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लालबत्ती

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’’हाथ कट गया रे, गयी दैव के घर लालबतिया, लालबत्ती कट-कुट गयी। खून-खच्चर भयी लालबत्ती।‘‘ जिसने सुना वो अवाक, बदहवास सा भागा। सुबह-सवेरे का वक्त, गाॅव की जिन्दगी कुनमुनाती हुई कठिन दिनचर्या की तरफ बढ़ रही थी। पूस की ठंडी फागुन की बयारें लिये घूम रही थी जो बाशिंदों के कलेजों की सिप्पा बन कर छेद रही थी और जिसने लोगों का जीवन मुश्किल में डाल रखा था। फिर भी जिन्दे डटा था। उसके तीन बीघे सरसों की सिंचाई हो चुकी थी। सुबह की पाली थी सो खेत के जिस हिस्से में पानी नहीं पहुॅचा था वहाॅ पर हाथा (कृषियंत्र) से उलच कर पानी पहुॅचाने की तैयारी कर रहा था। तब तक उसे दूर कोहरे और धुॅध को चीरती हुयी उसकी माॅ आती दिखी। वो इतनी सुबह-सुबह माॅ के आने की उम्मीद नहीं कर रहा था। वैसे भी माॅ की तरफ से उसका मन खट्टा था। कल रात जोरदार झगड़ा हुआ था उसका माॅ से। उसकी बीवी कहती थी कि पुराने मुद्दे को सुलझाओ। अब इस घर में रहना असह्य हो गया है। उसकी बीवी ने रट लगा रखी थी कि परम दारू पीने के बाद उसे ललचाई नजरों से देखता है। किसी दिन मौका पाकर वो उस पर झपट पड़ा तो? हमेशा की भाॅति जिन्दे ने अपनी बीवी रूचि की इस सोच को वहम बताया था। उसने बीवी को खुद के होने की तसल्ली दिलायी थी और निश्चिन्त रहने को कहा था। मगर उसका मन खुद अंदेशों से भरा था। हमेशा की भाॅति जिन्दे की माॅ ने इस सबको सुनकर अनसुना कर दिया था, मगर आज उसकी बीवी के मिजाज कुछ ज्यादा ही बिगड़े हुये थे। खुद की बात को महत्वहीन होते देख रूचि ने विग्रह कर दिया था और आगे बढ़कर जिन्दे की माॅ से अपना बच्चा छीन लिया और बिफरते हुये बोली ‘‘उसे भी छिनालपन सिखा रही हो क्या? खुद का तो धर्म-सत्त गों गों गों’’ करती रह गयी रूचि। क्योंकि तब तक जिन्दे के छोटे भाई बिन्दे ने उसका गला दबाना शुरू कर दिया था। जिन्दे ने दौड़कर छोटे भाई बिन्दे को झटका और छोटे भाई पर पिल पड़ा। अम्मा तब तक चिंघाड़ीं ‘‘छोड़ हरामी छोड़ उसे, इस छिनाल के लिये अपने भाई को मारेगा’’। रूचि ये सुनकर चिहुंकते हुये बोली ‘‘नौ सौ चूहा खाय के बिल्ली हज करै। मैं छिनाल हूॅ, तुम सती-सावित्री हो का’’? इस बार जिन्दे की माॅ तुलसी तिलमिला गयी। वो दौड़ी और उसने रूचि की चोटी पकड़ ली और थप्पड़ ताना मगर वार करने की उन्होने कोशिश न की। तने हुये थप्पड़ के संभावित हमले से रूचि भयाक्रांत हो गयी और उसने अपनी सास पर हाथ उठाने के धर्मसंकट से बचते हुये नारी सुलभ प्रत्युत्तर में उन्हें धक्का दे दिया। अम्मा के जमीन पर गिरते ही जिन्दे-बिन्दे पुनः गुत्थमगुत्था हो गये। तब तक हाथ में कीचड़ लगाये हुये दौड़ते-हाॅफते युधिष्ठिर कहीं से आ गये और अपने दोनों बेटों को अलग कराया।

 

