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@dawriter

यही तो इश्क है भाग-६

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nis1985 by  
nis1985

 

निशा की कलम से......

【यही तो इश्क है भाग-६】

""उधर आनंद की माँ,आनंद के बचपन की घटना को लेकर विलाप कर रही थी,और मंदिरी उन्हें सम्भालते हुए वचन दे रही थी ,कि वो आनंद को सारी खुशियां देगी,उतने में ही आनंद वहा आ गया,,दोनों ने झट से अपने आंसू पोछे और टॉपिक ही चेंज कर दिया, आंखों के आंसू को बनावटी मुस्कुराहट में तब्दील होते जरा भी देर नहीं लगी।

""ये क्या खुसुर-फुसुर हो रही है, सास-बहू में, आनंद ने मजाक करते हुए पूछा।

""हालाँकि आनंद समझ चुका था, कि कुछ तो गंभीर बाते हुई है दोनों के बीच ,क्योंकि चेहरे के भाव सब कुछ बया कर रहे थे,फिर भी आनंद जानबूझ कर अनभिज्ञ बना रहा।

""अरे तुझे क्या ये हमारे आपस का मामला है,तूने भी हमे कुछ बताया क्या, की तू अभी अकेले में क्या लेने गया था मंदिरी के लिए।

""ओह हो माँ आप भी न एकदम बच्चों जैसे लड़ती हो मुझसे,अच्छा चलो मत बताओ आप कुछ भी, आपकी जिद के सामने तो मैं हार ही गया।

""माँ किसकी हुँ, आखिर तेरी ही न, माँ ने हसते हुए कहा।

""अब यही बाते करते रहोगी, की चलोगी माँ, अभी ढेरो शॉपिंग करनी बाकी है,आनंद ने कहा।

""मंदिरी ने भी अपनी पसंद की कुछ खरीदारी की,हालाँकि उसकी पसन्द माँ और आनंद को उतनी नहीं भाई, फिर भी उन्होंने मंदिरी का मन रखने के लिए कुछ भी नहीं कहा।

""हर सासु माँ की दिली ख्वाहिश होती है ,कि वो अपनी बहू को पूरा सजा सवरे देखे,खास मौकों पे तो जरूरी है ,बाकी समय मे मंदिरी आजाद थी कि वो अपने हिसाब से रहे।

""माँ मंदिरी को हेवी सारी और गहने दिखाते हुए बोली,,मंदिरी बेटा देखो ये कितने प्यारे है न ,मैने ये सब तुम्हारे लिए पसन्द किया है,,

""मंदिरी कुछ बोली नहीं सास के सामने।
बस इतना ही कहा,,,,,हम्म माँ बहुत प्यारे है।

""माँ ने मंदिरी को समझाते हुए कहा, बेटा मंदिरी शादी के बाद जो ये स्त्रियों का श्रृंगार होता है न,, वो सौभाग्य का प्रतीक होता है,और पति की उम्र से भी इसका सम्बन्ध होता है, ये चूड़ी, बिंदिया, झुमका ,पायल सब-कुछ सुहाग की निशानी होती है, समझ गयी न मंदिरी तुम मैं क्या कहना चाहती हुँ,

""मंदिरी ने चुपचाप हामी भर दी,

""देखो बेटे तुम काफी समझदार हो,आनंद की उस बचपन की घटना ने मुझे आज तक झकझोर के रखा है,मै बहुत ज्यादा डर चूकी हुँ, ये तुम्हारे आजाद खयालो की सास अपने बेटे को लेकर काफी सतर्क है, मैं अब कोई रिस्क नहीं लेना चाहती, भले तुम इस मामले में मुझे धकियानुसी विचारो की समझो, पर मैं अपने बेटे को लेकर बिल्कुल भी नहीं बदलूंगी।

""शादी के बाद तुम जो भी करोगी उसका प्रभाव तो मेरे बेटे पर पड़ेगा ही, तुम्हारी पूजा, तुम्हारे श्रृंगार, तुम्हारा व्रत अब सब कुछ मेरे बेटे के जीवन से जुड़ा है, इसलिए मैं कोई भी समझौता कर सकती हूं पर अपने बेटे के जीवन से जुडा कोई भी समझौता नहीं करूँगी।

""मंदिरी अपनी सास की बाते चुपचाप सुन रही थी।

""हम्म.. माँ मैं आपकी भावनाओं को समझ सकती हूं, आप चिंता न करे मैं इस बात का हमेशा खयाल रखूंगी।

""माँ मंदिरी को देख मुस्काई, हा बेटा मुझे तुमसे यही उम्मीद थी।

""शोपिंग खत्म होते ही आनंद और माँ मंदिरी की घर की ओर चल पड़े, मंदिरी को छोड़ने।

""चलिए न माँ अंदर आपलोग काफी थक गए हैं, चाय पी लीजिये, मंदिरी ने अपनी सास से आग्रह किया।

""अरे नहीं बेटा फिर कभी, अभी जल्दी घर पहुँचना है तुम्हारे पापाजी मेरा बेसब्री से इंतजार कर रहे होंगे।

