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@dawriter

पवारिश

0 75       
nis1985 by  
nis1985

 

निशा की कलम से.....

परवरिश ........
TRUE story
सुबह की भागमभाग ओहो इतना टाइम हो गया अब परी को तैयार करना है, उसका टिफिन और फिर नीचे भी तो जाना है, नहीं तो उसकी स्कूल बस भी मिस हो जाएगी हद है,ये बस वाले भईया थोड़े देर भी इंतजार नहीं करते,अरे पर वो कर भी क्या सकते हैं उनको तो इतने बच्चों को लाना होता है टाइम से,गलती तो मेरी ही है जो कभी-कभी देर हो जाती है,और फल भुगतना पड़ता है बेचारे पति देव को कि, जाओ परी को स्कूल छोड़ के आओ और पतिदेव बिचारे अनमने ढंग से उठ के परी को स्कूल ले जाते हैं पर क्या करें बीवी का आदेश जो है नहीं करूँगा तो मुह फुलाये बैठे रहेगी सारा दिन.......बस ये सब याद करते माधवी खुद से ही बाते करती हुई हंस रही थी और साथ मे घर का काम भी निपटा रही थी!!


बस रोज का यही सिलसिला था माधवी रोज 7 बजे परी को स्कूल बस के लिए नीचे छोड़ने जाती थी, उसका घर सेकंड फ्लोर पे जो था, उसी समय एक बुजुर्ग भी आते थे, नीचे रोज टहलने, वो माधवी के ससुरजी के उम्र के ही थे, उनकी भी पोती की स्कूल बस उसी टाइम पे आती थी, बस जैसे ही माधवी अपनी परी के साथ आती वो बुजुर्ग भी अपनी पोती के साथ आते, उस अपार्टमेंट का गार्ड दो कुर्सियां निकाल देता और माधवी और वो बुजुर्ग बैठ जाते स्कूल बस का इंतजार करते, माधवी की परी और उनकी पोती खेलते रहते जब तक स्कूल बस नहीं आ जाती!!!!


बस कुछ ही दिनों में माधवी और उन बुजुर्ग की बातों बातों में जान पहचान हो गयी, माधवी उन्हें अब चाचाजी कहने लगी और चाचाजी भी माधवी को बेटी कहकर बुलाते थे, उन्होंने अपना परिचय दिया और माधवी का भी परिचय लिया, उन्होंने बताया कि वो दूसरे शहर से आये हैं ,बेटे की यहाँ नौकरी है बहू है, एक पोती और एक पोता है और उनकी जीवनसाथी अब इस दुनिया में नहीं रही बस यही कहते हुए उनकी आंखें भर आयीं, पता नहीं कब माधवी में उन्हें अपनी बेटी नजर आने लगी और सारी दिल की बातें चाचाजी उसे पूरे विश्वास के साथ बताने लगे!


सच में इस विश्वास में कितनी ताकत होती है ना कि पराया भी अपना बन जाता है और यही विश्वास जब टूटता है तो अपने भी पराये हो जाते हैं, पर इस मामले में ज्यादातर लोग दिल की ही सुनते हैं, जैसे चाचाजी ने अपने दिल की सुनी और माधवी को अपनी बिटिया मान बैठे, अब तो रोज की आदत हो गयी चाचाजी जब तक माधवी को अपने दिल की बात नहीं बताते उनको चैन नहीं मिलता!!!!!


पर पता नहीं क्यों चाचाजी अपनी पोती जो 9 वी क्लास में थी और अपनी बहू जो कि कभी-कभी वो भी छोड़ने आती थी बिटिया को उनके सामने अपने दिल की बात बोलने में हिचकते थे माधवी से,शायद अपनी बहू से थोड़ा घबराते थे, बहु दिखने में एकदम मोर्डन और कपड़े पहनने का ढंग भी एकदम स्टाइलिश,माधवी से तो उसने ठीक तरीके से ही बात की ,थोड़ी तेज स्वभाव की लग रही थी ...पर जैसे ही चाचाजी ने अपनी बहु से हंसते हुए बात की तो बहु ने ऐसा जवाब दिया कि माधवी के तो होश ही उड़ गए....


चाचाजी जी ने अपनी बहू से- कहा क्या बात है बेटा आज लेट कैसे कर दी पोती को नीचे लाने में थोड़ी देर भी लेट होती तो बस चली जाती,चाचाजी ने बड़े शालीन ढंग और सरस स्वभाव में अपनी बहू से कहा...बहु ने तुरंत जवाब दिया, तो क्या हो गया देर हुई तो कोई पंख लगे हैं क्या मुझे जो उड़ के आती और मेरी भी तो तबियत अक्सर खराब रहती है ,चाचाजी जी ने सर झुका लिया और उसकी पोती ने भी मां का साथ दिया अरे रहने दो न मम्मा ये दादाजी भी न थोड़े सठिया गए हैं बूढ़े जो हो रहे हैं, और दोनों हँसने लगीं ये सब देख के माधवी के तो होश ही उड़ गए वो बस अपलक ही सब कुछ देख रही थी, बहु तो ऐसे रियेक्ट कर रही थी कि ये तो रोज की ही बात है चाचाजी भी दिल पे पत्थर रख के मुस्कुरा दिए और टॉपिक चेंज कर दिया!