झगड़ा छूटने से पूर्व बिन्दे ने जिन्दे की कलाई पर दाॅत से काट लिया था और जिन्दे के थप्पड़-घूंसों से बिन्दे का मुॅह सूज चुका था। हालाॅकि दोनों भाई बेमन से ही लड़े थे, मगर उनकी लड़ाई उनसे जुड़ी स्त्रियों की साख और महत्व से अछूती न थी। पत्नी एवं माॅ से जुड़ी निष्ठा ने दोनों युवकों से वार कराये तो उनके जिस्मों पर चोट आनी लाजिमी थी। युधिष्ठिर, जिन्दे को खींचते हुये बाहर ले गये। गाली-गलौज तो चलती रही, मगर वार करने के और प्रयास न हुये। ये सब पंवारा इस घर का रोज का शगल बन चुका था। क्योंकि जब से जिन्दे की बीवी रूचि ने नौकरी पकड़ी है भले ही बारह सौ रूपये महीने वाली और जिन्दे को संविदा की पचास पैसे किलोमीटर वाली कंडक्टरी जब-तब मिल जाती है तब से उनके मिजाज बदले-बदले नजर आते हैं। अब परमजीत, रूचि को गुंडा नजर आता है हालाॅकि अब भी वो चाचा ही पुकारा जाता है। रूचि कहती थी कि अब वो पिता-तुल्य न था वो एक निकृष्ट इंसान था जो कि घर की बदनामी का सबब बन रहा था। हालाॅकि घर पहले से बहुत बदनाम था। पहले ये घर बदहाल भी हुआ करता था। तब मुफलिसी थी, मगर गुजारा तो ही ही रहा था। ले-देकर दो बच्चे और महज तीन बीघे की खेती। बच्चे धनोपार्जन के कुछ-न-कुछ उपाय करते रहते थे। मगर उसे रोजगार की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता था। उन्हीं दिनों युधिष्ठिर माली की नौकरी से निलम्बित हुये थे क्योंकि दारू की लत में उन्होने अपने दलित साहब से ठाकुर होने की धौंस देकर गाली-गलौज की थी। आरोप पत्र तगड़ा था सो निलम्बन घाव नहीं, नासूर की तरह लम्बा चलना था। यकीनन अभाव था मगर थोड़ी-बहुत बाहर की आमद राहत देती थी। अब तो फांके ही फांके थे। बाप लाचार, बच्चे परेशान तो फिर घर की औरत तो और हल्कान थी। दारू ने शरीर और आत्मा दोनों को तोड़ा था युधिष्ठिर के। उन्हीं दिनों परमजीत से जिन्दे का साबका हुआ। परमजीत ट्राले को धोने के लिये गाॅव आने लगा। परमजीत की पुरानी आदत थी कि जिस घर से उसे रोटियां मिलती थीं उस घर को वो अपना लेता था। युधिष्ठिर और परमजीत हमप्याला हो गये, साथ में गोश्त ट्राले के नीचे स्टोव जलाकर बनाया जाता था। कालान्तर में वही गोश्त घर के चूल्हे पर भूना जाने लगा। जब चाय के लाले थे उस दौर में घर के मुखिया को शराब भी मिल गयी तो क्या कहने? उन्ही दिनों परमजीत का तआरूफ ठकुराइन से हुआ था जो धीरे-धीरे प्रगाढ़ होता चला गया था। धीरे-धीरे ठकुराइन ने छिन्नी धोती त्याग दी और वे साड़ियां पहनने लगीं। फिर धीरे-धीरे वे भी महत्वपूर्ण हो गयीं महत्व के ओढ़ावे-पहनावे के बदौलत। उनके जेवरों का वजन बढ़ता गया। मास्टर को घूस देकर उनका जिन्दे इंटर पास हो गया। उनके धर में पक्का शौचालय बन गया तब भी वे सुबह खेतो में जाती थीं।

 

