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@dawriter

बेगैरत इंसान

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aksha by  
Aksha

है दिया दर्द इस दुनिया ने मुझे बेइंतहा,
हैं दी चोटें,अघातें इन लोगों ने मुझे बेपरवाह,
है रोया दिल मौन के आसूँ भी,
हैं हुई बंद पलकें उन बेकदरों के लिए भी,
हैं उठे हाथ,झुका मस्तक भी उन लोगों के लिए,
पर चल दिये छोड़कर,आज वो सब अंजान बनकर
बेगैरत और बेईमान बनकर।
उठ गया भरोसा अब तो इंसानियत से भी,
बन गये इंसान पत्थर, हो गया भरोसा अब इस पर,
सोचती हूँ अब ,छोड़ दूँ इन इंसानों को
पत्थर से बने इन बेईमानों को,और
बन जाऊँ सहारा अब इन बेज़ुवानों का ही ,
जो कहने को तो हैं जानवर,पर हैं बेहतर इन इंसानों से भी।।



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