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@dawriter

वापसी

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jkalkal5047 by  
jkalkal5047


बहुत दिनों बाद लौटा हूँ इस कस्बे में। घर के बाहर पहरेदारी कर रहा नीम का पेड़ अपनी टहनियों को हिलाकर मुझसे गले मिलने को आतुर दिखाई दे रहा है। ऊँचे चबूतरे पर सज्जित तुलसी का पौधा इस बार मेरे सामने काफी बौना लग रहा है। सरसों और बथुआ के साग की महक मेरे नथुनों में भर रही है। माँ को पहले से ख़बर जो है मेरे आने की l

हमेशा की तरह देहरी पर कदम रखने से पहले ही उसके हाथ मेरे सिर की तरफ़ बढ़ चुके हैं। कुशल-क्षेम पूछकर वह खाना परोसने रसोई में चली गई है।

पलँग पर बिछी धुली चादर, दीवार पर टँगी हम दोनों भाईयों की तस्वीरें, खूँटी से लटकी पिताजी की बेंत, किताबों से भरी लकड़ी की भारी-भरकम अलमारी और उस पर रखी घड़ी सब कुछ पहले की तरह व्यवस्थित तथा इस घर में रहने वाले लोगों का सदा के लिए साथ निभाने को तत्पर दिखाई दे रहे हैं। सामने दीवार पर लगा बड़ा कलर टी.वी. और खिड़की से झाँकता कूलर पिताजी की रौबीली आवाज़ में गवाही दे रहे हैं, "मै अभी ज़िंदा हूँ"।

एक फ़ोटो में हम दोनों भाई एक दूसरे के कंधे पर हाथ रखकर मुस्कुराते हुए खड़े हैं। छोटे के गले में गोल्ड मेडल चमक रहा है जो उसने दौड़ में जीता था। वह शुरू से ही बड़ा महत्त्वाकांक्षी था। जल्द अपनी डॉक्टर की पढ़ाई पूरी कर ऑस्ट्रेलिया जाकर सेट हो गया।

"तुझे याद है इस दौड़ को जीतने के लिए छोटे ने कितना हंगामा किया था"।

माँ खिलखिलाई।

सच तो है उसके किसी खेल में भाग लेने की बात से ही सारा घर काँपता था क्योंकि हारना छोटे को कभी बर्दाश्त नहीं था। अगर कहीं वह किसी कम्पीटिशन में हार जाता तो आँगन के गमले और कभी कभार एकाध कप गिलास भी टूट जाते थे।

"मैने उसके सारे ईनाम सम्भाल कर रखे हैं। वक्त कैसे बीत जाता है पता ही नहीं चलता,लगता है जैसे कल ही की बात हो"। माँ बड़े प्यार से एक मेडल पर हाथ फिरा रही है जैसे अपने छोटे बेटे को छूकर भर भर दुआएँ उसके पास भेज रही हो।

"अब इसके बच्चे इसी तरह परेशान किया करेंगे तब पता चलेगा इसे।........या हो सकता है...... ना भी करते हों।"

आँखों की दहलीज को पार कर बाहर आने को बेताब नमी को चुपके से पोंछकर वह फिर से मुस्कुराती हुई बाहर लोहे के गेट को निहारने लगती है।

मैने भी तो छोटे के बच्चों को फ़ेसबुक और व्हाट्स एप पर ही बड़े होते देखा है। माँ मेरे बच्चों के बारे में पूछने लगती है। राजी खुशी बताकर मै फटाफट मोबाइल में मैसेज चेक करने लगता हूँ। मेरे मन का डर भाँप कर वह बुदबुदाने लगती है।

"तुम्हारे पिताजी पता नहीं कहाँ रह गए?"

