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@dawriter

तुम कब आओगे ?

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sunilakash by  
sunilakash

 

दिक्-दिगंत का कलरव आज संगीत बना है।
जीवन का ये एकाकीपन फिर गीत बना है॥
सुखद मनोहर वसंत बना है शीत आजकल।
विरह-व्यथा का दर्द पुन: मनमीत बना है ॥
हृदय-उमंगें लगी सँवरने।
तन्हाई का जाल कुतरने॥1॥

तुम कब आओगे ?

स्वांस गँधाती आज मुझे मदमस्त किये है।
सुप्त तरंगे जाग उठीं सँत्रस्त किये है॥
मूक-दृष्टि की प्यास से यह व्याकुल मन मेरा।
तुम्हारे मार्ग पर पलक-पाँवडे बिछा दिये हैं॥
आ -- आकर आहट।
कानों मॆ लगी उतरने॥2॥

तुम कब आओगे ?

आज हवा गुदाज लगती है बाँहों की तरह।
धूप मेरे साथ गाती मस्त चरवाहों की तरह॥
मस्तियांं-सी झर रही हैं, पेड़ों-फूलों से तले।
ताकता है कोई मुझको तेरी निगाहों की तरह॥
लगा कोई अधरों से।
अधरों मॆ रस भरने॥3॥

तुम कब आओगे ?



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