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@dawriter

ख्वाब सरीखे दिन

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dushyant88 by  
dushyant88

पड़ोस में अगर कोई हसीन चेहरा आकर बस जाए तो अकसर आपके अच्छे खासे दोस्त भी जलन के शिकार हो जाते हैं। ऐसा ही कुछ उस परी चेहरे की आमद पर मेरे साथ हुआ। जब कुछ दोस्तों ने बधाई दी, कुछ ने पार्टी की फरमाइश की और कुछ ने अपनी किस्मत को कोसते हुए बाकायदा मेरी अच्छी किस्मत के कसीदे पढ़ डाले, तब मैने हैरानी से पूछा कि अचानक ऐसा क्या हो गया है।
‘मेरे भोले सनम, अब इतना भी इनोसेंट न बनकर दिखाओ। यार लोग सब खबर रखतें हैं।
’किसकी बात कर रहे हो? कुछ बताओ भी तो कमबख्तो?‘
’अनजान बन रहा है ! बेटा अब हमसे क्या छिपाना! हम कब कह रहे हैं कि हमारा भी इंटरो करवा दे। अबे जो बात पूरी दुनिया में ब्रेकिंग न्यूज की तरह ब्रॉडकास्ट हो चुकी है, वो तुझे नहीं पता?’
’बाई गॉड, नहीं पता....।

दोस्तों की नज़रें आपस में मिली। ’कमाल है यार, इसे तो सचमूच कुछ नहीं पता। अबे घोंचू अपने आंख कान जरा खुले रखा कर। दिन-रात किताबों की दुनिया में खोया रहता है। वो क्या शेर है जो तू ही सुनाया करता है......ज़िदगी क्या है, किताबों को हटाकर देखो.....।'
’धूप में निकलो घटाओं में नहाकर देखो, ज़िदगी क्या है किताबों को हटाकर देखो। मेरे मुंह से निकला।
’हां वही...और अब इसको ज़रा जि़ंदगी में अमल में भी ला। सब पता चल जाएगा।’
दोस्त तो सीख देकर चले गए पर मै सोच में पड़ गया।

और जब मैने किताबों को हटाकर सचमूच अपने आसपास देखा तो खुश्बुओं से लबरेज़ उजले लिबास में महकती जिंदगी अपने करीब ही नज़र आई। वो मेरे घर के पीछे काफी खाली पड़ी जमीन पर दूर तक कतारबद्ध लगे यूकेलिप्टस के पेड़ों के बाद बनी गुलाबी कोठी में पिछले हफ्ते ही अपने परिवार सहित शिफ्ट हूई थी। रोमानी किस्से-कहानियों में दर्ज बेपनाह हुस्न की मलिका किसी शहजादी की तरह अपने घर की बालकनी या छत पर कभी-कभार उसका नमूदार होना, यूकेलिप्टस की आसमान छूती झूमती शाखाओं की लुका-छिपी के बीच अपने चेहरे पर बार-बार उड़ आती लटो को हटाते किसी सोच में डूबे हुए उसका अपने घर की छत पर चहलकदमी करना- यूं लगता था मानो किसी दुखांत प्रेम कहानी की विरहिन नायिका दूर देश गए अपने नायक का बरसों से इंतज़ार कर रही हों। या फिर बहुत पहले बचपन में कभी पढ़ी कहानी वाली मासूम परी राजकुमारी जैसे अनजाने में अपनी सखियों से बिछड़ कर भूले-भटके मनुष्यों के देश में आ पहुंची हो और अब हर मुसीबत से निकाल ले जाने वाले किसी राजकुमार के इंतज़ार में सबसे नज़रें बचाकर घूम रही हो। वो जरूर ऊपरवाले द्वारा आइंदा दिनों में पेश आने वाले किसी खूबसूरत सिलसिले का कोई खास किरदार थी वरना हम जैसे साधारण लोगों के बीच एैसी अप्सरा का क्या काम? मेरे तसव्वुर के दरीचों पर उसकी खूबसूरत आमद हसीनतरीन ख्वाब दिखाने वाले अनगिनत झरोखों के खुलने का पैगा़म तो थी ही, साथ ही मेरे ख्वाब सरीखे दिनो की शुरुआत भी थी। दोस्त ठीक कहते थे- शायद मेरी किस्मत अच्छी थी कि वो मेरे घर के इतने करीब थी कि मै उसका दीदार रोज़ कर सकता था।

पांच-छह दिन तक अपने आसपास उसकी मौजूदगी के तिलस्मी अहसास में खोए रहने के बाद दोस्तो की कही अच्छी किस्मत वाली बात साबित भी हो गई। एक शाम मेरे स्टडी रुम में वो मुझसे मुख़ातिब थी।

दरअसल मेरी छोटी बहन रीना और वो दोनों एक ही क्लास और सब्जैक्ट्स की स्टुडेंट निकलीं, सिर्फ कॉलेज अलग थे। मै पहली बार उसे इतने करीब से देख रहा था। खूबसूरती के लिए अब तक दी गई तमाम उपमाऐं उसके जादुई सौदर्य के सामने पनाह मांगती दिखती थीं। अपने पाश में बांध लेने वाले तेज से दमकते उस मोहक चेहरे पर जिस जगह मेरी निगाह थम कर रह गई, वो थी- उसकी बोलती आंखें। उसे शायद ज्यादा बोलने की जरुरत नहीं पड़ती होगी। उसकी आंखें ही सब कह देती होंगी।

‘ये पूजा है भैया, हमारे घर के पीछे पेड़ो के बाद वाली गुलाबी कोठी में नये आएं हैं।’
‘हाई........।’ वो मुस्कराकर बोली।

अपने आपको भरसक सामान्य बनाए रखने का प्रयत्न करते हुए मै ‘हैल्लो’ कह पाया। मै कुछ मायूस हुआ कि उसका नाम परी, शहजादी या अप्सरा जैसा कुछ नहीं निकला। शायद अपने लोक से हमारी दुनिया में आकर बदल लिया हो। वो सर से पांव तक सौंदर्य की देवी थी, जिस पर नज़र पड़ते ही पूजा की ख्वाहिश खुद ब खुद जाग उठती थी। इस लिहाज़ से पूजा नाम भी उसकी शख्सियत के अनुरुप ही था। ज़मीनी हकीकतों से दूर मेरा दिल भी न जाने कैसी-कैसी कल्पनाऐं कर रहा था। अकाउंट्स की स्टूडेंट होने के कारण उसे रीना के साथ कम्प्यूटर पर ‘टैली‘ की प्रैक्टिस करनी थी। मै चुपचाप स्टडी रुम से निकल गया।

कुछ दिनों में रीना से उसकी अच्छी-खासी ट्यूनिंग हो गई, लिहाज़ा हर शाम मेरे स्टडी रुम में उसके कदम पड़ने लगे। उसकी खुश्बू अब स्टडी रुम की स्थाई विशेषता बन गई जो मेरे दिलो-दिमाग पर दिन-रात छाई रहती। मुझे सुबह से ही अब शाम का इंतज़ार रहने लगा। ज्यों-ज्यो उसके आने का समय नज़दीक आता, एक अजीब सी बैचेनी मुझ पर तारी होने लगती। ‘ये कह-कह कर हम दिल को बहला रहे हैं, वो अब चल चुके वो अब आ रहे हैं।’ शायरों, कवियों ने खूबसूरती के बारे में तमाम शेर और कविताएं शायद एैसे ही किसी चेहरे का तसव्वुर कर लिखें होंगे। उसका अक्स सामने आते ही जहन में वो तमाम शेर जैसे गूंजने लगते थे। अपने होंठों पर हमेशा रहने वाली महीन सी तरल मुस्कुराहट की सौगात लिए किसी अहमतरीन किरदार की तरह उसकी आमद जैसे अब तक बेमतलब और बेमानी वहां मौजूद हर चीज़ और गतिविधि को मानो खास मायने देती। रीना के साथ कम्प्यूटर के सामने बैठते ही जैसे उसके इर्द-गिर्द एक ओज-सा स्थापित हो जाता जिसके चलते मंत्रमुग्ध-सा दूर बैठा मै सम्मोहन की अवस्था में पहुंच जाता। कम्प्यूटर स्क्रीन पर तन्मयता से नज़रें जमाए बीच-बीच में उसके द्वारा विषय से सम्बन्धित शब्दो का धीमा-धीमा उच्चारण ऐसा लगता मानो वो धीरे-धीरे किन्ही मंत्रों से वातावरण को अभिमंत्रित कर रही हो। वो सम्मोहन ही तो था क्योंकि उसके मुंह से निकले ‘सेल-परचेस’ या ‘प्रोफिट-लॉस’ जैसे भावहीन शब्द भी किसी पारलौकिक श्लोक, मंत्र या दुआ का सा आभास कराते मालूम होते थे। कल्पनाशीलता से कोसो दूर आंकड़़ों व ग्राफिक्स के भारी-भरकम बोझ से बोझिल अकाउंट्स जैसा विषय भी सिर्फ उसके द्वारा पढ़े जाने के कारण एकाएक जीवंत और असीमित खूबसूरत संभावनाओं का प्रतीक लगने लगा था।

