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@dawriter

दीवाली और वो ख्वाब

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"यामिनी अरे ओ यामिनी" कहते हुए मां आंगन से चिल्ला रही थी, "कब से कह रही हूँ कि जल्दी से दीवाली की सफाई कर ले.. बाद में समय नहीं मिलेगा एक हफ्ते बचे हैं दीवाली के और ठीक पांच दिन बाद तेरी सगाई.. कितना काम है अभी लेकिन मेरी कोइ सुने तब तो.. " मां के मुँह से दीवाली का नाम सुनते यामिनी तुरन्त स्टोर रूम में गई और लपक के बक्से में से सुर्ख लाल रंग का अधजला दुपट्टा निकाला अभी देख ही रही थी कि अनायास मां कमरे में आ गई.." अरे हाँ ये बक्सा भी साफ कर लो और सारे पुराने कपड़े निकाल दो उनसे बर्तन ले लूगी " कहते हुये मां वहा से चली गई। लेकिन यामिनी तो कही और खो गई थी, दुपट्टा हाथ में लिये वो लाॅन के तरफ गई उसकी निगाहें वही थम गई. ...

जब पहली बार उसे किसी के प्यार का एहसास हुआ था, जब उसने पार्थ के आँखो में अपने लिये सच्चा प्यार देखा था..  पार्थ, जो कि सामने वाले शर्मा जी के बेटे पिंटू का दोस्त था। उस दिन जब वो कालेज के लिये तैयार हो रही थी तो.. पिंटू बाहर से ही चिल्लाते हुए, दीदी - दीदी कहा हो..? अन्दर आया मां वही आँगन मे मसाले फैला रही थी, ने कहा "यामिनी बेटा देखो ये पिंटू तुम्हे बुला रहा है, तैयार हो रही है आज थोड़ा लेट हो गई है कालेज के लिये, बैठ जाओ बेटा तब तक" मां के कहने पर वो दोनो वही बैठ गये। तभी यामिनी बालो मे कंघा करते हुए कमरे से आई, "क्या हुआ पिंटू अब फिर से किसी निमेरिकल मे उलझ गए क्या" "नहीं दीदी ये पार्थ है" पिंटू ने बताते हुए कहा "दीदी इसको आर्गेनिक केमिस्ट्री के कुछ नोट्स चाहिये.. PMT की तैयारी कर रहा है" "अच्छा वेरी गुड, मै दूढ़ के दे दुगी कल आ जाना" यामिनी ने कहा तभी मां ने तपाक से कहा.. "जाने कितने नोट्स तो इसने एेसे ही बाट दिये कितनी बार कहा है कि अपने कालेज के साथ कोचिंग मे भी पढाया कर.. कुछ आमदनी ही होगी..

यामिनी के पापा के पैरलाइस अटैक के बाद उनका बिजनेस बन्द पड़ा है फिर छोटू की पढ़ाई भी है.. बीच में ही यामिनी ने मां को टोकते हुये कहा "क्या मां तुम भी चुप रहो.. मै सब कर लूगी बस ग्रेजुएट होने दो.."  पिंटू ने बोला, "सच मे दीदी यू आर बिरलियेंट"  देखना बहुत जल्द आपकी जाॅब लगेगी.. " मुस्कुराते हुए यामिनी ने पार्थ को अगले दिन आने के लिये कह के बिना उसके तरफ देखे कालेज के लिये निकल ली.. 

पार्थ अगले दिन ठीक 4 बजे शाम को यामिनी के घर पहुच गया और जैसे ही वो दरवाजे पर पहुँचा कि तभी उसके कदम रूक गये.. अन्दर से जोर - 2 से आवाजे आ रही थी, यामिनी की मां रोते हुए यामिनी को चिल्ला रही थी.. " कलमूही कब से कह रही हूँ तुझसे कि भैरव मन्दिर में प्रसाद चढ़ा कर वहाँ की भभूत अपने बाबू जी को लगा दे लेकिन चार अक्षर पढ़ क्या ली है किसी की सुनती ही नहीं है.. कहती हैं विश्वास नहीं है अरे एक बार कर के तो देख पटवारिन के मामा भैरव बाबा की भभूत से ही ठीक हुये हैं.. " मां एेसा नहीं है मै सोचती हूँ लेकिन समय नहीं मिल पा रहा हैं क्या मै नहीं चाहती बाबू जी जल्दी से स्वस्थ हो जाये लेकिन प्रैक्टिकल के वजह से कालेज रोज जाना पड़ रहा है."प्रैक्टिकल या घूमने जाती है तू.. बाबू जी को कुछ हुआ तो छोड़ेगी नहीं मै तुझे " मां ने रोते हुए. . यामिनी को मारना चाहा कि तभी पार्थ ने ना चाहते हुए भी बेल बजा दी..