वहाॅ वे अपने पक्के शौचालय के शान में कसीदे गढ़तीं और नित नये-नये फैशन के बारे में बातें करती। सुबह खेतों मेें वे कहती कि उने पेट में मरोड़ है क्योंकि कल रात को उनके घर मुर्गा बना था। गाॅव की औरतें जल-भुन जातीं कि जहाॅ उन्हें सत्तू-पिसान के लाले थे वहीं इनके घर मुर्गा-अण्डा ही पकता था। चुहल या ईष्र्या के कारण वे तुलसी भौजी से लालबत्ती हो गयीं-लालबत्तीं यानी कि महत्वपूर्ण। गन्ने का सीजन चला तो उनके बरामदे की फर्श भी पक्की हो गयी। क्योंकि काॅटे से जो ट्राला गन्ना लादकर चीनी मिल को जाता था, परमजीत उसे गाॅव के मुहाने पर पहुॅचकर दस-बीस बोदी गन्ना लालबत्ती के लिये गिरा देता था। ट्राले के सैकड़ो टन गन्ने में सौ-पचास कुन्तल गन्ना कम हो जाने से कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता था। गन्ने के सीजन में लालबत्ती के घर पर डीजल की अस्थाई दुकान खुल जाया करती थी। क्योंकि परम टैंकर या ट्राले से जो डीजल चुराता था उसे लालबत्ती के चाय-चीनी के नाम पर दिया करता था। लालबत्ती अब जूतियां पहनकर गाॅव में घूमती थी और नव-वधुओं की भाॅति रंग-रोगन और सिंगार-पटार भी करती थी। वो पान हमेशा खाये रहती थी और दिन ढलते ही लहसुन-प्याज निकोलना शुरू कर देती थी मांस पकाने हेतु। वो अपना बहुत ख्याल रखती थीं और अक्सर दूसरों को सुनाते हुये कहती कि ठाकुर का मुकदमा फाइनल होने वाला है और बहाल होते ही वो फारिसगाड हो जायेंगे। गाॅव वाले युधिष्ठिर को वाचर जानते थे वे उसे माली हर्गिज न जानते थे। फिर परधानी की हवा बही तो लालबत्ती ने भी हाथ आजमाने की सोची। अभी दो-तीन साल पहले ही वे एक नल के लिये प्रधान से गिड़गिड़ाया करती थीं। प्रधान ने लगातार टालमटोल किया था और उनसे दिलजोई की कोशिशें की थी। उन्हे ये बात बहुत अखरी थी तथी उन्होने प्रधान को सबक सिखाने का सोचा था। भले ही लालबत्ती की जीत में संशय था मगर वे प्रधान को हरवा तो सकती ही थीं। वे जोर-शोर से परधानी लड़ने में जुट गयीं। उन दिनों कई टैंकर उनके दरवाजे पर धोये जाने लगे। माघ के महीने में हो रही परधानी में ट्राले-टैंकर के ड्राइवरों ने दिल खोलकर चन्दे दिये। क्योंकि उनके भाई-बन्धु परम के खासमखास लालबत्ती की प्रतिष्ठा जो दाॅव पर लगी थी। पूछते-पूछते ट्राले-टैंकर के ड्राइवर लालबत्ती के दरवाजे पर पहुॅच जाते उन्हे चन्दा और शुभकामनायें देकर विदा हो जाते। गाॅव के लंपटों, विधुरों की दिलचस्पी अचानक लालबत्ती में बढ़ गयी थी। हालाॅकि वे व्याहता थीं जवान हो रहे पुत्रों की माता थीं मगर उनसे दिलजोई हर कोई करता था। वे सार्वजनिक पद का चुनाव लड़ रही थीं मगर लोग उन्हे सार्वजनिक सम्पत्ति के तौर पर देखते थे। युधिष्ठिर का मुकदमा उच्च न्यायालय में अंतिम दौर में था इसीलिये टैंकर आजकल गन्ना गिराने के बाद किराये पर बारातें भी ढोता था। मामले की तारीखें हफ्ते दर हफ्तें टल रही थीं और परधानी के चुनाव की तारीखें काफी नजदीक आ चुकी थीं।

 