एक दिन शाम को वो थोड़ा जल्दी आ गई। संयोग से रीना बाकि परिजनो के साथ मार्किट गई हुई थी। औपचारिक ‘हैलो’ के आदान-प्रदान के बाद मै स्टडी रुम से निकलने ही वाला था कि अचानक वो बोली, ‘एक्सक्यूज़ मी, आपको ‘एक्सल‘ आता है?’
‘जी हां....’। मै रुक गया।

‘रीना कह रही थी कि आप ‘एक्सल’ में एक्सपर्ट हैं। आप मुझे ‘वी लुक-अप’ कैसे यूज करते हैं-बता देंगे? और हां, एक्सल की कुछ शार्टकट कमांड्स भी सिखा देंगे? आप तो वैसे भी एम.सी.ए. कर रहे हैं, ओवियसली इंटैलीजैंट तो होंगे ही।’

वो मेरे अस्तित्व से बिल्कुल अनजान ना थी, ये जानकर दिल को अपार सकून मिला। प्रत्यक्षतः मै बोला, ‘इंटैलीजैंट का तो पता नहीं लेकिन जितना मुझे आता है, आपको बता दूंगा।’
‘यस! दैट्स द स्पिरिट!’ वो उत्साह से बोली। ‘रीना तो आज है नही। मै अकेली बोर हो जाउंगी। आज आप मुझे ‘एक्सल’ ही सिखा दो।’

वो बड़ी बेतकल्लुफी से बोल रही थी। स्त्री सुलभ हिचक से कोसो दूर। ‘ये परी तो बड़ी प्रैक्टिकल है।’ मैने मन ही मन सोचा। एक ही की-बोर्ड शेअर कर उसे विभिन्न कमांड्स बताना और इस दौरान उसके बिल्कुल करीब होने के अलौकिक अनुभव से गुजरते हुए भी सहज बने रहना हालाकि मेरे लिए बेहद मुश्किल था लेकिन इस मुश्किल पर सारे जहान की राहतें कुर्बान थी। मेरे करीब बैठने पर वो अपने आप में सिमटी जरुर, पर की-बोर्ड पर उसकी दूध सी कोमल उंगलियों के मेरी उंगलियों से टकराने पर उसने हाथ खींचने की कतई कोशिश न की। आधे घंटे में मैने उसे काफी शार्टकट बता दिए। वो रिलैक्स होकर बैठ गई। मै भी कुर्सी पर सीधा होकर बैठ गया।

वो मेरे सामने थी और हम दोनो तन्हा थे। हूरों को मात करते, ओस से नहाए ताजा फूल सा खिले उसके चेहरे को निहारते मै सोच रहा था कि अगर वक्त रुक सकता था तो उसके रुकने की अपील आखिर कहां की जाए। उसके चेहरे पर एक इत्मिनान भरी मुस्कुराहट थी। मुस्कराते हुए जैसे उसकी खूबसूरती उस अनोखी खुदाई वेवलैन्थ पर होती जहां आकर चीज़े नायाब होने का दर्जा पा जातीं हैं। जी तो चाहता था वो एैसे ही मुस्कुराते हुए मेरे सामने बैठी रहे और मै उसे दीवानावार निहारता रहूं। मुझे तो एैसी किसी हरकत से कोई परहेज़ नहीं था पर कमबख्त शिष्टाचार आड़े आ रहा था। अपेक्षाकृत लम्बी खिंची खामोशी और काफी देर से मुझे अपनी ओर इतनी गौर से देखता पा वो कुछ असहज हुई और गला खंखारकर अनमने भाव से सामने बुक शेल्फ में लगी किताबो पर सरसरी नज्रर दौड़ाने लगी। अपनी ओर से हुई इस अनचाही गुस्ताखी का प्रभाव कम करने के लिए फौरन कुछ बात शुरु करना ज़रुरी हो गया था। ‘....आप सिर्फ शार्टकट ही क्यों सीखना चाहती हैं?’ जल्दी में यहीं से बात आरंभ करना मुझे सूझा।

वो कुछ संयत हुई। ‘शार्टकट से एक तो जल्दी काम हो जाता है, फिर डिटेल में ये सब सीखने में टाईम भी बहुत लग जाएगा। इतना टाईम किसके पास है।’
‘लेकिन शार्टकट हर चीज का हल तो नहीं है। कई चीजों को समझने के लिए उन्हें गहराई से जानना जरुरी होता है।
‘कौन इतनी सारी चीज़े सीखने के झंझट में पड़े। मेरा काम सिर्फ शार्टकट से चल जाएगा।’

मैं ज़िन्दगी की बात कर रहा था पर वो शायद 'एक्सेल' से ही बाहर नहीं आ पाई थी।
‘क्या आप लाईफ में भी शार्टकट में विश्वास रखतीं हैं?’ उसके चेहरे के भावों को पढ़ने के प्रयास में मैने पूछ ही लिया।
‘आफकोर्स....! अगर कम टाईम और मेहनत से कोई चीज जल्दी पाई जा सकती है तो क्यों नही...।’
‘....मतलब आप चीजों को गहराई से जानने में विश्वास नहीं करतीं?’

उसने एक पल सोचा, फिर चेहरे पर अनायास झुक आई लटों को पीछे करते हुए बोली,‘ नहीं ऐसी बात तो नहीं है लेकिन सभी चीजों को अगर हम सीरियसली और डीपली लेने लगेंगे तो दिमाग खराब हो जाएगा। जो चीजें हमारे काम की हैं या फायदेमंद हैं उन्हीं को सीरियसली लेना चाहिए। हर चीज की टैंशन लेकर थोड़े ही न बैठ जाना चाहिए। अगर हम हर चीज के लिए सीरियस होने लगे तो इंज्वाय कब करेंगे...? वन शुड बी प्रैक्टिकल!’

‘बंटाधार.....।’ आधुनिक युग की उस मॉडर्न परी के ये घोर व्यावहारिक उदगार सुनकर यही शब्द मेरे दिमाग में कौंधा। अकाउंट्स का प्रॉफिट और लॉस वाला सिस्टम ज़िदगी में भी लागू! ‘बेटा, तेरी शायराना तबियत के बिल्कुल उलट है ये तो...। बहुत मेहनत करनी पड़ेगी बॉस......!’
‘चाय पियेंगी आप.....।’ विषय बदलने की गरज से मैने पूछा।

‘मै चाय नहीं पीती..।’ वो घोषणा के से स्वर में बोली मानो चाय पीना उसके स्तर से बहुत नीचे की बात हो। खूबसूरत लड़कियों को चाय जैसी प्रेरणादायी चीज़ से पता नहीं क्यों एलर्जी होती है?
‘हैल्थ कांशियस...!’ प्रत्यक्षतः मै बोला।
‘नही, एैसी कोई बात नही....। बस शुरू से कभी पी ही नही।’,
वैसे फूलों सी कैफियत रखने वाली उस नाज़ु़क मेहमान को चाय ऑफर करना भी तो मेरी निरी बेवकूफी का ही प्रमाण था।
'तो फिर कुछ और...। एनीथिंग दैट यू लाइक...।
'नो, नो। इट्स ओके। प्लीज डोंट बी फॉर्मल।'
'ओके, ऐज़ यू विश। ..लगता है अकाउंट्स आपका फेवरेट सब्जैक्ट है..?’ मैने बातचीत के विषय को उसकी पसंद की ओर मोड़ा।

‘फेवरेट तो नहीं, लेकिन बी. कॉम का क्योंकि ये मेरा लास्ट ईयर है इसलिए कॉलेज में पढ़ाए जाने वाले अकाउंट्स के साथ प्रैक्टिकल अकाउंट्स जल्द से जल्द सीख लेना चाहती हूं। आपके पीसी में ’टैली’ इंस्टाल्ड है, तभी रोज यहां आकर रीना के साथ प्रैक्टिस कर लेती हूं। और हां...टाइम मिलने पर नेट पर अपनी ’मेल्स’ और ’फेसबुक’ वगैरह भी चेक कर लेती हूं’-वो हंसी। ’अपना सेल फोन साथ नहीं लाती ताकि डिस्टरबैंस ना हो। वैसे आपको बुरा तो नहीं लगता मै रोज़ आपका कम्प्यूटर और नेट रोज़ यूज करती हूं?

‘नहीं ..नहीं, एैसी कोई बात नहीं। मैं कतई ऐसा नहीं सोचता। लेकिन इतनी जल्दी ये सब-टैली और प्रैक्टिकल अकाउंटस सीखने की क्या वजह है? इनकी तो तब जरुरत पड़ती है जब कोई जॉब करनी हो। कही अप्लाई किया हुआ है क्या?'
’नही, जॉब वगैरह के लिए नहीं कर रही ये सब।’
’फिर...! किसी से कोई शर्त वर्त लगी है क्या..?’
‘शर्त तो नहीं लगी...लेकिन किसी को सरप्राइज देना है...।’ वो कुछ सोचते हुए मुस्कुराई।
’कोई सीक्रेट है?’
’है तो! बट यू नो, सीक्रेट्स आर नॉट टू बी टोल्ड।’ उसकी मुस्कुराहट गहरी हुई।
एक सीक्रेट शायद वो अपने बारे में नहीं जानती थी कि उसकी हसीनतरीन शख्सियत पर चस्पा उसकी दिलकश मुस्कराहट से बढ़कर कोई सरप्राइज या सीक्रेट हो ही नहीं सकता था। इस सीक्रेट को साक्षात देखकर कोई और सीक्रेट जानने की मेरी हसरत भी नहीं थी।
‘अच्छा और किन चीजों में इंटरेस्ट है..?’

