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@dawriter

गूढ़ समझ

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kavita by  
kavita


अपनी लाडली कली को समझाया ..
झुर्रियां पड़ चली मलिन काया वाली सुमन-झलि ने,
कि, 'तू अब अपने ये आवरण बंध खोल ..
और अपने अंतर्मुखी स्वरूप को त्याग..
और खिला दे अपने ओजस्वी रूप को,
अपनी खुशबू को बिखेर....
यूँ कब तक 'कांटों से डर कर जियेगी..
अब इन कांटों का डर खत्म कर, जिंदगी अब तुझे सही मायनों में मिलेगी..!
.......


बेटी ! तुझे तो एक शहजादे भंवर के संग जाना है,
और वहां अपने रूप गुण को महकाना है,
खुद को बदल,
देख 'ये जग कितना सुहाना है,
कली ने कहा: 'चिंता न कर माँ ...
मैं खुद को समाविष्ट करना जानती हूं..
अभी अधखिली हूं, ये मानती हूं..
पर तुम मुझ पर रखो विश्वास..
न तोड़ूंगी अपने खानदान की आस..
मैं अलि के संग जब भी जाऊँगी..
अपने गुणों के सौंदर्य का पराग ले के जाऊँगी..
..

अपने गुण समेत उनके परिवेश में ढल जाऊँगी..
मुरझा कर भले ही इस डाल से गिर जाऊँगी,
किन्तु इस पराग के बल पर मैं उन सबके दिलो में बस जाऊँगी..

..

भले ही इन कांटों ने अब तक मुझे भेदा है,
पर वादा है माँ, मैं ये कांटे वहां नही बिछाऊंगी ..
...

मुरझा कर भी अपनी खुशबू वहां फैलाऊंगी..
अपने इसी हुनर के बल पर एक दिन...
मैं उनके घर का 'शहद' कहलाऊंगी...!!

-कविता जयन्त श्रीवास्तव



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