ऐन परधानी के चुनाव के वक्त युधिष्ठिर को मामले की सुनवाई हेतु लखनऊ जाना पड़ा। चुनाव में गन्ने के काॅटे के दलाल, काॅटा बाबू और तमाम टैंकरों के ड्राइवर-क्लीनर भी आ जुटे थे। तत्कालिक प्रधान को चिढ़ाने के लिए एक नल लालबत्ती के दरवाजे पर गड़वा दिया गया था। जो कि एलान था कि अब लालबत्ती नल और सौ-दो सौ के कर्जों से बड़ी चीज था। चुनाव की तैयारी और घेराबन्दी तो जोरदार हुयी थी मगर चुनाव के रंग कुछ अटपटे लग रहे थे। गाॅव में लालबत्ती को लेकर चुहल थी, दिलजोई थी, उत्सव था मगर परंपरागत ठाकुरों का गाॅव उन्हे चुनाव जिताकर बतौर आदर्श स्थापित नहीं करना चाहता था। क्योंकि वे नजीर बन सकती थीं और तमाम बहू-बेटियां उनके दिखाये गये रास्ते पर चलकर महत्वपूर्ण बनने की इच्छा पाल सकती थीं। उन्हें लेकर मुखर दिल्लगी थी मगर मौन विरोध भी था। सो लालबत्ती को अंदेशा हो गया था कि उनकी दाल शायद न गले। हालाॅकि लालबत्ती को अपनी बत्ती जलाने की इतनी फिक्र न थी जितनी जिद उन्हे तात्कालिक प्रधान की बत्ती बुझाने की थी। युधिष्ठिर लखनऊ में थे। नतीजे का अंदेशा था मगर वो सब अभी दूर था। सो आज हामियों का शुकराना तो अदा करना ही था। सो तमाम गन्ने के दलालो, टैंकर के ड्राइवरों और शुभचिंतको के लिए एक बधिया काटा गया और देसी दारू उपलब्ध थी ही। इस जश्न की वजह और वक्त, जिन्दे-बिन्दे की समझ से परे था मगर था तो था। अभावग्रस्त को संपन्नता दिखी तो स्वागत है कैसे भी आवेे? खाना-पीना देर तक चलता रहा। खानदान को शामिल होने की मनाही थी, बस खैर अंदेशों की महफिल थी। परमजीत पीकर लुढ़क चुका था। उसके सारे यार-दोस्त ट्रैंकर-ट्राले पर सोये थे। अचानक उसकी पीठ में दर्द उठा और वो कमरे में दवा लाने चला गया। उस दिन चालाकी से अपनी कसम देकर जिन्दे-बिन्दे को भी परम ने शराब पिला दी थी। मगर जिन्दे को नशे में भी इतना याद था कि आधी रात को गरमाकर कटोरी में कडुआ तेल ले जाते हुये उसने अपनी माॅ से पूछा था कि ‘‘ये किसके लिये अम्मा’’? ‘‘पहुना की पीठ में दर्द है’’ उसकी माॅ बताया था। ये सुनते ही जिन्दे ने अपनी आॅखे उनींदी कर ली थी। मगर सुबह जिन्दे ने परम की बनियाइन और अम्मा की साड़ी पर तेल ही तेल देखा था। उस रात जिन्दे का शरीर थकान से चूर-चूर था, नींद से आॅखे खुल नहीं रही थी मगर किसी अनहोनी की आशंका से उसका विचलित दिमाग उसे सोने नहीं दे रहा था। शरीर से ज्यादा मन की पीड़ा थी। नैतिक पतन की गवाही वो खुद था। आज उसे उन सुखों और एहसानों का मोल चुकाना था जो परम की बदौलत उसके घर में आये थे। उसने खुद को तसल्ली दी कि ये अक्षमतायें और दुश्वारियां पिता की नाकामी की वजह से हैं, न कि उसकी वजह से, मगर इंटर पास युवक को उसकी आत्मा ने झंझोड़ा कि क्या सिर्फ पिता ही इस सबके जिम्मेदार हैं, वो नहीं।

 