जैसे मुझे यकीन दिलाना चाहती हो की इस औपचारिक मुलाकात के लिए उसकी तरह पिताजी भी राजी थे। पर इस सब से अगर कुछ अलग है, तो वह है चौखट के पास बैठा एक कुत्ता जो काफी देर से अंदर आने की कोशिश में है। माँ बार-बार उसे भगा रही है लेकिन वो बड़े हक से उनके आगे पीछे अठखेलियाँ कर रहा है, जैसे घर का सदस्य ही हो। थकान होने के कारण मुझे तुरंत झपकी आ गई।

थोड़ी देर बाद माँ की आवाज़ सुनकर जाग जाता हूँ। शायद पिताजी आ गए। उठकर देखता हूँ। माँ उसी कुत्ते के साथ इस तरह बतिया रही है, जैसे वो कोई छोटा बच्चा हो। माँ हँस रही है। खुश हो रही है। उस पर ममता उंडेल रही है। जैसे फिर से हम दोनों भाइयों के बचपन को उसके साथ जीने की कोशिश कर रही हो। पुचकार, मनुहार कर खाना खिला रही है। अचानक मुझे देखकर झेंप जाती है।

"बेचारा बेज़ुबान जानवर है। एक दो बार इसे दो टूक क्या खिला दिए, तब से यहीं बैठा रहता है। "अपना ज़िक्र होते देख कुत्ता 'इंट्रोडक्शन' के तरीके से पूंछ हिलाता हुआ, खुशामद करता मेरे पैरों में आकर लोटने लगता है मगर मै उसे "हिश्" कहकर दुत्कार देता हूँ। माँ बनावटी गुस्सा दिखाते हुए उसे थोड़ी देर बाहर बैठने को कहती है। वह अपने पंजों के ऊपर मुँह रखकर वहीं जम गया है। मै खाना खाते हुए उसे घूर रहा हूँ। मेरे मन में पनपी दुर्भावना को समझते हुए वह थोड़ा बाहर की ओर सरक गया है। "इतने बड़े घर में सारा दिन अकेले रहते हैं ना, बस यह बेचारा दिखता रहता है तो खालीपन नहीं काटता। तेरे पिताजी तो फिर भी अपनी रिटायर्ड मंडली में बैठ आते हैं।"

वह मेरी खातिर बेचैन सी होकर फिर से मेहमाननवाज़ी में जुट जाती है। "वो जरूर सरपंच से मिलने गए होंगे। आजकल सरकार घर घर शौचालय बनवाने पर ज़ोर दे रही है ना, बस उसी में लगे हैं। पूरे गाँव की देख रेख का जिम्मा जैसे इन्हीं पर है। तुझे जाने की जल्दी होगी। उनके मोबाइल पर मिस कॉल मार दे।"

कहकर वह थोड़ा शरमा गई है। महसूस कर रहा हूँ चोर नज़रों से वह उसी कुत्ते को अपनी मजबूरी का अहसास दिला रही है। मै सोचना नहीं चाहता कि माँ को मेरे लौटने की जल्दी है या फिर कुत्ते को अंदर बुलाने की ।

"पिताजी से बाहर ही मिलता चला जाऊँगा"। कहकर मै खुद को आँगन में खींच लाया हूँ। वह ढेरों आशीर्वाद देती हुई देहरी तक आ गई है। कुत्ता उसके पैरों में खड़ा मुस्कुरा रहा है। एक आवारा और देसी कुत्ता मेरी जगह कभी नहीं ले सकता। मै असहज हो रहा हूँ। "ठीक कहा तुमने। तुम कलयुगी बेटे हो और मै एक वफादार कुत्ता। क्या पता दुबारा कभी इन बूढ़े माँ बाप की सुध लेने आओगे भी या नहीं। या हो सकता है एक की मौत की ख़बर सुनकर एक दूसरे से कह दो की इस बार तुम चले जाओ अगली बार मै जरूर छुट्टी ले लूँगा।

मगर मै अंत समय तक इनकी रोटी का हिसाब चुकाता रहूँगा"। मुझे माँ के मुँह पर चिंता और कुत्ते के चेहरे पर मुस्कान दिखाई दे रही है। आँखों पर काला चश्मा चढ़ाकर और नीम के पेड़ पर एक सरसरी निगाह डालकर मै चल देता हूँ, जल्दी लौटकर आने और माँ को एक महँगा और बढ़िया नस्ल का पढ़ा लिखा कुत्ता ला कर देने का वायदा करके.....।

ज्योत्स्ना कलकल



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