैनें बोल दिया, वहाँ कोई मेरे काम पर ध्यान नहीं देगा, बस पापा के कारण सब तारीफ करेंगे और मेरी हाँ में हाँ मिलाएँगें. लेकिन पिछले महिने जब पापा की तबीयत खराब हुई, तो जय अंकल और सुजाता अंटी ने कहा, तुम्हारे होते हुए इस उम्र में तुम्हारे पापा अकैले सारा बिजनेस संभालते हैं, ये अच्छा नहीं लगता. अगर तुम अभी उनका बिजनेस जॉइन नहीं करना चाहती, तो उनके पास जॉब कर लो. पॉकेट मनी लेना तो तुमने पहले ही बन्द कर दिया हैं. जो सैलरी हम तुम्हें देते हैं, वहीं सैलरी अपने पापा से ले लेना. इस तरह तुम सेल्फ डिपेन्ड भी रहोगी और अपने पापा की मदद भी कर दोगी. दूसरी जगह नौकरी करने से कोई ज्यादा आत्मनिर्भरता थोड़े ही आ जाती हैं, वो तो इन्सान पर निर्भर करता हैं. और फिर आगे चलकर तुम्हें अपने पापा का बिजनेस ही तो संभालना हैं. तुम वहाँ जॉब करोगी तो अनुभव मिलेगा. हमारा तो ज्वैलरी का बिजनेस हैं. हमारे पास जॉब करोगी तो बाद में तुम्हारे पापा का बिजनेस जॉइन करने के लिए तुम्हें शुरू से दुबारा मेहनत करनी पड़ेगी. इसलिए अपने पापा के पास जॉब करो और उनका सहारा बनो. तुम काबिल लड़की हो, अपनी काबिलियत का इस्तेमाल करो.”

सुदर्शन—“सेठ जी और सुजाता मैडम की बातें तो बिल्कुल सही हैं. और अब तो तुम्हारी अपने मम्मी–पापा के साथ चल रही सारी प्रोब्लम भी खतम हो गई. इसलिए तुम्हें भी अपना फर्ज निभाना चाहिए.”

कृतिका—“हाँ, इसलिए तो मैनें जय अंकल और सुजाता अंटी की बात मानकर पापा के साथ ऑफ़िस जाना शुरू कर दिया.”

सुदर्शन—“ये भी सही हैं. वैसे तुम खुश हो ना, अब अपनी जिन्दगी में ?”

कृतिका—“खुश ! मैं तो बहुत खुश हूँ. अब तो मेरे मम्मी–पापा मेरा इतना ख्याल रखते हैं, बस पूछो मत. उनका प्यार देखकर मुझे बहुत अफ़सोस होता हैं. काशः मैं पहले ही सुधर जाती.”

सुदर्शन—“अफ़सोस क्यों करती हो ? जब सब कुछ ठीक हो गया हैं, तो खुश रहो और अपने मम्मी–पापा को भी खुश रखो.”

कृतिका—“हाँ, और सब कुछ ठीक जय अंकल, सुजाता जी और तुम्हारे कारण हुआ.”

सुदर्शन—“मैनें क्या किया ? मैनें तो बस उस लड़के के बारे में फेसबुक पर पोस्ट करने के लिए कहा था. सब कुछ किया तो तुमने ही हैं और फिर सेठ जी और मैडम ने तुम्हारे घर की प्रोब्लम सुलझा दी, तुम्हारे मम्मी–पापा को समझाकर.”

कृतिका—“हाँ, जय अंकल और सुजाता अंटी का ये एहसास तो मैं कभी नहीं भूलूगीं. लेकिन मेरे बारे में उनको सब बताया तो तुमने ही था ना.”

सुदर्शन—“बताने से क्या होता हैं ? वो बहुत अच्छे और भले लोग हैं. उन्होंने ने तो बहुत लोगों का भला करके लोगों की दुःख भरी जिन्दगी में खुशियाँ भरी हैं.”

कृतिका—“हाँ, इसीलिए तो वो लोग भी बहुत सुखी हैं.”

सुदर्शन—“हाँ, लेकिन बहुत से लोगों ने उनकी अच्छाई का गलत फायदा भी उठाया हैं. कई लोग दुःखी और परेशान होने का नाटक करके उनके पैसे लेकर भाग गए. फिर भी उन्होंने अच्छाई का रास्ता नहीं छोड़ा, ये बड़ी बात हैं.”

कृतिका—“अच्छे लोगों की यहीं तो पहचान हैं. वो बुरा होने पर भी नहीं बदलते.”

सुदर्शन—“हाँ, ये तो हैं. वैसे तुमने अपने मॉम–डेड को मम्मी–पापा कहना कैसे शुरू कर दिया ?”

कृतिका हँसकर बोली—“बस ऐसे ही. जब मैं कॉलेज में आई, तो मेरे सब फ्रैंड्स अपने मम्मी–पापा को मॉम–डेड कहते थे, वहीं से मुझे भी आदत पड़ गई. अब तुम, सृष्टी, अँकुश, संयम, आलोक सब अपने मम्मी–पापा को मम्मी–पापा बोलते हो, तो मेरी भी यहीं आदत हो गई.”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“ये भी सही हैं.”

कृतिका—“अच्छा एक बात बताओ. ये सुजाता अंटी जयसिंह अंकल से दो–तीन साल बड़ी हैं क्या ?”

सुदर्शन ने हँसकर कहा—“दो–तीन साल नहीं, सुजाता मैडम चार साल और तीन महिने बड़ी हैं सेठ जी से. सुजाता मैडम का जन्मदिन छब्बीस(26) अप्रेल को आता हैं और सेठ जी का जन्मदिन पच्चीस(25) जुलाई को आता हैं.”

कृतिका—“ओह………”

सुदर्शन—“क्या हुआ ?”

कृतिका—“कुछ नहीं, आमतौर पर पति की उम्र पत्नी से ज्यादा होती हैं ना, इसलिए पूछा.”

सुदर्शन—“हाँ, लेकिन इनकी लव–मैरिज हुई थी. और इनकी लव–स्टोरी भी बहुत अनोखी हैं.”

कृतिका—“तुम्हें पता हैं, उनकी लव–स्टोरी ?”

सुदर्शन—“हाँ.”

कृतिका—“तो मुझे भी बताओ ना.”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“उनके घर जाकर सुजाता मैडम या सेठ जी से पूछ लेना.”

कृतिका—“नहीं, उनसे पूछने में मुझे अजीब लगेगा. तुम बताओ ना.”

सुदर्शन ने हँसकर कहा—“अच्छा, ठीक हैं. बताता हूँ. सेठ जी का पुराना घर हैं ना, जहाँ अब सेठ जी के छोटे भाई रहते हैं.”

कृतिका—“हाँ.”

सुदर्शन—“उसी गली में सेठ जी के घर से चार–पाँच घर छोड़कर सुजाता मैडम की बुआ का घर हैं. मैडम की बुआ तो अब दुनिया से चली गई. बुआ के दो बेटे हैं. एक तो मैडम दो–तीन साल छोटे हैं, दूसरे छः या सात साल छोटे हैं.”

कृतिका—“हम्म…”

सुदर्शन—“सुजाता मैडम बचपन से, छोटी थी तब से ही, साल में कई बार अपनी बुआ के घर आया करती थी. बुआ के घर आती थी, तो बुआ के बच्चों के साथ खेलती भी थी, बुआ के बच्चों के साथ बाहर गली में जाकर दूसरे बच्चों के साथ भी खेलती थी.”

कृतिका—“फिर जय अंकल कैसे मिले, सुजाता जी से ?”

सुदर्शन—“फिर सेठ जी जब चार–पाँच साल के हुए तो वो भी घर से बाहर गली में आने लगे, खेलने के लिए. सेठ जी की सुजाता मैडम के भाईयों के साथ दोस्ती हो गई. फिर जब मैडम बुआ के घर आती थी, तब सेठ जी भी मैडम के साथ खेलते थे. इस तरह खेल–खेल में खेलते–खेलते सेठ जी और सुजाता मैडम की दोस्ती हुई.”

कृतिका—“हम्म………ऐसे तो बचपन में बहुत सारे बच्चों की दोस्ती होती हैं.”

सुदर्शन—“हाँ, उस टाइम सेठ जी पाँच–सात(5–7) साल के थे और सुजाता मैडम आठ–दस(8–10) साल की थी. दोस्ती होने के बाद सेठ जी मैडम का इंतजार करते थे, कब सुजाता बुआ से मिलने आए और उसके साथ खेलूँ ? उधर अपने शहर में सुजाता मैडम भी इंतजार करती थी, कब बुआ के घर जाऊँ और जय के साथ खेलूँ ?”

कृतिका ने मुस्कुराकर कहा—“हम्म………फिर आगे क्या हुआ ?”

सुदर्शन—“फिर पढ़ाई–लिखाई के चक्कर में सुजाता मैडम का बुआ के घर आना कम हो गया. पहले मैडम हर महिने दो–चार दिन के लिए आती थी, फिर दो–तीन महिने में एक–दो बार दो–चार दिन या पाँच–सात दिन के लिए आने लगी. धिरे–धिरे वक्त गुजारता रहा और पन्द्रह–सोलह(15–16) साल की उम्र होने के बाद सुजाता मैडम का बाहर गली में खेलना–कूदना कम हो गया. लेकिन सेठ जी अभी ग्यारह–बारह(11–12) साल के बच्चे थे, उनको जैसे ही पता चलता सुजाता आई हैं, वो मैडम की बुआ के घर पहुँच जाते और सुजाता मैडम को अपने साथ खेलने के लिए कहते. सुजाता मैडम मना कर देती.”

कृतिका—“फिर ?”

सुदर्शन—“फिर सेठ जी मैडम को बताते, मैनें तुम्हें कितना याद किया ? फिर सुजाता मैडम से पूछते, तुम्हें मेरी याद नहीं आती क्या ? तुमने यहाँ आना कम क्यों कर दिया ? दोनों में इस तरह की बातें होती.”

कृतिका—“फिर सुजाता जी क्या कहती थी ?”

सुदर्शन—“कहना क्या हैं ? सुजाता मैडम को अपने बचपन के दोस्त सेठ जी की बातें बहुत अच्छी लगती. फिर सुजाता मैडम सेठ जी को समझाती, अब मैं बड़ी हो गई हूँ. अब ऐसे गली में, मिट्टी में खेलना अच्छा नहीं लगता. फिर सेठ जी कहते, लेकिन मेरा तो तुम्हारे साथ खेलने का बहुत मन करता हैं. मुझे तो तुम्हारी और मेरी सारी बातें याद हैं. बचपन में खेलते–खेलते हर रोज अपनी लड़ाई होती थी, तुम मुझे पीट देती थी, मैं रोने लगता था, फिर तुम पहले हँसकर मेरा मजाक उड़ाती थी, फिर मुझे मनाती थी, फिर हम साथ–साथ खेलते थे.”

कृतिका ने हँसकर कहा—“सुजाता अंटी, जय अंकल को पीटती थी.”

सुदर्शन—“हाँ.”

कृतिका—“तुम्हें कैसे पता ?”

सुदर्शन—“अक्सर बताते रहते हैं. बहुत बार मैं उनके पास बैठा होता हूँ, तब वो आपस में एक–दूसरे के साथ अपने बचपन की बातें करते हैं. इस तरह मुझे भी पता चल जाता हैं.”

कृतिका—“हम्म…फिर सुजाता जी कुछ नहीं कहती थी ?”

सुदर्शन—“फिर अब सुजाता मैडम बचपन की तरह गली में जाकर मिट्टी में खेल तो सकती नहीं थी. पहले की तरह हर महिने बुआ के घर भी नहीं आ सकती थी. लेकिन सेठ जी की बातें सुनकर मैडम को भी बचपन की सारी बातें याद आती और घर जाने के बाद सुजाता मैडम को सेठ जी बहुत याद आते. इसलिए सुजाता मैडम ने बातचीत का एक तरीका निकाला, ताकि सेठ जी के साथ उनकी दोस्ती चलती रहे.”

कृतिका—“क्या तरीका निकाला ?”

सुदर्शन—“लैटर. खत. चिट्ठी.”

कृतिका—“ओह………कबूतर जा–जा, पहले प्यार की पहली चिट्ठी साजन को दे आ.”

सुदर्शन ने हँसकर कहा—“हाँ, उस वक्त अब की तरह मोबाइल वगैरह तो थे नहीं. इसलिए सुजाता मैडम ने सेठ जी को चिट्ठी लिखना और वो डाक टिकट लगाकर पोस्ट करना, लाल रंग के डिब्बे में खत डालना. जो भी तरीका हैं, खत भेजने का. वो सब सीखा दिया. फिर सेठ जी और सुजाता मैडम एक–दूसरे को चिट्ठियाँ लिखने लगे. सेठ जी और सुजाता मैडम दोनों एक–दूसरे के खतों को छुपाकर नहीं रखते थे. घर में चिट्ठी के बारे में कोई पूछता था, तो घरवालों को चिट्ठी दिखा देते थे. घरवाले चिट्ठी पढ़ते थे, तो चिट्ठियों में वहीं बचपन वाली हँसी–मजाक और खेलकूद की बातें होती थी. दोनों एक–दूसरे की पढ़ाई–लिखाई के बारे में पूछ लेते थे, एक–दूसरे का हाल–चाल पूछ लेते थे, एक–दूसरे के घरवालों का हाल–चाल पूछ लेते थे. चिट्ठियों में ये साधारण बातें पढ़कर सेठ जी और सुजाता मैडम के घरवालों ने सोचा, दोनों बचपन में साथ खेलते थे, बचपन की बातें याद तो आती ही हैं. फिर जयसिंह तो अभी बच्चा हैं, बच्चों को अपने साथ खेलने वालों से लगाव होता ही हैं. इसलिए खतों के जरिये बातें करते हैं. इस तरह की बातें सोचकर दोनों के घरवालों ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया और कोई रोक–टोक नहीं लगाई. इस तरह चिट्ठियों में बातें करते–करते सेठ जी और सुजाता मैडम की दोस्ती मजबुत होती चली गई.”

कृतिका—“फिर अंकल जब बड़े हुए, तब भी किसी ने कुछ नहीं कहा ?”

सुदर्शन—“नहीं, साधारण बातें लिखते थे. कोई प्यार–मोहब्बत वाली बात तो लिखते नहीं थे. इसलिए किसी ने कुछ नहीं कहा. दो–चार महिनों से जब सुजाता मैडम अपनी बुआ के घर आती थी, तो दोनों की मुलाकात हो जाती थी. दोनों की चिट्ठियाँ पढ़ने के कारण सबको मालूम था, दोनों के मन में एक–दूसरे के लिए कुछ गलत नहीं हैं. इसलिए किसी ने मिलने–जुलने से भी नहीं रोका.”

कृतिका—“अच्छा, फिर ?”

सुदर्शन—“फिर जब सुजाता मैडम की उम्र अठारह–उन्नीस(18–19) साल की हुई, तो मैडम के घरवाले मैडम के लिए लड़का देखने लगे. उस टाइम तक सेठ जी चोदह–पन्द्रह(14–15) साल के हो गए थे. सुजाता मैडम अपनी बुआ के घर आकर जब सेठ जी से मिली, तो बातों–बातों में सुजाता मैडम ने सेठ जी से कहा, मेरे घरवाले मेरे लिए लड़का देख रहे हैं. जैसे ही उनको मेरे लिए कोई अच्छा लड़का पसन्द आया, फिर उसके साथ मेरी शादी हो जाएँगी और शादी के बाद हमारी बातचीत बन्द.”

कृतिका—“फिर अंकल ने क्या कहा ?”

सुदर्शन—“सेठ जी ने कुछ नहीं कहा. बस सुजाता मैडम की शादी के बाद सुजाता मैडम के साथ बातचीत बन्द होने वाली बात सुनकर सेठ जी उदास हो गए. फिर यहाँ से शुरुआत हुई, सेठ जी और मैडम के प्यार की.”

कृतिका—“कैसे ?”

सुदर्शन—“सुनती जाओ, पता चल जाएँगा. सुजाता मैडम दो–तीन दिन बाद जब बुआ के घर से वापस अपने शहर में अपने घर जाने से पहले सेठ जी से मिलने आई, तो सेठ जी ने मैडम से कहा, तुम मुझसे शादी कर लो. फिर हमारी बातचीत कभी बन्द नहीं होगी.”

कृतिका हँसकर बोली—“अरे वाह………फिर सुजाता जी ने क्या कहा ?”

सुदर्शन—“सुजाता मैडम भी तुम्हारी तरह हँसकर बोली, तुम अभी बहुत छोटे हो और शादी में लड़की की उम्र कम और लड़के की उम्र ज्यादा होनी चाहिए. अगर तुम उम्र में मेरे बराबर होते या मुझसे बड़े होते, तो फिर मैं तुमसे शादी जरूर कर लेती.”

कृतिका—“ओह…फिर क्या हुआ ?”

सुदर्शन—“होना क्या था ? सेठ जी फिर से मायूस हो गए. सुजाता मैडम अपने शहर वापस चली गई. सेठ जी मन में सोचने लगे, काश, मैं उम्र में सुजाता से बड़ा होता. ये सुजाता मुझसे पहले क्यों पैदा हो गई ? अगर सुजाता मेरे दुनिया में आने के बाद दुनिया में आती, तो मैं सुजाता से शादी करके हमेशा सुजाता के साथ रह पाता.”

कृतिका—“फिर ?”