वही तो परम को इस घर में सुबह जल्दी ही स्नान कर लिया था मगर उसकी आॅखे सूजी हुयी थीं। जिन्दे-बिन्दे एक दूसरे से नजरें नहीं मिला पा रहे थे। मगर तुलसी ऐसा दिखा रही थी कि मानो कुछ हुआ ही न हो। अपराध बोध अवश्य था, पतिव्रता न थी मगर घर एवं संस्कार तो ठाकुरों का ही था। उनके नैहर-सासुर में सभी खौफनाक प्रवुत्ति के थे। उनका लहू फड़क सकता था। यदि जवान होते पुत्रों की माता ने बखेड़ा खड़ा किया तो खून-खराबा हो सकता था। यदि बवाल ही अंजाम था तो इस पीड़ादायक रात से गुजरने का फायदा क्या था। उसने अनमनयस्क पुत्रों को चैके में बैठा कर परोस-परोसकर छककर भोजन कराया गया। चारों तरह के व्यंजन के बाद खीर भी बनी। घर में संगीत भी बजाया गया ताकि माहौल हल्का-फुल्का बना रहे। लड़के हतप्रभ थे, कि क्या ये रात की घटनाओं का उत्सव था। परम भी हैरत में था कि ये स्वीकृति, ये उल्लास तो फिर रात को जो कश्मकश थी, वो क्या था? ‘वाह रे नारि और उसका तिरिया चरित्तर’। उनका अड़ोस-पड़ोस भी चकित था कि लालबत्ती जब परधानी हारने का इसरार कर चुकी थी तो फिर ये उमंग की हिलोरें कैसी? मगर वो तुलसी से लालबत्ती ऐसे ही नहीं बनी थी। यहाॅ-वहाॅ कहती फिरती ‘‘सबेरे-सबेरे मुझे सपना आया है कि ठाकुर का मुकदमा फाइनल हो गया है और वो फारिसगाड बन गये हैं। सुबह के सपने हमेशा सच होते हैं’’। लड़कों ने राम की मानसिक यातना से पिंड छुड़ाया और पिता के नौकरी से जुड़े अपने-अपने हसीन सपने बुनने शुरू कर दिये। परम भी निहाल था कि रास्ता खुल गया और अब रात का बवाल खतरनाक मोड़ न लेगा। उसके कृत्य को स्वीकृति मिल चुकी थी। लालबत्ती ने भी चैन की सांस ली कि चीजें काबू में है कि उसका पतन तो सिर्फ वो और उसके बच्चे जानते हैं मगर उसका उत्थान पूरा गाॅव जानेगा। गाॅव वालों ने इस असमय के उत्सव पर मिली-जुली प्रतिक्रिया दी। कुछ प्रसन्न थे कि अब युधिष्ठिर का घर बच जायेगा और नौकरी से उसके बाल-बच्चों का भविष्य भी बन जायेगा। गांव के दूरदर्शी व्यक्तियों ने चैन की सांस ली कि युघिष्ठिर अपने घर के खर्चे उठाने लगेगा तो परम की आमद रूक जायेगी। इससे गाॅव की गन्दगी हो जायेगी और दूसरे के घर की बहू-बेटियों के पाॅव बहकने के आसार कम होंगे जिनके लिये लालबत्ती कामयाबी की नजीर बनती जा रही थी। लोगों ने इसे अपनी दुआओं का कबूलनामा कहा। युधिष्ठिर और परधानी के नतीजे दोनों साथ-साथ आये। दोनों के कुछ निहितार्थ जरूर थे। जहाॅ परधानी में लालबत्ती चुनाव हार गयी थीं मगर वो परधान को हरवाने में भी कामयाब रही थीं। वे इसे अपनी फतह करार देती थी। मुकदमे में कुछ खास न हुआ था। बस एक अच्छी खबर ये थी कि जिन दलित साहब ने युधिष्ठिर को निलम्बित किया था वे अब खुद रिटायर हो चुके थे। थकान से टूटे युधिष्ठिर उम्मीद से लबरेज दिख रहे थे।

 