यामिनी आँसु्अो को पोछते हुये दरवाजे पर गइ तो सामने पार्थ था.. उसने बिना उसके तरफ देखे दूसरे दिन बुलाया.. बोला नोट्स अभी ढूंढ़ना पड़ेगा.. पार्थ वापस आ गया. . घर आने पर वो यामिनी के आँसूओं से भरे चेहरे को भूला नहीं पा रहा था। अगले दिन सुबह वो भैरव मंदिर का प्रसाद और भभूत लेकर यामिनी के घर पहुच गया जैसे ही यामिनी ने दरवाजा खोला तो पार्थ को देखकर बोली.. ओह सारी तुम्हारा नोट्स अभी... तभी पार्थ प्रसाद और भभूत यामिनी को देते हुए बोला "ये मै अंकल जी के लिये लाया हूँ . . कल मैंने.. तो कल तुमने सब.." हा "पार्थ ने कहा.. तभी यामिनी की मां आ गई वहा, पार्थ प्रसाद और भभूत उनको देते हुए बोला आन्टी" मेरी माँ आज भैरव मन्दिर गई थी और ये प्रसाद.. "भला हो तुम्हारा बेटा अन्दर आओ चाय पी लो बेटा.. यामिनी जा चाय बना के ला.." बीच में ही मां ने कहा चाय पीने के बाद उसने नोट्स लिये और जाने लगा कि तभी यामिनी ने धन्यवाद कहा और कुछ कहना चाह रही थी कि, पार्थ ने बीच मे ही बोला "थैंक्स फाॅर द नोट्स, और हाँ कोई प्रॉब्लम होगी तो जरूर बताईयेगा.. मुस्कुराते हुए आप अच्छी लगती हैं.."  यामिनी के चेहरे पर एक भीनी सी मुस्कान छा गई पहली बार उसकी आँखें भी मुस्कुरा रही थी.. इसकी वजह शायद उसे भी नहीं पता था.. 

इसी बीच यामिनी का ग्रेजुएशन पुरा हो गया और उसने मेडिकल की तैयारी कराने वाली कोचिंग संस्थान मे पढ़ना शुरू कर दिया था.. पार्थ ने भी वही कोचिंग ज्वाइन कर लिया। अब अक्सर पार्थ यामिनी से नोट्स लेने और पढ़ने आया करता था.. खैर.. यामिनी ने भी यूनिवर्सिटी मे मास्टर्स मे दाखिला ले लिया था लेकिन उसने कोचिंग संस्थान नहीं छोड़ा। एक दिन कोचिंग सेंटर से लौटते समय पार्थ ने यामिनी से बताया कि उसका मेडिकल मे सिलेक्शन हो गया है और उसके पीछे केवल और केवल यामिनी का हाथ है तो यामिनी ने कहा कि "ये सब तुम्हारी मेहनत और लगन का फल है. . तुमने एक दिन भी क्लास मिस नहीं की.." मिस कैसे करता.. आपसे कैसे मिलता फिर आपसे बिना मिले मेरे दिन की शुरुआत ही नहीं होती" यामिनी कुछ समझती की सारा माजरा उसे समझ में आ रहा था.. उसने कहा मतलब? उस दिन पार्थ बिना कुछ कहे वहा से चला गया.. यामिनी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था ये सब क्या है.. पार्थ जो कि उससे लगभग तीन, चार साल छोटा है उसके प्रति इस लगाव को वो और क्या कहे.. ये एक किशोर मन का आकर्षण है और कुछ नहीं.. फिर वो तो परिपक्व है फिर वो क्यो पार्थ को देखना चाहती है? हर जगह, क्यो वो कोचिंग नहीं आता तो उसकी नजरे उसको धुढ़ती है? अगर ऐसा है तो ये समाज इस रिश्ते को कभी नहीं स्वीकार करेगा.. और मै अब पार्थ को अनदेखा करूगी..

