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@dawriter

घंटों मुझसे बतियाती हो

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sunilakash by  
sunilakash

 

 

जब मन एकाकी होता है,
तुम दबे पाँव आ जाती हो।
और यादों के वातायन से,
घंटों मुझसे बतियाती हो॥
वही दृष्टि, वही काजल,
मुझको आकर्षित करता है।
नथुनों में स्पंदित श्वाँस,
नया कोई उपालम्भ धरता है ॥
आँखों में मिलन की तस्वीरें ले,
तुम मुझको खोल दिखाती हो।
और यादों के वातायन से,
घंटों मुझसे बतियाती हो॥1॥


जुल्फों का घना काला रेशम,
यूँ फर-फर फहराता है।
अँधियारी रात की रानी का,
ज्यों चूनर लहराता जाता है॥
अधरों की कहानी मौन पड़ी,
और तुम खिलती-मुस्काती हो।
और यादों के वातायन से,
घंटों मुझसे बतियाती हो॥2॥


मैंने जब भी छूकर देखा,
पारे-सी छिटक तुम दूर गईं।
फिर सोचों में घिरकर बैठा,
तुम मेरे निकट आ खड़ी हुई॥
कभी नेह का आँचल ढककर,
थपकी दे मुझे सुलाती हो।
और यादों के वातायन से,
घंटों मुझसे बतियाती हो॥3॥



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