सुदर्शन—“फिर कुछ दिन परेशान और उदास रहने के बाद सेठ जी ने यहाँ–वहाँ, इधर–उधर, छोटे–बड़े, कुँवारे–शादीशुदा, नारी–पुरुष, अपने आस–पास के बहुत से लोगों से पूछा, कि शादी में लड़के की उम्र लड़की से ज्यादा होना जरूरी हैं क्या ? और अगर जरूरी हैं, तो क्यों जरूरी हैं ? अगर शादी में पत्नी उम्र में पति से बड़ी हो, तो क्या प्रोब्लम होती हैं ? बहुत से लोगों से इस तरह के सवाल–जवाब करने के बाद भी किसी से सेठ जी को कोई सही और जायज जवाब नहीं मिला.”

कृतिका—“फिर ?”

सुदर्शन—“फिर सेठ जी ने शादी में पति बड़ा और पत्नी छोटी क्यों होती हैं ? इसके बारे में पढ़ा. आखिर में सबसे पूछने और सब पढ़ने के बाद परिणाम ये निकला, कि प्रोब्लम तो कुछ भी नहीं हैं, बस लोगों ने ही अपनी मनमर्जी से ये नियम बनाया हैं.”

कृतिका—“फिर क्या किया, अंकल ने ?”

सुदर्शन—“फिर सेठ जी ने यहीं बातें सुजाना मैडम को समझाना शुरू किया. सारी बातें सोच–समझकर चार–छः महिने बाद सुजाता मैडम सेठ जी की बातों से सहमत हो गई. सेठ जी की बातों से सहमत होने के बाद सुजाता मैडम ने कहा, तुम्हारी बातें बिल्कुल सही हैं. लेकिन फिर भी हमारी शादी नहीं हो सकती. क्योंकि तुम अभी सिर्फ सोलह(16) साल के हो. जब तक तुम शादी के लायक होओगे, तब तक तो मेरी शादी हो चुकी होगी.”

कृतिका—“फिर अंकल ने क्या कहा ?”

सुदर्शन—“फिर सेठ जी की आँखों में आँशू आ गए और सेठ जी ने रोते–रोते कहा, मैं समझ गया. तुम मुझसे शादी करना ही नहीं चाहती. मैं तुमसे शादी करने के लिए इतनी कोशिश कर रहा हूँ और तुम हर बार मुझे बहला–फूसलाकर मना कर देती हो. तुम अपने घरवालों को बोल नहीं सकती, कि तुम मुझसे शादी करना चाहती हो ? जब मैं इक्कीस साल का हो जाऊँगा, फिर कर लेगें शादी.”

कृतिका—“फिर ?”

सुदर्शन—“फिर इस बात पर सुजाता मैडम और सेठ जी में बहुत बार झगड़े हुए. लेकिन झगड़ते–झगड़ते आखिर में सुजाता मैडम को भी सेठ जी से प्यार हो ही गया. फिर सेठ जी सुजाता मैडम के दिल पर छा गए. सुजाता मैडम भी सेठ की दीवानी हो गई और दोनों एक–दूसरे के प्यार में पागल हो गए.”

कृतिका—“फिर क्या हुआ ?”

सुदर्शन—“फिर सुजाता मैडम ने कहा, जब तक तुम इक्कीस साल के नहीं हो जाते, मैं कोई ना कोई बहाना बनाकर अपनी शादी टालती रहूँगी. लेकिन तुम अपने वादे से पलट मत जाना. सेठ जी ने कहा, तुम्हारी कसम ! मैं इक्कीस साल का होते ही तुमसे शादी कर लूँगा. तुम्हारे सिवा किसी ओर से शादी के बारे में सोचूँगा भी नहीं. इस तरह सेठ जी और सुजाता मैडम ने प्यार के वादे कर लिए, प्यार की कसमें खा ली. इसके बाद सुजाता मैडम के लिए जब भी कोई रिश्ता आता, तो मैडम कोई ना कोई बहाना बनाकर शादी से मना कर देती. लेकिन सुजाता मैडम जब बाईस–तैईस(22–23) साल की हुई, तो एक लड़का मैडम के घरवालों को इतना पसन्द आया, कि सुजाता मैडम के घरवालों ने मैडम के मना करने के बाद भी सुजाता मैडम का रिश्ता कर दिया.”

कृतिका—“ओह………फिर ?”

सुदर्शन—“फिर सुजाता मैडम ने सेठ जी से कहा, मुझे माफ़ कर दो. मैनें बहुत कोशिश की, लेकिन मेरे घरवालों ने जबरदस्ती रिश्ता कर दिया. सेठ जी ने बेवफाई के इल्जाम लगाकर कहा, मुझे तो पहले ही पता था, तुम्हें मुझसे शादी करनी ही नहीं हैं. सुजाता मैडम ने कहा, अब तुम चाहे जो मरजी इल्जाम लगाओ. लेकिन मैं मजबूर हूँ.”

कृतिका—“फिर ?”

सुदर्शन—“फिर सेठ जी सबकी परवाह छोड़कर सीधे सुजाता मैडम के घर चले गए और मैडम के घरवालों को सब सच–सच बता दिया, कि सुजाता और मैं एक–दूसरे से बहुत प्यार करते हैं. एक–दूसरे के बिना नहीं रह सकते. एक–दूसरे से शादी करना चाहते हैं. लेकिन मेरी उम्र कम हैं, इसलिए दो–ढ़ाई साल रूक जाओ.”

कृतिका—“अरे वाह………मतलब जय अंकल शुरू से ही बहुत हिम्मत वाले हैं.”

सुदर्शन—“वो तो हैं. और सुजाता मैडम भी कम नहीं हैं. वो भी शुरू से ही ऐसी हैं.”

कृतिका—“हम्म………फिर ?”

सुदर्शन—“फिर सुजाता मैडम के घरवालों ने पहले तो सेठ जी का मजाक उड़ाया. फिर सुजाता मैडम ने भी सेठ जी का पूरा साथ दिया और कहा, जय सच बोल रहा हैं.”

कृतिका—“फिर क्या हुआ ?”

सुदर्शन—“फिर जब सेठ जी नहीं माने, तो सुजाता मैडम के घरवालों ने सेठ जी को थप्पड़ मारकर धक्के देकर भगा दिया और सुजाता मैडम ने सेठ जी को बचाने की कोशिश की, तो उनको भी थप्पड़ मारे. सेठ जी ने फिल्मी स्टाइल में कहा, सुजाता, हम हार नहीं मानेगे.”

कृतिका—“फिर क्या किया, अंकल ने ?”

सुदर्शन—“फिर सेठ जी ने उँगली टेढ़ी करके घी निकालने की सोची. सेठ जी ने उस लड़के का पता लगाया, जिसके साथ सुजाता मैडम का रिश्ता पक्का हुआ था. पता लगाकर सेठ जी पहुँच गए उस लड़के के शहर. और वहाँ जाकर उस लड़के की पूरी रिश्तेदारी में ये खबर फैला दी, सुजाता का जयसिंह नाम के लड़के के साथ चक्कर चल रहा हैं. लड़के वालों तक जब खबर पहुँची, तो उन्होंने सुजाता मैडम के साथ अपने लड़के की शादी करने से मना कर दिया.”

कृतिका—“फिर सुजाता जी के घरवाले मान गए, अंकल से सुजाता अंटी की शादी के लिए ?”

सुदर्शन—“अभी कहाँ ? अभी तो और भी प्रोब्लम हुई थी. उस लड़के के घरवालों ने तो सुजाता मैडम को बहू बनाने से मना कर दिया, लेकिन सुजाता मैडम को तो तुमने देखा ही हैं. सुजाता मैडम अभी पचास(50) साल की उम्र में भी कितनी खूबसूरत हैं, तो उस टाइम तैईस(23) साल की उम्र में तो और भी अच्छी लगती होगी. तो सुजाता मैडम की खूबसूरती देखकर वो लड़का मैडम पर लट्टू हो गया था. उसने अपने घरवालों से कहा, एक बार इस सुजाता से मेरी शादी करवा दो और दो–चार महिने इसके साथ रहने दो. फिर चाहे तलाक करवा देना.”

कृतिका—“उफ्फ………वो तो बहुत ही घटिया और गन्दा लड़का था. अच्छा हुआ, सुजाता अंटी की उससे शादी नहीं हुई.”

सुदर्शन—“हाँ, उस लड़के की ये बात किसी तरह सेठ जी को मालूम हो गई. फिर सेठ अपने चार–पाँच दोस्तों को लेकर गए और पीट–पीटकर उसकी हड्डी–पसली एक कर आए. फिर उस लड़के के घरवालों ने सोचा, इस सुजाता ने शादी किये बिना ये हाल करवा दिया. शादी के बाद पता नहीं क्या–क्या करेगी ? और अपने लड़के को सुजाता मैडम और सुजाता मैडम के घरवालों से पूरी तरह दूर कर लिया.”

कृतिका—“बहुत अच्छा किया उस लड़के के साथ, अंकल ने.”

सुदर्शन—“हाँ, वो इसी लायक था. फिर ये सब होने के बाद जब सेठ जी और सुजाता मैडम की मुलाकात हुई, तो सेठ जी ने सुजाता मैडम से कहा, मुझे माफ़ कर देना. तुम्हारी बदनामी तो बहुत हुई हैं. लेकिन दूसरा कोई रास्ता नहीं था. सुजाता मैडम ने कहा, माफ़ी मत माँगो. तुम्हारे लिए मैं कुछ भी सहन कर सकती हूँ.”

कृतिका—“फिर इसके बाद क्या हुआ ?”

सुदर्शन—“फिर सेठ जी ने धिरे–धिरे सुजाता मैडम के सारे रिश्तेदारों में ये बात फैला दी, कि सुजाता का जयसिंह के साथ चक्कर चल रहा हैं. इसलिए सुजाता मैडम के घरवालों को सुजाता मैडम के लिए कोई लड़का नहीं मिल रहा था. जैसे–तैसे किसी तरह कोई लड़का मिलता, तो सेठ जी वहाँ पहुँचकर किसी ना किसी तरीके से अपने और सुजाता मैडम के चक्कर की बातें फैला देते. इस तरह सुजाता मैडम के घरवाले सुजाता मैडम की शादी नहीं कर पा रहे थे.”

कृतिका—“फिर अंकल ने सुजाता जी के घरवालों को कैसे मनाया ?”

सुदर्शन—“सुजाता मैडम के घरवालों को मनाने से पहले सेठ जी के घरवालों ने सेठ जी के लिए बड़ी मुसीबत खड़ी कर दी. सुजाता मैडम की बुआ ने सेठ जी के घरवालों को बता दिया था, कि आपके लड़के को समझाओ, वो मेरी भतीजी की जिन्दगी खराब कर रहा हैं. एक–दो बार सुजाता मैडम के घरवाले भी सेठ जी के घरवालों से झगड़ा करके गए. फिर सेठ जी के घरवालों ने सेठ जी को समझाया, अभी तो तू छोटा हैं. अभी तो तेरी शादी की उम्र ही नहीं हुई. वो लड़की तेरे से बड़ी हैं. अपने से बड़ी उम्र की लड़की का चक्कर छोड़. जवाँनी के जोश में दुनिया से अलग चलने की कोई जरूरत नहीं हैं. सेठ जी ने पहले प्यार से अपने घरवालों को समझाने की कोशिश की. लेकिन सेठ जी के घरवाले नहीं माने. फिर सेठ जी ने साफ़–साफ़ बोल दिया, शादी तो सिर्फ सुजाता से ही करूँगा, मैं सुजाता के इलावा किसी और को अपनी पत्नी कभी नहीं मानूँगा.”

कृतिका—“फिर ?”

सुदर्शन—“फिर सेठ जी के घरवालों ने सोचा, इस उम्र में प्यार का भूत चढ़ता ही हैं. इससे पहले कि जयसिंह प्यार के चक्कर में कुछ उल्टा–सीधा करें, जयसिंह की शादी कर देते हैं. शादी के बाद प्यार का भूत अपने आप उतर जाएँगा.”

कृतिका—“फिर ?”

सुदर्शन—“फिर सेठ जी के घरवालों ने सेठ जी के बहुत मना करने के बाद भी सेठ जी का रिश्ता कर दिया. सेठ जी ने अपने घरवालों से कहा, अभी तो मैं बीस साल का ही हूँ. जब मैनें सुजाता से शादी करने का कहा, तब तो बोल रहे थे, अभी तेरी शादी की उम्र ही नहीं हैं. लेकिन सेठ जी के घरवालों ने सेठ जी की एक नहीं सुनी. बस जल्दी से जल्दी सेठ जी की शादी करने में लग गए.”

कृतिका—“फिर अंकल ने अपनी शादी कैसे रोकी ?”

सुदर्शन—“नहीं रोक पाए शादी.”

कृतिका—“मतलब, अंकल ने किसी और से शादी कर ली ?”

सुदर्शन—“हाँ, सेठ जी ने शादी से पहले अपने ससुराल वालों को सब सच–सच बता दिया, कि मैं किसी और से प्यार करता हूँ और उसी से शादी करना चाहता हूँ. आप लोग अपनी बेटी की शादी मेरे साथ मत करो. लेकिन सेठ जी के ससुराल वालों ने भी सेठ के प्यार को बचपना और नादानी समझकर जवाँनी का जोश समझ लिया और सेठ जी की धन–दौलत देखकर सब कुछ जानते हुए भी अपनी बेटी की शादी सेठ जी के साथ कर दी. सेठ जी के ससुराल वालों ने सोचा, एक बार शादी हो जाए, शादी के बाद सब भूल जाएँगा. अब लड़कों को इस उम्र में कोई ना कोई लड़की तो पसन्द आ ही जाती हैं. इस एक बात के लिए इतना अच्छा लड़का हाथ से क्यों जाने दें ?”

कृतिका—“ओह………फिर क्या हुआ ?”

सुदर्शन—“फिर सेठ जी की शादी होने के बाद सुजाता मैडम की बुआ और सुजाता मैडम के घरवालों ने सुजाता मैडम से कहा, देख, जिसके लिए तू पागल हो रही हैं, उसने तो शादी कर भी ली. तू बैठी रह उसके इंतजार में कुँवारी.”

कृतिका—“फिर सुजाता जी ने क्या कहा ?”

सुदर्शन—“सुजाता मैडम ने अपने घरवालों से कुछ नहीं कहा. जब सेठ जी शादी के बाद सुजाता मैडम से मिलने उनके शहर गए, तब सुजाता मैडम बहुत दुःखी होकर सेठ जी से बहुत नाराज हुई और सेठ जी को बोली, झूठे, मक्कार, धोखेबाज, बेवफा. मैं तेरे प्यार में इतनी तकलीफ सहन कर रही हूँ. हर रोज अपने घरवालों से ताने सुनती हूँ. तुम्हारे कारण बदनाम होकर अपने घरवालों की पिटाई सहन करके भी तुमसे ही प्यार करती हूँ और तुमने किसी और से शादी कर ली. सेठ जी ने कहा, तुम चाहे जो मरजी कह लो. लेकिन मेरे प्यार पर शक मत करो. मैं दिल से अपनी पत्नी सिर्फ तुम्हें ही मानता हूँ. उस लड़की के साथ मेरी शादी जरूर हुई हैं, लेकिन मैं दिल से उसको अपनी पत्नी नहीं मानता. शादी को दो महिने हो गए, रोज उसके साथ सोता हूँ, लेकिन कभी उसको हाथ भी नहीं लगाया. सुजाता मैडम ने गुस्से में कहा, तो लगा लो ना. मुझे शादी के सपने दिखाकर शादी तो तुमने उससे ही की.”

कृतिका—“ओह…फिर अंकल ने कैसे समझाया सुजाता जी को ?”

सुदर्शन—“सेठ जी उस वक्त सुजाता मैडम को नहीं समझा पाएँ. सुजाता मैडम सेठ जी को बहुत सी बातें सुनाने के बाद नाराज होकर अपने घर चली गई और सेठ जी वापस अपने शहर आ गए. फिर सेठ जी की शादी होने के चार–पाँच महिने बाद सेठ जी की पत्नी ने अपने मायके जाकर अपने घरवालों से कहा, जब जयसिंह ने आप लोगों को शादी से पहले सारी बात सच–सच बताई थी, फिर भी आप लोगों ने उसके साथ मेरी शादी क्यों करवाई ? आप लोगों ने जयसिंह के साथ मेरी शादी तो करवा दी, लेकिन जयसिंह मुझे अपनी पत्नी मानता ही नहीं हैं. वो हर रात मेरे साथ सोता जरूर हैं, लेकिन शादी के बाद से अब तक जयसिंह ने कभी गलती से भी मेरी तरफ देखा तक नहीं.”

कृतिका—“फिर ?”

सुदर्शन—“फिर सेठ जी के ससुराल वालों ने कहा, ऐसे कैसे पत्नी नहीं मानता ? सारे समाज के सामने, सारे रीति–रिवाजों से शादी हुई हैं. कोई मजाक थोड़े ही हैं. हम ईंट से ईंट बजा देगें उनकी.”

कृतिका—“ओ माई गॉड, पहले सब कुछ जानने के बाद भी शादी कर दी और फिर कहते हैं, ईंट से ईंट बजा देगें.”

सुदर्शन—“हाँ, ऐसा भी होता हैं.”

कृतिका—“फिर क्या हुआ ?”

सुदर्शन—“फिर पहले तो सेठ जी के घरवालों और सेठ जी के ससुराल वालों के आपस में बहुत झगड़े हुए. सेठ जी ने कहा, भाड़ में जाओ, लड़ते रहो, मरते रहो, मुझे मतलब नहीं हैं. मैनें तो बहुत समझाया था, लेकिन आप लोग नहीं माने. अब भुगतो, मैं तो उसको अपनी पत्नी नहीं मानता. मेरे लिए तो वो पराई नारी हैं.”

कृतिका—“फिर क्या हुआ ?”

