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@dawriter

पिंजरा जिसका दरवाज़ा खुला था

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hema by  
hema

एक समय की बात है किसी शहर के एक छोटे से पिंजरे में एक चिड़िया रहा करती थी । उस चिड़िया का नाम बन्दिनी था । तो यह कहानी है चिड़िया बन्दिनी की ।

एक व्यस्त शहर के एक छोटे से पिंजरे में वो रहा करती थी । उसे अपने पिंजरे से बहुत ही प्यार था, इतना कि पिंजरे का दरवाज़ा खुला होने पर भी वो आसमान की तरफ़ ना जाके कमरे में ही कहीं फुदक कर बैठ जाती थी । दूर से अपने पिंजरे को देखना भी एक अनोखा एहसास था उसके लिए । अपने पिंजरे पर बड़ा नाज़ था उसे । वो अपनी आख़िरी सांस भी उसी पिंजरे में लेना चाहती थी । परितोष उस चिड़िया का पूरा ख्याल रखता था । उसे समय पर दाना-पानी देना, उसके पिंजरे की समय-समय पर सफाई करना वो कभी नहीं भूलता था । कहीं से लौट कर आये तो सबसे पहले पिंजरे को देखता था और अपनी नई कहानियाँ बन्दिनी को सुनाता था । बन्दिनी को पिंजरे जितना ही प्यार परितोष से भी था । शायद परितोष की वजह से ही उसे पिंजरे से प्यार था । उसे परितोष का इंतज़ार करना अच्छा लगता था । एक दिन बन्दिनी पिंजरे से निकलकर बालकनी की रेलिंग पे बैठी थी । ठन्डी हवा और बारिश का मज़ा लेते हुए कुछ गा रही थी तभी वहाँ एक और चिड़िया उड़ती हुई आई, मुक्ता । उसने आते ही बन्दिनी से कहा, ‘यार! तुम बड़ी सही जगह बैठकर मौसम का मज़ा ले रही हो’ । बन्दिनी ने उसका मुस्कुराकर स्वागत करा और मुक्ता ने बक-चक जारी रक्खी । अपने पंखो की साफ़ सफ़ाई, शहर में चीलों के बढ़ते आतंक, खाने-पीने के नए अड्डे और भी ना जाने क्या-क्या । जब बारिश रुकी तो मुक्ता की मुक्त बातचीत पर भी ब्रेक लगा और उसने बन्दिनी से कहा ‘चल असमान में एक फेरा लगाकर आते हैं’ । बन्दिनी ने कहा ‘परितोष आता ही होगा, तू उड़, मैं नहीं उड़ सकती तेरे साथ’ । मुक्ता की गोल-गोल आँखें तेज़ी से गोल गोल घूमने लगी और उसने चहक कर पूछा ‘क्या? परितोष?’ बन्दिनी ने फिर उसे बहुत गुरूर से दिखाया ‘वो देख, मेरा पिंजरा’ । मुक्ता हैरान होती ही चली गयी । उसने बन्दिनी से कहा ‘मौके का फायदा उठा, अभी पिंजरे में नहीं है तू, चल उड़ चलें यहाँ से, आज़ादी की उड़ान भरें’ । बन्दिनी ने कहा ‘नहीं, मुझे इस पिंजरे से प्यार है और परितोष से भी । वो वापस आकर मुझे ढूंढेगा । मैं नहीं जा सकती ।‘ मुक्ता को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि कोई अपनी बंदिश से कैसे प्यार कर सकता है ? जिसने आज़ादी छीन ली हो उस ज़ालिम से कैसे प्यार कर सकता है ? बन्दिनी ने उसकी आँखों में घूमते सवाल पढ़े और मुस्कुराकर कहा ‘मैं ऐसी ही हूँ’ । मुक्ता को इस जवाब से और भी कोफ़्त हुई और उसे बन्दिनी पर अनजाना सा गुस्सा आया और नफरत होने लगी । उसने लानत भरी नज़रों से बन्दिनी को देखा और उड़ने से पहले बन्दिनी को अपनी नफरत का तोहफ़ा दिया । उसने कहा ‘बन्दिनी, अगर तेरा परितोष तुझसे सचमुच प्यार करता तो रोज़ यूँ लापरवाही में पिंजरा खोलकर ना जाता । तू मानना ना चाहे तो बात और है, लेकिन सच यही है कि उसे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तू यहीं रहे या उड़ जाये । तू अपने पिंजरे से प्यार करती है ना? तो डरती भी होगी कि कहीं कोई उसे तुझसे छीन ना ले ? फिर यह परितोष का प्यार कैसा है जिसमे डर नहीं है ? तू पिंजरे से प्यार करती है तो उस पर अपना अधिकार समझती है ना? परितोष तुझ पर अधिकार क्यूँ नहीं समझता ? यह कैसा प्यार है जिसमे अधिकार नहीं है ?’ अपनी नफ़रत का जहर बन्दिनी की सोच में भर कर मुक्ता उड़ चली दूर आसमान में । जैसे बन्दिनी को अपनी मुक्त उड़ान से लुभाना चाहती हो या फिर जलाना ।

