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@dawriter

खामोशी ...…...! कभी कभी हाल भी है ।

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nehabhardwaj123 by  
nehabhardwaj123

पिछले कुछ दिनो से किशोर और आस्था के बीच सब सही नही है । किशोर आज-कल अपने काम मे कुछ ज्यादा ही मसरूफ़ सा रहने लगा और उधर आस्था पिछले 10-15 दिन से महसूस कर रही थी , कि उसे आस्था मे और उसकी बातो मे कोई खासा दिलचस्पी नही थी , पर उसके सब्र का बाँध उस समय टूट गय़ा जब पिछले एक सप्ताह से उसके पापा हॉस्पिटल मे थे और किशोर ने उन्हे एक बार भी फोन करके उनका हाल जानने की कोशिश नही की । आस्था अपना गुस्सा निकालना चाहती थी ,पर किशोर के पास तो बात करने का भी समय नही था ।...आस्था अंदर ही अंदर घुट रही थी.... कुछ पापा की बीमारी की वजह से....। और कुछ किशोर के बर्ताव की वजह से। इसलिये अब उसने किशोर कॊ कुछ भी कहना छोड़ दिया । उसके ऑफिस के बारे मे या घर मे रोज की घटनाये जिनके बारे रोज रात कॊ बिस्तर पर लेटकर घंटों बाते करते थे । अब बहुत पुरानी हो चुकी थी अब बिस्तर पर लेटते ही दोनो सो जाते थे । कभी कभी किशोर कॊ घर आकर भी काम करना पड़ता था । आस्था समझ सकतीं थी की उस पर काम का बोझ कुछ ज्यादा हो गय़ा । पर फ़िर भी किशोर से ऐसे रूखेपन की उसे कतई उम्मीद नही थी । इसीलिये अब आस्था ने सोच लिया था कि वो ये सब सही कर के रहेगी । पर कैसे ?..... आस्था तो अब कमरे मे आते ही चादर तान कर सोने लगी थी और किशोर भी ऐसे ही बस अलग - अलग सा हो गय़ा था । आस्था इसका कोई हल चाहती थी..... पर क्या करे....? यही वो पूरा दिन सोचती । एक दिन उसकी नज़र कोने मे टेबल पर पड़ी डायरी पर गयी । तभी उसे ख्याल आया कि क्यों ना ?.... लिख कर अपनी बात किशोर से कह दे उसने तभी एक पेपर पर कुछ लिखा और उसे किशोर के पर्स मे डाल दिया । अब वो पूरा दिन किशोर के जवाब का इन्तेज़ार कर रही थी पर किशोर ने भी उसका जवाब उसी की तरह ही दिया । जहाँ आस्था ने लिखा हुआ था
" तुम्हारे लिये मेरे हर रिश्ते की कीमत भी उतनी ही होनी चाहिये , जितनी तुम्हारे हर रिश्ते की मेरे लिये है ।।
मै भी तुमसे उतनी ही उम्मीद करती हूँ ,जितनी तुम मुझसे ।।
अगर तुम रिश्तों का आदर नही कर सकते तो शायद !...मै भी नही कर पाऊंगी " ॥
उसी के नीचे किशोर का जवाब कुछ ऐसा था ।
" मै तुमसे पूर्ण संतुष्ट हूँ और अगर मैंने तुम्हे कोई दुख दिया तो उस पर मरहम की जिम्मेदारी भी मेरी "।।
ये पढ़ कर आस्था की आँखे चमक उठी और वो रात कॊ किशोर के घर आने का इन्तेज़ार करने लगी , पर रात कॊ उसे किशोर के बर्ताव मे कोई फर्क नही लगा इसलिये वो आज भी चादर ले कर सोने चली गयी पर जब थोड़ी देर बाद किशोर नही आया तो उसने देखा..... कि हॉल की लाइट खुली हुई थी.....और किशोर किसी से फोन पर बात कर रहा था और कह रहा था.......यहाँ सब सही है बाऊजी !.. अगर छुट्टी मिली तो अगले महीने आने की कोशिश करते है । ये सुन कर आस्था कॊ बहुत सुकून मिला क्युँकि ?....पापा की तबियत मे भी एक दो दिन से थोडा सुधार था । आस्था वापस आकर बिस्तर पर लेट गयी और सोचने लगी की ये तरीका कितना सरल था जिसमे ना लड़ाई बढ़ने की गुंजाइश ना अपशब्दों का इस्तेमाल । इस घटना कॊ 4-5 दिन बीत चुके थे । दोनो के रिश्ते ने अब अपने पुराने ढर्रे पर आना शुरू कर दिया था । पर दोनो हर विषय पर बात करते थे, लेकिन इस पर दोनो ने ही चुप्पी साध ली थी कि जैसे कुछ हुआ ही ना हो |
अगर देखा जाये तो हर लड़ाई या गिला-शिकवा बैठ कर बात-चीत से हल हो सकता है | पर कभी-कभी बात चीत मे बात बिगड़ने का डर भी रहता है | इसीलिये कहीँ ना कहीँ आस्था ने अब ये निश्चय कर लिया था कि पहले शांत तरीके से अपनी हर परेशानी कॊ हल करने की कोशिश किया करेंगे | क्युँकि !.... अगर बात मे बात बिगड़ जाये तो घर के बाकी सदस्य भी उससे प्रभावित होते है कुछ सकारात्मक और कुछ नकारात्मक ! सकरात्मक वो..... जिन्हे आपसे प्यार है और आपकी परवाह है जो नहीँ चाहते , आप दोनो के बीच मे मन मुटाव हो और वो आपकी लड़ाई सुलझ जाने के बाद भी उसकी गहराई मे उलझे रहते है वो पल पल इसी से डरते की आप लोगों के बीच कहीँ कोई परेशानी तो नहीँ है ।
और दूसरे वो जिन्हे आपके रिश्ते के सही या खराब होने से कोई फर्क नहीँ उन्हे बस ये मनोरँजन से बेहतर कुछ नहीँ लगता ।
तो ये समझदारी दोनो की और से ज़रूरी है । कि उसे कैसे हल किया जाये ॥



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