सुदर्शन—“फिर जब लड़ने–झगड़ने से कोई फायदा नहीं हुआ, तो सेठ जी के घरवालों और सेठ जी के ससुराल वालों ने मिलकर सेठ जी को समझाने का फैसला किया. सबने मिलकर सेठ जी को समझाया, कि शादी कोई खेल या मजाक नहीं हैं. इस लड़की के साथ तेरी शादी हो गई हैं. अब यहीं तेरी पत्नी हैं. इसलिए ये बचपना छोड़ और सही रास्ते पर आजा.”

कृतिका—“फिर अंकल ने क्या कहा ?”

सुदर्शन—“सेठ जी ने कहा, यहीं सारी बातें तो शादी से पहले मैं आप सबको समझा रहा था. कि शादी कोई खेल या मजाक नहीं हैं. मैं मन से किसी और को अपनी पत्नी मानता हूँ, इस लड़की के साथ मेरी शादी मत करो. लेकिन किसी ने भी मेरी एक नहीं सुनी. सब बोल रहे थे, जवाँनी का जोश हैं. एक बार जयसिंह की शादी हो जाए, फिर सब भूल जाएँगा. जिसके साथ मैं शादी करना चाहता हूँ, उसके लिए तो मेरी उम्र कम हैं और जिसके साथ मैं शादी नहीं करना चाहता, उसके साथ बीस साल की उम्र में ही फेरे करवा दिये.”

कृतिका—“फिर ?”

सुदर्शन—“फिर सबने मिलकर सेठ जी को थोड़ा और समझाया, कहाँ तू अपने से चार साल बड़ी लड़की के चक्कर में पड़ा हैं. जरा सोचकर देख, वो तेरे से पहले बुढ़ी हो जाएँगी. लोग तेरा मजाक उड़ाएँगें. इसलिए मुर्खता छोड़ और समझदारी से काम ले. ये लड़की तेरे से डेढ़–दो साल छोटी, तेरे बराबर की हैं. इसके साथ तेरी जोड़ी बहुत अच्छी हैं.”

कृतिका—“फिर अंकल ने क्या कहा ?”

सुदर्शन—“फिर सेठ जी ने आस–पास खड़े कुछ लोगों के उदाहरण देकर कहा, मजाक उड़ाने वाले तो किसी ना किसी तरीके से मजाक उड़ाते ही हैं. जब किसी बुढ़े आदमी को जवाँन पत्नी के साथ देखते हैं, तो बोलते हैं, इस नारी ने या तो किसी लालच में इस बुढ़े से शादी की हैं या फिर इस नारी में कोई कमी हैं, जिसके कारण इस नारी को कोई अपनी उम्र का पति नहीं मिला. जब किसी काले–कलूटे या साँवले आदमी को सुन्दर दिखने वाली गौरी पत्नी के साथ देखने हैं, तो बोलते हैं, पता नहीं, क्या देखकर इस सुन्दर नारी ने इस काले–कलूटे साँवले आदमी को पति बनाया. जब किसी गौरे रंग के सुन्दर आदमी को काली–कलूटी या साँवली पत्नी के साथ देखते हैं, तो बोलते हैं, इस आदमी में जरूर कोई ना कोई कमी हैं, इसलिए इतना सुन्दर होने के बाद भी इस काली–कलूटी या साँवली नारी को पत्नी बनाया. और रही बात सुजाता के मुझसे चार साल बड़ी होने की, तो वो सिर्फ चार साल बड़ी हैं. कोई चालीस–पचास साल की नारी नहीं हैं, जो वो जल्दी बुढ़ी हो जाएँगी और मैं जवाँन रह जाऊँगा. फिर ये बात तो जब लड़के अपने से चार–पाँच साल या आठ–दस साल छोटी लड़की से शादी करते हैं, तब भी लागू होनी चाहिए. जब पति उम्र में पत्नी से ज्यादा बड़ा होता हैं, तब वो भी तो पत्नी से पहले बुढ़ा हो जाता हैं. उस वक्त जवाँन और खूबसूरत दिखने वाली पत्नी को भी शर्म महसुस हो सकती हैं, एक बुढ़े को अपना पति कहते हुए.”

कृतिका—“हम्म………फिर अंकल की इस बात क्या जवाब दिया सबने ?”

सुदर्शन—“क्या जवाब देते ? वहीं घिसे–पिटे दकियानूसी जवाब. दुनिया क्या पागल हैं ? लोग क्या मुर्ख हैं, जो समाज के बनाए हुए नियमों के हिसाब से चल रहे हैं ?”

कृतिका—“हम्म…जब कोई जवाब नहीं होता, तो आखिर में यहीं बोला जाता हैं.”

सुदर्शन—“हाँ, या फिर बोलते हैं, धर्म की बात पर सवाल–जवाब करना पाप हैं, हराम हैं.”

कृतिका—“हम्म………फिर क्या हुआ ?”

सुदर्शन—“फिर सेठ जी के घरवालों और सेठ जी के ससुराल वालों के बहुत समझाने के बाद भी जब सेठ जी नहीं माने और खुदखुशी की धमकी देने लगे, तो सेठ जी के ससुराल वालों ने चार–पाँच महिने बाद सेठ जी से अपनी बेटी का तलाक करवा लिया.”

कृतिका—“फिर अंकल के घरवाले मान गए ?”

सुदर्शन—“नहीं, फिर सेठ जी के घरवाले सेठ जी की दूसरी शादी के बारे में सोचने लगे. सेठ जी ने गुस्से में आकर कहा, अब भी अक्ल नहीं आई. क्यों हमारी जिन्दगियाँ खराब करने पर तूले हो ? मैं सिर्फ सुजाता को अपनी पत्नी मानता हूँ और मैं उसके सिवा किसी और को अपनी पत्नी कभी नहीं मानूँगा. चाहे मेरी जितनी मरजी शादियाँ करवा दो.”

कृतिका—“फिर ?”

सुदर्शन—“फिर आखिरकार सेठ जी के घरवाले सेठ जी के प्यार के सामने झूक गए. फिर सेठ जी के घरवालों ने सुजाता मैडम के घरवालों से मिलकर सेठ जी और सुजाता मैडम की शादी की बात की. सुजाता मैडम के घरवालों ने चार–पाँच महिने तक नाटकबाजी की. फिर आखिर में सुजाता मैडम के घरवालों ने भी सेठ जी और सुजाता मैडम के प्यार के सामने हार मान ली. तब जाकर सेठ जी और सुजाता मैडम की शादी हुई.”

कृतिका—“उफ्फ………सुजाता अंटी उम्र में अंकल से चार साल बड़ी हैं. प्रोब्लम तो बस यहीं थी ना ?”

सुदर्शन—“हाँ, सुजाता मैडम उम्र में सेठ जी से बड़ी हैं. सिर्फ इसलिए सेठ जी और सुजाता मैडम को इतनी परेशानी और इतने दुःख झेलने पड़े.”

कृतिका—“हम्म…लेकिन खुशी की बात ये हैं, कि आखिर में जीत प्यार की हुई.”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“हाँ, वो तो हुई. सेठ जी ने सुजाता मैडम से कहा था, मैं इक्कीस साल का होते ही तुमसे शादी कर लूँगा और जब सेठ जी और सुजाता मैडम की शादी हुई, तब सेठ जी की उम्र इक्कीस(21) साल और सुजाता मैडम की उम्र पच्चीस(25) साल थी. इस तरह सेठ जी ने अपना वादा निभा दिया.”

कृतिका—“हम्म…लेकिन एक वादा टूट गया.”

सुदर्शन—“कौनसा ?”

कृतिका—“अंकल ने कहा था, वो सुजाता जी के सिवा किसी और से शादी नहीं करेगें. लेकिन अंकल के घरवालों ने जबरदस्ती उनकी शादी कर दी. तो अंकल का सुजाता जी के सिवा किसी और से शादी नहीं करने का वादा टूट गया ना.”

सुदर्शन—“वो शादी सिर्फ कहने के लिए शादी थी. जब सेठ जी ने उस लड़की को दिल से अपनी पत्नी माना ही नहीं. उसके साथ सो कर भी कभी उसको हाथ तक नहीं लगाया. तो फिर उस शादी का क्या मतलब ? अगर सेठ जी ने उस लड़की को पत्नी का दर्जा दे दिया होता, तो वो लड़की अपने मायके वालों से शिकायत नहीं करती. फिर ना तो सेठ जी के ससुराल वाले उस लड़की से सेठ जी का तलाक करवाते और ना ही फिर सेठ जी और सुजाता मैडम की शादी हो पाती. इस तरह सेठ जी ने उस लड़की से शादी होने के बाद भी उस लड़की को अपनी पत्नी नहीं माना, तभी तो सेठ जी और सुजाता मैडम की शादी हुई.”

कृतिका—“हम्म………ये तो हैं. अगर अंकल उसे पत्नी का दर्जा दे देते, तो वो जैसे–तैसे अंकल के साथ एडजस्ट कर लेती. लेकिन अंकल से अलग नहीं होती.”

सुदर्शन—“हाँ, दिल से तो सेठ जी ने सिर्फ एक सुजाता मैडम को ही अपनी पत्नी माना हैं और आज तक सिर्फ सुजाता मैडम के ही दीवाने हैं. अब सेठ जी छियालिस(46) साल हो गए हैं और सुजाता मैडम पचास(50) साल की हो गयी हैं. अगले महिने पच्चीस नवम्बर को उनकी शादी के पच्चीस साल पूरे हो जाएँगें.”

कृतिका—“ओह…ग्रेट ! इसे कहते हैं, सच्चा प्यार. शादी के इतने साल बाद भी दोनों एक–दूसरे के साथ बहुत खुश हैं. वरना ज्यादातर लोगों का प्यार तो शादी होने के कुछ साल बाद ही खतम हो जाता हैं.”

सुदर्शन ने हँसकर कहा—“अरे अब सेठ जी ना मोटे, ना पतले, एकदम तंदरुस्त. उस पर इतने स्मार्ट और हैंडसम हैं, क्लीन शेव होकर बिल्कुल हीरो की तरह चकाचक रहते हैं. सुजाता मैडम साड़ी पहने या सूट पहने, हर ड्रेस में बिल्कुल परी जैसी लगती हैं. अच्छी हेल्थ, कसावट भरा गोलमटोल सेहतमंद और तंदरुस्त शरीर. उनको देखकर लगता हैं, जैसे सुन्दरता की देवी हो, खूबसूरती का दूसरा नाम. तो प्यार कम कैसे हो ?”

कृतिका—“अरे नहीं, बहुत से आदमी पत्नी चाहे कितनी भी सुन्दर हो, फिर भी बाहर वाली महिलाओं के पीछे भागते हैं और ऐसी महिलाएँ भी होती हैं, जो पति चाहे कितना भी स्मार्ट और हैंडसम हो, फिर भी किसी दूसरे आदमी के साथ चक्कर चलाती हैं.”

सुदर्शन—“हम्म…ऐसा तो मैनें भी बहुत देखा हैं.”

कृतिका—“तभी तो ! जय अंकल और सुजाता अंटी का प्यार देखकर मैं तो उनकी जबरदस्त फैन हो गई हूँ.”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“हम्म…मैं तो हर मामले में उनका फैन हूँ.”

कृतिका ने मुस्कुराते हुए कहा—“कभी उनसे पूछना चाहिए, शादी के पच्चीस साल बाद भी इतना प्यार ? इसका राज तो बताओ ?”

सुदर्शन ने हँसकर कहा—“हाँ, तो जब उनके घर जाओ, तब पूछ लेना.”

कृतिका—“मुझे पिटना थोड़े ही हैं, जो उनसे पूछू.”

सुदर्शन—“लो, इसमें पिटने वाली क्या बात हैं ? मैं पूछ लूँगा.”

कृतिका—“वो नाराज नहीं होगे ?”

सुदर्शन—“नाराज क्यों होगें ?”

कृतिका—“तुम उनसे हैंसबेंड–वाईफ के रिलेशन के बारे में पूछोगें, उनका बुरा नहीं लगेगा क्या ?”

सुदर्शन—“दिल और दिमाग में गन्दगी नहीं होनी चाहिए. फिर सही और जायज बात पूछने पर कोई नाराज नहीं होता. मैं सेठ जी और सुजाता मैडम की अपने मम्मी–पापा की तरह इज्जत करता हूँ. इसलिए मैं उनके बारे में या उनके साथ ऐसी कोई बात नहीं करूँगा, जो मुझे नहीं करनी चाहिए.”

कृतिका—“तुम बुरा ना मानो तो एक बात पूछूँ ?”

सुदर्शन—“जरूर पूछो.”

कृतिका—“हम्म…तुम अपनी मम्मी पूछ लेते इस बारे में ?”

सुदर्शन—“अगर मेरी मम्मी की सोच–समझ सुजाता मैडम जैसी होती, तो जरूर पूछ लेता. लेकिन मेरी मम्मी अलग माहौल में पली–बढ़ी हैं, उनकी सोच अलग हैं. बाकि जो सही बात हैं और जो जायज बात हैं, उसके बारे में किसी से भी बात करने में कोई बुराई नहीं हैं. बस इतना ध्यान रखो, जिसके साथ हम बात कर रहे हैं, उसके दिल और दिमाग में गन्दगी नहीं होनी चाहिए. किसी से बात करने से पहले ये कन्फर्म करना बहुत जरूरी हैं.”

कृतिका—“ओके. लेकिन अपने मम्मी–पापा से इस बारे में बहुत कम लोग बात करते हैं.”

सुदर्शन—“यहीं तो सारी प्रोब्लम की जड़ हैं. सेठ जी और सुजाता मैडम ने यहीं बातें तो तुम्हारे मम्मी–पापा को समझाई हैं. जन्म के बाद बच्चा सबसे पहले अपने मम्मी–पापा के पास ही रहता हैं, इसलिए जिन्दगी की हर बात के बारे में बच्चों को मम्मी–पापा जितनी अच्छी तरह समझा सकते हैं, उतनी अच्छी तरह दूसरा कोई नहीं समझा सकता. बस दो बातों का ध्यान रखना बहुत जरूरी हैं. पहला तो ये कि हम खुद सही हो, वरना जो माँ–बाप खुद गलत रास्ते पर चल रहे हो, वो अपने बच्चों को गलत रास्ते पर जाने से रोके, तो बच्चे मन में कहेंगे, खुद तो सब कुछ कर रहे हैं और हमें रोक रहे हैं.”

कृतिका—“हाँ, ये तो होता ही हैं.”

सुदर्शन—“इसी तरह जो लड़का खुद लड़कियों के साथ रिलेशन बनाता हो, वो लड़का जब अपनी बहन को रोकेगा, तो बहन मुँह से बोलकर कहे या ना कहे, मन में यहीं सोचेगी, वाह भाई, खुद तो लड़कियाँ पटा–पटाकर सब कुछ कर रहा हैं और मुझे पटने से रोक रहा हैं.”

कृतिका ने हँसकर कहा—“मैं ऐसी कुछ लड़कियों को जानती भी हूँ.”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“ये तो नोर्मल बात हैं. ऐसा लड़कों में भी होता हैं. जो लड़की खुद लड़कों को बेवकूफ बनाती हो, वो लड़की अगर अपने भाई को बुरी लड़कियों से दूर रहने के लिए समझाएँ, तो भाई भी यहीं सोचेगा, वाह बहन, खुद तो लड़की होकर सब कुछ कर रही हैं और मैं लड़का हूँ, फिर भी मुझे रोक रही हैं.”

कृतिका—“हाँ.”

सुदर्शन—“इसलिए कोई भी बात कहने या समझाने के लिए सबसे पहले तो खुद का सही और अच्छा होना बहुत जरूरी हैं. वरना हमारी बात का असर नहीं होगा. इसके बाद कोई भी बात कहने या समझाने का तरीका सही होना भी बहुत जरूरी हैं. तुम्हारे मम्मी–पापा बहुत अच्छे हैं. उनकी बहुत इज्जत हैं. वो किसी भी तरह का कोई गलत काम नहीं करते. लेकिन उनका तुम्हें सही रास्ते पर चलाने का तरीका गलत था. कुछ माँ–बाप जरूरत से ज्यादा प्यार देकर बच्चों को बिगाड़ देते हैं. तुम्हारे मम्मी–पापा ने जरूरत से ज्यादा सख्ती करके तुम्हें बिगाड़ दिया.”

कृतिका—“नहीं, वो इतने सख्त भी नहीं थे. मैं ही शरारतें बहुत ज्यादा करती थी और फिर मैनें उनको परेशान और दुःखी भी बहुत किया हैं.”

सुदर्शन हैरान होकर बोला—“क्या बात हैं ? आज तो मम्मी–पापा को सही और खुद को गलत बताया जा रहा हैं.”

कृतिका—“अब यार, सच तो यहीं हैं. मैं खुद ही बहुत ज्यादा बिगड़ गई थी. फिर वो क्या करते ?”

सुदर्शन—“चलो, अब कौन कितना सही था और कौन कितना गलत ? इसका तोलमोल नहीं करना. लेकिन ये देखकर बहुत अच्छा लगा, अब तुम बहुत खुश हो और खुद की गलतियाँ देख रही हो. जब इन्सान खुद की गलतियाँ तलाश करना शुरू कर दें, तब वो दूसरी सबसे अच्छी आदत पकड़ लेता हैं.”

कृतिका—“और पहली सबसे अच्छी आदत कौनसी हैं ?”

सुदर्शन—“पहली मतलब सबसे ज्यादा अच्छी आदत हैं, खुद की बुराईयों को खतम करना शुरू कर देना. क्योंकि बहुत सारे लोगों को मालूम होता हैं, कि उनमें क्या बुराई हैं ? और वो उस बुराई का रोना तो रोते रहते हैं, लेकिन उस बुराई को खतम करने की कोशिश नहीं करते.”

कृतिका—“हम्म………लेकिन मैं अब अपनी एक–एक बुराई को जड़ से खतम कर दूँगी. ताकि मेरे कारण मेरे मम्मी–पापा को कहीं शर्मिन्दा ना होना पड़े.”