उनके लिये उस रात बने बकरे के कबाब से लालबत्ती ने कुछ बचा कर रखा था। युधिष्ठिर ने वो कबाब खाया तो वो निहाल हो उठा। उसने बकरा कटने का सबब पूछा तो पता चला कि परम ने उसके मुकदमे की खुशी से खुश होकर ये दावत दी थी। ये सुनकर वो पुलक उठा। और उसने और भी चाव से वो कबाब खाये। लालबत्ती ने उस रात की बची शराब उसे अपने हाथों से दी तो वो चिंहुक पड़ा। क्या ये वही लालबत्ती थी जो शराब के लिए हमेशा उससे लड़ती-भिड़ती रहती थी। कबाब जैसा तामसी भोजन और शारीरिक-मानसिक थकान से टूटे शरीर का शराब मली तो युधिष्ठिर ने लालबत्ती से संसर्ग की इच्छा प्रकट की। फिर तो जो हुआ उसकी तो उसने कल्पना तक न की थी। लालबत्ती झपटकर उन पर हावी हो गयी। एकांत में ही सही, उसने लाज-शर्म को त्यागकर नारी सुलभ लज्जा एवं शारीरिक अवस्था से परे जाकर प्रेमालाप किया। युधिष्ठिर पहले-पहल तो स्तब्ध हुये मगर बाद में निहाल हो उठे। भली स्त्री द्वारा पहल करके किया गया प्रेम किस पुरूष को गर्वानुभूति नहीं देता। लालबत्ती अक्रिय सहयोगी से सक्रिय सहयोगी बन चुकी थी। उसे तसल्ली एवं शांति थी कि पहल करके ही सही उसने अपने ब्याहता होने का कर्तव्य निभाया था। उस दिन के बाद जब कभी भी युधिष्ठिर ने संसर्ग करने की इच्छा की लालबत्ती ने पुरूष की भाॅति पहल करके उसे संतुष्ट किया। परम आता रहा-जाता रहा, युधिष्ठिर की पेशियाँ पड़ती रही और समय पंख लगाकर उड़ता रहा। पास के कस्बे इकौना में शिक्षा की मंडी सजती थी। दबंग ठाकुर फैन सिंह इण्टर कालेज के प्रिंसिपल थे। देसी मुर्गा, दारू और पांच हजार के साथ जो भी ठाकुर उनसे संपर्क करता उसकी इण्टरमीडिएट की वैतरणी पार लग जाया करती थी। अगर लड़का विजातीय हुआ तो पास कराने का रेट दस-बीस हजार तक भी हो सकता था। सुना है, ठाकुर साहब लंगोट के भी कच्चे थे, उसकी एवज में भी पास करवा देते थे। परम के पैसों के प्रताप से जिन्दे ने इण्टरमीडिएट और बिन्दे ने हाईस्कूल पास कर लिया था। परम के दिये बीस हजार के घूस से उसी साल उसकी रोडवेज में पचास पैसे किलोमीटर वाली कंडक्टर की संवदिा की नौकरी भी लग गयी थी। कंडक्टर का झोला हाथ में आया तो तमाम रिश्ते भी हाथ आने लगे। सो होते-करते उसी कंडक्टरी की बदौलत एक पढ़ी लिखी लड़की से उसका ब्याह भी पक्का हो गया था। इस रिश्ते में मिठास तब और भी घुल गयी थी जब परम ने तिलक में कन्या पक्ष से मिले दस हजार रूपये में खुद पंद्रह हजार मिलाकर बजाज का स्कूटर भी लालबत्ती के दरवाजे पर खड़ा करवा दिया था। लालबत्ती के अब तमाम काज सुधर चुके थे। वो बालों में खिजाब और पैरों में रंग बराबर लगाया करती थीं। उनकी बहू रूचि ने भी नौकरी शुरू कर दी थी। नौकरी महज बारह सौ रूपये वाली थी, मगर भविष्य की उम्मीदें तो जगाती थी।

 