वो बाकायदा गिनाने लगी। ‘सोशल नेटवर्किंग, सर्फिंग, चैटिंग, गैजेट्स, मूवीज इटसेटरा..इटसेटरा...। और हां...’ वो कुछ रुक कर हिचकिचाती हुई मुस्कराकर बोली,‘...आज से ‘एक्सल’ में भी इंटरेस्ट हो गया है। वैसे एक बात बताऊं आकाश जी, आप सिखाते बहुत अच्छा हैं।’

‘मै भी आपको एक बात बताउं पूजा जी, आप सीखती बहुत अच्छा हैं...।’ मैने उसके अंदाज की नकल करने की कोशिश की।
वो खिलखिला कर हंसी। फिर बोली,‘मै सीरियसली कह रही हूं,! मै तो कब से आप से ये सब पूछना चाहती थी, पर कभी मौका ही नहीं मिल पाया। आप हमेशा एक छोटी सी हैलो के बाद या तो रूम से बाहर निकल जाते या फिर कोई मोटी सी किताब लिए दूर बैठे रहते। वो तो आज मौका देखकर मैने आपको रोक लिया वरना आप तो आज भी निकल रहे थे। देखा, इससे मेरा कितना फायदा हो गया। आपने अभी इतने इंटरैस्टिंग तरीके से समझाया कि लगता नहीं मै ये सब कभी भूलूंगी। लगता है आपसे और भी कुछ सीखना पड़ेगा। पता नहीं आपके पास टाईम होता है या नही...?’
‘टाईम की कोई प्रॉब्लम नहीं है। शाम को तो मै फ्री ही होता हूं। वैसे आप जिस वक्त कहेंगी, तभी शुरू कर देंगे।’ उसे क्या पता, उसकी सोहबत की पेशकश के सामने दुनिया की हर शै बेमानी थी।
‘ओके डन...। वो उत्साहित स्वर में बोली-'अब आप हर रोज़ शाम को मुझे ‘एक्सल’ सिखाएंगे।...और सिर्फ शार्टकट्स नही, वो क्या कह रहे थे आप....? हां....। गहराई से....। थॉरोली...। आपसे सीखने में बड़ा मज़ा आएगा।’
तभी रीना आ गई।
‘क्या बात है आज बड़ी गुफ्तगु चल रही है।’
‘यार रीना, तेरे ब्रदर तो बड़े इंटरैस्टिंग निकले।....और हां, मुझे ‘एक्सल’ सिखाने को भी तैयार हो गऐं हैं।’

अपने प्रति उसका उत्साह देखकर मुझे यूं लग रहा था मानो मेरी कल्पना की दुनिया को वो अपने अनिद्य सौंदर्य के रंगो से नया रूप दे रही हो। और फिर खुशगवार शामों का ऐसा सिलसिला शुरू हुआ मानों मैने किसी खूबसूरत ख्वाब को जीया हो। दिन-रात उसके अहसास की खुश्बू को अपने चारो और महसूस करना और शाम को सचमूच उसके करीब होने की खुशकिस्मती-ये एक एैसी नैमत थी जिसके आगे दुनिया की सारी खूबसूरत चीजें फीकी थीं। एक चीज सीख लेने के बाद उसका नयी चीज सीखने की जिद करना, मेरी हर बात को ध्यान से सुनना, एक भी पल मुझे स्टडी रूम से न हिलने देना-ये सब मेरे लिए मन मांगी मुराद पूरी होने जैसा था। अब रीना उसके आने पर उससे सिर्फ ‘हाय हैलो‘ कर मुस्कुराती हुई स्टडी रूम से निकल जाती। धीरे-धीरे हम दोनों के बीच से औपचारिकता और बातों के विषय से ‘अकाउंट्स‘ और ‘एक्सल‘ न जाने कब गायब हो गये। अब हम हर विषय पर बात करते। फिल्म, म्यूजिक जैसे हल्के-फुल्के विषयों से लेकर टैक्नोलोजी, फिलॉसफी, साहित्य और जीवन-मृत्यु जैसे गंभीर विषयों पर भी वो बड़ी उत्सुकता से बात करती। बेशक कुछ विषयो में उसका ज्ञान सीमित था परंतु वो बड़े जिज्ञासु भाव से सब सुनती। हमारे बीच हुई बातचीत को वो कितना महत्व देती, इसका अंदाजा मुझे इसी बात से हो जाता कि अकसर वो पिछले दिन छोड़े गये विषय से ही शुरूआत करती। आश्चर्यजनक रूप से कई विषयों पर पूछने के लिए वो तैयार प्रश्नों के साथ आती। वो हैरान होती कि अपने विषय के अलावा मुझे इतनी जानकारी कहां से आती है?
’आकाश, आप तो पूरे इनसाईक्लोपीडिया हो। हर सब्जैक्ट की इतनी जानकारी आप कैसे रखते हैं? मुझे तो अपने सब्जैक्टस की बुक्स पढ़ते-पढ़ते ही नींद आ जाती है।’
मै हंसा-’अपने-अपने इंटरेस्ट की बात है। आप में भी एैसी बहुत सी खूबियां हैं जो बाकि किसी में नहीं हैं।’
’अच्छा! एैसी कौन सी खूबी है मुझमें...।’ उसने पलकें झपकाईं।
मैने ध्यान से उसकी ओर देखा।
तुम्हें देखकर यूं लगता है मानो ज़िदगी की आपाधापी से निकलकर, खुश्बुओं के बादल पर सवार होकर, संगीत की मधुर लहरियों के बीच दूर पहाड़ियों से घिरी हसीन फूलों से लहराती वादी में कदम रख दिया हो।
‘किस सोच में डूब गए मिस्टर इनसाईक्लोपीडिया! कुछ बताने वाले थे आप।‘ उसने मेरी तंद्रा भंग की।
‘अच्छा वो...। देखिए, आपमें कोई एक खूबी तो है नहीं। बहुत सारी खूबियां हैं। लिस्ट बनानी पड़ेगी और वो भी एक्सल शीट में...। मेरा ख्याल है एक पूरी ’वर्क बुक’ कम पड़ जाएगी, इसलिए फिर कभी बताउंगा।‘ मैने हंसते हुए कहा।
‘..यू मस्ट बी जोकिंग.....। उसने मुंह बनाते हुए नकली नाराज़गी प्रकट की।
’नहीं,नहीं मै सीरियस हूं। एक दिन जरुर बताउंगा।

मै तो सचमूच सीरियस था। वो सीरियस थी या नहीं, मै समझ नहीं पा रहा था। क्या ये सब सिर्फ कुछ सीखने के लिए हैं या इसके कुछ और भी मायने हैं। ’कहां से लाउंगा मै जुदाई का हौंसला, क्यूं इस कदर मेरे करीब आ रहे हो तुम।’ बहरहाल जो कुछ भी था, बड़ा पुरसुकून था, बेशकीमती था।
अकसर बाते करते करते जब रात हो जाती तो उसे छोड़ने जाते समय स्टडी रुम का पिछले दरवाजे का ही इस्तेमाल करते, जो दूर तक फैले पेड़ों के बीच बनी दूर उसके घर के करीब तक जाती तक जाती पगडंडी की ओर खुलता था। उस मुख्तसर से सफर पर किसी रोमानी कथा के पात्रों की तरह तेज हवा में झूमते कतारबद्व पेड़ों के बीच से हम दोनो का गुजरना, यूं लगता था मानों दीन-दुनिया से बेखबर मै उसके साथ किसी और दुनिया में पहुंच गया हूं। अब तकरीबन रोज़ ही वो लेट होने लगी। उसकी बाते खत्म होने का नाम ही ना लेती। उसकी बातें सुनते हुए धीरे-धीरे घने पेड़ों के बीच से उसके साथ गुजरने का दृश्य उन दिनों की यादगार के तौर पर मेरे दिलो-दिमाग पर किसी रोमांटिक फिल्म के पोस्टर की तरह हमेशा के लिए अंकित हो गया।