सुदर्शन ने तालियाँ बजाते हुए कहा—“आज तो तुम्हारी हर एक बात लाजवाब हैं.”

कृतिका हँसकर सुदर्शन के हाथ पकड़कर सुदर्शन को तालियाँ बजाने से रोककर बोली—“अब बस करो. मुझे ज्यादा हवा में मत उड़ाओ.”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“वैसे, तुम्हें खुश देखकर बहुत अच्छा लग रहा हैं.”

कृतिका—“लेकिन यार, एक प्रोब्लम हैं ?”

सुदर्शन—“अब क्या प्रोब्लम रह गई ?”

कृतिका—“मम्मी–पापा मेरी शादी को लेकर परेशान रहते हैं.”

सुदर्शन—“बच्चों के शादी के लायक होने के बाद सारे माँ–बाप अपने बच्चों की शादी के लिए परेशान रहते हैं. जब कोई अच्छा लड़का मिलेगा, तुम्हारी शादी भी हो जाएँगी.”

कृतिका—“प्रोब्लम तो यहीं हैं. मैं अब शादी करना नहीं चाहती.”

सुदर्शन—“क्यों ? अभी तक बॉयफ्रैंड दिल से गया नहीं क्या ?”

कृतिका—“अरे, वो तो कब का चला गया. अगर वो दिल से नहीं जाता, तो उसकी सारी करतूत फेसबुक पर पोस्ट थोड़े ही करती.”

सुदर्शन—“फिर शादी क्यों नहीं करना चाहती ?”

कृतिका—“बस ऐसे ही. अब शादी से विश्वास उठ गया हैं. और फिर शादी करना ही जिन्दगी का मकसद थोड़े ही हैं. अपने मम्मी–पापा के साथ जिन्दगी गुजार लूँगी. वैसे भी अब जाकर मुझे मम्मी–पापा का प्यार मिला हैं. शादी करके मैं उनसे दूर नहीं जाना चाहती.”

सुदर्शन—“हाँ, तो शादी के बाद उनको अपने साथ रख लेना. जिसके साथ शादी करो, उसको शादी से पहले बोल देना, कि शादी के बाद तुम्हारे मम्मी–पापा तुम्हारे साथ ही रहेंगे.”

कृतिका—“नहीं, यार. एक तो ऐसा लड़का और ऐसा ससुराल मिलेगा नहीं. दूसरा मेरे मम्मी–पापा भी बेटी की शादी के बाद बेटी के साथ रहने के लिए नहीं मानेंगे.”

सुदर्शन—“तुम्हारे मम्मी–पापा को तो सेठ जी और सुजाता मैडम समझा देगें. और लड़का भी मिल जाएँगा. बस तुम सारी बातें शादी से पहले क्लियर कर लेना.”

कृतिका हँसकर बोली—“तुम्हें मेरे बारे में सब पता हैं, फिर भी ऐसी बातें करते हो. पहली बात तो ये कि कोई अच्छा लड़का मुझसे शादी करेगा नहीं और अगर कोई अच्छा लड़का मुझ पर रहम खाकर दया करके मुझसे शादी के लिए तैयार हो भी गया, तो जब मैं अपनी शर्तें रखूँगी, तो उसका पहला जवाब यहीं होगा, कि एक तो मैं गर्लफ्रैंड बनकर रिलेशन में रहने के बाद भी तुझसे शादी कर रहा हूँ और तू मेरा एहसास मानने की जगह मेरे सामने शर्तें रखकर रही हैं.”

सुदर्शन—“तुम अभी तक वहीं अटकी हुई हो. सबने तुम्हें इतनी बार तो समझा दिया, कि तुमने किसी का बुरा नहीं किया, तुम्हारे साथ बुरा हुआ हैं. हो गई गलती इन्सान को पहचानने में. तो अब क्या करे ? जिन्दगी भर रोते रहें. और बहुत सी लड़कियाँ तो आजकल सोच–समझकर जान–बुझकर रिलेशन में रहती हैं. कई फिल्म–एक्ट्रेस, टीवी–एक्ट्रेस नाम–पैसा, दौलत–शौहरत सब कुछ होने के बाद भी पहले लिव–इन–रिलेशन में रहती हैं, फिर धोखा खाने के बाद खुदखुशी करती हैं. बहुत सी साधारण घरों की लड़कियाँ आजकल सिर्फ इंजॉयमेंट के लिए रिलेशन बनाती हैं. तुम तो उन सबसे बहुत अच्छी हो. तुम्हारी जिन्दगी में तो कुछ प्रोब्लम थी, इसलिए भटक गई.”

कृतिका—“फिर भी जैसे अच्छी लड़की को अच्छा लड़का मिलना चाहिए. उसी तरह किसी अच्छे लड़के को मेरे जैसी लड़की नहीं मिलनी चाहिए.”

सुदर्शन—“तुम्हारे अन्दर क्या कमी हैं ? जो तुम्हें अच्छा लड़का नहीं मिलना चाहिए ?”

कृतिका—“छोड़ो ये बात. जब मैं शादी करना ही नहीं चाहती, तो तुम ये सब मुझे क्यों समझा रहे हो ?”

सुदर्शन—“लेकिन अगर किसी को तुमसे प्यार हो जाए और वो तुम्हारे साथ जिन्दगी गुजारने चाहे तो ?”

कृतिका—“मुझसे किसी को प्यार नहीं हो सकता, सिर्फ हमदर्दी हो सकती हैं. जैसे तुम्हें प्यार के नाम पर रिलेशन बनाने वाली लड़कियाँ पसन्द नहीं, फिर भी तुम मेरे दोस्त बन गए. दोस्त बनने तक ठीक हैं. लेकिन मैं नहीं चाहती, कोई हमदर्दी के कारण मुझसे शादी करें.”

सुदर्शन मन में सोचने लगा कि अभी इसे कुछ मत बोल. ये अपने पापा के बिजनेस में उनकी मदद करना चाहती हैं. इसे वहीं करने दें. आज नहीं तो कल, ये जरूर बिजनेस में कामयाबी हासिल करेगी. तू उस वक्त तक का इंतजार कर और खुद को इसके लायक बना. वरना अभी अगर तूने इसे शादी के लिए मना भी लिया तो शादी के बाद तू इसे खुश रख पाएँगा ? माना कि इसके माँ–बाप पहले इसके साथ अच्छा व्यवहार नहीं करते थे. लेकिन उन्होंने कभी इसे किसी चीज की कमी नहीं रहने दी. इसे जो चाहिए था, इसके माँगने से पहले इसे दिया.

कृतिका ने सुदर्शन को सोच में खोया देखकर कहा—“क्या हुआ ?”

सुदर्शन—“नहीं, कुछ नहीं.”

कृतिका ने सुदर्शन के कंधे पर हाथ रखकर मुस्कुराते हुए कहा—“अरे, तुम मेरे लिए परेशान मत हो. मैं शादी के बिना भी बहुत खुश हूँ. अच्छा, अब मैं चलती हूँ. बहुत देर हो गई, घर से आए.”

सुदर्शन—“ठीक हैं.”

सुदर्शन और कृतिका बैंच से खड़े होकर पार्क से बाहर चले गए.


अगले दिन नौ अक्टूबर, सोमवार को सुबह के पौने दस बजे नाश्ता करने के बाद सुदर्शन ने सीढियाँ उतरते हुए नीचे बेसमेंट में आकर जयसिंह का केबिन खोला और अलमारी में रखे पचास नेकलेस लेकर केबिन से बाहर आकर नेकलेस अपने टेबल पर रखकर अपने टेबल की कुर्सी पर बैठकर नेकलेस चैक करने लगा.

पाँच मिनट बाद सीढियाँ उतरते हुए जयसिंह बेसमेंट में आए और सुदर्शन के पास आकर बोले—“ये कल चैक किये नहीं थे क्या ?”

सुदर्शन—“नहीं, ये पचास रह गए थे.”

जयसिंह—“चल ठीक हैं, कर ले. अच्छा, सुन ! आज मैं और अँकुश तो चार–पाँच दिन के लिए बैंगलोर जा रहे हैं. मैडम, सृष्टी और संयम यहीं हैं. तो तुम जब तक हम वापस ना आए, तब तक यहीं घर पर ही सो जाना.”

सुदर्शन—“ठीक हैं.”

जयसिंह अपने केबिन की तरफ मुड़कर केबिन में जाकर पूजा करने लगे. सुदर्शन अपने काम में लग गया.

कुछ देर बाद स्टाफ के अन्य लोग भी आने लगे और एक–दूसरे को गुड मॉर्निंग बोलकर अपने–अपने टेबल पर अपने–अपने काम में लग गए.

सुदर्शन सारा दिन कृतिका के बारे में सोचते हुए खोया–खोया सा रहा.

रात के ग्यारह बजे खाना खाने के बाद सुदर्शन सोफे पर बैठकर टीवी देख रहे सृष्टी और संयम के साथ बैठा हुआ था.

सुजाता किचन का काम खतम करके किचन से बाहर आकर बोली—“चलो, अब ग्यारह बज गए. अपने–अपने कमरे में जाकर सोओ. सुदर्शन, तुम इस कमरे में सो जाना.”

सृष्टी और संयम सोफे से खड़े होकर सीढियाँ चढ़ते हुए ऊपर जाकर अपने–अपने कमरे में चले गए.

सुजाता ने टीवी बन्द करके सुदर्शन को सोच में डूबा देखकर कहा—“सुदर्शन.”

सुदर्शन ने खड़े होकर कमरे की तरफ जाते हुए मुस्कुराकर कहा—“सॉरी मैडम.”

सुजाता—“रूकना जरा.”

सुदर्शन सुजाता की तरफ मुड़कर बोला—“हाँ.”

सुजाता सुदर्शन के पास आकर बोली—“क्या बात हैं ? मैं आज सुबह से देख रही हूँ. तुम कहीं ओर ही खोये हुए हो.”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“नहीं, कहीं खोया नहीं हूँ. बस आपको लग रहा हैं.”

सुजाता ने सुदर्शन का बाजू पकड़कर सुदर्शन को सोफे पर बिठाकर सुदर्शन के पास बैठते हुए कहा—“मैं सब समझ रही हूँ. चलो यहाँ बैठो और बताओ, क्या बात हैं ? क्या सोच रहे हो ?”

सुदर्शन ने कहा—“कुछ सोच नहीं रहा. बस कृतिका की बातें याद आ रही हैं.”

सुजाता मुस्कुराकर बोली—“ओह………तो ये बात हैं.”

सुदर्शन—“नहीं, मैडम. वैसी बात नहीं हैं. लेकिन इन छः महिनों में उससे बहुत अच्छी दोस्ती हो गई हैं. अब पिछले एक महिने से उससे मिलना–जुलना कम हो गया. हफ्ते में बस संडे के दिन मिलने आती हैं. कल उससे मिला था, तो वहीं बातें याद आ रही थी.”

सुजाता—“हम्म…मैं समझ रही हूँ. क्या कह रही थी वो ?”

सुदर्शन—“कह तो कुछ नहीं रही थी. बस इधर–उधर की बातें कर रहे थे. और हाँ, कल मैनें उसे आपकी और सेठ जी की प्रेम–कहानी बताई.”

सुजाता ने हँसकर कहा—“अच्छा ! फिर क्या कहा उसने ? कैसे पागल लोग हैं ? बचपन में खेल–खेल में लड़ते–लड़ते प्यार कर बैठे.”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“नहीं–नहीं, वो तो आपकी प्रेम–कहानी सुनकर आपकी फैन हो गई. बोली, मैं तो उनकी जबरदस्त फैन बन गई हूँ.”

सुजाता ने मुस्कुराकर कहा—“चलो, इस बहाने हम भी खुश हो लेगें. हमारे भी दो–चार फैन हैं.”

सुदर्शन—“आपके फैन तो होने ही चाहिए. आपकी शादी हुए पच्चीस साल होने वाले हैं, लेकिन आपका और सेठ जी का प्यार देखकर लगता हैं, बस दो–चार साल पहले ही शादी हुई होगी. वरना ज्यादातर पति–पत्नी का प्यार शादी होने के पाँच–सात साल बाद ऐसे गायब होता हैं, जैसे ज्वैलरी पहनने के कुछ महिनों बाद ज्वैलरी से पॉलिस गायब हो जाती हैं.”

सुजाता हँसकर बोली—“देखो, जो लोग एक–दूसरे से आकर्षित होकर एक–दूसरे से प्यार करते हैं, उनका प्यार तो शादी के बाद इसलिए खतम होता हैं, क्योंकि वो सिर्फ एक–दूसरे को पाने के लिए शादी करते हैं और जब शादी का मकसद सिर्फ एक–दूसरे को पाना हो, तब शादी करके एक–दूसरे को पाने के बाद प्यार खतम हो जाता हैं. फिर होती हैं, एक–दूसरे में कमियाँ निकालकर हमेशा एक–दूसरे से शिकायतें.”

सुदर्शन—“ये बात तो सही हैं, मैडम. लेकिन कुछ लोगों को तो सच में प्यार होता होगा. शादी के बाद उन सच्चे प्यार वालों में अनबन और झगड़े कैसे शुरू हो जाते हैं ?”

सुजाता—“उनका मैं कैसे बताऊँ ? कोई ना कोई वजह हो जाती हैं. सबकी जिन्दगी के बारे में तो हम नहीं जानते ना. इसके इलावा दूसरों को खुश देखकर दूसरों की खुशियों से जलने वाले भी बहुत होते हैं. ऐसे जलने वाले लोग भी कभी दूसरों के घर में गलतफ़हमी पैदा करके, कभी दूसरों के घर में किसी को भड़काकर, दूसरों के घर उजाड़ते रहते हैं. ऐसे लोग बहुत तरह के अलग–अलग तरीके अपनाते हैं. अब हमने तो कभी किसी का बुरा सोचा नहीं, इसलिए क्या–क्या करते हैं, कैसे–कैसे टोटके लगाते हैं ? हमें तो पता नहीं.”

सुदर्शन—“हाँ, मैडम. छोड़ो इन बेकार लोगों की बातें. आप तो ये बताओ. आपने सेठ जी को अब तक अपना दीवाना कैसे बना रखा हैं ? वरना पति चाहे कैसा भी हो, पत्नी तो पराये आदमी के बारे में नहीं सोचती. हालांकि आजकल बहुत सी नारी गलत रास्ते पर चल रही हैं. फिर भी आदमी तो यहाँ–वहाँ पराई नारी के पास कुछ ज्यादा ही भटकते हैं. लेकिन सेठ जी तो आपके सिवा किसी ओर को देखते भी नहीं. ये सेठ जी पर आपने ऐसा कौनसा जादू किया हैं ?”

सुजाता ने हँसकर कहा—“अरे, तुम लोग भी ना, बस. मैनें उन पर कोई जादू नहीं किया. उल्टा उन्होंने जरूर मुझ पर कोई जादू कर रखा हैं, जो शादी के इतने साल बाद भी, उनसे कुछ दिन दूर रहने पर सब सुना–सुना लगने लगता हैं.”

सुदर्शन—“नहीं, मैडम. प्यार बनाए रखने का भी कोई ना कोई तरीका तो होता ही हैं. कल कृतिका भी यहीं कह रही थी. मैनें कहा, जब घर आओ, तब सेठ जी और मैडम से पूछ लेना. वो बोली, मुझे शर्म आती हैं. मैनें कहा, चलो, मैं ही पूछ लूँगा.”

सुजाता—“हम्म………ज्यादा तो मालूम नहीं. मैं मेरी जो सोच हैं, वो बता देती हूँ. देखो, हर इन्सान को नई और ताजा चीजें बहुत पसन्द आती हैं. नये डिजाईन के कपड़े, नई और ताजा सब्जी, कोई नई इलेक्ट्रॉनिक चीज. यहाँ तक की मार्केट में कोई नया मोबाइल हैंडसेट आता हैं, तो वो भी सबको अच्छा लगता हैं और पुराने वाला बेकार लगने लगता हैं. चाहे कुछ भी हो, इन्सान को कोई भी नई और ताजा चीज दिखाई देती हैं, तो इन्सान उसकी तरफ आकर्षित होकर उसे पाना चाहता हैं. यहीं बात दो इन्सानों के बीच भी होती हैं, खासकर नारी और पुरुष में. बस इसी बात को ध्यान में रखकर मैनें खुद को पुरानी नहीं होने दिया और हर तरह से खुद को नई और ताजा बनाकर रखने की कोशिश की हैं, शायद इसलिए तुम्हारे सेठ जी का प्यार बिल्कुल वैसा ही बना हुआ हैं, जैसा पहले था. और तुम्हारे सेठ जी ने भी खुद को नया और ताजा बनाकर रखा हैं, इसलिए वो भी मुझे बहुत अच्छे लगते हैं. दूसरी महिलाओं की तरह मुझे कभी उनसे कुछ कहने की जरूरत ही नहीं पड़ती. मेरे हिसाब से पति–पत्नी के रिश्ते में प्यार और अपनेपन का एहसास बनाए रखने के लिए इन्सान को जरूरत के हिसाब से लिमिट में रहकर खुद में बदलाव करते रहना चाहिए. लेकिन कुछ लोग तो खुद को बदलते नहीं हैं और कुछ लोग खुद को बहुत ज्यादा बदल लेते हैं. शायद यहीं प्रोब्लम हैं, जिसके कारण प्यार में कमी आ जाती हैं. अगर बैलेन्स बनाकर खुद को पुराना या पुरानी ना होने दे, तो प्यार कभी कम नहीं होता. फोर एग्जामपल तुम इमेजिन(कल्पना) करके देखो, अगर मैं पुराने टाइम की महिलाओं की तरह रहूँ तो कैसी लगूँगी ?”

