12
Share




@dawriter

कुत्ता चीज़

1 89       
Rajeev Pundir by  
Rajeev Pundir

कुत्ता चीज़

वो मेरे ठीक सामने बैठी थी। हम लगभग चार या पांच साल के बाद मिल रहे थे। मैंने दो कप Coffee का order दिया और उसकी तरफ देखा। हालाँकि उसके होंठो पर मुस्कुराहट थी मगर आंखे बोल रही थी कि भीतर कहीं गहरी उदासी दबी पड़ी है।


"कैसी हैँ आप?" मैने धीरे से पूछा।
"ठीक ही हूँ," उसके जवाब मेँ जो दर्द था वो मैँ भाँप गया था। कहीँ न कहीँ मैँ भी उसके लिए जिम्मेदार तो था।
"शादी हो गयी?" मैंने झिझकते हुए पूछा।
"हाँ। देख नहीं रहे ये सिन्दूर?" उसने अपने सिर की तरफ ईशारा करते हुए कहा।
"ओह। Sorry, मैंने ध्यान नहीं दिया।"मैं सकपकाते हुए बोला।
थोड़ी देर की चुप्पी के बाद-
"कैसा चल रहा है?" मैंने कुछ सहानुभूति दर्शाते हुए पूछा।
"कुछ नहीं सबका वही हाल है। दूसरी औरतों का चक्कर!" और उसने मेरी तरफ हिकारत भरी नजरें फेरी।


मैँ थोड़ी देर चुप रहा।


"हाँ। आदमी है ही बड़ी कुत्ती चीज़।" मेरी आवाज़ मेँ निर्ल्लजता और अपराध-बोध दोनों का समावेश था जो उसे पसन्द नहीं आया।


"कुत्ती नहीं, कुत्ता चीज़! Don't discriminate sex-wise." उसने तपाक से कहा और मेरी तरफ कुछ क्रोध से और कुछ नफरत से देखा।
"हाँ हाँ...कुत्ता चीज़।" मैने उसकी हाँ में हाँ मिलाई।मुझे लगा जैसे किसी ने मेरे मुंह पर तमाचा जड़ दिया हो.


और फिर वहाँ गहरा सन्नाटा छा गया।

लेख़क : राजीव पुंडीर

 



Vote Add to library

COMMENT