अच्छे दिन बहुत जल्दी बीत जाते हैं। मुझे यही लगता था जैसे रहती दुनिया तक सब कुछ एैसे ही चलता रहेगा। बहरहाल सब कुछ वैसे नहीं चला। वैसे तो उसके एग्जाम कब के खत्म हो चुके थे पर उसका रोज आना बदस्तूर जारी था। मेरे एग्ज़ाम भी खत्म हो चुके थे। अब उसने अपना सेल फोन लाना शुरु कर दिया था। अब बातचीत के बीच बीच में वो फोन पर आने वाले मैसेजस भी देखती रहती और उनके जवाब भी देती रहती। दो-तीन दिन से मै नोट कर रहा था कि कोई भी मैसेज आने पर वो बड़ी उत्सुकता से उसे देखती और फिर थोड़ी निराश होती। फिर दूसरा कोई मैसेज आने पर भी उसकी यही प्रतिक्रिया होती। शायद उसे किसी खास मैसेज का इंतज़ार था। कई बार मै पूछने को हुआ पर कुछ सोचकर चुप हो गया।
उस रोज वो जाने को ही थी। मै कुछ दूर बैठा एक पत्रिका के पन्ने उलट रहा था। अचानक वो उत्साह से चिल्लाई, ‘यस....! ही इज कमिंग।’
‘कौन आ रहा है?’ पत्रिका पर से सर उठाकर मैने पूछा।
‘यू नो, साहिल आ रहा है।’
’कौन साहिल...?.’ इतने अपनेपन से उसके मुंह से किसी लड़के का नाम मै पहली बार सुन रहा था।
‘सॉरी आकाश, साहिल के बारे में मैने आपको कभी बताया ही नही। साहिल मेरे ब्रदर का फ्रैंड है। लंदन से एम. बी. ए. करने के बाद उसने वहीं अपना बिजनेस शुरु किया है। फिर कुछ रुक कर हिचकिचाते हुए धीमे स्वर में बोली, ‘एक्चुअली, ही इज इंटरस्टड इन मी। दोनो फैमिलीज को भी कोई प्राब्लम नहीं है। वैसे हम सिर्फ मुश्किल से दो बार ही मिलें है। फिर उसे लंदन जाना पड़ गया पर वो टच में रहता है। वो वहां की स्नैप्स और वीडियोज शेयर करता रहता है। अब वो अगले हफते आ रहा है। कहता है बड़ी मुश्किल से टाईम निकाला है। अगर सब कुछ ठीक रहा तो मैरीज के बाद अगले महीने शायद मै भी उसके साथ वहीं माईग्रेट हो जाउं। लंदन कितना खूबसूरत शहर है और वहां के मौसम और लाईफ स्टाईल का तो कहना ही क्या...। इंडिया की गरमी, भीड़-भाड़ और शोर-शराबे से बिल्कुल उलट-कूल एंड कॉम!’
वो लंदन और साहिल के बारे में जाने क्या-क्या बोले जा रही थी।
किसी का साथ अगर आप के लिए सांस लेने से भी ज्यादा जरुरी हो जाए तो उससे अलग होने की कल्पना आपके अंतर्मन में जो उथल-पुथल मचाती है, उसके आगे हजार सुनामियां भी कहीं नहीं ठहरती। भावनाओं की लहरों पर अचानक आया सुनामी का झंझावात आंखों के रास्ते बाहर आने को बेताब था। मै भी कितना बेवकूफ था कभी उससे इस बारे में पूछा तक नही। फेसबुक, चैटिंग, मोबाईल पर धड़ल्ले से मैसेजस का आदान-प्रदान और भविष्य के प्रति उसका बेफिक्र रवैया-इन सब बातों की ओर मैने कभी ध्यान ही नहीं दिया। कभी उससे उसकी पर्सनल लाईफ के बारें में पूछा तक नही। मै तो यही समझता रहा कि उपरवाले ने उस परी चेहरे को दो महीने पहले बनाकर मेरे लिए भेजा था।
वो मुझे बड़े गौर से देख रही थी। शायद मेरी आंखो मे आयी नमी उसकी नजरों से छिप नहीं पायी थी।
’क्या हुआ आकाश, आर यू ओके?’
’नहीं, कुछ नहीं। लगता है पढ़ते-पढ़ते एैसे ही आंखो मे पानी आ गया। कभी-कभी आ जाता है।’ मै जबरन मुस्कुराया।
उसे छोड़ने जाते समय आज पेड़ों के साये झूम नहीं रहे थे। शायद उन्हें भी मेरी हालत पर तरस आ गया था। इसलिए खामोशी ओढ़े चुपचाप खड़े थे। बोलने को कुछ नहीं था लिहाजा मै खामोश था। वो भी किसी सोच में डूबी हुई थी। दोनो और से खामोशी का सिलसिला यूं ही काफी देर तक चला। आखिर उसकी सोच का सिलसिला किसी नतीजे पर पहुंचा-’आकाश, एक बात सच-सच बताओगे?’
’पूछो’-मै अपने सोच के दायरे से बाहर निकला।
’जब से मैने साहिल का ज़िक्र किया है, आप बहुत अपसेट लग रहे हैं। मै सोच में हूं कि साहिल के बारे में बताकर मैने ऐसा क्या गलत कर दिया है जिससे आप इतने सीरियस हो गये हैं। अगर आपने मुझसे कभी इस बारे में पहले पहले पूछा होता तो मैने बता दिया होता। बाई चांस कभी इस बारे मे बात ही नहीं चली। पर पता नहीं क्यो, मुझे अच्छा नहीं लग रहा है। प्लीज़ बताईए, आपको क्या हो गया है। आप तो इतने सीरियस कभी नहीं होते, हमेशा कुछ न कुछ मज़ाक करते रहते हो। खासकर आपके सेंस ऑफ ह्यूमर से तो मै बहुत इम्प्रैस्ड हूं। फिर आज क्या हुआ है? और हां...आकाश, झूठ मत बोलना, सच-सच बताना।’
मै अच्छा एक्टर नहीं था। शायद वो सब समझ गई थी।
’पूजा, परसो यूनिवर्सिटी में कैम्पस इन्टरव्यू थे। काफी रैपुटड कप्पनीज़ आईं थी। मैने तुम्हें पहले नहीं बताया । मेरा सेलैक्शन भी बंगलूरु की एक एम.एन.सी. में हो गया है। कल मेरे फाईनल इग्ज़ाम का रिजल्ट आते ही मै बंगलूरु जाकर वो कम्पनी ज्वायन कर रहा हूं।’
’और ये फैसला आपने कुछ देर पहले ही साहिल का जिक्र आने के बाद लिया है। है ना...।’ उसकी व्यग्र आंखे मुझ पर ही टिकी थी जो शायद जल्द से जल्द वो सब पढ़ लेना चाहती थी जो मै कह नहीं पा रहा था।
’आकाश, दिस इज नॉट फेयर। आपको कुछ न कुछ जरुर कहना चाहिए। प्लीज से समथिंग..। अगर आप कुछ नहीं बोलोगे तो मै आपसे कभी बात नहीं करुंगी।’

मैने उसके चेहरे की तरफ देखा। हमेशा बेफिक्री से मुस्कुराते रहने वाले चेहरे पर पहली बार मै परेशानी के भाव देख रहा था। क्या बताउं उसे...। वो...जिसे शब्दों में समझाया नहीं जा सकता।

’...पूजा, जब तुम तेज चलती हवाओं के बीच अपनी छत पर किसी सोच में डूबी खड़ी होती थी तो मुझे लगता था जैसे किसी ट्रेजिक रोमांटिक नॉवल की विरहन नायिका न जाने कब से दूर गए अपने नायक की राह देख रही हो। मै खुद की तुलना उस नायक से करने लगा जिसके तुम्हे इंतजार था। फिर तुम मुझसे मिली। तुम्हारा मुझमें इतना दिलचस्पी लेना, मेरी बातों को इतना महत्व देना-इन सबसे मुझे लगा, तुम्हे मेरा साथ अच्छा लगता है। मुझसे मिलकर ही तुम इतनी खुश रहने लगा हो। मेरे लिए तुम हमारी दुनिया की साधारण लड़की कभी नहीं रही। किसी दूसरी दुनिया या जन्नत से आयी कोई परी जिसे उपरवाले ने खास मेरी कल्पनाओं के अनुरुप गढ़कर इस ज़मीन पर भेजा है। तुम्हें ये सब सुनकर बेशक अजीब लग रहा होगा पर क्या करु, मेरी सोच का दायरा हमेशा इन्हीं कल्पनाओं के गिर्द घूमता रहा है।तुम जितनी प्रैक्टिकल हो, मै उतना ही कल्पना लोक में विचरने वाला जीव हूं। अब भला इसमें तुम्हारा भी क्या कसूर है। सबकुछ मेरी तरफ से हुआ। अब बेशक मै ना भी चाहूं,, तुम्हारा यही अक्स हमेशा मेरे ज़हन में रहेगा-दिलकश मुस्कान वाली हसीन मासूम परी।’

वो कुछ क्षण तक अपलक मेरी तरफ देखती रही। फिर धीरे से बोली,’सॉरी आकाश, मेरी वजह से आपकी फीलिंग्स हर्ट हुईं। मेरी एैसी इंटेशन कभी नहीं रही।’
ये पहली बार था कि हमारी बातचीत के दरमियान माहौल कुछ भारी हो गया था वर्ना गंभीर से गंभीर विषय पर बात करते हुए भी माहौल को हल्का बनाए रखने और उसे हंसाते रहने की जिम्मेवारी मेरी होती थी। फिर अब जबकि ये तय था कि ये हमारी आखिरी मुलाकात थी, इस मौके को बोझल बनाने का मेरा कतई इरादा नहीं था।

’मोहतरमा ये सॉरी कहां से आ गई बीच में। अब आपने पूछा-मैने बता दिया। दैटृस ऑल। नो हार्ड फीलिंग्स, नो रिग्रेट्स। तुम्हारी भी जय-जय, हमारी भी जय-जय। ना तुम हारे, ना हम हारे। और सीरियस होने का डिपार्टमेंट आपका नहीं, इस खाकसार का है। आपका जिम्मा सिर्फ खुश रहने का है।’
एक पल को उसका उसका चेहरा और संजीदा हुआ, लगा वो रो देगी। बड़े यत्न से उसने उन भावों को फीकी सी मुस्काराहट में तब्दील किया।
’दैटृस लाईक अ गुड गर्ल!’