सुदर्शन ने इमेजिन किया, भारी–भरकम गहनें पहनकर पूरी तरह राजस्थानी पहनावे में लम्बा घूँघट निकालकर खड़ी सुजाता मैडम.

सुजाता ने आगे कहा—“और अगर बिल्कुल ही बोल्ड हो जाऊँ तो कैसी लगूँगी ?”

सुदर्शन ने इमेजिन किया, जींस–टीशर्ट में खड़ी सुजाता मैडम, कटिंग वाली साड़ी पहनकर खड़ी सुजाता मैडम.

सुजाता सुदर्शन को खोया देखकर बोली—“क्या हुआ ? सच में इमेजिन कर रहे हो क्या ?”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर हाँ में सर हिलाते हुए कहा—“नहीं मैडम, आप अभी जैसे साड़ी और सुट पहनकर रहते हो, वहीं बेस्ट हैं.”

सुजाता ने हँसकर सुदर्शन के माथे पर चांटा मारकर कहा—“अच्छा, मतलब इमेजिन कर लिया. चलो, जब इमेजिन कर ही लिया, तो फिर ये बताओ. तुम्हारी इमेजिनेशन में मैं कैसी लग रही थी ?”

सुदर्शन ने शर्माकर कहा—“रहने दीजिए.”

सुजाता—“अरे, बताओ तो ?”

सुदर्शन ने मुस्कुराते हुए कहा—“पहले तो मैडम, वो पड़ौस में सेठानी जी हैं ना. जो भारी–भरकम गहनों से लदी हुई पुराने स्टाइल में रहती हैं, उनका ख्याल आया.”

सुजाता ठहाका लगाकर हँसने के बाद बोली—“अच्छा, फिर ?”

सुदर्शन—“फिर ये पड़ौस के मालपाणी जी की वाईफ हैं ना, जो उम्र में आपसे बड़ी हैं, फिर भी जींस–शर्ट, जींस–टीशर्ट पहनती हैं, उनका ख्याल आया और फिर फिल्मों में दीपिका पादूकोन और प्रियंका चौपड़ा जिस तरह की साड़ी पहनकर आती हैं, वो ख्याल आया.”

सुजाता खिलखिलाकर हँसने के बाद अपनी हँसी रोककर बोली—“उफ्फ………अब तुम्हीं बताओ, अगर मैं इनमें से कोई स्टाइल अपनाकर तुम्हारे सेठ जी के सामने जाऊँ, तुम्हारे सेठ जी हिल नहीं जाएँगें ?”

सुदर्शन—“हाँ, समझ गया मैडम, आपने टाइम के हिसाब से खुद में बदलाव किया, लेकिन बदलाव उतना ही किया, जितने बदलाव की जरूरत हैं.”

सुजाता—“हाँ, हर बात एक लिमिट तक ही अच्छी लगती हैं. जब कुछ भी जरूरत से ज्यादा होने लगे, तो बस वहीं से प्रोब्लम शुरू हो जाती हैं. जैसे तुम्हारे सेठ जी बहुत बार कुछ ना कुछ बोलकर मुझे छेड़ते हैं, मैं भी उनके साथ बात कर लेती हूँ. अब अगर मैं इनके साथ बातें नहीं करूँगी, तो ये कोई दूसरी नारी तलाश करने लगेगें, जिसके साथ ये खुलकर ऐसी बातें कर सकें. इसलिए मैं ही इनके साथ सभी तरह की बातें कर लेती हूँ. ताकि ये ऐसी बातें करने के लिए कोई दूसरी नारी तलाश ना करें. लेकिन अगर मैं ज्यादा बातें करूँगी, तो ये कहेंगे, सुजाता तो बिल्कुल ही बेशर्म हो गई. फिर ये कोई अच्छी शर्म–लिहाज करने वाली नारी तलाश करने लगेगें. इसलिए इनको किसी ओर के पास जाने से रोकने के लिए मैं लिमिट में रहकर हल्की–फुल्की बातें करती हूँ. लेकिन ये मुझे बेशर्म ना समझे, इसलिए ज्यादा बातें नहीं करती.”

सुदर्शन—“हाँ, मैडम. मैं भी फिर आपकी तरह लिमिट में रहकर खुद को हमेशा नया और ताजा बनाकर रखूँगा, ताकि मेरी शादी के बाद मेरी वाईफ किसी ओर को तलाश ना करें.”

सुजाता ने मुस्कुराकर कहा—“हम्म…बहुत अच्छी बात हैं. अब बताओ, तुम्हारे दिमाग में क्या उलझन चल रही हैं ?”

सुदर्शन—“मैडम, आप तो फिर से वहीं पर आ गई.”

सुजाता—“और जब तक तुम बताओगे नहीं, मैं बार–बार वहीं आती रहूँगी.”

सुदर्शन चुपचाप सर झूकाकर बैठा रहा.

सुजाता—“अच्छा, ठीक हैं. हम कौनसे तुम्हारे अपने हैं ? तुम हमारे पास जॉब करते हो, इसका ये मतलब थोड़े ही हैं, हम तुमसे तुम्हारी हर बात पूछे.”

सुदर्शन मन में बोला कि उफ्फ………कैसी ड्रामेबाज मैडम हैं ? लेकिन बहुत अच्छी हैं. वरना अपने पास जॉब करने वालों से इतना अपनापन कौन रखता हैं ? बस कोई मैडम की इस अच्छाई का गलत फायदा ना उठाए.

सुदर्शन—“मैडम, आप भी अच्छी तरह जानती हो, मैं आपको और सेठ जी को अपने मम्मी–पापा की तरह मानता हूँ.”

सुजाता—“झूठ ! अगर ऐसा होता तो क्या तुम अपनी परेशानी हमसे शेयर नहीं करते ? तुम्हारा चेहरा देखकर साफ़ पता चल रहा हैं, तुम किसी गहरी सोच में डूबे हो.”

सुदर्शन—“एक उलझन हैं तो सही. लेकिन………”

सुजाता—“लेकिन क्या ?”

सुदर्शन—“लेकिन पाँच साल पहले भूख से तड़पकर जब मैं कचरे में से फल उठाकर खा रहा था. हर कोई मुझे दुत्कार कर दूर भगा रहा था. कोई मुझे अपने पास खड़ा भी नहीं होने दे रहा था. उस वक्त आपने आकर मेरी आँखों से बहते आँशू पोंछे और मुझे अपने साथ घर ले आयी. फिर सेठ जी ने ये जॉब दे दी. कुछ दिन घर में भी रखा.”

सुजाता—“ओहो………हमने कुछ नहीं किया. तुम बहुत अच्छे हो, तुम बहुत समझदार हो, तुम मेहनती, ईमानदार और काबिल हो, इसलिए तुम अपनी ईमानदारी और काबिलियत से हमारे पास जॉब कर रहे हो. समझे बेवकूफ. यू ही हमें ऊपर वाली हवा में उड़ाते रहते हो.”

सुदर्शन—“नहीं मैडम, जो सच हैं, वो सच हैं. इन पाँच सालों में आपने और सेठ जी ने मुझे बहुत प्यार और अपनापन दिया. सृष्टी, अँकुश और संयम ने छोटे भाई–बहनों की तरह मुझे बहुत इज्जत दी. इसलिए अब आप सभी से दूर जाने का मन नहीं कर रहा. अब तो आप लोग कहो, कि मुझे सैलरी नहीं दोगे, तब भी मैं फ्री में सारी जिन्दगी आपके पास जॉब कर सकता हूँ.”

सुजाता—“तुम असली बात बताओ, क्या हैं ?”

सुदर्शन ने झिझकते हुए कहा—“मैडम………”

सुजाता—“हाँ, बोलो.”

सुदर्शन ने एक सांस में कहा—“मैडम, मैं खुद का काम करना चाहता हूँ. लेकिन ये जॉब छोड़ने का मन नहीं कर रहा.”

सुजाता ने मुस्कुराकर कहा—“ओहो, ये तो बहुत अच्छी बात हैं. अब कुछ पाने के लिए कुछ खोना तो पड़ता ही हैं. जैसे पाँच साल पहले तुम अपने मम्मी–पापा, अपने भाई–भाभी, बहन, अपना घर, अपने दोस्त, अपना शहर छोड़कर यहाँ आए थे. अब आगे तुम कुछ ओर करना चाहते हो, इसलिए जॉब तो छोड़नी पड़ेगी.”

सुदर्शन—“लेकिन मैडम, आप लोगों को बुरा लगेगा ना. इसे कचरे में से उठाकर लाए, जॉब दी, इतने एहसान किये. अब थोड़े पैसे आते ही ये छोड़कर जा रहा हैं.”

सुजाता—“हे…भगवान………क्या–क्या सोचता हैं ? ये लड़का. कचरे में से उठाकर लाए, एहसान किये. मन कर रहा हैं, एक चांटा लगाऊँ तुम्हें. हमने तुम पर कोई एहसान नहीं किये. तुम जॉब करते हो, इसलिए सैलरी देते हैं. ऑवर–टाइम करते हो, संडे को आते हो, इसलिए खाना खिलाते हैं. तुम मेहनत और ईमानदारी से नौकरी करते हो, तुम बहुत अच्छे हो, इसलिए जब तुम्हारे पास रहने की जगह नहीं होती, तो अपने घर में रख लेते हैं. इसमें एहसान कैसा हैं ?”

सुदर्शन—“मैडम………”

सुजाता—“वाह रे वाह ! गधे………अब ये सब बातें अपने दिमाग से निकाल दो. इनके बैंगलोर से आते ही मैं इस बारे में इनसे बात करती हूँ. और हाँ, अब ये मत कहना. हम तुम्हें खुद का काम शुरू करने में मदद करके एक और एहसान कर रहे हैं. तुमने पाँच साल तक लगन और मेहनत से पूरी ईमानदारी के साथ हमारे पास जॉब की हैं, इसलिए हम तुम्हारी थोड़ी सी हेल्प करेगें.”

सुदर्शन ने सोफे से नीचे होकर सुजाता के पैरों को हाथ लगाकर सुजाता के सामने अपना सर झूकाकर कहा—“मुझे माफ़ कर दो, मैडम. मैं आपके प्यार और अपनेपन को एहसान का नाम देकर बहुत छोटा कर रहा था. मैं भूल गया था, माँ कभी अपने बच्चे पर एहसान नहीं करती.”

सुजाता ने खड़ी होते हुए सुदर्शन को उठाकर गले लगाकर मुस्कुराते हुए कहा—“अरे, बेटे की जगह माँ के पैरों में नहीं, माँ के दिल में होती हैं. और मुझे पता हैं, तुम ये खुद का काम अपने लिए नहीं, कृतिका के लिए शुरू कर रहे हो. शादी के बाद कृतिका को उसी तरह रखने के लिए, जैसे वो साँवरमल जी के घर में रही हैं.”

सुदर्शन ने सुजाता की तरफ देखकर मुस्कुराते हुए हाँ में सर हिलाया.

सुजाता सुदर्शन के गाल पर प्यार से चांटा मारकर मुस्कुराते हुए बोली—“हम तो उसी दिन समझ गए थे, जब एक दिन कृतिका से ना मिलने का कारण तुम्हारे चेहरे का रंग उड़ गया था और परेशान होकर दूसरे दिन आलोक के साथ कुछ खाये–पीये बिना भूखे पेट उसे ढूंढने निकल गए. हम तो बस ईंतजार कर रहे थे, तुम कब कहते हो ?”

सुदर्शन शर्माकर नजरें चुराते हुए इधर–उधर देखने लगा.

सुजाता ने मुस्कुराहट बरकरार रखते हुए कहा—“चलो, अब वो फालतू बातें दिमाग से निकालो और कृतिका के सपने देखो. जाओ सो जाओ”

सुदर्शन मुस्कुराता हुआ सामने के कमरे में चला गया और सुजाता मुस्कुराते हुए हॉल की लाइट बन्द करके अपने बैडरूम में चली गई.


तेरह दिन बाद बाईस अक्टूबर, रविवार को सुबह के ग्यारह बजे जयसिंह के घर की छत पर सृष्टी, अँकुश और संयम के साथ सुदर्शन कैरम बोर्ड खेल रहा था.

सुजाता छत पर आकर बोली—“सुदर्शन, नीचे तुम्हारे अंकल बुला रहे हैं.”

सुदर्शन बोला—“क्या मैडम, मैं जीतने वाला हूँ और आप बुलाने आ गई.”

सुजाता—“अरे, नीचे तो आओ. कृतिका के पापा भी तुम्हें बुला रहे हैं.”

सृष्टी ने मुस्कुराते हुए कहा—“अब तो भईया जरूर जाएँगें.”

सुदर्शन मुस्कुराते हुए खड़ा होकर सुजाता के साथ सीढिया उतरते हुए नीचे चलने लगा.

नीचे हॉल में सोफे पर सेठ साँवरमल बागड़ी, राजलक्ष्मी और जयसिंह सोफे पर बैठे बातें कर रहे थे. सुजाता नीचे आकर जयसिंह के पास बैठ गई. सुदर्शन सामने आकर खड़ा हो गया.

जयसिंह—“इधर आओ, तुम भी बैठो.”

सुदर्शन जयसिंह के पास आकर बैठ गया.

जयसिंह ने सुदर्शन के कंधे पर हाथ रखकर सेठ साँवरमल बागड़ी और राजलक्ष्मी से कहा—“सुदर्शन से आप पहले भी कई बार मिल चुके हैं. सुदर्शन को पाँच साल हो गए मेरे पास जॉब करते हुए, ये बहुत अच्छा लड़का हैं. हम अपने बच्चों में और सुदर्शन में कोई फर्क नहीं समझते. अभी दिवाली पर राम–राम वाले दिन सुदर्शन के घरवालों से भी मैनें बात की हैं. उन्होंने कहा, आप जो ठीक समझें, सुदर्शन के लिए फैसला कर सकते हैं. इसलिए मैनें आज आपसे सुदर्शन के बारे में बात की. हमें पता हैं, सुदर्शन और कृतिका एक–दूसरे को पसन्द करते हैं और मुझे पूरा विश्वास हैं, सुदर्शन कृतिका को बहुत खुश रखेगा.”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“अगर कृतिका भी सुदर्शन को पसन्द करती हैं, तो मुझे कोई आपति नहीं हैं और फिर जिस लड़के ने हमारी बेटी को मुश्किल वक्त में संभाला, हमारी बेटी के लिए उससे अच्छा लड़का कहाँ मिलेगा ? आप लोगों के साथ–साथ इस लड़के का भी बड़ा योगदान हैं, हमारे घर में फिर से खुशियाँ लाने में.”

सुदर्शन ने खड़े होकर सुजाता को साइड में बुलाकर कहा—“मैडम, यहाँ तो मेरी और कृतिका की शादी की बात हो रही हैं. आपने मुझे बताया क्यों नहीं ?”

सुजाता—“क्यों हम तुम्हारी शादी की बात नहीं कर सकते ?”

सुदर्शन—“कर सकते हो, मैडम. आप मेरे लिए कोई भी फैसला कर सकते हो.”

सुजाता—“फिर क्या प्रोब्लम हैं ? उस दिन तुमने खुद कहा था ना. तुम्हें कृतिका से प्यार हो गया हैं.”

सुदर्शन—“हाँ, लेकिन अभी शादी. अभी तो मेरा काम भी शुरू नहीं हुआ.”

सुजाता—“काम तो कल से शुरू हो ही रहा हैं. तुम्हारे अंकल ने तुम्हें ऑफ़िस दिलवा दिया हैं.”

सुदर्शन—“लेकिन………”

सोफे पर बैठे जयसिंह ने कहा—“अरे, क्या बात हैं ? हमें भी बताओ.”

सुजाता ने मुड़कर कहा—“सुदर्शन कह रहा हैं, अभी तो मैनें अपना काम भी शुरू नहीं किया.”

जयसिंह ने मुस्कुराकर कहा—“इधर आ.”

सुजाता और सुदर्शन जयसिंह के सामने आए.

जयसिंह—“अब बता क्या बात हैं ? यहाँ सब अपने घर के ही तो हैं. हम हैं, कृतिका के मम्मी–पापा हैं, जो भी बात हैं, खुलकर कहो.”

सुदर्शन ने सुजाता की तरफ देखा.

सुजाता—“हाँ–हाँ, बताओ.”

सुदर्शन—“सेठ जी, मैं अभी शादी नहीं करना चाहता.”

जयसिंह ने हँसकर कहा—“अरे आज के आज तुम्हारे फेरे थोड़े ही करवा रहे हैं. आज सिर्फ बात कर रहे हैं. अभी तो तुम्हारे घरवालों को यहाँ बुलाकर साँवरमल जी मिलवाएँगें, फिर सब मिलकर आगे की बात पक्की करेंगे. आज तो मैनें सिर्फ बात की हैं. आखिरी फैसला तो तुम्हारे घरवाले और कृतिका के घरवाले ही करेगें.”

सुदर्शन—“नहीं, सेठ जी. वो बात नहीं हैं. मैं चाहता हूँ, शादी से पहले मैं कृतिका को खुश रखने के लायक बन जाऊँ.”

जयसिंह—“कृतिका को खुश रखने लायक तो तुम हो ही. इसलिए तो मैनें शादी की बात की.”

सुदर्शन—“लेकिन सेठ जी, पहले मैं अपना काम जमाकर, घर संभालने लायक तो हो जाऊँ.”

जयसिंह ने मुस्कुराकर कहा—“देखो, घर तो तुम मेरे पास जॉब करके भी संभाल सकते हो और अब तो कल से तुम्हारा खुद का ऑफ़िस होगा. तुम खुद का बिजनेस शुरू कर रहे हो. सृष्टी और अँकुश भी तुम्हारी हेल्प के लिए तुम्हारे पास आ जाएँगें. अब तो कोई प्रोब्लम ही नहीं होनी चाहिए. फिर भी अगर कोई दिक्कत या परेशानी आती हैं, तो हम बैठे हैं. तुम क्यों टेन्शन ले रहे हो ?”

