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@dawriter

कसक

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अमीना ने जैसे ही दरवाजा खोला, देखा कि सामने से मेधावी चली आ रही है। सुबह–सुबह किधर जाया जा रहा है? पास आने पर अमीना ने मेधावी से पूछा।

अरी! अमीना तुझ से ही मिलने आ रही हूँ।

तो फिर आ अन्दर, बैठ कर बात करते हैं।

इसके बाद दोनों सहेलियां कमरे के अन्दर बैठ कर बातें करने लगीं।

अमीना ने पूछा -आजकल तेरी बंगला काल़ोनी का क्या हाल है?

मेधावी ने ठंडी आह भरी! और फिर कहने लगी अब हमारी बंगला कालोनी कहाँ रही? कभी यह बंगला कालोनी हुआ करती थी, जब यहाँ पर कोठी बंगले हुआ करते थे। अब तो यहाँ पर, बस फ्लैट ही फ्लैट नजर आते हैं। अब इसे फ्लैट कालोनी कहो तो ज्यादा अच्छा है। 

सब वक्त की बात है, वक्त हमेशा एक सा नहीं रहता, अमीना ने कहा।

वह तो मै देख ही रही हूँ! वक्त इतना तेजी से बदल जाता है, पता न था? मेधावी ने कहा।

और क्या बदल गया? अमीना ने पूछा

अब यह भी कोई बताने की बात है? मै एक घंटे से बक–बक किये जा रही हूँ और एक तू है कि न तो चाय को पूछती है और न ही पानी क़ो! मेधावी की बात सुन कर, अमीना शर्मिंन्दा होते हुए बोल उठी! हाय राम! म़ैं भी कितनी बाबली हूँ? कि चाय–पानी तक पिलाना भूल गयी? मैं अभी आती हूँ, तू बैठ, कह कर झट से किचन में पानी लेने चली गयी। जैसे ही अमीना पानी लेकर आयी

मेधावी ने अमीना से कहा– अमीना बैठ, तुझ से जरूरी बात करनी है।

ना बाबा न! अब मैं पहले वाली गलती नहीं करने वाली। पहले तू चाय पी, फिर आगे बात होगी।

चाय नाश्ता करने के बाद अमीना ने पूछा–अब बता, मेधा्वी क्या बात करनी है?

मेधा्वी ने पूछा– सच बता! अमीना क्या तू जन्म से मुसलमान है या शादी के बाद मुसलमान बनी है?

मैं त़ो जन्म से ही मुसलमान हूँ। मेरी अम्मी और अब्बा पास की ही कालोनी में रहते हैं। पर तू मुझ से यह सब आज क्यों पूछ रही है। पहले तो कभी भी, आज तक यह सवाल नहीं पूछा? फिर आज क्यों ?

सच कहूँ! बुरा तो नहीं मानेगी ? तू जन्म से मुसलमान है ही नहीं।

तो पंडित जी! आपने मेरा हाथ देख कर जाना है आपने?

नहीं! तू तो बुरा मान गयी। चल छोड़, नहीं बताना चाहती तो मत बता! कोई बात नहीं।

बात है। तूने यह बात मेरे बारे में कैसे कही?

अमीना सच कड़वा ह़ोता है। कभी कभी बहुत चुभने वाला भी। लेकिन सच त़ो सच ही होता है। जानना चाहती है कि यह सच मैने कैसे जाना तो सुन। इन्सान जब सोच समझ कर बोलता है तो वह कोई गलती नहीं करता। लेकिन जब वह आवेग में, भावावेश में या उल्लास में ब़़ोलता है तो वह बात भी बोल जाता है जो उसके अतीत की झलक दिखला जाता है। तुम्हारे साथ भी आज यही हुआ।

मैं समझी नहीं मेधावी! तुम क्या कह रही हो? मैने आज ऐसा क्या कहा?

अरे पगली “हाय राम” का प्रयोग क्या कोई मुसलमान करता है?

इतना सुन कर अमीना गुम सुम सी हो गयी। फिर थोड़ी देर बाद बोली – मेधावी तुम सच में मेधावी ह़ो। तुम केवल नाम से ही मेधावी नहीं हो, बल्कि अक्ल से भी मेधावी हो। जो बात पिछले दस साल से कोई न जान सका, वह तुमने इतनी आसानी से जान ली।

अमीना मैं तुम्हारी अच्छी सहेली हूँ। क्या अब भी तुम अपने दिल की बात नहीं बताओगी ?

मेधावी बताऊँगी ! तुम्हें तो जरूर बताऊँगी।

इसके बाद, अमीना कहने लगी– मेधावी तेरी बात सच है कि मैं जन्म से मुसलमान नहीं हूँ। मैंने शादी के बाद ही इस्लाम धर्म कबूल किया। मैं तो माथुर परिवार से थी। हमारा मध्यंमवर्गीय परिवार था। मैं चार भाई बहनों में सबसे छोटी थी। परिवार में छोटी होने के कारण सबकी लाडली भी थी। लेकिन आज उन सब से दूर एक बेगानी सी पड़ी हूँ। मेरी जिंदगी में यह बदलाव तब आया जब मैं दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कालेज से बी. काम कर रही थी। उसी कालेज में साहिल के पापा भी पढ़ते थे। एक दिन कालेज लायब्रेरी में उनसे मुलाकात क्या हुई कि फिर हम आये दिन मिलने लगे। यह सिलसिला इतना बढ़ा कि आखिर हमने शादी करने का फैसला कर लिया।

इसके बाद जो होना था, वही हुआ। शब्बीर का परिवार इसके लिए रजामंद न था। जहाँ तक मेरे माँ–बाप की बात है वे भी इस रिश्ते के सख्त खिलाफ थे। लेकिन हमारे बुलंद इरादों के आगे किसी की एक न चली।

नतीजा यह हुआ कि शब्बीर के परिवार वालों ने तो हमारे रिश्ते को कबूल कर लिया। लेकिन मेरे माँ–बाप ने मुझ से अपना रिश्ता हमेशा–हमेशा के लिए तोड़ दिया। वो दिन है और आज का दिन है, उन्होंने पीछे मुड़कर आजतक नहीं देखा कि मैं जिंदा हूँ या नहीं। रिश्ते टूटने की कसक क्या होती है, वह मुझसे बेहतर कौन जान सकता है। हम उनमे से हैं जो आज भी उन रिश्तों को याद कर तड़पते हैं।

यह कह कर अमीना फफक–फफक रो पड़ी।

मेधावी उसके आँसू पोंछने की कोशिश रही थी लेकिन आँसू थे कि रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे।

Image Source: lifeofmuslim



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