बन्दिनी की सीधी-सादी ज़िंदगी में तूफ़ान आ गया । वो मुक्ता के सवालों में उलझ गयी । थोड़ी देर बाद परितोष आया और उसे बताने लगा कि आज वो रास्ते में बारिश में भीगा और उसे बहुत अच्छा लगा । बन्दिनी उसकी बातें सुन रही थी मगर उसका मन अन्दर ही अन्दर अभी तक रेलिंग पर मुक्ता के साथ बैठा था । वो रात बन्दिनी पर बड़ी भारी गुज़री । वो रात भर जगती रही और सोचती रही क्या मुक्ता सही कह रही थी ? खलबली मच गयी उसकी छोटी सी जिंदगी में । अगले दिन परितोष रोज़ की तरह उसे दाना-पानी देकर चला गया और शाम को जैसे ही बन्दिनी ने उसके दरवाज़ा खोलने की आवाज़ सुनी वो पिंजरे से निकलकर उड़ गयी । उड़ी, लेकिन बहुत दूर नहीं बस घर की छत तक ।

उसे देखना था कि उसके रहने या ना रहने का परितोष पर कोई असर होता है या नहीं ? परितोष के लिए बन्दिनी का यूँ उड़ जाना बहुत अजीब था । वो तो सोचता था की उसका और बन्दिनी का साथ जीवन भर का है । बन्दिनी अपनी इच्छा से उसके साथ रहती है किसी बंदिश के चलते नहीं । बन्दिनी के प्यार पर उसे अटूट भरोसा था । आज बन्दिनी का इस तरह उड़ जाना उसकी नींद उड़ा ले गया । वो बेचैनी से इधर उधर टहलता रहा और उस रात उसने खाना भी नहीं खाया । बार-बार वो बालकनी पर आ जाता था बन्दिनी को ढूँढने । रात के अँधेरे में बन्दिनी भी छत पर बैचैन थी और एक दो बार उसने छुप-छुप कर देखा कि परितोष भी सोया नहीं है । दिन भर का थका परितोष बालकनी में टहल कर जब पस्त हो गया तो वहीँ रक्खी कुर्सी पे बैठ गया । नींद कब उसकी आँखों पर आ बैठी उसे पता ही नहीं चला । बन्दिनी ने देखा बहुत देर से परितोष बिना हिले डुले कुर्सी पर बैठा है तो वो धीरे से उड़कर उसके पास आई ।

आज उसने परितोष को पहली बार सोते हुए देखा और धीरे से उसकी नज़र टहलती हुई जब परितोष के आँखों के किनारे पहुँची तो उसका दिल रो उठा । उसने कभी नहीं सोचा था कि किसी दिन वो परितोष के आँसुओं की जिम्मेदार होगी । परितोष के सूखे हुए आँसू बन्दिनी को रुला गए । उसे अपने कम बोलने की आदत पर उस समय बहुत गुस्सा आया और वो सोच रही थी कि काश! मन में घूमते सवालों को कह लेती तो ऐसा नहीं होता । उसे परितोष की जिंदगी में अपनी जगह का एहसास हो गया था । परितोष के बैचैन दिल पर प्यार भरा हाथ रखने की कोशिश में वो परितोष की शर्ट की बायीं जेब पे जा बैठी । परितोष की आँख खुल गयी और अपनी बन्दिनी को अपने पास देखकर वो ख़ुशी से ज्यादा खुश हो गया । उसने बन्दिनी को अपने दोनों हाथों में प्यार से लिया और चूम लिया ।

प्यार से उलाहना देते हुए कहा ‘क्या हो गया था तुम्हें? दोबारा ऐसा मत करना । कुछ खाओगी या अब सुबह ही खाना होगा ‘? जवाब में बन्दिनी उड़कर परितोष के बिस्तर पर जा बैठी । परितोष ने बालकनी का दरवाज़ा बंद किया और चैन से अपने बिस्तर पे लेट गया । अगली सुबह दोनों खुश थे ।



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