लालबत्ती पर वक्त पूरी तरह से मेहरबान था इसीलिये साल भर के भीतर उन्हे पोता भी मिल गया था। क्या कहने उनके? लालबत्ती अब कान-कान तक खींसे निपोरा करती थीं। परम बच्चे को लेकर घूमा करता था। बच्चे का पहला जन्म दिन। अभाव में भी गुलछर्रे। कुछ को बुलाया, कुछ को न बुलाया। जिन्हे न बुलाया वे पट्टीदार जल-भुन गये। सुबह घर के दरवाजे पर हाथ से लिखे कई खत पाये गये कि गाॅव समझता है कि लालबत्ती की बहू का बच्चा भी परम का ही है। ढली उम्र की सास बहू के जरिये घर का खर्चा चलवा रही है। गाॅव में ये बात जंगल की आग के मानिंद फैली। दो-चार से होते हुये सैकड़ो मुॅह यही बाते कहने लगे कि जिन्दे का बच्चा परम की संतान है। हर तरफ बस यही चर्चा का विषय था। गाॅव-जवांर में छीछालेदर हुयी हुयी जा रही थी। मुॅह पर कोई कुछ न कहता मगर पीठ पीछे सब सिर्फ सही कहते थे। गाॅव एकमत था कि लालबत्ती का घर अब चकलाघर हो चला है। पंचायत तो न हुयी मगर फरमान जारी हो गया कि अब परम का आना ना काबिले बर्दाश्त है। वो आये तो मार भगाओ। परम ने सुना तो वो खिसक गया। वो भाग गया तो सारे आशंकायें और भी बलवती हो गयीं। आरोपों की बौछार रूक नहीं रही थी, हारकर रूचि ने जहर खा लिया। उसे लाद-फांदकर अस्पताल पहुँचाया गया। मामला थाना-कचहरी हो गया तो परम ने जिला ही छोड़ दिया। मक्तूला गिरफ्तार हो गयी, परम फिर पैसों के बूते पर बच निकला। रूचि को जमानत करवानी पड़ी और परम बगैर थाने में हाजिर हुये भेजे गये पैसों के बूते पर बरी हो गया था। कभी एक दूसरे को बहू-ससुर मानने वालों में अब घोड़ा-भैंसा का बैर था। चटखारे ले-लेकर इन लच्छेदार बातों की चर्चा गाॅव में बहुत दिनों तक चलती रही। लालबत्ती के रंग-रोगन को देखकर अब लोग ‘‘बूढ़ी घोड़ी-लाल लगाम’’ का जुमला उछालते हैं। रूचि ने घर छोड़ दिया था और वो पास के कस्बे कटरा में पति के साथ किराये के मकान में रहने लगी थी। तानों से आजिज होकर लालबत्ती ने खिजाब लगाना छोड़ दिया, उनके बाल सन से सफेद दिखते थे, धीरे-धीरे उन्होने पैर में रंग लगाना और जूतियां पहनना छोड़ दिया था। माहौल की गर्मी कम हुयी तो परम ने रात-बिरात आना फिर शुरू कर दिया था। हालाॅकि उसे हमले का डर बराबर बना रहता था। लालबत्ती अब उपने ढलान पर थीं। रूचि की छोटी बहन शुचि का रिश्ता गाॅव में ही लग रहा था। इस बात से वो खासी फिक्रमंद थी। इस बात को वो अपने मायके में खुलना हर्गिज गवारा नहीं कर सकती थी कि उसकी सास को एक टैंकर ड्राइवर की रखैल कहा जाता है। ये तो डूब मरने वाली बात थी उसके लिये कि उसके बच्चे को उस ड्राइवर की पैदाइश कहा जाता था। वो अपने पति और अपनी कमाई खा रही थी। अतीत का आज पर क्या आक्षेप? वक्त ने करवट बदली। आखिर युधिष्ठिर माली के पद पर बहाल हो गये।

 