""ऐसा क्यों माँ, मंदिरी ने मुस्कुराते हुए पूछा।

""वो क्या है न, जब तक तुम्हारे पापाजी मेरी हाथो की बनी चाय नहीं पीते, न उनका दिन पूरा होता और न ही रात।

""माँ की बाते सुनकर मंदिरी हँसने लगी।

""अरे तू क्या हमारी बाते सुनकर गिजगिजा रहा है ,जल्दी से जा और मंदिरी को घर के अंदर तक छोड़ के आ, मैं यही कार मे बैठूंगी, थकान की वजह से मेरे हाथ-पैर टूट रहे है, तू बहन जी से क्षमा मांग लेना मेरी तरफ से, मैं नहीं आ पाउंगी।

""जी माँ और आनंद मंदिरी को साथ ले गया।

""घर के अंदर प्रवेश करने से पहले ही आनंद ने मंदिरी को रोक लिया।

""मंदिरी सुनो!!

""हा, आनंद क्या बात है बोलो न।

""मंदिरी पता है, आज तुम इतनी खूबसूरत लग रही हो, एकदम मेरी सपनो की राजकुमारी की तरह, पर मुझे एक बार भी मौका नहीं मिला कि मैं आँखों मे आँखे डालकर तुम्हारी तारीफ कर सकूँ।

""मंदिरी आनंद की बाते सुनकर शर्म से गुलाबी हो गई, और बार-बार अपनी लट को सवांर रही थी, जो उसके झुमकों में उलझ कर उसे परेशान कर रहे थे।

""आनंद बस उसे एकटक निहारे जा रहा था, ऐसा लग रहा था कि मानो ये पल यही पर थम जाए।

""अचानक मंदिरी अपने बालो को समेट कर जुड़ा बनाने लगी तो, आनंद ने तुरन्त उसका हाथ पकड़ के रोक दिया, ऐसे ही रहने दो न मंदिरी, खुले बालो में तुम मुझे और भी खूबसूरत लगती हो।

""आनंद की बाते सुनकर मंदिरी का दिल और भी जोरो से धड़कने लगा।

""अच्छा अब मेरा हाथ छोड़ो आनंद मुझे जाना है देर हो रही है।

""हा बाबा जाओ किसने रोका है।

""और सुनो मुझे फ़ोन पे तुमसे कुछ जरुरी बाते करनी है, तो पलज़्ज़ जल्दी अपने कमरे में चली जाना, आनंद ने कहा।

""हा बाबा जल्दी फ़ोन करूँगी अब प्लीज जाने दो न, माँ क्या सोच रही होंगी, मंदिरी ने घबराते हुए कहा और उनके पैरों में दर्द भी तो है, जल्दी जाओ आनंद।

""अरे पागल अब तो उनके पैरों का दर्द छू हो गया होगा, आनन्द ने मुस्कुराते हुए कहा।

""मुझे खुश देखकर, समझी बुद्धू, और मंदिरी मुस्कुराने लगी।

"मंदिरी घर की तरफ जाने लगी, तभी हवा का तेज झोका आया और मंदिरी का दुपट्टा आनंद को स्पर्श करता हुआ उड़ने लगा, आनंद ने आंखे बंद कर ली मानो वो मंदिरी को महसूस कर रहा हो, वो तो बस इन पलो को कैद कर लेना चाहता था, और मंदिरी से जुड़ी हर यादो को भी, मानो वो कही बहुत दूर जा रहा हो।

""तभी मंदिरी,आनंद की ओर बिना देखे ही चिल्लाई।

""ओह ओह आनंद जाओ मैं तुम्हे कोई काल वाल नहीं करने वाली अब।

""अरे!अब मैने क्या किया है, आनंद हड़बड़ाया।

""अच्छा अब ज्यादा भोले मत बनो, और चुपचाप मेरा दुपट्टा छोड़ो, नहीं तो मैं माँ को आवाज लगा रही, फिर तुम ही जवाब देना।

""आनंद जोर -जोर से हँसने लगा।

""अच्छा तुम्हें हँसी सूझ रही रुको अभी तुम और मंदिरी ने पलटकर देखा, तो उसका दुपट्टा झाड़ी में फसा हुआ था।

""मंदिरी मासूम से चेहरा लेकर चुपचाप खड़ी थी, और आनंद उस चाँद से मासूम चेहरे को एकटक निहारे जा रहा था।

""उफ्फ! क्या नजारा था, मानो ये पल बस यही रुक जाए, बस यही पर रुक जाए!!!

कशमकश ये है, चाँद देखु या तुझको निहारु,
तमन्ना ये भी है कि तेरी उलझी लट सवारूँ...!!!

क्योंकि यही तो इश्क है...!!!©
【क्रमशः】

निशा रावल
छत्तीसगढ़

यही तो इश्क है-१

यही तो इश्क है-२

यही तो इश्क है-३

यही तो इश्क है भाग-४

यही तो इश्क है भाग-५



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