कुछ पल खामोशी से गुज़रे। फिर वो बोली-’वैसे एक बात है आकाश, आपको तो शायर या राईटर होना चाहिए था। आप बाते भी वैसी ही करते हो। मेरी जैसी सिर्फ अपने बारे में सोचने वाला लड़की को आपने अप्सरा, परी और न जाने क्या-क्या बना दिया। आप सचमूच बहुत इमेजिनेटिव हो और इतनी गहराई से सोचते हैं। कई बार आपकी बातें फेयरी टेल्स जैसी लगती है। आपको ये जॉब वगैरह का चक्कर छोड़कर नॉवल या स्टोरीज़ लिखनी चाहिए। बिलीव मी, आपकी बुक बेस्ट सैलर साबित होगी। आप अपनी बात से बहुत लोगों को इम्प्रैस कर सकते हैं।’
’जिसे इम्प्रेस होना था, वो तो हुई नही।’ मैने मन में आह भरी।

’लोगो को इम्प्रैस करने के लिए तो नहीं पर किसी से इम्प्रैस्ड होकर शायद एक कहानी या नावेल लिखूं, जिसकी नायिका’-एक हसरत भरी नज़र उसके चेहरे पर डालकर मै बोला-’इस वक्त मेरे सामने खड़ी है। बरसों से परदेस गये अपने नायक के लौटने की प्रतीक्षा करती विरहन नायिका की कहानी।’
उसने खामोशी से नजरें झुका ली। फिर धीमे स्वर में बोली-’मैने आपसे बहुत कुछ सीखा है। कितनी ही चीजों और विषयों की जानकारी मुझे सिर्फ आपसे मिली। ज़िंदगी के कई पहलू मुझे सिर्फ आपसे मिलकर पता चले हैं। इन सबको अपने जीवन में कितना उतार पाती हूं, मुझे अभी नहीं पता। लेकिन मै कोशिश करुंगी कि मेरी सोच थोड़ी बहुत आपकी तरह हो। अगली बार जब हम अगर कभी मिले तो आप खुद वो बदलाव देखना और मुझे बताना।’

रात ज्यादा हो रही थी और उसका घर करीब था। उसे आखिरी बार अलविदा कहने का मौका आ गया था। मुझे दूर-दूर तक घड़ी का इमकान न था इसलिए मेरे दिलो-दिमाग ठीक से काम नहीं कर रहे थ, लिहाजा वो क्या कहना चाह रही थी-कुछ समझ नहीं आ रहा था। आखिरी बार मैने उस पुरअसर चेहरे पर नजर डाली ’अब के बिछड़े तो फिर ख्वाबों में मिलें, जैसे सूखे हुए फूल किताबों में मिले’। जैसे-जैसे वो मुझसे दूर होती जा रही थी, मेरे ख्वाब सरीखे दिन भी मुझसे दूर होते जा रहे थे।

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आगामी छह महीने अपने शहर से बहुत दूर बंगलूरु में बिल्कुल नये माहौल में अपने आपको ढालने में गुजरे। कार्पोरेट जगत के निहायत औपचारिक वातावरण, फार्मल्स, ट्रेनिंग सैशंस, प्रैजेटेशंस, मीटिंग्स इत्यादि ने इतना वक्त ही नहीं दिया कि गुज़रे समय को शिद्दत के साथ महसूस किया जा सके। कम्प्यूटर स्क्रीन के सामने लगातार सिटिंग, प्रोग्रामिंग, कम्पैरिजन शीटृस और डाटाबेस तैयार करने में लगी घंटों की दिमागी कसरत और फिर विभिन्न रिपोर्टस तैयार करने में देर तक उलझे रहने की बाद आंखों में इतनी हिम्मत ही नहीं बचती कोई ख्वाब देखे। दिलो-दिमाग इतने थक जाते कि पहले से देखे हुए किसी ख्वाब के बारे में सोचे। ये सब मेरे लिए सही भी था। अगर मै इतना व्यस्त न होता तो शायद गुजरा वक्त चैन न लेने देता। संवेदनाओं से कोसो दूर तथ्यों पर आधारित नितांत यांत्रिक माहौल ने मेरी शायराना सोच और ज़ज्बातों को उस दौरान बिल्कुल उभरने ना दिया।

पिछले दस दिनों से तो वैसे भी दम लेने की भी फुरसत न थी। फॉरेन क्लाईंट से दो महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट मिलने की फाईनल स्टेज में थे। चूंकि दोनो क्लाईंट नये थे इसलिए प्रोजेक्ट देने से पहले हर तरह से संतुष्ट हो जाना चाहते थे। कम्पनी भी उन्हें ’कनविंस’ करने में कोई कोर-कसर बाकि नहीं रखना चाहती थी। कम्पनी के सीनियर ऑफिशियल और मैनेजमैंट के साथ क्लाईंट की तकरीबन हर रोज़ वीडियो कांफ्रेसिंग के जरिए मीटिंग्स चल रहीं थी और प्रेज़ेंटेशंस के आदान-प्रदान का सिलसिला जारी था। इसलिए लगभग सभी एम्पलाईज को तरह-तरह की कवायद करनी पड़ रही थी। तकरीबन सभी के लिए ’लेट आवर्स’ तक रुकना अनिवार्य था। क्लाईंट अपने विशाल डाटाबेस की सुरक्षा को लेकर संशय में था और कम्पनी को अपनी तमाम विशेषज्ञता के बावजूद उसे इत्मिनान दिलाने में पसीने छूट रहे थे। कम्पनी किसी कीमत पर दोनो प्रोजेक्टस को हाथ से निकलना नहीं देना चाहती थी। मुश्किल ये थी कि एक तो क्लाईंट नये थे, दूसरे खुद कम्पनी ने भी इससे पहले इतने बड़े डाटाबेस को हैंडल नहीं किया था।

आखिरकार बात बनी लेकिन क्लाईंट की कुछ शर्तां पर। कैलिफोर्निया वाला क्लाईंट प्रोजेक्ट का कुछ हिस्सा फिलहाल परीक्षण के तौर पर देने को तैयार हो गया लेकिन यू.के. का क्लाईंट ये सुनिश्चित कर लेना चाहता था कि प्रोजेक्ट हमे सुपुर्द करने से पूर्व हमारे कुछ ’डाटाबेस एडमिनिस्ट्रेटर’ और सॉफ्टवेयर विशेषज्ञ प्रोजेक्ट की टेस्टिंग और सुरक्षा से सम्बिन्धित एक ’ट्रेनिग कम इंटेरैक्शन प्रोग्राम’ का हिस्सा बने। लेकिन शर्त ये थी इस ’ट्रेनिंग सैशन’ के लिए हमे अपने तीन या चार प्रोफेशनल्स की एक टीम लिसेस्टर. ईंग्लैड भेजनी होगी। कम्पनी ने फौरन हामी भर दी।

फिलहाल सभी ने इत्मिनान की सांस ली। दो हफ्ते से पड़ रहे अतिरिक्त वर्क लोड की सरदर्दी और देर शाम तक ऑफिस रुकने का सिलसिला आखिरकार खत्म हुआ था। मै भी एक बार फिर से अपनी सामान्य दिनचर्या के काम पर लौट आया।
दो दिन बाद शाम को टी ब्रेक के दौरान जब मै अपनी सीट पर बैठा चाय का इंतजार कर रहा था तो प्रोजेक्ट मैनेजर का बुलाया आया। मै उसके केबिन मे पहुंचा। मेरे अभिवादन करने और बैठने के बाद वो बोला, ’आकाश, तुम्हारी चाय मैने यहीं मंगा ली है। और कैसा चल रहा है ’
’सब ठीक है सर।’

’दैट्स गुड। आकाश, यू नो, यू.के. वाला प्रोजेक्ट हमारे लिए बहुत इंम्पोटैंट है। वुई विल बी अमग्स्ट टॉप थ्री ऑफ एशिया आफटर हैविंग दैट। यू.के. जाने के लिए मैनेजमैंट ने चार लोगो की टीम फाईनल कर ली है।अनफोर्चुनेटिली, सीनियर सिस्टम एनालिस्ट मिस्टर दवे को असिस्ट करने उनके साथ जाने वाले मिस्टर कुमार को अचानक टॉयफाईड हो गया है। वैसे तो ट्रेनिंग टीम को जाने मे अभी 15 दिन है, बट यू नो टॉयफाईड टेकस टाईम टू रिकवर। लगता नहीं कि वो टीम के साथ जा पाएं। मीनवाईल, हमे अपने अल्टरनेटिव्स तैयार रखने चाहिए। दो-तीन कैडीडेट्स के साथ मिस्टर दवे ने तुम्हारा नाम भी रिकमैंड किया है। तुम्हे कोई प्रोब्लम तो नहीं है?’