माधवी अब सब कुछ भांप चुकी थी और सब समझ भी चुकी थी, दिनभर यही सोच रही थी क्या यही है असली आधुनिकता? की पढ़े लिखे हो,अच्छा खासा पैसा, कार, घर सबकुछ, खुद को हाइली एजुकेटेड भी शो करते हो और बात करने का लहज़ा ऐसा, धिक्कार है फिर ऐसी आधुनिकता पर जो अपने बड़ों को मान सम्मान भी न दे सके.!


अगले दिन सुबह फिर माधवी परी के साथ आई, चाचाजी भी पोती के साथ आये, माधवी ने नमस्ते चाचाजी कहा और बैठ गयी, आज चाचाजी की आंखे बिल्कुल लाल थीं, ऐसा लग रहा था कि वो रातभर सो नहीं पाए,ह्म्म्म दुख और उदासी तो साफ ही झलक रही थी पर माधवी सब जानते हुए भी कुछ नहीं पूछी, वो चाचाजी को दुखी नही देख सकती थी, बस बातो ही बातों में उन्हें हसाने की कोशिश करती रही, चाचाजी भी अपनी दिल से मानी हुई बेटी का मान रखने के लिए हसने लगे पर उनके चेहरे के भाव और हंसी बिल्कुल भी मेल नहीं खा रहै थे!


उसी अपार्टमेंट के एक और भाई साहब एक छोटे से डॉगी (पपी) को टहला रहे थे बस माधवी की प्यारी सी बिटिया परी जो क्लास 1st में थी खेलने लगी बहुत खुश हुई डॉगी को देख के,मम्मा प्लीज मै इसे एक बार उठा लूँ जिद करने लगी, माधवी ने जोर से डांटा बिलकुल नहीं परी तुम्हे स्कूल जाना है कपड़े गन्दे हो जायेंगे जैसे-तैसे माधवी ने परी को मनाया पर परी का मन तो उस डॉगी में ही अटका हुआ था!


अचानक माधवी की नजर चाचाजी की तरफ पड़ी पता नहीं वो क्या सोच के मुस्कुरा रहे थे, माधवी को उनकी मुस्कुराहट थोड़ी व्यंग्यात्मक सी प्रतीत हुई, माधवी ने कौतूहल वश चाचाजी से पूछ ही लिया क्या बात है चाचाजी, उन्होंने बस बोला कि कुछ नहीं बेटी बस इस डॉगी (पपी) को देखा,तो सोच रहा था कि ये भाई साहब जो रोज पपी को घुमाने लाते हैं मेरे पड़ोस में ही रहते हैं, जब भी देखता हूँ इन्हें कितना खयाल रखते हैं अपने डॉग का समय-समय पे खाना देना उसे नहलाना उसको सुलाना, यहाँ तक कि अपने बिस्तर (बेड) में भी सुला लेते हैं ये भाई साहब, बस दिन -रात यही सोचता रहता हूं ये पपी कितना भाग्यशाली है ना, कि इसे इतना प्यार और दुलार देते हैं, काश कोई अपने माँ-बाप से भी प्यार करता ऐसे ही,बोलते साथ उनकी आंखें डबडबा उठीं गला भर आया उनका ,हाँ बिल्कुल चाचाजी अपने बारे में ही बात कर रहे थे, माधवी निशब्द सी उनके सामने बैठी रही कुछ न बोल पायी वो,सब कुछ समझ चुकी थी कि चाचाजी के घर उनके साथ कैसा व्यवहार किया जाता है, काश उनकी जीवन साथी भी इस दुनिया में होती तो उनके दुख को समेट पाती!!


सच में क्या कुछ लोगों की आधुनिकता यही है कि वो डॉगी से प्यार करना तो अपना इस समाज में स्टेटस या कह लो रुतबा तक समझते हैं पर अपने पिता समान ससुर को थोड़ा प्यार और सम्मान भी नहीं दे सकतेे, तो धिक्कार है ऐसी आधुनिकता पे, जो पूरी तरह से स्पष्ट करता है कि हम पढें लिखे गवांर है, या मानवता ही नहीं बची हमारे अंदर, बस दिखावा और दिखावा!


इस घटना के बाद बस मैं तो यही कहूंगी की आप ये मत देखो की आपको क्या मिल रहा है बस ये सोचो कि आप दूसरों को क्या दे सकते हो, अगर आप प्यार और सम्मान अपनो को नहीं दे सकते तो दूसरों को क्या दोगे!!!!


चाहे स्त्री हो या पुरुष दोनों को एक दूसरे के माता-पिता के प्रति वही प्यार और सम्मान रखना चाहिए जो वो खुद के माता-पिता के प्रति रखते हैं, अगर हम यही सोचते रहेंगे की बदले में हमे क्या मिला तो शायद कुछ नहीं बदलने वाला है!!!!!


निशा रावल
बिलासपुर छत्तीसगढ़



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