दूसरे दिन यामिनी ने पार्थ के तरफ देखा भी नहीं .. पार्थ उसके पास आया बताने के लिये कि दिवाली के बाद वो यहा से अहमदाबाद चला जायेगा लेकिन उसके इस बात का यामिनी ने कोई जवाब नहीं दिया.. ये सब आसान नहीं था यामिनी के लिए खैर पार्थ ने भी कोचिंग आना छोड़ दिया था..  खैर दिवाली का दिन भी आ गया, उस दिन यामिनी ने सुर्ख लाल रंग का सूट पहन रखा था.. उसकी बड़ी बड़ी सुन्दर आखे चश्मे से और भी खूबसूरत लग रही थी..उसके लम्बे काले बाल बादलों की तरह उसके चेहरे को घेरे हुये थे, दिये के रोशनी में उसका चेहरा चाँद की तरह दमक रहा था. . .  थाली में दिया लिये वो लाॉन में गई तो देखा सामने पार्थ शर्मा जी के बेटे पिंटू के साथ खड़ा बात क़र रहा है.. पार्थ को देखते ही वो हड़बड़ी में अन्दर आने के लिए मुड़ी ही थी कि अनायास ही एक जलता हुआ रॉकेट उसके दुपट्टे मे लिपट गया..और वही पास मे छोटू पटाखों का बंडल लिये बैठा था..

पार्थ ये सब देख रहा था.. जैसे ही उसने देखा कि यामिनी के दुपट्टे में आग लग गई वो झट से दौड़ा और यामिनी के शरीर से उसने दुपट्टा अलग कर दिया.. यामिनी कुछ समझ पाती कि उससे पहले ही राकेट पार्थ के हाथ में बोल गया और उसका पूरा हाथ जख्मी हो गया. . ये सब इतना अचानक हुआ कि किसी को कुछ समझ में नहीं आया.. खैर यामिनी ने पार्थ को पकड़कर अन्दर लिटाया और उसकी मरहम पट्टी की.. यामिनी के आखों से आंसू रूक ही नहीं रहे थे.." क्या जरूरत थी ये सब करने की.. "अच्छा तुम्हे कुछ हो जाता तब" पार्थ ने कहा.. यामिनी के पास कोइ जवाब नहीं था.. कुछ था तो वही अधजला सुर्ख लाल रंग का दुपट्टा और दीवाली की वो रात.. उसके बाद पार्थ अहमदाबाद चला गया..

शर्मा जी के बेटे पिंटू से उसके बारे में पता चल जाता था लेकिन बैंक मे कार्यरत शर्मा जी का भी स्थांतरण हो गया.. तो पिंटू के जाने के बाद पार्थ के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली.. तब से. .  तभी मां की आवाज़ ने यामिनी को बीते कल से जगा दिया.. "अरे बेटा तुम्हारी सफाई हुई कि नहीं ये क्या अभी तक. . संदूक ही खोले बैठी है.. जाने क्या होगा इस लड़की का.. दूसरे घर जायेगी तब अकल ठिकाने आयेगी.."  माँ बड़बड़ाते हुये चली गई.. यामिनी ने भारी मन से संदूक में  वो अधजला दुपट्टा गले से लगा कर करीने से एक अमानत की तरह रख दिया और अपने यादो के उस संदूक को भीगी आखों से. . मीठी मुस्कुराहट और. . ये सोचते हुये बन्द कर दिया कि. . आज पांच साल बाद उसका पार्थ अब डॉ पार्थ बन चुका होगा.. वो जहां रहे बस खुश रहे.. और कुछ नहीं चाहिये उसे. . . 

#ऋतु 



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