उस घर में अब बाप-बेटा दोनों बारोजगार थे सो परम को हटाने के लिये जतन सोचे जाने लगे। मगर बरसों की आदत इतनी जल्दी कैसे छूटती खासतौर से जब आदत इतनी नशीली हो। परम से बिन्दे भी खार खाये बैठा था। वो रूचि की छोटी बहन शुचि से विवाह करना चाहता था। बस परम के होने से अड़चन थी। रजामंद तो शुचि भी थी। बिन्दे ने आशनाई की जिद में एक दिन हाथ पर बारूद से शुचि लिखकर उस पर आग लगा दी थी। माॅस के उस हिस्से के परखच्चे उड़ चुके थे। घाव भरा, मगर दाग रह गया और वो दाग स्थायी रूप से हाथ पर शुचि का नाम छोड़ गया था। रूचि इस रिश्ते का भरसक विरोध कर रही थी। वो नही चाहती थी कि कल को उसकी बहन को कोई संतान हो तो उस पर भी परम की संतान होने का लांछन लगे। लालबत्ती ने काफी यत्न किये मगर रूचि इस रिश्ते के लिये तैयार न हुयी। भाग्य का खेल, शुचि का विवाह अंततः उसकी गाॅव में तय हो गया, सो अब परम वाली बात फैलनी लाजिमी थी। इसी वजह से रार और हाथापायी की नौबत आयी थी। अगले कुछ दिन बहुत उथल-पुथल भरे थे। शुचि के तिलके के दिन बिन्दे ने हाथ की नस काट ली थी, उसकी जान बच गयी थी। रूचि अब गाॅव नहीं आती कटरा में ही पति के साथ मुस्तकिल रह रही है। बिन्दे को स्वास्थ्य लाभ लेने के लिये और बदनामी से बचने हेतु बाप के पास कतरनिया रेंज भेज दिया गया। मशीन के पट्टे में हाथ फंस जाने के कारण लालबत्ती का दाहिना हाथ काटना पड़ा था। बिन्दे और रूचि ने लालबत्ती को देखना तक गवारा न किया था क्योंकि दोनों अपनी जिन्दगी का गुनाहगार लालबत्ती को मानते हैं। परम यदा-कदा दिख जाता है युधिष्ठिर के साहब ठाकुर हैं, उसने पत्नी की सेवा हेतु हाथ-पाॅव जोड़कर साहब से मोहलत ली है और अपनी जगह बिन्दे को मालीगीरी के दायित्व सौंप आया है। लालबत्ती को रोजमर्रा के काम में काफी दिक्कत होती है, युधिष्ठिर घर का चूल्हा-चैका करते हैं और सोचते हैं कि बिन्दे का ब्याह हो जाता तो बहू घर संभालती और वो ड्यूटी। लालबत्ती के साथ हुयी दुर्घटना को लोग उसके पापों का प्रतिफल बताते हैं और हाथ उठाकर ईश्वर को न्याय के लिये धन्यवाद देते हैं बिन्दे दो बातें सोचता है कि पहला अगर युधिष्ठिर की मृत्यु हो जाये तो उसे माली की नौकरी मिल जाये या दूसरे उसे परम तो नहीं मगर जैसा कोई मिल जाये तो जिन्दे की तरह उसकी भी जीवन नैया पर हो जाये। लालबत्ती अपने पुराने सुनहरे दिनों को याद करके बार-बार और जार-जार रोती है। शुचि का विवाह अगली छमाही में इसी गाॅव में है। परम गाॅव से थोड़ी दूर की दारू की ठेकी पर बैठकर लालबत्ती के परिवार को गरियाता रहता है कि उन सबकी वजह से ही वो आज ड्राइवरी से निकाला जा चुका है और खलासी है। गाॅव वाले लालबत्ती को देखकर बिदल जाते हैं, बूढ़ी औरतें उसे सुनाकर घृणा से जमीन पर थूक देती हैं।

 

बच्चे और मनचले युवक मुॅह से लालबत्ती की सायरन की आवाज लगाते हुये उसके सामने से दौड़ लगाते हैं ओर खिलखिलाकर हॅसते हैं। लालबत्ती ये देख-सुनकर आग बबूला हो जाती है ओर गाली-गुप्ता देते हुये इकलौते हाथ से पत्थर फेंक-फेंककर खदेड़ती है।
समाप्त



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