मुझे इसकी उम्मीद नहीं थी। हैरानी थी कि छह महीने पहले ज्वायन किए एक ट्रेनी सिस्टम एनालिस्ट को इतनी बड़ी जिम्मेवारी दी जा रही थी।
’सर, मैने तो सिर्फ छह महीने पहले ही ज्वायन किया है। फॉरेन क्लाईंट के साथ डीलिंग का मुझे कोई एक्सपीरियंस नहीं है।’ मैने अपनी शंका प्रकट कर ही दी।
इसी बीच चाय आ गई थी। मुझे चाय लेने का संकेत करते और अपना कप उठाता हुआ वो बोला, ’वो सब हम पर छोड़ दो। तुम्हारे साथ तीन सीनियर कुलीग होंगे, वो सब संभाल लेंगे। तुम्हे सिर्फ प्रोजेक्ट को समझना है। टेस्टिंग और ट्रबलशूटिंग पर ज्यादा फोकस करना है। मिस्टर दवे ने बहुत स्ट्रांगली तुम्हारा नाम रिकेमेंड किया है। आकाश, तुम्हारे लिए ये बहुत बड़ा एक्सपोजर होगा। बहुत कुछ सीखने को मिलेगा जो आगे बहुत काम आएगा।’
मै सोच में पड़ गया। प्रोजेक्ट मैनेजर जरुर मेरे रोमांचित होने की उम्मीद कर रहा होगा। सामान्य परिस्थतियों में मै शायद होता भी। लेकिन उसे क्या पता, ईंग्लैंड से मै किन्ही ओर अर्थों मे जुड़ा था।
’आकाश, मै समझ गया तुम क्या सोच रहे हो?’
मै चौंका। क्या समझ गया था वो ?
आई थिंक, यू डोंट हैव पासपोर्ट येट? एम आई राईट?’
’यस सर।’ मै जल्दी से बोला। ’मेरे पास पासपोर्ट नहीं है। कभी बनवाने की जरुरत ही नहीं पड़ी।’ मैने सोचा शायद बचने का मौका मिल गया।
’कोई बात नही। तुम्हारा पासपोर्ट कर्टसी कम्पनी रिसोर्सस, अरजेंटली तैयार हो जाएगा। उसकी चिंता मत करो। वन थिंग मोर, ट्रेनिंग प्रोग्राम सिर्फ पांच दिन का है। मैनेजमैंट ने एक हफ़ते का टूर अप्रूव किया है-यानि दो दिन आप लोग ईंग्लैंड की सैर कर सकते है। यू आर वैरी फारचूनेट, इतनी जल्दी कम्पनी के बिहाफ पर अब्रॉड जाने और वहां घूमने की सिचुएशन बन रही है। वैल आकाश, अगर इसके अलावा कोई डाउट या प्रॉब्लम हो तो मुझे कल तक फाईनल बता देना ताकि हम एक कैंडीडेट को सलैक्ट कर बाकि प्रोसीजर पूरा कर सकें। मै पर्सनली चाहता हूं कि तुम इस असाइनमैंट का हिस्सा बनो। अगर तुम कल हां करते हो तो हम किसी ओर कैंडीडेट को कन्सीडर नहीं करेंगे। थैंक्स एण्ड बैस्ट ऑफ लक।’ मैने उठकर हाथ मिलाते हुए उसका धन्यवाद किया और केबिन से बाहर आ गया।

वापिस अपनी सीट पर बैठते ही मैने आंखे बंद कर ली। ईंग्लैंड जाने के नाम से एक बार फिर वही परी चेहरा अपनी पूरी मासूमियत के साथ अवचेतन में आ खड़ा हुआ। छह महीने से उसकी कोई खबर मुझ तक नहीं पहुंची थी। अब तक तो वो लंदन पहुंचकर वहां सैटल भी हो चुकी होगी। इस बीच उसका कोई फोन या मैसेज मुझे नहीं मिला था। हैरानी थी कि रीना के जरिए भी उसकी कोई खबर मुझ तक नहीं पहुंची थी। घर पर फोन करने या घर से फोन आने पर न मै उसके बारे में पूछता और न ही रीना उसके बारे मे कुछ बताती। लंदन के प्रति उसकी दीवानगी देखकर तो यही लगता था कि वहां जाकर भला उसे हिंदुस्तान और उससे जुड़ी चीजें कहां याद रहीं होंगी। लंदन घूमने और वहां की लाईफस्टाईल की चकाचौंध में उसे हमारे फोन नंबर कहां याद रहें होंगे? लंदन जाने के नाम से प्रोजेक्ट मानो कहीं पार्श्व में चला गया था और उसे फिर से देखने और मिलने की सुप्त सम्भावना एकदम से सामने आ खड़ी हुई थी। ईंग्लैंड में प्रोजेक्ट से सम्बन्धित काम के बाद घूमने के लिए दो दिन हमारे पास थे। क्या नियती चाहती थी कि मै उससे फिर मिलूं - इस बार लंदन में।

मैने आंखे खोली और अनजाने में ही सामने रखे कम्प्यूटर पर ’गूगल’ में लिसेस्टर और लंदन का फासला देखने के लिए ’सर्च’ में डाला। सड़क से तकरीबन दो घंटे का फासला। मै वहां उससे आसानी से मिल सकता था। उसका वहां का पता रीना के जरिए उसके घर से मिल जाएगा। मुझे वहां देखकर वो हैरान हो जाएगी। मगर अब वो पहले वाली विरहिन नायिका थोड़े ही होगी। अब तो वो साहिल के साथ बहुत खुश होगी। उसके साथ किसी और के होने के ख्याल से ही दिल में हूक सी उठी। उसका ये रुप मेरे ख्यालों में बसे उसके अक्स से दूर-दूर तक मेल नहीं खाता था। इस सब से बचने के लिए ही तो मै यहां आया था और अब वही सब कुछ अनचाहे ही यहां भी मेरे दिलो-दिमाग को अपनी गिरफ्त मे ले रहा था। मन फिर उसी ओर खिंचा जा रहा था। अगर मै वहां उससे ना भी मिला तो भी उसके वहां होने के अहसास से खुद को एक पल को भी महरुम रख पाना मेरे लिए मुहाल होगा-ये बात वहां जाने से पहले ही तय थी। एैसे में काम पर क्या खाक ध्यान दे पाउंगा। अच्छा हुआ अभी मैने वहां जाने के लिए हां नहीं कहा। ये यू,एस, वाले क्लाइंट ने एैसी ट्रेनिग के लिए बुलाया होता तो और बात होती। दवे सर को भी मेरा ही नाम सुझाना था। खैर, प्रोजेक्ट से अलग होने के लिए कोई ठोस कारण प्रोजेक्ट मैनेजर को बताना जरुरी था। क्या पता मिस्टर कुमार ही तब तक ठीक हो जाए। देखते है क्या होता है।

संयोग से शाम को ही घर से आए एक फोन ने मुझे इस पशोपेश की स्थिती से निज़ात दिला दी। अगले रविवार रीना को देखने लड़के वाले आने वाले थे और इस लिहाज़ से मेरा वहां मौजूद होना बहुत जरुरी था। प्रोजेक्ट पर जाने से इंकार करने की वजह मुझे मिल गई थी। छुटृटी लेकर ही इस टूर पर जाने से बचा जा सकता था। वैसे भी ज्वायन करने के बाद से ही मैने कोई छुटृटी नहीं ली थी। अगले दिन सुबह ही मैने प्रोजेक्ट मैनेजर को स्थिती से अवगत करा एक सप्ताह की छुटृटी के लिए भी आवेदन कर दिया। इतनी छोटी वजह से इंग्लैंड जाने से इंकार करने पर मुझे अजीब नज़रों से तो देखा गया लेकिन मेरा आवेदन मंजूर कर लिया गया। मैने चैन की सांस ली। इन हालात में मुझे नौकरी गवाने की शर्त पर भी इस प्रोजेक्ठ का हिस्सा बनना गवारा ना होता।
कई घंटो के थका देने वाले सफर के बाद जब मै अपने शहर के स्टेशन पर उतरा तो शाम होने को थी। कभी अपनी सी लगने वाली शाम अब अजनबी सी लग रही थी। घर के सामने की सड़क पर पहुंचकर पांव अपने आप थम गए। शाम का धुंघलका अभी फैला नहीं था। घर के पीछे के कतारबद्ध युकेलिप्टस तेज हवाओं के साथ झूम रहे थे। झूमते पेडों के पीछे उसके घर की छत और पेड़ों के बीच बनी उसके घर तक जाती लम्बी पगडंडी- सबकुछ एकदम वीरान और उदास। उसके साथ गुजरी उन अनगिनत शामों की दुनिया में गुम हो जाने से मैने खुद को बमुश्किल रोका। दर्द की एक अनजानी कसक का आवेग वजूद को भीतर तक झकझोर गया। एक लम्बी सांस लेकर मै घर में दाखिल हो गया।

