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@dawriter

यादों की डायरी

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कहते हैं ना की, जिन्दगी को हम जितना सुलझाना चाहते हैं। वो हमें उतना ही उलझाती है। ज़िन्दगी को अपनी जिन्दगी में सुलझना बहुत कठिन है।इस लिये हमे कोशिश भी नहीं करनी चाहिए।वो जैसी चल रही हैं हमें उसे वैसे ही चलने देना चाहिए।

तुम्हें याद हैं स्कूल का वो पहला दिन, जब हम दोनों को मिलाकर 12 बच्चें ही आये थे हमारी क्लास में। और संगीत के हम दो ही थे।

सब कितना अजीब हो रहा था ना! पहला दिन, दो लोग, तीसरे पीरियड में महीनें की चौथी तारीख को कमरा नम्बर पांच में, 6 तबलो के बीच में एक 7 होने के करीब थे।

इतनी देर एक साथ खामोश बैठने के बाद तुमने ही चुप्पी तोड़ी थी। शायद तुम्हें याद न हो, पर मै नहीं भूला। भूल भी कैसे सकता हूँ? तुमने पहली बार मुझसे कुछ कहा था।
''आज सब कुछ कितना अजीब हो रहा है ना''?
मैने मुस्कुरा कर कहा था 'शायद'!

सच में! सब कुछ था भी अजीब ! हर पल, हर घडी, हर शब्द, हर गिनती, हर शक्स।
ऐसा लग रहा था कि भगवान भी हमें मिलाने की साजिश रच रहे थे। ये सब पहली बार हो रहा था मेरे साथ, शायद तुम्हारे साथ भी??

सब कुछ एक ही पल में कैसे बदल गया था। हम दोनों अब तक एक दूसरे से बिल्कुल अजनबी थे! लेकिन एक ही पीरियड के बाद ऐसा लगा जैस हम दोनों एक दूसरे को लम्बे अरसे से जानते हो।

कहते है कि प्यार सोच समझ कर नही किया जाता, वो बस हो जाता है बिना किसी अग्रिम सूचना के, प्यार शक्ल, सूरत या नाम देखकर नहीं होता। वो तो बस एक प्यारा सा एहसास होता है जिसे बताया नहीं जा सकता, बस महसूस किया जा सकता है। और वही हम महसूस कर रहे थे उन दिनों।

हम दोनों भी अजीब थे! एक सप्ताह बीत चुका था, और हम दोनों एक दूसरे के नाम तक नहीं जानते थे या शायद हमें जरूरत ही नहीं पड़ी।

वो तो भला हो हमारे नये म्यूजिक टीचर का जिन्होंने अपने क्लास के पहले दिन हमारा परिचय पूछ लिया मै समीक्षा तुमने यही कह कर अपना परिचय दिया था।

तुम्हें याद है... वो छोटू?
अरे वही जो स्कूल के अन्दर समोसे बेचने आता था ......
पहली बार 100% आरक्षण लड़कियों के लिए देखे थे।

क्या मजाल था कि कोई छोटू को 1रुपये के समोसे को दस ऱुपये देके भी कोई लड़का ले ले। जैसे वो साला पैदा ही हुआ था लड़कियों को समोसे खिलाने के लिए। स्कूल के सारे लड़के उसे "साला" ही बुलाते थे। क्योंकि वो भी लड़कियों को दीदी बुलाता था शायद यही कारण था।

एक दिन मैंने छोटू से मजाक में ही बोला था
'साले तुझे सरकार चलाने के लिए दे दिया जाय तो तू सभी लड़को को हिमालय ही भेज दे। तुम मेरे साथ ही थी।

छोटू मुस्कुरा कर वहाँ से चला गया। पर तुमने कहा था! ऐसा थोड़े न करेगा वो! और मैंने भी मजाक के अन्दाज में कहा था, कि ऐसा करने के लिए उसे सरकार कौन दे रहा?

तुम्हें हमेशा मेरी फिक्र थी, मेरे हर दुख में तुम साथ रही। और मेरी खुशियाँ तो तुम्हारे साथ होने तक थी। मैं भी तुम्हारे दुःख बाँटना चाहता था लेकिन तुमने मुझे उन तक पहुचने ही नहीं दिया शायद तुम मुझे अपने दुःख को बाँटने के काबिल ही नहीं समझती थी! या मुझे कभी दुख देना नहीं चाहती थी।

तुम कहती थी, की मैं अजीब हूँ! कितने अच्छे से समझती थी तुम मुझे!
तुम्हारे इस पगले को आज भी कोई नहीं समझ पाता, तुम्हारे सिवा!

पता है आज इग्लिश के सर मिले थे! पूछ रहे थे तुम्हारे बारे में! कह रहे थे की तुम्हें उसकी याद आती हैं क्या....?
क्या बताऊ उन्हें और कैसे बताऊं कि तुम यादें नहीं जिन्दगी थी मेरी।

और एक बात पूछ रहे थे कि जब हम उनके रूम में पढने जाते थे तो चाय कौन बनाता था? तुम दोनों के स्कूल छोड़ने के बाद वैसी चाय कभी नहीं मिली कैसे बनाते थे....?
अब उनको कैसे बताऊ ...?
हम दोनों को झगड़ते रहते थे चाय चढ़ा कर चाय कौन बनाता था ये तो हमें भी पता नहीं चलता था।

बात करते करते उनकी आँखें भर आई थी। बोल रहे थे क्या एक बार फिर मेरे दोनों बच्चे एक साथ मिल जायेगें? बस एक कप चाय के लिए उन झगड़ों के बीच एक बार फिर से तुम दोनों को पढ़ाना चाहता हूँ। वो हमसे कितना प्यार करते है ये मुझे अब पता चला।
वो पूछ रहे हैं कि तुम बक आओगी ?

तो क्या बोलू कब आ रही हो...? अब तुम ही बता दो, क्योंकि मुझे नहीं आता यूं किसी का दिल दुखाना।

सुनो ना....
बस एक बार आ जाओ वापस मेरा दिल रखाने के लिये, मुझे सताने के लिए, रूठा हूं मनाने के लिये, मुझपे अपना हक जताने के लिये, मुझे भरोसा दिला कर, मेरे भरोसे और जज्बातों को तोड़कर फिर से जाने के लिए.......... आ जाओ ना एक बार फिर से मेरा दिल तोड़कर जाने के लिये।

आओगी न.... जितना जागे समय लगा लेना बस इन आँखों के बन्द होने से पहले आ जाना।

 :- चन्द्र प्रताप सिंह



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