सुदर्शन—“सेठ जी, अगर आपकी इजाजत हो तो मैं अंकल जी से एक बात पूछ सकता हूँ ?”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“आराम से पूछो, बेटा.”

सुदर्शन—“मुझे बस यहीं पूछना था, अगर ये सब प्रोब्लम नहीं होती, तब मैं आपसे आकर कहता, कि मैं कृतिका से शादी करना चाहता हूँ, तो आप मुझे क्या कहते ?”

किसी ने भी कोई जवाब नहीं दिया.

सुदर्शन—“शायद आप कहते, रिश्ते हैसियत देखकर जोड़े जाते हैं.”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“लेकिन अब तो हम ऐसा नहीं सोचते, फिर तुम क्यों सोच रहे हो ?”

सुदर्शन—“मैं भी ऐसा नहीं सोचता. लेकिन जब कृतिका मुझसे मिलने आती थी, तब वो आपकी दिलवाई हुई गाड़ी लेकर आती थी. सुबह मुझे घर से ऑफ़िस लेकर आती थी, शाम को ऑफ़िस से घर लेकर जाती थी. हम घंटों तक गाड़ी बैठे बातें करते हैं. अब मेरा सपना हैं, शादी के बाद जब कृतिका आपसे मिलने, आपके घर जाए, तो वो मेरी दिलाई हुई गाड़ी लेकर जाए. मुझे ज्यादा अरबपति–खरबपति नहीं बनना, बस शादी से पहले कृतिका के लिए एक घर और एक गाड़ी खरीद लूँ. बस इतना ही मेरा सपना हैं.”

राजलक्ष्मी ने मुस्कुराकर कहा—“लेकिन ये सपना तो शादी के बाद तुम दोनों मिलकर भी पूरा कर सकते हो ?”

सुदर्शन—“अंटी जी, सपना तो शादी के बाद भी पूरा हो सकता हैं. लेकिन मैं खुद को देखना चाहता हूँ, मैं कृतिका को खुश रखने के लायक हूँ या नहीं. वरना शादी के बाद अगर मैं घर और गाड़ी नहीं खरीद पाया, तो कृतिका को जो हैं, जैसा हैं, उसी में एडजस्ट करना पड़ेगा. मैं नहीं चाहता, कि वो एडजस्ट करें.”

सुजाता ने मुस्कुराकर जयसिंह से कहा—“जय, अब क्या कहना हैं, आपको ?”

जयसिंह—“अब मैं क्या कहूँ ? लड़की के मम्मी–पापा बैठे हैं. लड़का सामने हैं. लड़के ने अपनी बात रख दी.”

सुदर्शन—“एक बात और भी हैं.”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“बताओ.”

सुदर्शन—“कृतिका अब खुश तो हैं, लेकिन वो खुद को किसी के लायक नहीं समझती. वो सोचती हैं, वो रिलेशन में रहकर अब किसी अच्छे इन्सान की पत्नी बनने के लायक नहीं रही. इसलिए अगर अभी मैं उससे शादी करूँगा, तो वो सोचेगी, मैं उस पर दया करके या उस पर तरस खाकर हमदर्दी के कारण उससे शादी कर रहा हूँ. इसलिए आप पहले उसको आपके बिजनेस में कामयाबी हासिल कर लेने दीजिये. वो आपके ऑफ़िस में जॉब कर रही हैं. धिरे–धिरे उसे बिजनेस की बारीकियाँ सीखाकर आपकी तरह एक कामयाब बिजनेस वूमेन बनाइए. फिर हर कोई उसके साथ अपना नाम जोड़ना चाहेगा. उस वक्त मैं भी लग जाऊँगा, लाइन में.”

राजलक्ष्मी—“बेटा, बातें तो तुम्हारी बहुत अच्छी हैं. लेकिन हमारी भी उम्र हो गई. पता नहीं कब बुलावा आ जाए. इसलिए मरने से पहले कृतिका का घर बसा हुआ देखना.”

सुदर्शन राजलक्ष्मी के पास आकर बोला—“अंटी जी, आप ऐसी बातें क्यों सोच रही हैं ? माना कि भविष्य हमारे बस में नहीं हैं. लेकिन फिर भी हमें अपना भविष्य अच्छा बनाने की कोशिश तो करनी चाहिए ना. सेठ जी और सुजाता मैडम कहते हैं, अगर हम कोशिश करेगें, तो या हमारी कोशिश सफल होगी, या हमारी कोशिश असफल होगी. लेकिन अगर कोशिश ही नहीं करेगें, फिर तो सफलता के बारे में सोचना ही बेकार हैं. इसलिए आप ये सब मत सोचो, बस अपना आशिर्वाद दो, ताकि हम अपने छोटे–छोटे सपने पूरे कर सकें.”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“चलो, जब बच्चे इतना सोच रहे हैं, तो हम भी उनकी मदद करें.”

राजलक्ष्मी ने सुदर्शन के सर पर हाथ रखकर कहा—“ठीक हैं. भगवान करें, जल्दी ही तुम अपने सारे सपने पूरे करो.”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“बस आप सबसे एक रिक्वेस्ट और हैं.”

सुजाता ने मुस्कुराते हुए कहा—“अब क्या रिक्वेस्ट रह गई ?”

सुदर्शन—“जब तक मैं इस शहर में एक घर और एक गाड़ी ना खरीद लूँ. तब तक आप सब हमारी आज की बातों के बारे में कृतिका को कुछ मत बताना.”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“वो क्यों ?”

सुदर्शन—“क्योंकि मैनें और कृतिका ने अभी तक एक–दूसरे से अपने दिल की बात नहीं कही. अब पता नहीं मुझे घर और गाड़ी खरीदने में दो साल लगे या पाँच साल लगे. हो सकता हैं, दस साल लग जाए. इस बीच कृतिका की जिन्दगी में कोई और आ गया, तो मैं उसे अपने प्यार के बंधन में बाँधकर रोकना नहीं चाहता.”

जयसिंह—“अरे, ये क्या बात हुई ?”

सुदर्शन—“बस सेठ जी, आप ही लोगों से सीखा हैं, प्यार में बँधन नहीं होना चाहिए. प्यार में एक–दूसरे की खुशी के लिए जीना चाहिए. अगर प्यार में सच्चाई हैं, तो प्यार, प्यार करने वालों को खुद ही खींचकर एक–दूसरे के पास कर देगा.”

कुछ पल के लिए सभी चुप होकर गंभीर हो गए.

सेठ साँवरमल बागड़ी—“ठीक हैं. हम नहीं बताएँगें. अपने दिल की बात तुम खुद ही कृतिका को बताना.”

सुदर्शन ने सेठ साँवरमल बागड़ी, राजलक्ष्मी, जयसिंह और सुजाता के पैर छूकर मुस्कुराते हुए कहा—“अब मैं ऊपर चला जाऊँ.”

सुजाता ने मुस्कुराकर कहा—“हाँ, ठीक हैं.”

सुदर्शन सीढिया चढ़ते हुए ऊपर जाने लगा. सुजाता जयसिंह के पास सोफे पर आकर बैठ गई. सब लोग छत पर जा रहे सुदर्शन की तरफ़ देखने लगे.


सात साल बाद सात अक्टूबर, सोमवार को सुबह के दस बजे उम्र में तैंतीस(33) साल का हो चुका सुदर्शन हाथ में ऑफ़िस–बैग लिए अपने ऑफ़िस के अन्दर आकर स्टाफ के लोगों को गुड मॉर्निग बोलते हुए अपने केबिन में आकर सुदर्शन ने बैग टेबल पर रखा और अपनी चेयर पर बैठ गया.

सुदर्शन मन में सोचने लगा कि सपने देखना बहुत आसान हैं. लेकिन सपने पूरे करना बहुत मुश्किल हैं. सात साल पहले मैनें कितनी आसानी से बोल दिया था, शादी से पहले कृतिका के लिए एक घर और गाड़ी खरीदना चाहता हूँ. उस वक्त लगा था, दो–तीन साल की बात हैं. घर और गाड़ी तो यू आ जाएँगें. लेकिन जिन्दगी की दूसरी उलझनों के कारण ये छोटा सा सपना पूरा करने में सात साल लग गए. चलो, ये भी सही हैं. आखिर सपना पूरा तो हुआ.

सुदर्शन ने अपने बैग से मोबाइल निकालकर सेठ साँवरमल बागड़ी को कॉल लगाकर मोबाइल कान से लगाया.

उम्र में छियासठ(66) साल के हो चुके सेठ साँवरमल बागड़ी अपने घर के बरामदे में कुर्सी पर बैठे अखबार पढ़ रहे थे. मोबाइल बजने पर उन्होंने जेब से मोबाइल निकालकर कॉल रिसींव किया.

सुदर्शन—“नमस्ते, अंकल जी.”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“नमस्ते, बेटा. कैसे हो ?”

सुदर्शन—“बस आपके आशिर्वाद से मैं बिल्कुल ठीक हूँ. आप और अन्टी जी कैसे हैं ?”

साँवरमल बागड़ी—“हम भी ठीक हैं.”

सुदर्शन—“और कृतिका ?”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“कृतिका भी बिल्कुल ठीक हैं. लेकिन वो तो ऑफ़िस चली गई. हर वक्त बस काम में ही उलझी रहती हैं.”

सुदर्शन—“ये तो बहुत अच्छी बात हैं. अच्छा, मैनें आपको एक गुड न्यूज देने के लिए फोन किया हैं.”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“बताओ फिर जल्दी से.”

सुदर्शन—“डेढ़ साल पहले मैनें घर बनाने के लिए एक जमींन खरीदी थी. वहाँ अब घर बनकर पूरा हो गया हैं. कल गृह प्रवेश हैं और कल मैं एक गाड़ी भी खरीद रहा हूँ.”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“ओहो………बहुत–बहुत बधाई हो. मैं तो कब से इस दिन का इंतजार कर रहा हूँ.”

सुदर्शन—“सब आप बड़ों का आशिर्वाद हैं. मैं चाहता था, कल आप पूरे परिवार के साथ हमारे घर आए और अपना आशिर्वाद दें. मैनें सेठ जी और सुजाता मैडम को भी बुलाया हैं.”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“ठीक हैं. हम जरूर आएँगे.”

सुदर्शन—“अच्छा, अंकल जी. रखता हूँ.”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“ठीक हैं, बेटा.”

सेठ साँवरमल बागड़ी के कॉल कटने के बाद सुदर्शन अपने काम में लग गया.


अगले दिन आठ अक्टूबर, मंगलवार को दोपहर एक बजे सुदर्शन के घर में पूजा होने के बाद खाना खाकर बाकि सभी मेहमानों के विदा होने के बाद सुदर्शन के माता(उम्र–59 साल)–पिता(उम्र–61 साल), भाई(उम्र–39 साल)–भाभी(उम्र–38 साल), बहन(उम्र–36 साल)–जीजाजी(उम्र–38 साल), जयसिंह(उम्र–53 साल)–सुजाता(उम्र–57 साल), सेठ साँवरमल बागड़ी–राजलक्ष्मी(उम्र–65 साल) घर के हॉल में बैठकर बातें कर रहे थे. बाहर से सुदर्शन और उम्र में तैईस(23) साल का हो चुका संयम आए.

सुदर्शन—“आप सबने खाना खा लिया ?”

सुदर्शन के पिता—“हाँ, हम सब ने खा लिया. अब तुम भी खा लो.”

संयम सुजाता के पास बैठते हुए बोला—“सुदर्शन भईया तो कृतिका दीदी के साथ खाना खाएँगें. कब से उसे ढूंढ रहे हैं और वो नजर आकर गायब हो जाती हैं.”

सभी हँसने लगे.

सेठ साँवरमल बागड़ी—“वो बाहर लोन में बैठी हैं. जाओ, उसे भी बुला लो.”

सुदर्शन बाहर जाने लगा.

सुजाता—“अरे सुनो.”

सुदर्शन रूककर मुड़ते हुए बोला—“हाँ.”

सुजाता—“अब तो तुम्हारा सपना पूरा हो गया. आज बोल दो, कृतिका को अपने दिल की बात.”

सुदर्शन मुस्कुराकर बोला—“नहीं, फिर कभी.”

संयम उठकर बाहर जाते हुए बोला—“ओहो, मैं ही बोलकर आता हूँ. वरना ये तो सात साल और लगा देगें.”

सुदर्शन संयम के दरवाजे के पास आते ही संयम का बाजू पकड़कर बोला—“अरे रूक. मैं खुद ही बोल दूँगा.”

जयसिंह—“तो फिर जाओ और बोलो. वरना आज हम बोल देगें.”

सुदर्शन—“सेठ जी.”

सुजाता—“क्या सेठ जी ? यहाँ हम तुम्हारी और कृतिका की शादी की डेट फिक्स कर रहे हैं और तुम दोनों ने अभी तक एक–दूसरे से अपने दिल की बात भी नहीं बोली.”

संयम बाहर जाते हुए—“मैं बोल ही आता हूँ.”

सुदर्शन संयम को पकड़कर बोला—अरे रूक जा रे… मैं बोलता हूँ.”

सभी लोग खड़े होकर सुदर्शन को बाहर कृतिका के पास जाने के लिए कहने लगे.

सुदर्शन शर्माता हुआ बाहर जाने लगा.

संयम भी सुदर्शन के साथ आने लगा.

सुदर्शन—“अरे, तुम रूको यहीं.”

संयम—“क्यों आप बिना बोले वापस आ गए तो ?”

सुदर्शन मुड़कर बोला—“मैडम.”

सुजाता—“क्या मैडम ? ठीक ही तो बोल रहा हैं. हम सब यहाँ खिड़की में से देख रहे हैं. तुम जाकर बोलो, वरना हम बोल देगें.”

सुदर्शन—“ठीक हैं.”

सुदर्शन बाहर आकर लोन में आया. उम्र में पैंतीस(35) साल की हो चुकी कृतिका अपने में ही खोई हुई बैंच पर बैठी थी.

सुदर्शन मन में सोचने लगा कि ये प्यार का इज़हार करना भी कितना मुश्किल हैं. समझ में नहीं आ रहा, जब शादी की डेट फिक्स कर रहे हैं, तो इज़हार करने के लिए क्यों बोल रहे हैं ?

सुदर्शन ने मुड़कर खिड़की की तरफ देखा. सभी सुदर्शन को कृतिका से अपने प्यार का इज़हार करने के लिए इशारे से कहने लगे.

सुदर्शन कृतिका की तरफ मुड़कर बैंच पर बैठते हुए बोला—“अरे, कहाँ खोई हुई हो ? मैं तुम्हें अन्दर ढूंढ रहा था और तुम यहाँ बैठी हो.”

कृतिका चौककर बोली—“अरे, कहीं नहीं. बस यू ही आकर बैठ गई. बहुत अच्छा लोन बनवाया हैं, तुमने.”

सुदर्शन—“तुम्हें पसन्द आया, ये ज्यादा अच्छा लगा. अच्छा, एक बात बताओ. तुमने अपनी शादी के बारे में क्या सोचा हैं ?”

कृतिका—“पहले भी कितनी बार बता चुकी हूँ. मुझे शादी नहीं करनी.”

सुदर्शन—“हम्म………………लेकिन तुम्हारे मम्मी–पापा ने तुम्हारी शादी के लिए कुछ सपने देखे होगे, कुछ अरमान सजा रखे होगे और पहले तो तुम कहती थी, रिलेशन में रह चुकी लड़की से कोई अच्छा लड़का शादी क्यों करेगा ? या तो वो अच्छा नहीं होगा या फिर वो तरस खाकर दया करके शादी करेगा. लेकिन अब तो तुम कामयाब बिजनेस वूमेन हो. पिछले पाँच साल से सारा बिजनेस अकैले संभाल रही हो. तुम्हारे पापा की तरह तुमने भी इन सात सालों में बहुत नाम कमा लिया. अब तो तुमसे शादी करने वालों की लाइन लगी हुई हैं.”

कृतिका मुँह बनाकर बोली—“मुझे तो शादी नहीं करनी, लेकिन तुम क्यों अब तक कुँवारे घूम रहे हो ? तुम तो शुरू से ही बहुत अच्छे हो और अब तो तुमने खुद की कम्पनी भी शुरू कर ली. नाम भी तुमने बहुत कमा लिया और लड़कियों की लाइन तो तुम्हारे लिए भी लगी हुई हैं. फिर भी तुम कुँवारे घूम रहे हो और वो आलोक तुमसे छोटा हैं, उसके दो बच्चे हो गए.”

सुदर्शन—“अभी तो तुमने कहा, तुम्हें तो शादी करनी ही नहीं हैं. जब तुम शादी नहीं करोगी तो फिर मेरी शादी कैसे हो सकती हैं ?”

कृतिका—“अरे, ये क्या ? मेरी शादी से तुम्हारी शादी का क्या कनेक्शन ?”

सुदर्शन—“तुम कहती हो, तुम्हें शादी नहीं करनी. और मुझे शादी तुमसे करनी हैं. बस यहीं कनेक्शन हैं.”

कृतिका हैरान होकर सुदर्शन की तरफ देखते हुए बोली—“क्या बोले ? जरा फिर से बोलकर दिखाओ.”

सुदर्शन मन में सोचने लगा कि कमाल हैं, आज जैसे–तैसे करके मुँह से बात निकली और इसे सुनाई देना बन्द हो गया.

कृतिका—“अरे, बोलो ना.”

सुदर्शन— “तुम कहती हो, तुम्हें शादी नहीं करनी. और मुझे शादी तुमसे करनी हैं. बस यहीं कनेक्शन हैं.”

कृतिका मुँह फुलाते हुए बोली—“तो पहले क्यों नहीं कहा ?”

सुदर्शन—“पहले तुमने कभी पूछा ही नहीं.”