परिवार के सदस्यों के साथ चाय पीते, सबके बारे में मालुमात करते, अपने बारे में बताते तथा हल्की-फुल्की हंसी मजाक से मन कुछ हल्का हुआ। रीना के होने वाले रिश्ते की बाबत पूछने पर यकायक सब खामोश हो गए। फिर सब हंसने लगे। मै हैरानी से सबके चेहरे देखने लगा।’रीना की बच्ची, ये सब क्या चक्कर है। मुझे पहले कुछ नहीं बताया और अब भी कोई कुछ नहीं बता रहा।’
’चक्कर-वक्कर कुछ नहीं है भैया। पहले पुराने रिश्ते सिरे चढ़ेंगे फिर नये रिश्तों की बात होगी।’
’ये क्या पहेलियां बुझा रही है? कौन से रिश्तों की बात कर रही है? और सबकुछ एक ही बार में बताने की कृपा कर जरा।’
’आपके सभी सवालों का जवाब स्टडी रुम में है। बस इससे ज्यादा मत पूछना।’ रीना ने हंसते हुए ही जवाब दिया।
सस्पैंस और धड़कते दिल के साथ मैने स्टडी रुम में प्रवेश किया। सबकुछ वैसा ही था जैसा मै छोड़कर गया था। हर चीज वैसे ही करीने से लगी थी। टेबल, कुर्सी, कम्प्यूटर, शेल्फ में लगी किताबें और इन सब से बढ़कर-स्टडी रुम में महकती उसकी खुश्बू। क्या वो यही कही आसपास है या मेरा वहम है। कम्प्यूटर का मॉनीटर ऑन था यानि अभी-अभी किसी ने प्रयोग किया था। यकीनन ये मेरा वहम नहीं था। रीना पीछे-पीछे आ गई। मैने उसकी ओर प्रश्नसूचक नजरों से देखा।
’वो यहां हर रोज़ आती है। पहले की तरह कम्प्यूटर पर काम करती है। कभी आपके कलैक्शन से कोई बुक पढ़ती है और चुपचाप चली जाती है।’
मै सोच में पड़ गया।
’तुमने इस बारे मे मुझे कभी बताया क्यों नही?’
’उसने बताने से मना किया था। वो बहुत गुमसुम और चुपचाप रहती है। उसे बिना बताए आपको बहाने से बुलाया है।’
’पर वो है कहा? यहां तो कोई नहीं है।’
’अभी तो यहीं थी। शायद पिछले दरवाजे से चली गई। देर शाम जाने के लिए वो स्टडी का पिछला दरवाजा ही प्रयोग करती है।'
पिछला दरवाजा खोलकर मैने दूर तक नज़रे दौड़ाई। बाहर रात हो चुकी थी। सर्दी का मौसम दस्तक दे रहा था। दूर तक लगे कतारबद्ध पेड़ लगातार झूम रहे थे। वो कहीं नज़र नहीं आ रही थी। मै बाहर निकलकर पेड़ों के साये के बीच बने रास्ते पर आगे बढ़ा। तेज चलती हवाओं ने बाहर ठंडक बढ़ा दी थी। काफी दूर एक कोने में लगे बैंच पर कोई बैठा था। ’ये बैच यहां पर कहां से आ गया। पहले तो नहीं था।’ मै आगे बढ़ा और वहां बैठे साये के करीब पहुचा। वही थी-बरसों से अपने प्रेमी की बाट जोहती मेरी विरहन नायिका। बिल्कुल वैसे ही जब मैने पहली बार उसे किसी ठ्रेजिक नॉवल की नायिका की तरह गहरी सोच में डूबे हुए छत पर ठहलते देखा था। मुद्दतों दुआओं में मांगे जाने वाली उस मन्नत की तरह वो मेरे सामने थी जिसके पूरे होने की उम्मीद मै कब की छोड़ चुका था। मै उसके करीब पहुंचा। मुझे सामने पाकर वो उठ खड़ी हुई। शाल से अपने जिस्म को अच्छी तरह लपेटे, हवा में उड़ते खूले बाल। खूबसूरती के अब तक दिए मायनो को अगर कोई शक्ल देना चाहे तो यकीनन वो उसका ही चेहरा होगा। उसका संजीदा चेहरा भी उसकी खूबसूरती को नये आयाम दे रहा था। मेरी मंजिल एक बार फिर मेरे सामने थी। ’हसरते-दीदार ने दिए हैं इतने धोखे, वो सामने बैठे हैं यकीं हमको नहीं है।’ उसे देखकर न जाने क्यों खुद ब खुद ज़हन में शेर गूंजने लगते हैं। मैने सिर को हल्का झटका दिया और उससे मुखातिब हुआ।
’मोहतरमा क्या मै पूछ सकता हूं, इतनी ठंड में आप यहां क्या कर रहीं हैं?’
’बस जाने ही वाली थी। आप कब आए?’ अनायास मुझे सामने पाकर वो कुछ अनमनी सी हुई। फिर सहज हो गयी।
’पूजा, नाओ दिस इज नॉट फेयर एट ऑल! तुमने मुझे बताया क्यों नहीं कि तुम यहीं हो।’
वो हल्के से हंसी-’एक बार आपने नहीं बताया था, इस बार मैने नहीं बताया। हिसाब बराबर।’
मै हड़बड़ाया। ’तो क्या ये सब आपने हिसाब बराबर करने के लिए किया? हमारे बीच क्या कोई कम्पीटिशन हो रहा है।’
’आपसे तो नही, शायद मेरा खुद से कम्पीटिशन चल रहा था। एक कश्मकश जो दिलो-दिमाग में चल रही थी।’ उसने खोये से स्वर मे कहा।
’फिर फाईनल रिजल्ट क्या रहा?’ उसके चेहरे के भाव पढ़ने की कोशिश करते मेरे मुंह से निकला।
’फाईनल रिजल्ट!’ उसने एक लम्बी सांस ली। फिर चारो और नजरे घुमाते हुए झूमते पेड़ो पर नजर डालकर बोली-’उसका तो पता नही।...बस यहां बैठकर बहुत सकून मिलता है।
मैने आसपास के माहौल पर नज़र डाली। दूर-दूर तक खामोशी। उस खामोशी के बीच सिर्फ हवाओ की सरसराहट न जाने क्या कहना चाह रही थीं।
यकीनन बहुत कैजुअल, बेफिक्र और प्रैक्टिकल पूजा से निहायत अलग पूजा मेरे सामने थी।
’अच्छा ये बताओ, कैसी हो?
’देखो आपके सामने बिल्कुल ठीक-ठाक खड़ी हूं। फिट एंड फाईन। और आप कैसे हैं और साथ में आपका बंगलूरु?’
’मै भी ठीक हूं और बंगलूरु भी-यानि ऑल इज वैल।’ मै हंसा। ’लेकिन मुझे बंगलूरु से ज्यादा लंदन में इंटरेस्ट है। लंदन-वहां का माहौल, लाईफस्टाईल और सबसे बढ़कर लंदन रिटर्नड साहिल। सब कैसे है?’
उसने एक लम्बी सांस ली, फिर धीरे से बोली-’हम बैठ जाएं....।
’हां-हां श्योर।’ मुझे पहली बार अहसास हुआ कि हम खड़े थे। उसने शाल उतार कर एक बार फिर अपने जिस्म के चारो और अच्छी तरह लपेट ली। हम बैंच पर बैठ गए। तेज हवाओं से उसके रेशमी बालों का बेतरतीब होकर जब तब उसके चेहरे पर आ जाना उसकी खूबसूरती को जैसे एक नयी तरतीब दे रहा था। ’ना चली एक भी बाद-ए-सबा की, बिखरने में भी उनकी जुल्फ बना की।’ फिर कमबख्त शेर। उस परी चेहरे की सोहबत में पता नहीं क्यों लगता था सारी बाते शायरी मे की जाए।

चेहरे पर अठखेलिया करते बाल पीछे करते हुए उसने संजीदगी से कहना शुरु किया-शायद मै साहिल, लंदन, वहां की लाईफ के अलावा कभी कुछ ना सोच पाती, अगर मै आपसे ना मिली होती। आपके जाने के बाद जब साहिल वापिस आया तो जब भी मै उससे मिलती, पता नहीं क्यों उसे आपसे कम्पेयर करती और हमेशा मायूस होती। वो मुझमें सिर्फ एक फ्यूचर बिजनेस वुमैन देखता जो फाईल उठाए उसके पीछे-पीछे घूमती रहे। मुझे कभी नहीं लगा कि उसकी नज़रो में मेरी अहमियत शाम को होनेवाली बिज़नेस सर्किल पार्टीज में कार्पोरेट ड्रेस में सजी, होंठो पर नकली मुस्कान का आवरण चढ़ाए एक अदद खूबसूरत बिज़नेस ओरिएंटड बीवी से ज्यादा होगी। मैने अपनी उन शामों की तुलना जब आपके साथ बिताई शामों से की तो मुझे लगा-बेशक मुझे किसी चीज की कमी नहीं होगी लेकिन मै एक बनावटी दुनिया का हिस्सा बनने जा रही हूं।पता नहीं क्यो मुझे लगता कि वो मुझसे आपके जैसे दुनिया जहान की बातें करे, मुझे हंसाये, अपने साथ मेरी सोच को भी अहमियत दे। पर उसकी बातों का टॉपिक कभी बिज़नेस और पैसे से आगे कभी बढ़ ही ना पाया। तब मुझे लगा बेशक लंदन, वहां का मौसम और लाईफस्टाईल चाहे कितना भी अच्छा हो-जल्द ही एैसे माहौल में मेरा दम घुट जाएगा। मुझे लगता वो सब पाकर भी मै अपनी कोई कीमती चीज़ खो दूंगी।...और आकाश ये अहसास मुझे आपके साथ गुज़ारे उन दो महीनों की वज़ह से हुआ।’ उसने मेरी ओर देखा फिर सर झुका लिया।
मै उसका चेहरा देखता रहा। कुछ पल मै विचानमग्न रहा। ’फिर साहिल का क्या हुआ?’

