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@dawriter

यही तो इश्क है-१

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nis1985 by  
nis1985

निशा की कलम से.......
【यही तो इश्क है.........भाग-१】

जीवन में कभी एक ऐसा मोड़ आता है,जब हम किसी के लिए पूरी तरह बदल जाते है, शुरू- शुरू में ये चीजें कितनी अटपटी लगती हैं, शायद एक दबाव सा भी महसूस होता है, उस समय हमें लगता है कि ये एक समझौता ही है, और मुझे तो अब ये करना ही पड़ेगा, लेकिन धीरे-धीरे आपको पता चलता है कि,नहीं ये समझौता नहीं ये तो उस अजनबी के लिए आपका प्रेम है जो अब आपसे बन्ध चुका है!

मंदिरी को भी यही लगता था, मंदिरी तो एक साधारण से परिवार की लेकिन खूब पढ़ी -लिखी लड़की थी,इतनी सादगी से रहती थी मंदिरी की, न माथे पे बिंदी, न आंखों में काजल, न होठो पे लाली, न कानों पे झुमका और न ही हाथों में चुड़िया, इतनी साधारण सी रहने वाली मंदिरी इन सब के बिना भी इतनी आकर्षक लगती थी, कि पूछो ही मत किसी की भी नजर उसके चेहरे पर ठहर जाती थी, उसका मन तो सिर्फ पढ़ाई करने और आगे बढने में ही लगा हुआ था, कालेज में भी उसे कई लड़के पसंद करते थे ,पर किसी की हिम्मत नहीं होती थी कि कोई उसे बोल सके उसके स्वभाव को देखते हुए, और तड़क-भड़क वेशभूषा में रहने वाली लड़कियों को हमेशा यही लगता था, कि ये साधारण से कपड़े पहनने और बिना मेकअप वाली मंदिरी में ऐसी क्या बात है,जो सभी इसकी तरफ आकर्षित हो जाते है,कालेज की कई लड़कियां इसी वजह से मंदिरी से मन ही मन जलती थी!

पर पता है मंदिरी चेहरे से जितनी सुंदर थी, उतना ही उसका मन भी सुंदर था, आखिर वो दिन आ ही गया जब मंदिरी के घर वालो ने उसके लिए उसका हमसफर ढूंढ ही दिया, और मंदिरी की शादी पक्की कर दी, मंदिरी ने भी बिना सवाल जवाब किये हामी भर ही दी, क्योंकि मंदिरी के जीवन मे कभी इश्क की बहार ही नहीं ही आई थी, न ही उसने कभी इश्क को जिया था, और न ही इश्क को महसूस किया था, उसे तो बस यही लगता है कि शादी एक बन्धन है, जिसे हर किसी को निभाना पड़ता है, चाहे प्यार से या फिर समझौते से!

बस मन्दिरी और आनन्द बन्ध गए एक रिश्ते में, दोनो की सगाई कर दी गयी, आनन्द मन्दिरी के लिए बहुत प्यारी सी अँगूठी लाया और एक मोबाइल भी उपहार में दिया, हा आनंद मन्दिरी को पहली नजर में ही दिल दे बैठा था, उसे देखते ही उसकी सादगी पर लटटू हो गया था आनन्द, पर मन्दिरी के दिल में अभी तक वो एहसास नहीं पहुच पाया था, लेकिन फिर भी मन्दिरी खुशी-खुशी सारी रस्मो को निभा रही थी, क्योंकि मन्दिरी के पिता ने जो उसके लिए वर चुना था, और मन्दिरी को पूरा भरोसा था पिता की पसन्द पर और नाज भी!

अब आनंद तो मन्दिरी को दिल दे ही बैठा था और दोनों की सगाई भी हो चुकी थी, तो जाहिर सी बात है कि,आनंद अपने सगाई और शादी वाले समय के बीच के पल को जीना चाहता था, वो मन्दिरी से फ़ोन पे ढेर सारी बातें करना चाहता था, उसे और भी अच्छी तरह से समझना चाहता था, पर मन्दिरी को एक भी रुचि नहीं थी कि वो आनंद से बात करे वो तो सोचती थी कि शादी तो होनी ही है, फिर क्यों समय बर्बाद करु अपना, इस से बेहतर तो मैं पढ़ाई कर लूं, आखिर क्यों न सोचें मन्दिरी ऐसा, आनंद के प्यार के उस मीठे एहसास ने मन्दिरी के दिल मे अभी तक कोई दस्तक जो नहीं दी थी, आखिर कब तक नहीं धड़केगा मन्दिरी का दिल भी???? कभी तो उसे एहसास होगा आनंद के प्यार का, तब उसे मालूम चलेगा कि उसकी भी रातों कि नींदे उड़ने वाली है, क्योंकि यही तो इश्क है......!!!!!©

(क्रमशः)
निशा रावल
बिलासपुर

 

यही तो इश्क है-२

यही तो इश्क है-३ 

यही तो इश्क है भाग-४

यही तो इश्क है भाग-५



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