कृतिका—“लेकिन तुम्हें तो रिलेशन बनाने वाली लड़कियाँ पसन्द ही नहीं थी ना.”

सुदर्शन ने कृतिका का हाथ पकड़कर कहा—“रिलेशन बनाने में और किसी धोखेबाज के चक्कर में आकर मुर्ख बनकर रिलेशन बनाने में फर्क होता हैं.”

कृतिका ने सुदर्शन के हाथ पर अपना हाथ रखकर कहा—“लेकिन मैं अब अपने मम्मी–पापा की मरजी के बिना कुछ नहीं करती. पता नहीं, मम्मी–पापा हमारी शादी के लिए मानेगें या नहीं ?”

सुदर्शन हँसने लगा.

कृतिका हैरान होकर बोली—“क्या हुआ ?”

सुदर्शन जोर से हँसने लगा.

कृतिका—“ये पागलों की तरह हँसते ही रहोगे या बताओगे ? कि क्या हुआ ?”

सुदर्शन ने अपनी हँसी रोककर कहा—“तुम्हारे मम्मी–पापा को तो मैनें सात साल पहले ही पटा लिया था. वो तो अन्दर हमारी शादी की डेट फिक्स कर रहे हैं. वो देखो, पीछे खिड़की में.”

कृतिका ने खड़ी होकर पीछे मुड़कर कहा—“आप लोगों को सब पता था, पहले से ?”

सभी लोग हँसते हुए घर से बाहर लोन में आ गए. सुदर्शन बैंच से खड़ा हो गया. सेठ साँवरमल बागड़ी और राजलक्ष्मी कृतिका के पास आए.

सेठ साँवरमल बागड़ी—“अब जो लड़का खुद की खुशी से ज्यादा तुम्हें खुश रखने के बारे में सोचता हैं. उसे हम नापसन्द कैसे कर सकते हैं ?”

राजलक्ष्मी—“हम तो सात साल पहले ही मान गए थे. लेकिन सुदर्शन ने कहा, वो शादी से पहले तुम्हें खुश रखने लायक बनना चाहता हैं.”

कृतिका—“और आप दोनों ने मुझे बताया भी नहीं ?”

सुदर्शन ने स्टाईल से कहा—“अरे कृतिका, बड़ों की बात बच्चे नहीं समझते.”

कृतिका सुदर्शन की तरफ आते आए बोली—“तुम रूको, अभी समझाती हूँ, तुम्हें तो.”

सुदर्शन कृतिका से बचने के लिए इधर–उधर होने लगा. सभी उनको देखकर हँसने लगे. सुदर्शन कृतिका से बचकर भाग गया और कृतिका सुदर्शन के पीछे–पीछे भाग गई.


छत्तीस दिन बाद पच्चीस नवम्बर, सोमवार को दोपहर दो बजे गाजे–बाजे के साथ दुल्हा बनकर सुदर्शन कृतिका के घर बारात लेकर आया. बहुत धुमधाम से कृतिका और सुदर्शन की शादी सम्पन्न होने के बाद शाम के आठ बजे दुल्हन बनी हुई कृतिका सुदर्शन के साथ सुदर्शन के घर अपने ससुराल जाने के लिए अपने पिता के घर से विदा हुई.

गाड़ी चलते हुए कुछ दूर आने के बाद गाड़ी में पिछली सीट पर बैठी कृतिका ने अपने पास बैठे सुदर्शन से कहा—“तुमसे एक बात कहूँ ?”

सुदर्शन—“हाँ, जितनी मरजी बातें कहो.”

कृतिका—“अगर तुम मेरे लिए ये घर और गाड़ी नहीं भी बना पाते, तब भी मैं हर हाल में तुम्हारे साथ सारी जिन्दगी गुजार लेती.”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“हाँ, मालूम हैं.”

कृतिका—“जब मालूम हैं, तो फिर ये शादी से पहले घर और गाड़ी का सपना पूरा करने की बात बोलकर सात साल इंतजार क्यों किया ?”

सुदर्शन—“वो इसलिए क्योंकि प्यार का मतलब दूसरों से समझौता करवाना नहीं होता. कि मैं तो ऐसा हूँ, अगर प्यार हैं, तो इसी हाल में एडजस्ट करो. खुद को दूसरों के लायक बनाना ही सच्चा प्यार हैं. जैसे तुम मेरे लिए अपनी हाई–फाई लाइफ़ छोड़कर मेरे साथ किराये के कमरों या किराये के घरों में रहने के लिए तैयार थी. अब अगर तुम्हारे इस प्यार का फायदा उठाक उस वक्त मैं तुमसे शादी कर लेता, तो ये खुदगर्जी होती. इसलिए मैनें शादी से पहले खुद को तुम्हारे लायक बनाया. तुम्हारी जो गलत आदतें थी, गन्दी–गन्दी गालियाँ निकालना, शराब पीकर घूमना–फिरना, उन सारी गलत बातों को तुम्हारी जिन्दगी से दूर करना ठीक हैं, लेकिन तुम्हारी जिन्दगी बदलकर तुम्हें एडजस्ट करने के लिए कहना सही नहीं होता.”

कृतिका—“लेकिन अब अगर ऐसा कोई टाइम आ जाए, जब हमें एडजस्ट करना पड़े तो ?”

सुदर्शन—“मजबुरी एक अलग बात हैं. जान–बुझकर किसी को दलदल में लाना अलग बात हैं. ऐसे तो मुझे लड़के और लड़की का शादी किये बिना साथ रहना भी पसन्द नहीं हैं. लेकिन मजबुरी थी, बुरा टाइम था, इसलिए मैनें दो रातें तुम्हारे साथ गुजारी. हालांकि हमने एक–दूसरे को उस इरादे से हाथ भी नहीं लगाया, फिर भी देखने–सुनने वाले तो वहीं सब सोचते हैं.”

कृतिका ने मुस्कुराकर कहा—“हम्म………”

सुदर्शन ने गंभीर होकर कहा—“लेकिन मेरी एक शिकायत तुमसे अभी तक बनी हुई हैं.”

कृतिका हैरान होकर बोली—“कैसी शिकायत ?”

सुदर्शन—“छोड़ो, क्या फायदा कहने से ? अब तो शादी भी हो गई. आज सुहागरात भी हो जाएँगी.”

कृतिका ने उदास होकर कहा—“प्लीज, बताओ. क्या बात हैं ?”

सुदर्शन—“अरे, ये क्या ? तुम तो उदास हो गई. चलो फिर बता ही देता हूँ. जब तुम पहली बार मुझे मिली थी, उस वक्त तुमने मुझे अपना बॉयफ्रैंड समझकर बहुत बार आई लव यू बोला था. एक गाना भी गा दिया. पुलिसवालों से शिकायत करके पुलिसवालों को भी बता दिया. लेकिन उसके बाद आज हमारी शादी हो गई, फिर भी तुमने एक बार भी मुझे आई लव यू नहीं बोला.”

कृतिका मुस्कुराकर बोली—“तुमने भी तो नहीं बोला.”

सुदर्शन—“मुझे तो बोलना नहीं आता.”

कृतिका—“ओह………तो फिर पहले बोलना सीखो, फिर आकर मुझे बोल देना. जब तुम मुझे बोलोगें, उस वक्त मैं भी तुम्हें बोल दूँगी.”

सुदर्शन—“हत तेरे की. इससे अच्छा तो मैं भी तुम्हारे बॉयफ्रैंड की तरह होता. एक आई लव यू बोलने में इतने नखरे ?”

कृतिका—“ओहो, आई लव यू सुदर्शन–आई लव यू सुदर्शन–आई लव यू सुदर्शन–आई लव यू सुदर्शन.”

सुदर्शन मुस्कुराते हुए कृतिका के गाल पर किस करके बोला—“आई लव यू टू कृतिका.”

कृतिका मुस्कुराकर सुदर्शन के गले लग गई.

ड्राईविंग करता हुआ उम्र में इक्कतीस(31) साल का हो चुका आलोक बोला—“अरे भाई, मैं भी बैठा हूँ. घर तो आ जाने दे. फिर कर लेना, जितना मरजी प्यार. इतने सालों से तुझे बोल रहा था, करले शादी–करले शादी. तब तो कहता रहा, नहीं यार, मैं इंतजार करूँगा. अब गाड़ी में शुरू हो गए. घर पहुँचने का भी इंतजार नहीं हो रहा.”

सुदर्शन सीधा बैठकर बोला—“जब बहुत लम्बे इंतजार या बहुत मुश्किलों के बाद दो दिल मिलते हैं, फिर इंतजार नहीं होता.”

आलोक—“हम्म………समझता हूँ. और कृतिका जी, अब आप सुदर्शन को भी ड्राईंविग सीखा देना.”

कृतिका—“तो तुमने क्यों नहीं सिखाई ड्राईविंग ? एक साल हो गया, तुम्हें ड्राईविंग इंस्टीटयूट खोले हुए. अब तक तो सीखा देते.”

आलोक ने हँसकर कहा—“इंस्टीटयूट तो सुदर्शन ने ही मदद करके खुलवाया हैं, सब इसका ही हैं. लेकिन मैनें सोचा, जो बात आपसे सीखने में हैं, वो मुझसे सीखने में कहाँ होगी ? अब आप सीखा देना, आराम से प्यार करते–करते.”

आलोक के साथ सुदर्शन और कृतिका भी हँसने लगे. गाड़ी अपनी स्पीड से बढ़ती हुई चल रही थी.


शादी होने के पाँच दिन बाद तीस नवम्बर, शनिवार को सुबह के दस बजे पहले से बड़ा और आलिशान हो चुके नारायण के दो मंजिला घर सामने आकर सुदर्शन के साथ बैठी ड्राईविंग करती हुई कृतिका ने गाड़ी रोककर बन्द की.

सुदर्शन और कृतिका गाड़ी से उतरकर नारायण के घर की तरफ आने लगे.

दरवाजे पर खड़े उम्र में अड़तीस(38) साल के हो चुके नारायण ने अपनी पत्नी से कहा—“सुदर्शन और कृतिका आ ग्या.”

सुदर्शन नारायण के पास आकर नारायण से गले मिला.

नारायण—“म तने ही अडीकन लाग रयो.”(हिन्दी अनुवाद : मैं तुम्हारा ही इंतजार कर रहा था.)

सुदर्शन—“थाने केयो तो हो, एक बारी ब्याह गो सारो काम हो जावे, फेर आराम उ आवागा.”(हिन्दी अनुवाद : आपको कहा तो था, एक बार शादी के सारे रस्म–रिवाज हो जाए, फिर आराम से आएगें.)

नारायण—“चालो, अब तो सब आछी तरया होग्यो, सगळो काम ?”(हिन्दी अनुवाद : चलो, अब तो सब अच्छी तरह हो गए, सारे रीति–रिवाज ?)

सुदर्शन—“सारो की अठैई गेट पर ही पूछ ले. मायने आण बई ना केई.”(हिन्दी अनुवाद : सब कुछ यहीं गेट पर ही पूछ लो. अन्दर आने के लिए मत कहना.)

नारायण हँसकर बोला—“अरे, सॉरी–सॉरी. आ मायने आ. आजा बाई.”(हिन्दी अनुवाद : अरे, सॉरी–सॉरी. आओ अन्दर आओ. आओ बहन.)

सुदर्शन और कृतिका नारायण के पीछे–पीछे अन्दर आए. नारायण की उम्र में छ्त्तीस(36) साल की हो चुकी पत्नी किचन से बाहर आकर कृतिका से गले मिली. चारों बैठकर आपस में बातें करने लगे.

शाम के चार बजे बैडरूम में बैठकर नारायण की पत्नी के साथ बातें कर रही कृतिका को बाहर नारायण के साथ सोफे पर बैठे सुदर्शन ने आवाज़ देकर कहा—“अब चले, कृतिका. सेठ जी और सुजाता मैडम ने भी बुलाया हैं.”

कृतिका नारायण की पत्नी के साथ बैडरूम से बाहर आते हुए बोली—“हाँ, चलते हैं.”

सुदर्शन ने खड़े होकर नारायण से कहा—“अच्छा, नारायण भाई जी.”

नारायण खड़ा होकर बोला—“हाँ, ठीक हैं.”

नारायण और नारायण की पत्नी सुदर्शन और कृतिका को गाड़ी तक छोड़ने आए. सुदर्शन ड्राईवर के पास वाली सीट पर बैठा और कृतिका ड्राईविंग सीट पर बैठ गई.

कृतिका—“आपके बच्चे नहीं दिखे ? स्कूल गए हैं क्या ?”

नारायण की पत्नी—“बच्चे तो आपकी शादी से वापस आकर अगले दिन ननिहाल चले गए. वहाँ कल मेरे भाई की शादी हैं.”

कृतिका—“फिर आप नहीं गए शादी में ?”

नारायण—“हम भी अब शाम को आठ बजे निकलेगें. सुदर्शन ने ऐजेन्सी लाइन के काम दिलवाकर तरक्की तो बहुत करवा दी, लेकिन अब टाइम नहीं मिलता. पहले तो रात को दस–ग्यारह बजे तक बैठे रहते थे. कोई ब्याह–शादी होता था, तो दो दिन पहले जाते थे और एक दिन बाद आराम से आते थे. अब तो बस भागते रहो, कोई अंत ही नहीं हैं. परिवार में या रिश्तेदारी में कोई शादी ब्याह होता हैं, तब भी दौड़ते–दौड़ते जाते हैं और काम होते ही वापस भागते हैं.”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“अब कुछ पाने के लिए कुछ खोना तो पड़ता ही हैं. या तो चैन–सुकून मिलेगा या रूपये–पैसे मिलेंगे. अच्छा फिर मिलेगें.”

नारायण—“हाँ, ठीक हैं.”

कृतिका गाड़ी स्टार्ट करके चलाने लगी.

कुछ देर बाद सुदर्शन ने कहा—“चार तो इसने ही बजा दिये. अब सेठ जी के घर भी काफ़ी टाइम लगेगा. आज तो हनुमानगढ़ नहीं जा पाएँगें. अब तो कल सुबह ही निकलना पड़ेगा.”

कृतिका—“हम्म………हनुमानगढ़ अगले हफ्ते चले जाते तो सही रहता.”

सुदर्शन—“नहीं, अभी ठीक हैं. दो दिन रूककर आ जाएँगें. एक बार सारे परिवार वालों को तुमसे मिलवाना हैं. उसके बाद कोई बुलाएगा तो जाएँगें, वरना क्या करना हैं, वहाँ जाकर ?”

कृतिका—“तुम्हारा मन नहीं करता, अब अपने शहर जाने का ?”

सुदर्शन—“मुझे यहाँ सेठ जी और सुजाता मैडम से बहुत प्यार और अपनापन मिला हैं. कभी–कभी जब मैं सोचता हूँ, तो सेठ जी और सुजाता मैडम मुझे अपने मम्मी–पापा से बढ़कर लगते हैं. मेरे मम्मी–पापा मुझसे इसलिए प्यार करते हैं, क्योंकि मैं उनका बेटा हूँ. अगर मेरा मेरे मम्मी–पापा से कोई रिश्ता नहीं होता, तो उनको मुझसे कोई मतलब नहीं होता. जैसे किसी अन्जान से किसी को कोई मतलब नहीं होता. लेकिन सेठ जी और सुजाता मैडम से कोई रिश्ता नहीं हैं, फिर भी उन्होंने ने मेरे लिए क्या–क्या किया हैं ? सब कुछ तुम्हें पता हैं. आज मैं जो कुछ भी हूँ, सिर्फ उनके ही कारण हूँ. तो ऐसे अपनों को छोड़कर मैं हनुमानगढ़ जाकर क्या करूँ ? मम्मी–पापा, भाई–भाभी, बहन–जीजाजी इन सबको यहाँ बुला लिया. भाई और जीजा जी का अच्छे से बढ़िया काम सैट करवा दिया. अब बाकि परिवार वाले और रिश्तेदारों में से किसी को कोई मदद चाहिए हो तो उनकी मदद करते हैं.”

कृतिका—“हाँ, सच में बहुत अच्छे लोग हैं. मुझे तो हैरानी होती हैं, कदम–कदम पर बुरे लोग मिलने वाली इस दुनिया में जय अंकल और सुजाता अंटी जैसे लोग भी हैं.”

सुदर्शन—“हाँ, वैसे तो उनकी जिन्दगी में सब कुछ बहुत अच्छा हैं. उनके तीनों बच्चे सृष्टी, अँकुश और संयम भी उनकी तरह बहुत अच्छे हैं. लेकिन कभी–कभी उनके लिए डर लगता हैं, कहीं उनकी अच्छाईयों का गलत फायदा उठाकर कोई उनके साथ कुछ बुरा ना कर दें.”

कृतिका—“चिन्ता मत करो. अच्छे लोगों की जिन्दगी में मुश्किलें और परेशानियाँ आ तो सकती हैं, लेकिन ज्यादा देर टिक नहीं सकती. तुमने देखा नहीं, इस उम्र में भी उनके चेहरे पर कितनी रौनक हैं. वरना इस उम्र में और कुछ नहीं तो, लोग बीमारियों से परेशान रहते हैं. लेकिन जय अंकल और सुजाता अंटी को देखो, एकदम फिट, बिल्कुल तंदरुस्त और हेल्थी हैं. मैं तो चार साल पहले सृष्टी की शादी से चार–पाँच दिन पहले उस वक्त हैरान रह गई, जब मैनें देखा, सुजाता अंटी पैंतीस किलो गेहूँ से भरी बोरी सर पर उठाकर बिल्कुल आराम से ले आई. जय अंकल भी चालीस किलो तक वजन कितनी आराम से उठा लेते हैं.”