उसने चेहरा उठाया और सामने देखती हुई बोली-’हम लगातार मिलते रहे पर मै कभी खुद को अपनी बाकि ज़िंदगी उसके साथ बिताने के लिए तैयार नहीं कर पाई। हां- हर बार मिलने पर मेरा ये विश्वास जरुर मजबूत होता गया कि हमारा परफैक्ट मैच नहीं है।...और एक दिन मैंने उससे साफ कह दिया कि हम एक दूसरे के लिए नहीं बने हैं। मेरा लंदन जाने और उसके बिजनेस में कोई इंटरेस्ट नहीं है। मुझे यहीं रहना है।’
’वो मान गया?’

’वो हैरान तो हुआ। कहने लगा अब्रॉड जाने और वहां सैटल होने का सपना तो तकरीबन हर दूसरी लड़की देखती है। इस मौके को ज़ाया करके मै बड़ी बेवकूफी कर रही थी। लेकिन जैसे कि मुझे उम्मीद थी, उसे इस फैसले से कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ा। मेरी एैसी सोच उसके फ्यूचर बिजनेस प्लान से मेल नहीं खाती थी। सो उसने खुशी-खुशी इस फैसले को मान लिया। वो इन बातों मे बहुत प्रैक्टिकल है।’
’तुम प्रैक्टिकल नहीं हो?’ मेंरे मुह से निकला।

वो कुछ कहते रुकी। फिर हल्के से हंसी-’पता नहीं ..। पर पहले थोड़ी मतलबी जरुर थी। शुरु में कुछ चीजे मैने आपसे सिर्फ अपने मतलब के लिए सीखीं ताकि मै साहिल को बताकर इम्प्रैस कर सकूं कि मै यहां उसके बिजनेस में काम आने वाली चीजें सीख रही हूं। मै भी कितनी बेवकूफ थी। जिन चीजों को मैने ज़िंदगी का अहम हिस्सा या टार्गेट समझा, वो अंदर से बहुत खोखली और बनावटी निकलीं। मुझे लगता था ज़िंदगी की हर खुशी लग्ज़री, चमक-दमक और हाई प्रोफाईल लाईफस्टाइल में छिपी होती है। पर अब लगता है हमारी खुशियां मैटेरीयलिस्टिक दुनिया से नहीं बल्कि हमारे भीतर से जुड़ी होती हैं जो किसी भी छोटी सी बात या लम्हा जो दिल को छू जाए तो खुद ब खुद बाहर आ जाती है और तब सब अच्छा लगने लगता है। बहुत ज्यादा प्रैक्टिकल होने से हम खुदगर्ज़ होकर कई अच्छी चीजों से वंचित हो जाते है। फेसबुक पर किए चंद पोस्टस या फोन पर शेअर किए गये कुछ कमेंटस से किसी की लाईफ का एक छोटा सा फेज़ ही जाना जा सकता है और इस बेस पर ज़िदगी के फैसले लेना किसी भी हाल में कोई प्रैक्टिकल फैसला हरगिज़ नहीं कहलाएगा। मेरे ख्याल से तो सही मायनों में मै अब प्रैक्टिकल हुई हू। ज़िंदगी का कम्पलीट फेज तो किसी से फेस टू फेस ही जाना जा सकता है। साहिल पर खड़े रहकर भला कभी सागर की गहराई जानी जा सकती है। मैने आपकी ही किसी किताब में एक शेर पढ़ा था-महरूम-ए-हकीकत हैं साहिल के तमाशाई, हम डूब के समझे हैं दरियाओं की गहराई।

उसका फलसफाना अंदाज और ऐसा सटीक शेर। उसके खुबसूरत होठों पर लफज़ो की एैसी इंकलाबी बयार। ज़हेनसीब...।

’सॉरी आकाश आपके जाने के बाद आपके बुक्स कलैक्शन की तकरीबन सारी किताबें पढ़ डालीं।’ उसने खेदपूर्ण मुस्कुराते हुए कहा। मेरे लिए ये सब उसकी शख्सियत का एक नया आयाम था। अब मुझे हमारी आखिरी मुलाकात में उसकी कही बात का मतलब समझ आ रहा था। उसने सचमुच खुद को बदल कर दिखाया था। मैने आसपास के माहौल पर नज़र डाली। चांदनी रात, मदमस्त झूमते पेड़, सर्द रोमांचक हवाएं और सब से बढ़कर उसका मेरे बहुत करीब होना। सबकुछ एकाएक फिर से अपना सा लगने लगा है। तेज हवा में उड़ते उसके लम्बे बालों की लटे अब बेकाबू होकर यहां-वहां मेरे चेहरे को छूकर मानो इस अपनेपन की तसदीक कर रहीं थी। मै इस सब को जज़्ब कर लेना चाहता था।
’तुम रोज़ यहां आती हो?’
’हां। आपको अपने नायक का इंतज़ार करती विरहन नायिका पसंद है ना इसलिए।’
’ओ कम ऑन पूजा! वो सिर्फ मेरी कल्पना थी। इस तरह तुम्हारा रात को यहां अकेले बैठना ठीक नहीं है।’
’लेकिन मुझे तो अच्छा लगता है। मै वो सब करना चाहती हूं जैसी आपने मेरे बारे में कल्पना की थी। पहले का तो पता नहीं पर अब जरुर खुद को दूर परदेस गये अपने नायक का इंतजार करती किसी ट्रेजिक रोमांटिक स्टोरी की विरहन नायिका की तरह ही महसूस करती हूं। आपने जरुर सच्चे दिल से कल्पना की होगी तभी तो हकीकत में बदल गई।’
हे भगवान, मैने तो यहां से जाने के बाद इसके बारे मे क्या-क्या सोच लिया था कि पूजा कब की लंदन जाकर सब कुछ भुलाकर वहा सैटल भी हो गई होगी। उसके लंदन में होने के ख्याल की वजह से मै यहां वापस लौटा जबकि वो यहीं मेरा इंतजार कर रही थी।

मन में उसके लिए आए नये भावों के साथ मैने उसकी ओर देखा।

’और हां’-वो कहे जा रही थी-’ मै अब भी रो़ज़ आपका कम्प्यूटर यूज करती हूं। मैने टाइपिंग सीख ली है। रोज़ प्रैक्टिस करती हूं, टाईपिंग स्पीड भी काफी अच्छी हो गई है। जनाब का कभी कोई नावल या स्टोरी लिखने का इरादा बने तो बता देना। टाईपिंग का जिम्मा मेरा।’
दिल तो उस के सामने नतमस्तक होने को कर रहा था। पर फिर भी इतना तो मैने किया कि उसके साथ से उठकर उसके सामने जमीन पर घुटनों के बल बैठ गया। वो असमजंस में खड़ी होने को हुई पर मैने ऐसा ना करने ना दिया।
चांदनी में नहाए उसके चेहरे पर बेतरतीब उड़ती जुल्फों को एक एक कर सलीके से पीछे करते हुए मैने कहा-’इतना हसीन टाईपिस्ट अगर मुफ्त़़ में मिलेगा तो कौन कमबख्त इंकार करेगा।'

उसने धीरे से आंखे बंद कर ली।

' लेकिन एक छोटी सी शर्त है?’
उसने अर्धमुंदी आंखों से प्रश्नसूचक अंदाज़ में धीरे से गर्दन हिलाई।
’किसी ने कहा था कि मै अपनी बात से बहुत से लोगों को इंम्प्रैस कर सकता हुं। इसलिए अभी ये अहसास हुआ कि ये जॉब वगैरह का चक्कर छोड़कर क्यों ना फुल टाईम लिखने का काम ही शुरू कर दूं। पर क्योंकि मेरा इरादा कोई एक नॉवल या स्टोरी लिखने का नहीं है, इसलिए इसके लिए मुझे एक फुल टाईम टाईपिस्ट के साथ एक फुल टाईम प्रेरणा की भी जरुरत होगी।....और वो भी ताउम्र। खुशकिस्मती से दोनो इस वक्त मेरे बहुत करीब हैं। बोलो मंजूर है?’ मैने उसकी गोद में रखे उसके नाजुक हाथों को धीरे से अपने हाथों में ले लिया।
उसका मुस्कुराकर सिर झुकाना एक बार फिर से मेरे ख़्वाब सरीखे दिनों की कभी ना ख़त्म होनेवाली शुरुआत थी।



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