सुदर्शन ने हँसकर कहा—“अरे, वो तो मेरे मम्मी–पापा भी आठ–दस साल पहले पचास की उम्र होने तक उठा लेते थे. वो क्या हैं ? पुराने लोगों की कुछ बातें बहुत अच्छी हैं. गरीब लोग तो अब भी मेहनत वाले काम करते हैं, लेकिन बड़े लोग अब नौकर–चाकर रख लेते हैं या फिर भारी काम पैसे देकर करवा लेते हैं. पहले बड़े(पैसेवाले) लोग भी अपने बच्चों से मेहनत वाले भारी काम करवाते रहते थे. अब मेहनत वाले भारी काम करने से भूख भी लगती थी, इसलिए पहले के बच्चे खाना पूरा खाते थे. इससे बच्चों का शरीर भी बढ़िया बन जाता था. जिम जाने की जरूरत नहीं पड़ती थी.”

कृतिका—“हाँ, ये सब तो मेरे मम्मी–पापा भी बताते रहते हैं.”

सुदर्शन—“पहले ज्यादातर लोग ऐसा करते थे. एक तो उस टाइम अब जितनी सुविधाएँ नहीं थी. दूसरा लोग चाहते थे, कि उनके बच्चे आलसी ना बने, मेहनती बने. सेठ जी और सुजाता मैडम ने भी अपने टाइम में मेहनत वाले भारी काम किये हैं. जैसे सर पर उठाकर पानी का मटका लेकर आना, गेहूँ, चावल, अनाज से भरी बोरी सर पर उठाकर लाना. जब मैं सेठ जी के पास जॉब करता था, उस टाइम सेठ जी और मैडम बताया करते थे, कि अपनी जवाँनी में वो पचास–साठ किलो वजन आराम से उठा लेते थे.”

कृतिका आँखे ऊपर करके हैरान होते हुए बोली—“बाप रे………पचास–साठ किलो वजन. मेरा तो पन्द्रह–बीस किलो वजन उठाते ही दम निकल जाता हैं.”

सुदर्शन ने हँसकर कहा—“इस मामले में हम पुराने लोगों की बराबरी नहीं कर सकते. ये जो पुराने लोग बीमार होते हैं ना. असल में ये लोग अपने गलत खानपान और नशे का कारण बीमार होते हैं. वरना सेठ जी और सुजाता मैडम को देखो, उनको घर के मेहनत वाले भारी काम करने की बिल्कुल भी जरूरत नहीं हैं, फिर भी घर के काम तो खुद ही करते हैं. कोई ज्यादा काम हो, तब दूसरों को बुलाते हैं. इससे उनको कभी दवाईयाँ लेने की जरूरत नहीं पड़ी. हर रोज अनार, सेब, केले, संतरे, चीकू, पपीता, आम, सभी फल खाते हैं. खाने में हर रोज बढ़िया हरी सब्जी जरूर बनाते हैं. इस तरह सेठ जी और सुजाता मैडम ये सब शरीर को फायदे पहुँचाने वाली चीजें तो हर रोज पेट भरकर खाते हैं और चाट–पकौड़ी, समोसा–कचौरी, चाउमीन–बर्गर, पिज्जा वगैरह हफ्ते–दस दिन में एक या दो बार थोड़ा–बहुत खाते हैं. सबसे बड़ी बात सभी तरह के नशे से पूरी तरह दूर हैं. तो एकदम फिट हेल्थी, सेहतमंद और तंदरुस्त क्यों नहीं होगें ?”

कृतिका—“हाँ, ये बात तो बिल्कुल सही हैं.”

सुदर्शन—“हम्म…और यहीं सब उन्होंने अपने बच्चों को सिखाया हैं. मैं इनके पास आया तो यहीं सब मुझे भी सीखा दिया.”

कृतिका ने हँसकर कहा—“और तुमने यहीं सब मुझे सीखा दिया.”

सुदर्शन ने हँसकर कहा—“और तुमने यहीं सब अपने मम्मी–पापा को सीखा दिया.”

कृतिका खिलखिलाकर हँसते हुए बोली—“और अब हम दोनों मिलकर यहीं सब अपने बच्चों को सिखाएँगें.”

कृतिका को हँसते देखकर सुदर्शन की हँसी और ज्यादा खिल गई.

शाम के पाँच बजे कृतिका ने जयसिंह के घर के सामने गाड़ी लाकर रोककर बन्द कर दी. सुदर्शन और कृतिका गाड़ी से उतरकर जयसिंह के घर के दरवाजे पर जूते और सैंडल निकालकर घर के अन्दर आकर सीढियाँ उतरते हुए नीचे बेंसमेंट में आकर केबिन में आए.

जयसिंह—“अरे, आओ भई आओ.”

सुदर्शन और कृतिका ने मुस्कुराते हुए  जयसिंह के पास आकर जयसिंह के पैर छुए.

जयसिंह ने मुस्कुराते हुए दोनों को आशिर्वाद देते हुए कहा—“हमेशा खुश रहो.”

नीचे कारपेट लगे फर्श पर बैठकर ज्वैलरी चैक कर रही सुजाता ज्वैलरी छोड़कर खड़ी हुई.

सुदर्शन और कृतिका ने सुजाता के पास आकर सुजाता के पैर छुए.

सुजाता मुस्कुराते हुए बोली—“अरे, बस–बस. हमेशा हँसते–मुस्कुराते खुश रहो.”

जयसिंह—“इन्हें ऊपर ले जाकर चाय–नाश्ता करवाओ. मैं आता हूँ, थोड़ी देर में.”

सुजाता कृतिका के कंधे पर हाथ रखकर बोली—“हाँ, चलो. ऊपर चलते हैं. सुदर्शन, आ जाओ.”

सुदर्शन और कृतिका सुजाता के साथ केबिन से बाहर आकर सीढिया चढ़ते हुए ऊपर आकर सोफे की तरफ जाने लगे.

सुदर्शन—“सृष्टी, जीजाजी(सृष्टी के पति), अँकुश और संयम कहाँ हैं ?”

सुजाता—“अँकुश तो तुम्हारी शादी में शामिल होकर अगले दिन अपने ससुराल चला गया. वो पापा बनने वाला हैं ना, उसकी वाईफ का आखरी महिना चल रहा हैं. इसलिए वहाँ बहू के साथ रहेगा तो अच्छा हैं और संयम कल सृष्टी और जवाँई(दामाद) जी के साथ बैंगलोर चला गया. हफ्ते–दस दिन बाद आएँगा.”

सुजाता सोफे के पास आकर बोली—“तुम दोनों यहाँ बैठो. मैं तुम्हारे लिए चाय–नाश्ता लाती हूँ.”

कृतिका बोली—“चलिए, आपकी हेल्प कर देती हूँ.”

सुजाता—“अरे, तुम दोनों शादी के बाद पहली बार घर आए हो. इसमें हेल्प क्या हैं ? बस चाय ही तो बनानी हैं.”

कृतिका—“ओहो अंटी, आप भी क्या फॉर्मेलिटी करने लगी ?”

सुजाता ने मुस्कुराकर कहा—“अरे, सुदर्शन यहाँ अकैला बैठा रहेगा. अभी तुम बैठो और बातें करो. जब खाना बनाएँगें, तब हेल्प कर देना.”

सुदर्शन—“नहीं–नहीं, मैं नीचे सेठ जी के पास जा रहा हूँ.”

सुजाता—“अच्छा ठीक हैं.”

कृतिका सुजाता के साथ किचन में चली गई और सुदर्शन मुड़कर सीढिया उतरते हुए वापस नीचे बेसमेंट में चला गया.

रात को साढ़े दस बजे खाना खाने के बाद सोफे पर बैठी सुजाता और कृतिका सामने बैठे जयसिंह और सुदर्शन सब आपस में बातें कर रहे थे.

सुदर्शन ने कहा—“अच्छा, सेठ जी. अब हम चलते हैं. साढ़े दस बज गए.”

सुजाता—“अरे, साढ़े दस बज गए. बातों–बातों में पता ही नहीं चला. दो मिनट रूको, मैं अभी आती हूँ.”

सुजाता खड़ी होकर बैडरूम में गई और दो मिनट बाद हाथ में एक पैकेट लिए वापस आई. जयसिंह, सुदर्शन और कृतिका खड़े हो गए.

सुजाता ने सुदर्शन और कृतिका को पैकेट देते हुए कहा—“ये तुम दोनों के लिए हमारी तरफ से एक छोटा सा तोहफा.”

सुदर्शन—“मैडम, अब इसकी क्या जरूरत थी ?”

सुजाता—“क्यों ? हम तुम्हें गिफ्ट नहीं दे सकते.”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर जयसिंह की तरफ देखा. जयसिंह ने अपनी पलकें झपकाकर गिफ्ट लेने का इशारा किया. सुदर्शन ने कुछ बोले बिना मुस्कुराकर कृतिका को पैकेट लेने का इशारा कर दिया और कृतिका ने मुस्कुराते हुए पैकेट ले लिया.

सुदर्शन और कृतिका ने जयसिंह और सुजाता के पैर छूए.

जयसिंह और सुजाता एक साथ बोले—“हमेशा खुश रहो और तुम दोनों के प्यार को किसी की नजर ना लगे.”

सुदर्शन—“अच्छा, मैडम हम चले.”

जयसिंह—“अरे, पैकेट खोलकर तो देखो, उसमें क्या हैं ?”

कृतिका पैकेट खोलकर देखने के बाद बोली—“ये तो हनीमून ट्रिप के टिकट हैं.”

सुजाता ने मुस्कुराते हुए कहा—“हाँ, मुझे पता था, ये सुदर्शन तो अपने सेठ जी की संगत में कंजूस हो गया हैं. ये तो तुम्हें कहीं लेकर जाएँगा नहीं. इसलिए ये काम भी मैनें ही कर दिया. अब तुम दोनों तीस दिन के लिए घूमने जाओ और जल्दी से खुशखबरी देना.”

सुदर्शन और कृतिका शर्माकर इधर–उधर देखते हुए मुस्कुराने लगे.

सुजाता—“चलो, अब घर जाओ. देर हो रही हैं.”

सुदर्शन ने सुजाता और जयसिंह से कहा—“आपसे एक बात पूछूँ ?”

सुजाता—“हाँ, बोलो.”

सुदर्शन—“पहले तो मैं आपके पास नौकरी करता था. उस वक्त आप लोग कहते थे, मैं मेहनत, लगन और ईमानदारी से नौकरी करता हूँ, उसके बदले में आप भी मेरे लिए कुछ कर देते हो. लेकिन अब पिछले सात सालों में आपकी नौकरी छोड़ने के बाद आपने जो मेरी इतनी मदद की. मुझे खुद का बिजनेस शुरू करवा दिया. शुरू के दो साल बहुत खराब रहे, तो आप लोगों ने मेरे बिजनेस पर पचास लाख से ज्यादा खर्च करके मेरी हेल्प की और ढ़ाई–तीन साल बाद बिजनेस अच्छा चलने लगा, वरना आप लोग और मदद करते. फिर जब मैं आपको आपके पैसे वापस देने आया, तब भी आप लोग ले नहीं रहे थे. मैनें जबरदस्ती आपको आपके पैसे वापस दिये. बिना किसी रिश्ते के आप लोगों का इतना प्यार और अपनापन पाकर मैं हैरान हूँ.”

सुजाता ने मुस्कुराते हुए सुदर्शन के सर पर हाथ रखकर कहा—“एक बार तुमने मुझे माँ कहा था ना. तो माँ के प्यार पर हैरानी कैसी ?”

जयसिंह—“और जब से तुम हमारे पास आए हो, हमने तुम्हें अपने बच्चों की तरह समझा हैं. अब कहने वाले कहते हैं, हिसाब तो बाप–बेटे का भी होता हैं. लेकिन जब रिश्ता दिल से जुड़ जाए, फिर कोई हिसाब नहीं रहता.”

सुदर्शन—“लेकिन सेठ जी आप लोगों की अच्छाई का बुरे लोग गलत फायदा भी उठा सकते हैं. आपने सृष्टी, अँकुश और संयम को भी आपके सारे गुण दिये हैं. वो तीनों भी बिल्कुल आपकी तरह बहुत अच्छे हैं. बस इसीलिए कई बार आप सबकी चिन्ता हो जाती हैं.”

सुजाता ने हँसकर कहा—“बुरे लोग गलत फायदा उठाकर एक बार धोखा दे सकते है, दो बार धोखा दे सकते हैं. फिर वो अपना चेहरा दिखाने लायक नहीं रहते. हमने बहुत से लोगों को उनकी मुसीबत और परेशानियों में मदद की. लेकिन जब उनको मौका मिला, कोई रूपये–पैसे लूटकर भाग गया. कोई ज्वैलरी लूटकर भाग गया. और बहुत से लोगों की गन्दी नीयत भी सामने आई. अब वो लोग कभी हमें अपना चेहरा नहीं दिखा सकते.”

जयसिंह—“और अगर तुम चाहते, तो तुम भी इस तरह से रूपये–पैसे लूटकर भाग सकते थे. लेकिन तुमने ऐसा नहीं किया, इसलिए तो तुम बिल्कुल हमारे घर के सदस्य बन गए. हमें ऐसा लगने लगा, जैसे हमारे तीन नहीं, चार बच्चे हैं. रही बात तुम्हारी मदद की. तो जैसे तुम्हें कृतिका के आँशूओं में तुम्हारा खाया हुआ धोखा याद आता था. बिल्कुल उसी तरह हमें तुम दोनों के प्यार में अपना प्यार नजर आया. हमें भी कभी तुम्हारी तरह प्यार हुआ था. हमारी कहानी भले ही अलग–अलग हो, लेकिन प्यार का एहसास तो एक जैसा ही होता हैं ना.”

सुदर्शन ने मुस्कुराकर कहा—“हाँ, सेठ जी. मेरी धोखा खाकर बुरी हालत हुई थी, इसलिए मैं धोखे का दर्द समझता था. आपको और मैडम को एक–दूसरे से प्यार हुआ था, इसलिए आप लोग हमारा प्यार समझते हो.”

सुजाता ने मुस्कुराकर कहा—“हम्म…”

सुदर्शन—“अच्छा मैडम, हम चलते हैं.”

सुजाता—“हाँ, ठीक हैं.”

जयसिंह और सुजाता सुदर्शन और कृतिका को छोड़ने बाहर आए. कृतिका ड्राईविंग सीट पर बैठी और सुदर्शन दूसरी तरफ बैठा. कृतिका ने गाड़ी स्टार्ट की और सुदर्शन के साथ जयसिंह और सुजाता को बाए–बाए बोलकर गाड़ी चलाकर ले गई.

जयसिंह और सुजाता हँसते हुए घर के अन्दर आए. जयसिंह दरवाजा अन्दर से बन्द करने लगे. सुजाता दरवाजे के पास चप्पल उतारकर बैडरूम में आकर बैड पर बैठ गई.

जयसिंह बैडरूम में आकर सुजाता के पास बैठते हुए बोले—“हम्म…आखिरकार सुदर्शन और कृतिका की शादी हो गई.”

सुजाता—“हाँ, जिनका प्यार सच्चा हो, उनका मिलन देर–सवेर हो ही जाता हैं.”

जयसिंह ने एक हाथ सुजाता के गले में डालकर दूसरा हाथ सुजाता के गाल पर रखकर सुजाता के होंठ अपने होंठ के पास लाते हुए मुस्कुराहट के साथ कहा—“हाँ, अब हमारा मिलन भी हो जाए.”

सुजाता जयसिंह से खुद को छुड़ाते हुए बोली—“अरे, अब तो शर्म करो. हम नाना–नानी बन गए हैं और दादा–दादी बनने वाले हैं.”

जयसिंह फिर से सुजाता को अपनी बाहों में समेटकर बोले—“अब ये किसने कहा, कि नाना–नानी और दादा–दादी बनने के बाद प्यार नहीं कर सकते ?”

सुजाता जयसिंह के गले में अपनी बाहें डालकर जयसिंह से आँखें मिलाते हुई बोली—“कुछ लोग तुम्हें ठरकी बुढ़ा और मुझे बुढ़ी घोड़ी लाल लगाम बोलते हैं ?”

जयसिंह—“अब बोलने वालों को बोलने दो. अगर बोलने वालों के बारे में सोचते, तो हम मिल ही नहीं पाते. जब हमने कुछ गलत नहीं किया, फिर बोलने वालों की परवाह क्यों करें.”

सुजाता—“मतलब, तुम नहीं मानोगें ?”

जयसिंह—“क्यों मानू ? और आज तो तुम्हें बिल्कुल नहीं छोड़ सकता.”

सुजाता—“क्यों ? आज ऐसा क्या खास हैं ?”

जयसिंह—“बचपन में तुमने जो मेरी पिटाई की थी, उसका हिसाब बराबर करने के साथ–साथ आज जो तुमने सुदर्शन और कृतिका को हनीमून पर भेजा हैं, वो भी तो तुमसे वसूल करना हैं.”

सुजाता खिलखिलाकर हँसते हुए बोली—“तुम नहीं सुधरोगें. चलो, करती हूँ तुम्हारे हिसाब बराबर.”

जयसिंह मुस्कुराकर सुजाता को गले लगाते हुए बोले—“जब बदले में तुमसे प्यार करने का बहाना मिल रहा हैं, तो मैं क्यों सुधरूँ ?”

सुजाता जयसिंह के गले लगकर मुस्कुराते हुए बोली—“और कभी सुधरना भी मत. आई लव यू.”

जयसिंह बचपन में सुजाता से हुई अपनी पिटाई के हिसाब बराबर और सुजाता का सुदर्शन और कृतिका को दिया हनीमून ट्रिप वसूल करने के लिए सुजाता को बाहों में भरकर जयसिंह सुजाता की बाहों में समाकर जयसिंह सुजाता के साथ बैड पर लेट गए.

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समाप्त

लेखक— वर्मन गढ़वाल

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